बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 118, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः ६६ पतिशुश्रूषणरता न वै संसृतिभागिनः । सदा देवार्चनरता हरिनामपरायणाः ॥११६॥ प्रतिग्रहविवृत्ताश्च प्रयान्ति परमं पदम् । अनाथं विप्रकुणपं ये दहेयुर्नृपोत्तम ॥१२०॥ अश्वमेधसहस्राणां फलमश्नुवते सदा । पत्रैः पुष्पैः फलैर्वापि जलैर्वा मनुजेश्वर ॥१२१॥ पूजया सहितं लिङ्गमर्चयेत्तत्फलं शृणु । अप्सरोगणगन्धर्वैः स्तूयमानो विमानगः ॥१२२॥ प्रयाति शिवसान्निध्यमित्याह कमलोद्भवः । चुलुकोदकमात्रेण लिङ्गं संस्नाप्य भूमिप ॥१२३॥ लक्षाश्वमेधजं पुण्यं संप्राप्नोति न संशयः । पूजया रहितं लिङ्गं कुसुमैर्योऽर्चयेत्सुधीः ॥१२४॥ अश्वमेधायुतफलं लभेतस्य जनेश्वर । भक्ष्यैर्भोज्यैः फलैर्वापि शून्यं लिङ्गं प्रपूज्य च ॥१२५॥ शिवसायुज्यमाप्नोति पुनरावृत्तिवर्जितम् । पूजया रहितं विष्णुं योऽर्चयेदर्कवंशज ॥१२६॥ जलेनापि स सालोक्यं विष्णोर्याति नरोत्तम । देवतायतने यस्तु कुर्यात्संमार्जनं सुधीः ॥१२७॥ यावत्पांसु युगावासं वैष्णवे मन्दिरे लभेत् । शीर्णं स्फटिकलिङ्गं तु यः संदध्यान्नृपोत्तम ॥१२८॥ शतजन्मार्जितैः पापैर्मुच्यते स तु मानवः । यस्तु देवालये राजन्नपि गोचर्ममात्रकम् ॥१२६॥ जलेन सिञ्चेद्भूभागं सोऽपि स्वर्गं लभेन्नरः । गन्धोदकेन यः सिञ्चद्देवतायतने भुवम् ॥१३०॥ यावत्कणानुकल्पं तु तिष्ठेत देवसन्निधौ । मृदा धातुविकारैर्वा यो लिम्पेद्देवतागृहम् ॥१३१॥ स कोटिकुलमुद्धृत्य याति साम्यं मधुद्विषः । शिलाचूर्णेन यो मर्त्यो देवागारं तु लेपयेत् ॥१३२॥ निरत रहने वाले, पतिव्रता स्त्रियाँ, सदा देव पूजा में लीन रहने वाले एवं हरि कीर्तन परायण व्यक्ति संसार- बन्धन में नहीं पड़ते । नृपोत्तम ! कभी भी दान न लेने वाला व्यक्ति परम पद को प्राप्त करता है और जो अनाथ ब्राह्मण के शव दाह करता है वह सर्वदा सहस्र अश्वमेध का फल भोगता है । मनुजेश्वर ! जो पत्र, पुष्प, फल अथवा केवल जल से भी भक्ति पूर्वक शिवलिङ्ग की पूजा करता है, उसका फल सुनो ॥११६-१२११/२॥ वह विमान पर पर आरूढ़ होकर शिव के समीप जाता है और अप्सरा एवं गन्धर्व उसकी स्तुति करते हैं, ऐसा ब्रह्मा ने कहा है । भूमिपाल ! केवल एक चुल्लू जल से जो ऐसे शिवलिङ्ग की, जिसकी पूजा न होती हो-पूजा करता है वह लाख अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है। जो बुद्धिमान् ऐसे लिङ्ग की, जिसकी पूजा न होती हो, फूलों से पूजा करता है, उसको सहस्र अश्वमेध का फल मिलता है। फल अथवा किसी प्रकार के भोजन योग्य पदार्थ से जो शून्य¹ लिङ्ग की पूजा करते हैं वे आवागमन से रहित शिव की सायुज्य मुक्ति प्राप्त करते हैं । सूर्य-वंश में उत्पन्न ! इसी प्रकार ऐसी विष्णु मूर्ति की, जिसकी बहुत दिनों से जो पूजा न होती हो, जल से पूजा करता है, नरोत्तम ! वह विष्णु का सालोक्य प्राप्त करता है। जो सुधी मन्दिर में सफाई का कार्य करता है वह धूलि के कणों के बराबर युग तक विष्णु मन्दिर में निवास करता है ॥१२२-१२७१/२॥ नृपोत्तम ! जो मनुष्य टूटे हुए स्फटिक के शिव लिङ्ग को पुनः जोड़ कर यथारूप कर देता है वह अपने सौ जन्म के पापों से भी छूट जाता है । राजन् ! जो व्यक्ति देवालय में गोचर्म परिमित (एक चरमा) भूमि को जल से सींचता है वह भी स्वर्ग को जाता है। जो सुगन्धित जल से देव मन्दिर के अन्तःकक्ष या आंगन को सींचता है वह देव विष्णु के समीप उस देव भूमि के कण परिमाण के बराबर कल्प तक रहता है। जो देव मन्दिर को मिट्टी या किसी धातु विकार (गेरु) आदि से लीपते हैं वे अपने करोड़ कुलों का उद्धार कर मधुसूदन के समान रूप पाते हैं। जो मनुष्य शिला चूर्ण (पत्थर के चूने) से देव मन्दिर को लीपता या लिपाता है या स्वस्तिक चिह्न आदि बनवाता है उसको अनन्त पुण्य मिलता है । १. जो एकान्त में पड़ा हो, जिस पर कभी पूजन की सामग्री न दी गई हो ।