बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८ नारदीयपुराणम्
यद्दत्त्वा मोक्षमाप्नोति लिङ्गदानं तथा स्मृतम् । ब्रह्माण्डकोटिदानेन यत्फलं लभते नरः ॥१०३॥ तत्फलं समवाप्नोति लिङ्गदानान्न संशयः । शालग्रामशिलादाने ततोऽपि द्विगुणं फलम् ॥१०४॥ शालग्रामशिलारूपी विष्णुरेवेति विश्रुतः । यो ददाति नरो दानं गृहेषु बहलां प्रभो ॥१०५॥ गङ्गास्नानफलं तस्य निश्चितं नृप जायते । रत्नान्वितसुवर्णस्य प्रदानेन नृपोत्तम ॥१०६॥ भुक्तिमुक्तिमवाप्नोति महादानं यतः स्मृतम् । नरो माणिक्यदानेन परं मोक्षमवाप्नुयात् ॥१०७॥ ध्रुवलोकमवाप्नोति वज्रदानेन मानवः । स्वर्गं विद्रुमदानेन रुद्रलोकमवाप्नुयात् ॥१०८॥ प्रयाति यानदानेन मुक्तादानेन चैन्द्रवम् । वैदूर्यदो रुद्रलोकं पुष्परागप्रदस्तथा ॥१०९॥ पुष्परागप्रदानेन सर्वत्र सुखमश्नुते । अश्वदो ह्यश्वसांनिध्यं चिरं व्रजति भूमिप ॥११०॥ गजदानेन महता सर्वान्कामानवाप्नुयात् । प्रयाति यानदानेन स्वर्गं स्वयनिमास्थितः ॥१११॥ महिषीदो जयत्येव ह्यपमृत्युं न संशयः । गवां तृणप्रदानेन रुद्रलोकमवाप्नुयात् ॥११२॥ वारुणं लोकमाप्नोति महीश लवणप्रदः । स्वाश्रमाचारनिरताः प्रयान्ति सदनं हरेः ॥११३॥ अदाम्भिका गतासूयाः प्रयान्ति ब्रह्मणः पदम् । परोपदेशनिरता वीतरागा विगतज्वराः ॥११४॥ हरिपादार्चनरताः प्रयान्ति सदनं हरेः । सत्सङ्गाह्लादनिरताः सत्कर्मसु सदोद्यताः ॥११५॥ परापवादविमुखाः प्रयान्ति हरिमन्दिरम् । नित्यं हितकरा ये तु ब्राह्मणेषु च गोषु च ॥११६॥ परस्त्रीसङ्गविमुखा न पश्यन्ति यमालयम् । जितेन्द्रिया जिताहारा गोषु क्षान्ताः सुशीलिनः ॥११७॥ ब्राह्मणेषु क्षमाशीलाः प्रयान्ति भवनं हरेः । अग्निशुश्रूषवश्चैव गुरुशुश्रूषकास्तथा ॥११८॥
दान का भी महत्त्व कहा गया है। कोटि ब्रह्माण्ड के दान से मनुष्य को जो फल मिलता है, वह फल निःसन्देह शिव लिङ्ग के दान से प्राप्त हो जाता है। शालग्राम शिला के दान से उससे भी दूना फल मिलता है ॥१६६-१०४॥ शालग्राम शिला विष्णु का ही रूप है, ऐसा प्रसिद्ध है। प्रभो ! जो मनुष्य देव मन्दिरों में अपना अंश (पाई हुई सम्पत्ति) दान करता है, नृप ! उसको अवश्य ही गंगा स्नान का फल मिलता है। नृप ! रत्न सहित सुवर्ण के दान से मनुष्य भुक्ति और मुक्ति दोनों प्राप्त करता है; क्योंकि वह महादान माना गया है। मनुष्य माणिक्य के दान से परम मोक्ष को प्राप्त करता है ॥१०५-१०७॥ मानव वज्रमणि के दान से ध्रुव लोक को, विद्रुम (मूँगा) के दान से स्वर्ग को, यान दान से रुद्र लोक को और मुक्ता दान से इन्द्र-पद को प्राप्त करता है। वैदूर्य मणि और पुष्पराग मणि के दान से रुद्र लोक की प्राप्ति होती है—और सर्वत्र सुख मिलता है। भूमिप ! अश्व का दान करने से मनुष्य चिर काल तक अश्व पाता रहता है। महान् गज के दान से सब कामनायें पूरी होती हैं। सवारी के दान देने से मनुष्य स्वर्गीय विमानों पर आरूढ़ होकर स्वर्ग को जाता है ॥१०८-१११॥ भैंस का दान करने वाला अकाल मृत्यु से बचा रहता है और गौवों को घास खिलाने से रुद्र लोक मिलता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं। महीश ! नमक का दान करने से वरुण लोक प्राप्त होता और अपने कुलाचार को पालन करने वाले, सब प्राणियों के हित में लगे रहने वाले, शुद्ध हृदय, निष्कपट और उदार व्यक्ति ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं। परोपदेश में लीन रहने वाले वीतराग, मात्सर्य हीन और हरि की पूजा में सदा तत्पर रहने वाले जन विष्णु लोक को पाते हैं। सत्संग सुख के भोग करने तथा सत्कर्म करने के लिए सदा उद्यत रहने वाले और पर निन्दा से विमुख रहने वाले विष्णु-भवन में स्थान पाते हैं ॥११२-११५॥ गो ब्राह्मण का नित्य हित करने वाले और पर स्त्री को माता के समान समझने वाले कभी भी यमलोक को नहीं जाते हैं। जितेन्द्रिय, क्षुधा को वश में करने वाले, गौओं पर कभी भी क्रोध न करने वाले, सुशील और ब्राह्मणों पर सर्वदा क्षमा का व्यवहार करने वाले व्यक्ति हरि-भवन को जाते हैं। अग्नि की पूजा एवं गुरु सेवा में