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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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[पृष्ठ शीर्ष] ६४ नारदीयपुराणम्


संस्कृत श्लोक

इक्षुतोयेन देवेशं यः स्नापयति भूपते । केशवं लक्षपितृभिः सार्द्धं विष्णुपदं व्रजेत् ॥४०॥ पुष्पोदकेन गोविन्दं तथा गन्धोदकेन च । स्नापयित्वा हरिं भक्त्या वैष्णवं पदमाप्नुयात् ॥४१॥ जलेन वस्त्रपूतेन यः स्नापयति माधवम् । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुना सह मोदते ॥४२॥ क्षीराद्यैः स्नापयेद्यस्तु रविसंक्रमणे हरिम् । स वसेद्विष्णुसदने त्रिसप्तपुरुषैः सह ॥४३॥ शुक्लपक्षे चतुर्दश्यामष्टम्यां पूर्णिमादिने ॥४४॥ एकादश्यां भानुवारे द्वादश्यां पञ्चमीतियौ । सोमसूर्योपरागे च मन्वादिषु युगादिषु ॥४५॥ अर्द्धोदये च सूर्यस्य पुष्यार्के रोहिणीबुधे । तथैव शनिरोहिण्यां भौमाश्विन्यां तथैव च ॥४६॥ शन्य भार्गवमृगे चैव भृगुरेवतिसङ्गमे । तथा बुधानुराधायां श्रवणार्के तथैव च ॥४७॥ तथा च सोमश्रवणे हस्तयुक्ते बृहस्पतौ । बुधाष्टम्यां बुधाषाढे पुण्ये चान्ये दिने तथा ॥४८॥ स्नापयेत्पयसा विष्णुं शान्तिमान् वाग्यतः शुचिः । घृतेन मधुना वापि दध्ना वा तत्फलं शृणु ॥४९॥ सर्वयज्ञफलं प्राप्य सर्वपापविवर्जितः । वसेद्विष्णोः पुरे सार्द्धं त्रिसप्तपुरुषैर्नृप ॥५०॥ तत्रैव ज्ञानमासाद्य योगिनामपि दुर्लभम् । मोक्षमाप्नोति नृपते पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥५१॥ कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां सोमवारे च भूपते । शिवं संस्नाप्य दुग्धेन शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥५२॥ नालिकेरोदकेनापि शिवं संस्नाप्य भक्तितः । अष्टम्यामिन्दुवारे वा शिवसायुज्यमश्नुते ॥५३॥ शुक्लपक्षे चतुर्दश्यामष्टम्यां वापि भूपते । घृतेन मधुना स्नाप्य शिवं तत्साम्यतां व्रजेत् ॥५४॥ तिलतैलेन संस्नाप्य विष्णुं वा शिवमेव च । स याति तत्तत्सारूप्यं पितृभिः सह सप्तभिः ॥५५॥ शिवमिक्षुरसेनापि यः स्नापयति भक्तितः । शिवलोके वसेत्कल्पं स सप्तपुरुषैः सह ॥५६॥


हिन्दी अनुवाद

रस से जो देवेश विष्णु को को नहलाता है वह अपने लाख पितरों के सहित विष्णुलोक को जाता है। जो पुष्प मिश्रित जल और सुगन्धित जल से हरि को भक्ति पूर्वक स्नान कराता है वह वैष्णव पद को प्राप्त करता है। ॥३८-४१॥ जो मनुष्य कपड़े से छने हुए जल से माधव को नहलाता है वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णु के साथ आनन्द प्राप्त करता है। जो सूर्य ग्रहण के समय दूध आदि से भगवान् हरि को नहलाता है, वह इक्कीस कुल पुरुषों के साथ विष्णुलोक में निवास करता है ॥४२-४३॥ शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी, अष्टमी, पूर्णमासी एकादशो, रविवार, द्वादशी और पंचमी तिथि को, एवं चन्द्र और सूर्य के ग्रहण के समय, मन्वादि काल, युगादिकाल, सूर्य के अर्द्धोदय काल में, पुष्य के सूर्य, रोहिणी के बुध और शनि, अश्विनी के मंगल, शनि के शुक्र और चन्द्रमा, रेवती और शुक्र के संगम, अनुराधा के बुध, श्रवण के सूर्य एवं चन्द्रमा, हस्तनक्षत्र के बृहस्पति अष्टमीतिथि को बुध पड़ने पर, आषाढ़ में बुध के दिन अथवा अन्य पुण्य पर्वों पर जो मनुष्य शान्त और मौन होकर पवित्र भाव से दूध, घी, मधु या दही से भगवान् विष्णु को नहलाता हैं, उसका फल सुनो ॥४४-४६॥ नृप ! वह व्यक्ति सब पापों से मुक्त हो जाता और सब यज्ञों का फल पाकर अपने इक्कीस कुलों के साथ विष्णुलोक में निवास करता है। वहीं योगियों के लिए भी दुर्लभ ज्ञान को प्राप्त कर आवागमन से रहित निर्वाण को प्राप्त करता है। भूपते ! कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी और सोमवार के दिन शिव को दूध से नहलाने से शिवसायुज्य प्राप्त होता है। अष्टमी या सोमवार को भक्ति पूर्वक नारियल के जल से शिव को नहलाने से शिव सायुज्य प्राप्त होता है। शुक्ल-पक्ष की चतुर्दशी या अष्टमी को घृत और मधु से शिव को स्नान कराने से शिव साम्य प्राप्त होता है ॥५०-५४॥ तिल के तेल से विष्णु अथवा शिव को नहलाने से वह व्यक्ति अपनी सात पीढ़ियों के साथ शिव या विष्णु का सारूप्य प्राप्त करता है। जो शिव को गन्ने के रस से भक्ति पूर्वक स्नान कराता है, वह कल्पान्त तक सात कुलों के साथ शिव लोक में निवास करता है। जो देवोत्थान एकादशो और

त्रयोदशोऽध्यायः ६५ घृतेन स्नापयेल्लिङ्गमुत्थाने द्वादशीदिने । क्षीरेण वा महाभाग तत्फलं शृणु मद्गिरा ॥५७॥ जन्मायुतकृतैः पापैर्विमुक्तो मनुजो नृप । कोटिसंख्यं समुद्धृत्य स्वकुलं शिवतां व्रजेत् ॥५८॥ सम्पूज्य गन्धकुसुमैर्विष्णुं विष्णुतियौ नृपः । जन्मायुताजितैः पापैर्मुक्तो व्रजति तत्पदम् ॥५६॥ पद्मपुष्पेण यो विष्णुं शिवं वा पूजयेन्नरः । स याति विष्णुभवनं कुलकोटिसमन्वितः ॥६०॥ हरिं च केतकीपुष्पैः शिवं धत्तूरजैर्निशि । संपूज्य पापनिर्मुक्तो वसेद्विष्णुपुरे युगम् ॥६१॥ हरिं तु चाम्पकैः पुष्पैर्धर्कपुष्पैश्च शंकरम् । समभ्यर्च्य महाराज तत्तत्सालोक्यमाप्नुयात् ॥६२॥ शंकरस्याथवा विष्णोर्घृतयुक्तं च गुग्गुलुम् । दत्त्वा धूपो नरो भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥६३॥ तिलतैलान्वितं दीपं विष्णोर्वा शंकरस्य वा । दत्त्वा नरः सर्वकामान्संप्राप्नोति नृपोत्तम ॥६४॥ घृतेन दीपं यो दद्याच्छंकरायाथ विष्णवे । स मुक्तः सर्वपापेभ्यो गङ्गास्नानफलं लभेत् ॥६५॥ ग्राम्येण वापि तैलेन राजन्नन्येन वा पुनः । दीपं दत्त्वा महाविष्णोः शिवस्यापि फलं शृणु ॥६६॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वैश्वर्यसमन्वितः । तत्तत्सालोक्यमाप्नोति त्रिःसप्तपुरुषान्वितः ॥६७॥ यद्यदिष्टतमं भोज्यं तत्तदीशाय विष्णवे । दत्त्वा तत्तत्पदं याति चत्वारिंशत्कुलान्वितः ॥६८॥ यद्यदिष्टतमं वस्तु तत्तद्विप्राय दापयेत् । स याति विष्णुभवनं पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥६६॥ भ्रूणहा स्वर्णदानेन शुद्धो भवति भूपते । अन्नतोयसमं दानं न भूतं न भविष्यति ॥७०॥ अन्नदः प्राणदः प्रोक्तः प्राणदश्चापि सर्वदः । सर्वदानफलं यस्मादन्नदस्य नृपोत्तम ॥७१॥ द्वादशी के दिन दूध अथवा घी से शिवलिंग को नहलाता है, महाभाग, उसके फल को मैं कह रहा हूँ सुनो । नृप ! वह मनुष्य हजार जन्म के पापों से मुक्त होकर अपने करोड़ कुलों का उद्धार कर शिव स्वरूप हो जाता है । ॥५७-५८॥ नृप ! जो विष्णु-तिथि (एकादशी) को गंध और फूल से विष्णु की पूजा करता है वह हजार जन्म के पापों से मुक्त होकर विष्णु पद को प्राप्त करता है । जो मनुष्य कमल पुष्प से विष्णु या शिव की पूजा करता है, वह अपने करोड़ कुलों के सहित विष्णु लोक को जाता है । जो विष्णु को केवड़े के फूल से और शिव को धतूरे के फूल से रात में पूजा करता है वह अपने पापों से मुक्त होकर युग पर्यन्त विष्णु लोक में निवास करता है । ॥५६-६०॥ महाराज ! जो हरि को चम्पे के फूल से और शिव को मदार के फूल से पूजा करता है वह उसकी सालोक्य रूप मुक्ति पाता है । जो मनुष्य घृत युक्त गुग्गुल से विष्णु या शिव को भक्ति पूर्वक धूप देता है वह सब पापों से मुक्त हो जाता है । नृपोत्तम ! जो तिल-तैल से भरे हुए दोपक से विष्णु अथवा शंकर को दीप दिखलाता है वह अपने सब मनोरथों को प्राप्त करता है । जो शंकर अथवा विष्णु को घी का दीपक देता है, वह सब पापों से मुक्त होकर गंगा-स्नान का फल पाता है । राजन् ! जो ग्राम्य या किसी अन्य तेल से विष्णु या शिव को दीपक दिखाता है, उससे जो फल मिलता है, उसको सुनो ॥६१-६६॥ वह व्यक्ति सब प्रकार के पापों से छूट जाता और सब प्रकार के ऐश्वर्यों को प्राप्त कर अपने इक्कीस कुलों के साथ उन देवों का सालोक्य प्राप्त करता है ॥६७॥ अपने जो प्रिय भोज्य पदार्थ हैं उनको अपने इष्ट देवता शिव या विष्णु के लिए अर्पित करने से मनुष्य अपने चालीस कुलों के सहित शिव और विष्णुलोक को जाता है । जो पदार्थ अपने को प्रिय लगते हैं उन उनको ब्राह्मणों के लिए अर्पित कर देना चाहिए, ऐसा करने से वह व्यक्ति आवागमन से रहित विष्णुलोक को प्राप्त कर लेता है । भूपते ! भ्रूण हत्या करने वाला व्यक्ति सुवर्णदान से पुनीत हो जाता है । भूपते ! जल और अन्न दान के समान कोई भी दान इस संसार में नहीं है। अन्न दान करने वाला प्राणदाता कहा गया है और जो प्राणदाता है वह सर्वदाता है । नृपोत्तम ! इसलिये अन्न दान करने वाले को सब दानों का फल प्राप्त होता है ॥६८-७१॥ अन्नदाता अपने परिवार सहित ब्रह्मलोक को जाता है। वह संसार

६६ नारदीयपुराणम् अन्नदो ब्रह्मसदनं याति वंशायुतान्वितः । न तस्य पुनरावृत्तिरिति शास्त्रेषु निश्चितम् ॥७२॥ सद्यस्तुष्टिकरं ज्ञेयं जलदानं यतोऽधिकम् । अन्नदानान्नृपश्रेष्ठ निर्दिष्टं ब्रह्मवादिभिः ॥७३॥ महापातकयुक्तो वा युक्तो वाप्युपपातकैः । जलदो मुच्यते तेभ्य इत्याह कमलोद्भवः ॥७४॥ शरीरमन्नजं प्राहुः प्राणानप्यन्नजान्विदुः । तस्मादन्नप्रदो ज्ञेयः प्राणदः पृथिवीपते ॥७५॥ यद्यत्तुष्टिकरं दानं सर्वकामफलप्रदम् । तस्मादन्नसमं दानं नास्ति भूपाल भूतले ॥७६॥ अन्नदस्य कुले जाता आसहस्रं नृपोत्तम । नरकं ते न पश्यन्ति तस्मादन्नप्रदो वरः ॥७७॥ पादाभ्यङ्गं भक्तियुक्तो यदतिथेः कुरुते नरः । स स्नातः सर्वतीर्थेषु गङ्गास्नानपुरःसरम् ॥७८॥ तैलाभ्यङ्गं महाराज ब्राह्मणानां करोति यः । स स्नातोऽष्टशतं साग्रं गङ्गायां नात्र संशयः ॥७९॥ रोगितान्ब्राह्मणान्यस्तु प्रेम्णा रक्षति रक्षकः । स कोटिकुलसंयुक्तो वसेद्ब्रह्मपुरे युगम् ॥८०॥ यो रक्षेत्पृथिवीपाल रङ्कं वा रोगिणं नरम् । तस्य विष्णुः प्रसन्नात्मा सर्वान्कामान्प्रयच्छति ॥८१॥ मनसा कर्मणा वाचा यो रक्षेद्दामयान्वितम् । सर्वान्कामानवाप्नोति सर्वपापविवर्जितः ॥८२॥ यो ददाति महीपाल निवासं ब्राह्मणाथ वै । तस्य प्रसन्नो देवेशः स्वलोकं संप्रयच्छति ॥८३॥ ब्राह्मणाय ब्रह्मविदे यो दद्याद्गां पयस्विनीम् । स याति ब्रह्मसदनमन्येषामतिदुर्लभम् ॥८४॥ अन्येभ्यः प्रतिगृह्यापि यो दद्याद्गां पयस्विनीम् । तस्य पुण्यफलं वक्तुं नाहं शक्तोऽस्मि पण्डित ॥८५॥ कपिलां वेदविदुषे यो ददाति पयस्विनीम् । स एव रुद्रो भूपाल सर्वपापविवर्जितः ॥८६॥ विप्राय वेदविदुषे दद्यादुभयतोमुखीम् । यस्तस्य पुण्यं संख्यातुं न शक्तोऽब्दशतैरपि ॥८७॥ के आवागमन से मुक्त हो जाता है, ऐसा शास्त्रों का निर्णय है । यतः जल दान से मनुष्य को शीघ्र प्यास बुझ जाती है और उसको सन्तोष मिलता है, अतः हे नृपश्रेष्ठ ! ब्रह्मवादियों ने उसको अन्नदान से भी श्रेष्ठ माना है। महापापों अथवा उप पातक करने वाला मनुष्य जल का दान करने से अपने पापों से मुक्त हो जाता है, ऐसा ब्रह्माजी ने स्वयं कहा है ॥७२-७४॥ शरीर को अन्न से उत्पन्न (बना हुआ) कहा जाता है और प्राणों की उत्पत्ति अन्न से ही बताई गई है। इसलिये, पृथ्वोपते ! अन्नदाता को प्राणदाता समझना चाहिए। भूपाल ! जिन-जिन दानों से मनुष्य की तृप्ति होती है वह दान सब मनोरथों को सिद्ध करने वाला माना जाता है। अतएव अन्नदान के समान इस भूतले पर कोई दान नहीं है ॥७५-७६॥ नृपोत्तम ! अन्नदान करने वाले के कुल में हजार पीढ़ी तक जो उत्पन्न होते हैं, वे भी नरक नहीं देखते हैं । इसलिए अन्नदाता इस संसार में श्रेष्ठ माना गया है । जो मनुष्य भक्ति पूर्वक अतिथि का पैर धोता है, वह मानों गंगा सहित सब तीर्थों में स्नान कर चुका । महाराज ! जो व्यक्ति ब्राह्मणों के शरीर में तेल लगाता है, वह तत्काल गंगा में एक सौ आठ बार स्नान का फल पा लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं । जो रोगी ब्राह्मण को प्रेम पूर्वक सेवा-शुश्रूषा द्वारा रक्षा करता है, वह युगों तक करोड़ों कुलों के साथ ब्रह्मलोक में निवास करता है ॥७७-८०॥ पृथ्वीपाल ! जो मनुष्य दरिद्र अथवा रोगी की रक्षा करता है उसके ऊपर विष्णु प्रसन्न होकर उसके सब मनोरथों को पूर्ण कर देते हैं । जो मन, वचन और कर्म से किसी रोगी की रक्षा करता है वह अपने सब पापों से मुक्त होकर सब मनोरथों को प्राप्त करता है । महीपाल ! जो ब्राह्मण को रहने के लिए घर देता है, विष्णु उसके ऊपर प्रसन्न होकर अपना लोक उसको दे देते हैं । जो वेदज्ञ ब्राह्मण को दुधार गौ देता है वह ब्रह्मलोक को जाता है, जो दूसरों के लिए दुर्लभ है । पण्डित ! जो दूसरे से दान लेकर भी दुधार गौ का दान करता है, उसके पुण्य का वर्णन करने में मैं समर्थ नहीं हूँ ॥८१-८५॥ जो वेद-विद् ब्राह्मण को कपिला गाय देता है, भूपाल ! वही रुद्र है और वही पाप मुक्त धार्मिक पुरुष है । जो मनुष्य द्विमुखी गौ (जो बच्चा जन रही हो) किसी ब्राह्मण को देता है और उससे उसको जो पुण्य मिलता

त्रयोदशोऽध्यायः ८७

तस्य पुण्यफलं राजञ्छृणु वक्ष्यामि तत्त्वतः । एकतः क्रतवः सर्वे समग्रवरदक्षिणाः ॥८८॥ एकतो भयभीतस्य प्राणिनः प्राणरक्षणम् । संरक्षति महीपाल यो विप्रं भयविह्वलम् ॥८९॥ स स्नातः सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु दीक्षितः । वस्त्रदो रुद्रभवनं कन्यादो ब्रह्मणः पदम् ॥९०॥ हेमदो विष्णुभवनं प्रयाति स्वकुलान्वितः । यस्तु कन्यामलंकृत्य दद्यादध्यात्मवेदिने ॥९१॥ शतवंशसमायुक्तः स व्रजेद्ब्रह्मणः पदम् । कात्तिक्यां पौर्णमास्यां वा आषाढ्यां वापि भूपते ॥९२॥ वृषभं शिवतुष्ट्यर्थमुत्सृजेत्तत्फलं शृणु । सप्तजन्मार्जितैः पापैर्विमुक्तो रुद्ररूपभाक् ॥९३॥ कुलसप्ततिसंयुक्तो रुद्रेण सह मोदते । शिवलिङ्गाङ्कितं कृत्वा महिषं यः समुत्सृजेत् ॥९४॥ न तस्य यातनालोको भवेन्नृपतिसत्तम । ताम्बूलदानं यः कुर्याच्छक्तितो नृपसत्तम ॥९५॥ तस्य विष्णुः प्रसन्नात्मा दद्यादायुर्यशः श्रियम् । क्षीरोदो घृतदश्चैव मधुदो दधिदस्तथा ॥९६॥ दिव्याब्दयुतपर्यन्तं स्वर्गलोके महीयते । प्रयाति ब्रह्मसदनमिक्षुदाता नृपोत्तम ॥९७॥ गन्धदः पुण्यफलदः प्रयाति ब्रह्मणः पदम् । गुडेक्षुरसदश्चैव प्रयाति चोत्तमोत्तमम् ॥९८॥ घटानां जलदो याति सूर्यलोकमनुत्तमम् । विद्यादानेन सायुज्यं माधवस्य व्रजेन्नरः ॥९९॥ विद्यादानं महीदानं गोदानं चोत्तमोत्तमम् । नरकादुद्धरन्त्येव जपवाहनदोहनात् ॥१००॥ सर्वेषामपि दानानां विद्यादानं विशिष्यते । विद्यादानेन सायुज्यं विष्णोर्याति नृपोत्तम ॥१०१॥ नरस्त्विन्धनदानेन मुच्यते ह्युपपातकैः । शालग्रामशिलादानं महादानं प्रकीर्तितम् ॥१०२॥

है, उसकी गणना मैं सो वर्षों में भी नहीं कर सकता हूँ। राजन् ! उसके पुण्य फल को संक्षेप में कह रहा हूँ सुनो- एक ओर अत्यन्त विपुल दक्षिणा वाले यज्ञों का फल और दूसरी ओर भयभीत प्राणियों की प्राण रक्षा करने का फल, दोनों कदाचित् ही तुलना प्राप्त कर सकें। महीपाल ! जो भयाकुल विप्र की रक्षा करता है वह सब तीर्थों में स्नान करने का और सब यज्ञों में दीक्षित होने का फल पा जाता है। वस्त्र दान देने वाला, रुद्रलोक को और कन्यादान करने वाला ब्रह्मलोक को जाता है ॥८६-६०॥ सुवर्ण दान करने वाला अपने कुल के सहित विष्णुलोक को चला जाता है। जो कन्या को अलङ्कारों से भूषित करके अध्यात्मज्ञानी ब्राह्मण को अर्पित कर देता है, वह अपने सौ कुलों के सहित ब्रह्मलोक को चला जाता है। भूपते ! जो कार्तिक पूर्णिमा और आषाढ़ी पूर्णिमा को शिव की प्रसन्नता के लिए साँड़ को छोड़ता है, उसके फल को सुनो-वह अपने सात जन्मों के पापों से मुक्त हो कर रुद्र रूप हो जाता है और सत्तर कुलों के सहित रुद्रलोक में रुद्र के साथ आनन्द प्राप्त करता है ॥६१-६३॥ नृपतिवर ! जो शिव लिंग का चिह्न भैंसे के शरीर पर बनाकर उसको छोड़ देता है उसको किसी लोक में (नरक में) यातना नहीं दी जाती । नृपश्रेष्ठ ! जो शक्ति के अनुसार ताम्बूल दान करता है, उसके ऊपर विष्णु प्रसन्न होकर उसको दीर्घायु, यश और सम्पत्ति प्रदान करते हैं। दूध दान करने वाला घी, मधु और दही का दान करने वाला व्यक्ति सहस्र दिव्य वर्षों तक स्वर्ग लोक में पूजित होता है । नृपोत्तम ! गन्ना दान करने वाला ब्रह्मलोक को जाता है, गन्ध और पवित्र फलों का दान करने वाला ब्रह्मपद को प्राप्त करता है। गुड़, गन्ना और रस का दान करने वाला उत्तमोत्तम लोक को प्राप्त करता है ॥६४-६८॥ घड़ों का जल दान करने वाला उस परमोत्तम सूर्यलोक को जाता है जहाँ वीर रणभूमि में मर कर जाते हैं। नर विद्या दान से माधव का सायुज्य प्राप्त करता है। विद्या दान, भूदान और गोदान परमोत्तम दान हैं। जप, वाहन तथा दोहन दान से नरक से उद्धार होता ही है । सब दानों में विद्यादान उत्तम दान है। नृपोत्तम ! विद्या दान से मनुष्य विष्णु का सायुज्य प्राप्त करता है। मनुष्य इन्धन (लकड़ी) दान से सब उपपातकों से छूट जाता है। शालिग्राम शिला (वह पत्थर जिससे विष्णु की मूर्ति बनती है)दान महादान कहा गया है। उस दान को देकर मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है। इसी प्रकार शिव लिङ्ग

१२-नार०

६८ नारदीयपुराणम्

यद्दत्त्वा मोक्षमाप्नोति लिङ्गदानं तथा स्मृतम् । ब्रह्माण्डकोटिदानेन यत्फलं लभते नरः ॥१०३॥ तत्फलं समवाप्नोति लिङ्गदानान्न संशयः । शालग्रामशिलादाने ततोऽपि द्विगुणं फलम् ॥१०४॥ शालग्रामशिलारूपी विष्णुरेवेति विश्रुतः । यो ददाति नरो दानं गृहेषु बहलां प्रभो ॥१०५॥ गङ्गास्नानफलं तस्य निश्चितं नृप जायते । रत्नान्वितसुवर्णस्य प्रदानेन नृपोत्तम ॥१०६॥ भुक्तिमुक्तिमवाप्नोति महादानं यतः स्मृतम् । नरो माणिक्यदानेन परं मोक्षमवाप्नुयात् ॥१०७॥ ध्रुवलोकमवाप्नोति वज्रदानेन मानवः । स्वर्गं विद्रुमदानेन रुद्रलोकमवाप्नुयात् ॥१०८॥ प्रयाति यानदानेन मुक्तादानेन चैन्द्रवम् । वैदूर्यदो रुद्रलोकं पुष्परागप्रदस्तथा ॥१०९॥ पुष्परागप्रदानेन सर्वत्र सुखमश्नुते । अश्वदो ह्यश्वसांनिध्यं चिरं व्रजति भूमिप ॥११०॥ गजदानेन महता सर्वान्कामानवाप्नुयात् । प्रयाति यानदानेन स्वर्गं स्वयनिमास्थितः ॥१११॥ महिषीदो जयत्येव ह्यपमृत्युं न संशयः । गवां तृणप्रदानेन रुद्रलोकमवाप्नुयात् ॥११२॥ वारुणं लोकमाप्नोति महीश लवणप्रदः । स्वाश्रमाचारनिरताः प्रयान्ति सदनं हरेः ॥११३॥ अदाम्भिका गतासूयाः प्रयान्ति ब्रह्मणः पदम् । परोपदेशनिरता वीतरागा विगतज्वराः ॥११४॥ हरिपादार्चनरताः प्रयान्ति सदनं हरेः । सत्सङ्गाह्लादनिरताः सत्कर्मसु सदोद्यताः ॥११५॥ परापवादविमुखाः प्रयान्ति हरिमन्दिरम् । नित्यं हितकरा ये तु ब्राह्मणेषु च गोषु च ॥११६॥ परस्त्रीसङ्गविमुखा न पश्यन्ति यमालयम् । जितेन्द्रिया जिताहारा गोषु क्षान्ताः सुशीलिनः ॥११७॥ ब्राह्मणेषु क्षमाशीलाः प्रयान्ति भवनं हरेः । अग्निशुश्रूषवश्चैव गुरुशुश्रूषकास्तथा ॥११८॥


दान का भी महत्त्व कहा गया है। कोटि ब्रह्माण्ड के दान से मनुष्य को जो फल मिलता है, वह फल निःसन्देह शिव लिङ्ग के दान से प्राप्त हो जाता है। शालग्राम शिला के दान से उससे भी दूना फल मिलता है ॥१६६-१०४॥ शालग्राम शिला विष्णु का ही रूप है, ऐसा प्रसिद्ध है। प्रभो ! जो मनुष्य देव मन्दिरों में अपना अंश (पाई हुई सम्पत्ति) दान करता है, नृप ! उसको अवश्य ही गंगा स्नान का फल मिलता है। नृप ! रत्न सहित सुवर्ण के दान से मनुष्य भुक्ति और मुक्ति दोनों प्राप्त करता है; क्योंकि वह महादान माना गया है। मनुष्य माणिक्य के दान से परम मोक्ष को प्राप्त करता है ॥१०५-१०७॥ मानव वज्रमणि के दान से ध्रुव लोक को, विद्रुम (मूँगा) के दान से स्वर्ग को, यान दान से रुद्र लोक को और मुक्ता दान से इन्द्र-पद को प्राप्त करता है। वैदूर्य मणि और पुष्पराग मणि के दान से रुद्र लोक की प्राप्ति होती है—और सर्वत्र सुख मिलता है। भूमिप ! अश्व का दान करने से मनुष्य चिर काल तक अश्व पाता रहता है। महान् गज के दान से सब कामनायें पूरी होती हैं। सवारी के दान देने से मनुष्य स्वर्गीय विमानों पर आरूढ़ होकर स्वर्ग को जाता है ॥१०८-१११॥ भैंस का दान करने वाला अकाल मृत्यु से बचा रहता है और गौवों को घास खिलाने से रुद्र लोक मिलता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं। महीश ! नमक का दान करने से वरुण लोक प्राप्त होता और अपने कुलाचार को पालन करने वाले, सब प्राणियों के हित में लगे रहने वाले, शुद्ध हृदय, निष्कपट और उदार व्यक्ति ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं। परोपदेश में लीन रहने वाले वीतराग, मात्सर्य हीन और हरि की पूजा में सदा तत्पर रहने वाले जन विष्णु लोक को पाते हैं। सत्संग सुख के भोग करने तथा सत्कर्म करने के लिए सदा उद्यत रहने वाले और पर निन्दा से विमुख रहने वाले विष्णु-भवन में स्थान पाते हैं ॥११२-११५॥ गो ब्राह्मण का नित्य हित करने वाले और पर स्त्री को माता के समान समझने वाले कभी भी यमलोक को नहीं जाते हैं। जितेन्द्रिय, क्षुधा को वश में करने वाले, गौओं पर कभी भी क्रोध न करने वाले, सुशील और ब्राह्मणों पर सर्वदा क्षमा का व्यवहार करने वाले व्यक्ति हरि-भवन को जाते हैं। अग्नि की पूजा एवं गुरु सेवा में

त्रयोदशोऽध्यायः ६६ पतिशुश्रूषणरता न वै संसृतिभागिनः । सदा देवार्चनरता हरिनामपरायणाः ॥११६॥ प्रतिग्रहविवृत्ताश्च प्रयान्ति परमं पदम् । अनाथं विप्रकुणपं ये दहेयुर्नृपोत्तम ॥१२०॥ अश्वमेधसहस्राणां फलमश्नुवते सदा । पत्रैः पुष्पैः फलैर्वापि जलैर्वा मनुजेश्वर ॥१२१॥ पूजया सहितं लिङ्गमर्चयेत्तत्फलं शृणु । अप्सरोगणगन्धर्वैः स्तूयमानो विमानगः ॥१२२॥ प्रयाति शिवसान्निध्यमित्याह कमलोद्भवः । चुलुकोदकमात्रेण लिङ्गं संस्नाप्य भूमिप ॥१२३॥ लक्षाश्वमेधजं पुण्यं संप्राप्नोति न संशयः । पूजया रहितं लिङ्गं कुसुमैर्योऽर्चयेत्सुधीः ॥१२४॥ अश्वमेधायुतफलं लभेतस्य जनेश्वर । भक्ष्यैर्भोज्यैः फलैर्वापि शून्यं लिङ्गं प्रपूज्य च ॥१२५॥ शिवसायुज्यमाप्नोति पुनरावृत्तिवर्जितम् । पूजया रहितं विष्णुं योऽर्चयेदर्कवंशज ॥१२६॥ जलेनापि स सालोक्यं विष्णोर्याति नरोत्तम । देवतायतने यस्तु कुर्यात्संमार्जनं सुधीः ॥१२७॥ यावत्पांसु युगावासं वैष्णवे मन्दिरे लभेत् । शीर्णं स्फटिकलिङ्गं तु यः संदध्यान्नृपोत्तम ॥१२८॥ शतजन्मार्जितैः पापैर्मुच्यते स तु मानवः । यस्तु देवालये राजन्नपि गोचर्ममात्रकम् ॥१२६॥ जलेन सिञ्चेद्भूभागं सोऽपि स्वर्गं लभेन्नरः । गन्धोदकेन यः सिञ्चद्देवतायतने भुवम् ॥१३०॥ यावत्कणानुकल्पं तु तिष्ठेत देवसन्निधौ । मृदा धातुविकारैर्वा यो लिम्पेद्देवतागृहम् ॥१३१॥ स कोटिकुलमुद्धृत्य याति साम्यं मधुद्विषः । शिलाचूर्णेन यो मर्त्यो देवागारं तु लेपयेत् ॥१३२॥ निरत रहने वाले, पतिव्रता स्त्रियाँ, सदा देव पूजा में लीन रहने वाले एवं हरि कीर्तन परायण व्यक्ति संसार- बन्धन में नहीं पड़ते । नृपोत्तम ! कभी भी दान न लेने वाला व्यक्ति परम पद को प्राप्त करता है और जो अनाथ ब्राह्मण के शव दाह करता है वह सर्वदा सहस्र अश्वमेध का फल भोगता है । मनुजेश्वर ! जो पत्र, पुष्प, फल अथवा केवल जल से भी भक्ति पूर्वक शिवलिङ्ग की पूजा करता है, उसका फल सुनो ॥११६-१२११/२॥ वह विमान पर पर आरूढ़ होकर शिव के समीप जाता है और अप्सरा एवं गन्धर्व उसकी स्तुति करते हैं, ऐसा ब्रह्मा ने कहा है । भूमिपाल ! केवल एक चुल्लू जल से जो ऐसे शिवलिङ्ग की, जिसकी पूजा न होती हो-पूजा करता है वह लाख अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है। जो बुद्धिमान् ऐसे लिङ्ग की, जिसकी पूजा न होती हो, फूलों से पूजा करता है, उसको सहस्र अश्वमेध का फल मिलता है। फल अथवा किसी प्रकार के भोजन योग्य पदार्थ से जो शून्य¹ लिङ्ग की पूजा करते हैं वे आवागमन से रहित शिव की सायुज्य मुक्ति प्राप्त करते हैं । सूर्य-वंश में उत्पन्न ! इसी प्रकार ऐसी विष्णु मूर्ति की, जिसकी बहुत दिनों से जो पूजा न होती हो, जल से पूजा करता है, नरोत्तम ! वह विष्णु का सालोक्य प्राप्त करता है। जो सुधी मन्दिर में सफाई का कार्य करता है वह धूलि के कणों के बराबर युग तक विष्णु मन्दिर में निवास करता है ॥१२२-१२७१/२॥ नृपोत्तम ! जो मनुष्य टूटे हुए स्फटिक के शिव लिङ्ग को पुनः जोड़ कर यथारूप कर देता है वह अपने सौ जन्म के पापों से भी छूट जाता है । राजन् ! जो व्यक्ति देवालय में गोचर्म परिमित (एक चरमा) भूमि को जल से सींचता है वह भी स्वर्ग को जाता है। जो सुगन्धित जल से देव मन्दिर के अन्तःकक्ष या आंगन को सींचता है वह देव विष्णु के समीप उस देव भूमि के कण परिमाण के बराबर कल्प तक रहता है। जो देव मन्दिर को मिट्टी या किसी धातु विकार (गेरु) आदि से लीपते हैं वे अपने करोड़ कुलों का उद्धार कर मधुसूदन के समान रूप पाते हैं। जो मनुष्य शिला चूर्ण (पत्थर के चूने) से देव मन्दिर को लीपता या लिपाता है या स्वस्तिक चिह्न आदि बनवाता है उसको अनन्त पुण्य मिलता है । १. जो एकान्त में पड़ा हो, जिस पर कभी पूजन की सामग्री न दी गई हो ।

१०० नारदीयपुराणम् स्वस्तिकादीनि वा कुर्यात्तस्य पुण्यमनन्तकम् । यः कुर्याद्दीपरचनां देवायतने नृप ॥१३३॥ तस्य पुण्यं प्रसंख्यातुं नोत्सहेऽब्दशतैरपि । अखण्डदीपं यः कुर्याद्विष्णोर्वा शंकरस्य च ॥१३४॥ क्षणे क्षणेऽश्वमेधस्य फलं तस्य न दुर्लभम् । अर्चितं शंकरं दृष्ट्वा विष्णुं वापि नमेत्तु यः ॥१३५॥ स विष्णुभवनं प्राप्य मोदते च युगायुतम् । देव्याः प्रदक्षिणामेकां सप्त सूर्यस्य भूमिय ॥१३६॥ तिस्रो विनायकस्यापि चतस्रो विष्णुमन्दिरे । कृत्वा तत्तद्गृहं प्राप्य मोदते युगलक्षकम् ॥१३७॥ यो विष्णोर्भक्तिभावेन तथैव गोद्विजस्य च । प्रदक्षिणां चरेत्तस्य ह्यश्वमेधः पदे पदे ॥१३८॥ काश्यां माहेश्वरं लिङ्गं संपूज्य प्रणमेत्तु यः । न तस्य विद्यते कृत्यं संसृतिर्नैव जायते ॥१३९॥ शिवं प्रदक्षिणं कृत्वा सव्येनैव विधानतः । नरो न च्यवते स्वर्गाच्छंकरस्य प्रसादतः ॥१४०॥ स्तुत्वा स्तोत्रैर्जगन्नाथं नारायणमनामयम् । सर्वान्कामानवाप्नोति मनसा यद्यदिच्छति ॥१४१॥ देवायतने यस्तु भक्तियुक्तः प्रनृत्यति । गायते वा स भूपाल रुद्रलोके च मुक्तिभाक् ॥१४२॥ ये तु वाद्यं प्रकुर्वन्ति देवायतने नराः । ते हंसयानमारूढा व्रजन्ति ब्रह्मणः पदम् ॥१४३॥ करतालं प्रकुर्वन्ति देवायतने तु ये । ते सर्वपापनिर्मुक्ता विमानस्था युगायुतम् ॥१४४॥ देवायतने ये तु घण्टानादं प्रकुर्वते । तेषां पुण्यं निगदितुं न समर्थः शिवः स्वयम् ॥१४५॥ भेरी मृदङ्गपटहमुुरजैश्च सडिण्डिमैः । संप्रीणयन्ति देवेशं तेषां पुण्यफलं शृणु ॥१४६॥ देवस्त्रीगणसंयुक्ताः सर्वकामैः समर्पिताः । स्वर्गलोकमनुप्राप्य मोदन्ते कल्पपञ्चकम् ॥१४७॥ देवतामन्दिरे कुर्वन्नरः शङ्खरवं नृप । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुना सह मोदते ॥१४८॥ नृप ! जो देव मन्दिर में दीप रचना करता है, उसके पुण्य की गणना सौ वर्षों में भी नहीं की जा सकती है । ॥१२८-१३३॥ जो विष्णु या शंकर के समीप अखण्ड दीप जलाता है, उसके लिए क्षण-क्षण में अश्वमेध का फल मिलना दुर्लभ नहीं है अर्थात् उसको क्षण-क्षण में अश्वमेध-फल मिलता है। जो पूजित शंकर या विष्णु की प्रतिमा को देखकर प्रणाम करता है, वह विष्णु लोक में जाकर सहस्र युग तक आनन्द प्राप्त करता है। भूमिप ! जो देवी की एक बार, सूर्य की सात बार, गणेश की तीन बार और विष्णु मन्दिर में चार बार प्रदक्षिणा करता है, वह लाख युगों तक उन-उन देव लोकों में आनन्द पूर्वक निवास करता है ॥१३४-१३७॥ जो व्यक्ति भक्ति पूर्वक विष्णु, गौ, और ब्राह्मण की प्रदक्षिणा करता है वह पग-पग में अश्वमेध का फल प्राप्त करता है । जो काशी में विश्वनाथ की पूजा कर प्रणाम करता है, उसके पुण्य की गणना नहीं की जा सकती और वह कभी भी संसार में जन्म नहीं लेता । जो विधान पूर्वक दक्षिण विधि से शिव की प्रदक्षिणा करता है, वह शंकर की कृपा से कभी भी स्वर्ग से च्युत नहीं होता है । मनुष्य निर्विकार नारायण जगन्नाथ की स्तोत्रों से स्तुति करता है वह उन अपनी सभी मनः कामनाओं को प्राप्त करता है ॥१३८-१४१॥ भूपाल ! जो देव मन्दिरों में भक्ति पूर्वक नाचता या गाता है वह मुक्ति लाभ कर रुद्रलोक में जाता है । जो मनुष्य देव मन्दिर में बाजा बजाता है, वह हंसयान पर आरूढ़ होकर ब्रह्मलोक को जाता है । जो देव मन्दिर में ताली बजाते हैं वे सब पापों से मुक्त होकर सहस्र युग तक विमानारोही देवता होते हैं । जो देव मन्दिर में घण्टा बजाते हैं उनके पुण्यों को स्वयं शिव भी कहने में समर्थ नहीं हैं ॥१४२-१४५॥ जो भी मृदङ्ग , पटह, मुरज और ढोल से देवेश को प्रसन्न करते हैं, उनके पुण्य-फल को सुनिए । वे देव कन्याओं के सहित अपनी मनः कामनाओं को प्राप्त करते हैं और स्वर्ग में जाकर पाँच कल्प तक निवास करते हैं । नृप ! जो मनुष्य देव मन्दिर में शंख बजाता है, वह अपने सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में निवास करता है ।

चतुर्दशोऽध्यायः १०१ तालकांस्यादिनिनदं कुर्वन् विष्णुगृहे नरः । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकमवाप्नुयात् ॥१४६॥ यो देवः सर्वदृग्विष्णुर्ज्ञानरूपी निरञ्जनः । सर्वधर्मफलं पूर्णं संतुष्टः प्रददाति च ॥१५०॥ यस्य स्मरणमात्रेण देवदेवस्य चक्रिणः । सफलानि भवन्त्येव सर्वकर्माणि भूपते ॥१५१॥ परमात्मा जगन्नाथः सर्वकर्मफलप्रदः । सत्कर्मकर्तृभिर्नित्यं स्मृतः सर्वार्तिनाशनः ॥ तमुद्दिश्य कृतं यच्च तदानन्त्याय कल्पते ।१५२॥ धर्माणि विष्णुश्च फलानि विष्णुः कर्माणि विष्णुश्च फलानि भोक्ता । कार्यं च विष्णुः करणानि विष्णुरस्मान्न किंचिद्व्यतिरिक्तमस्ति ॥१५३॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे धर्मानुकथनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३॥

अथ चतुर्दशोऽध्यायः धर्मराज उवाच श्रुतिस्मृत्युदितं धर्मं वर्णानामनुपूर्वशः । प्रवक्ष्यामि नृपश्रेष्ठ तं शृणुष्व समाहितः ॥१॥ यो भुञ्जानोऽशुचिर्वापि चाण्डालं पतितं स्पृशेत् । क्रोधादज्ञानतो वापि तस्य वक्ष्यामि निष्कृतिम् ॥२॥ त्रिरात्रं वाथ षड्रात्रं यथासंख्यं समाचरेत् । स्नानं त्रिषवणं विप्र पञ्चगव्येन शुध्यति ॥३॥ भुञ्जानस्य तु विप्रस्य कदाचित्स्रवते गुदम् । उत्तिष्ठेत्त्वेऽशुचित्वे च तस्य शुद्धिं वदामि ते ॥४॥

मनुष्य विष्णु मन्दिर में ताल, कांस्य (झाल) आदि बाजे बजाकर सब पापों से छूट जाता है और विष्णुलोक को प्राप्त करता है। जो विष्णु ज्ञान स्वरूप, निरञ्जन और सब को देखने वाले हैं वे प्रसन्न होने पर सब धर्म-फलों को पूर्ण रूप से प्रदान करते हैं ॥१४६-१५०॥ भूपते ! जिस देवाधि-देव चक्रधर विष्णु के स्मरण मात्र से सब कार्य पूर्ण हो जाते हैं और जो देव परमात्मा, जगन्नाथ, सब मनोरथों को देने वाले और जिनके स्मरण मात्र से सत्कर्म करने वाले मनुष्यों की सारी विपदायें नष्ट हो जाती हैं, उनके उद्देश्य से जो कुछ कार्य किया जाता है वह अनन्त फल को प्रदान करने में समर्थ होता है । विष्णु ही सब धर्म, सब फल, सब कर्म और सब फलों के भोग करने वाले हैं । वे ही कार्य और वे ही कारण भी हैं । इस भगवान् विष्णु को छोड़कर इस संसार में दूसरा कुछ नहीं है । ॥१५१-१५३॥ "श्री नारदीय महापुराण में धर्मानुकथन नामक तेरहवां अध्याय समाप्त ॥१३॥

अध्याय १४ पापों का प्रायश्चित्त तथा श्राद्ध-पञ्चक निरूपण धर्मराज बोले-नृपश्रेष्ठ ! अब मैं श्रुतिस्मृति में कहे गए वर्णों के धर्म को अक्षरशः कह रहा हूँ, उसको ध्यान पूर्वक सुनो । जो भोजन करते समय क्रोध-वश या अज्ञान-वश अपवित्र, पतित या चाण्डाल को छू देता है, उसका प्रायश्चित्त कहता हूँ । वह तीन रात या छह रात्रि तक व्रत रखे और तीनों काल स्नान करे और पंच गव्य पान करे तब वह शुद्ध होता है ॥१-३॥ यदि कदाचित् भोजन करते समय किसी ब्राह्मण को मल स्राव हो जाय

१०२ नारदीयपुराणम् पूर्वं कृत्वा द्विजः शौचं पश्चादप उपस्पृशेत् । अहोरात्रोषितो भूत्वा पञ्चगव्येन शुद्धयति ॥५॥ निर्गिरन्यदि मेहेत भुक्त्वा वा मेहने कृते । अहोरात्रोषितो भूत्वा जुहुयात्सर्पिषाऽनलम् ॥६॥ यदा भोजनकाले स्यादाशुचिर्ब्राह्मणः क्वचित् । भूमौ निधाय तं ग्रासं स्नात्वा शुद्धिमिवाप्नुयात् ॥७॥ भक्षयित्वा तु तद् ग्रासमुपवासेन शुद्ध्यति । अशित्वा चैव तत्सर्वं त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥८॥ अशनतश्चेद्वमिः स्याद्धै ह्यस्वस्थस्त्रिशतं जपेत् । स्वस्थस्त्रीणि सहस्राणि गायत्र्याः शोधनं परम् ॥६॥ चाण्डालैः श्वपचैः स्पृष्टो विण्मूत्रे च कृते द्विजः त्रिरात्रं तु प्रकुर्वीत भुक्तोच्छिष्टः षडाचरेत् । उदक्यां सूतिकां वापि संस्पृशेदन्त्यजो यदि ॥१०॥ त्रिरात्रेण विशुद्धिः स्यादिति शातातपोऽब्रवीत् । रजस्वला तु संस्पृष्टा श्वभिर्मातङ्गवायसैः ॥१२॥ निराहारा शुचिस्तिष्ठेत्काले स्नानेन शुद्धयति । रजस्वले यदा नार्यावन्योन्यं स्पृशतः क्वचित् ॥१३॥ शुद्धयेते ब्रह्मकूर्चेन ब्रह्मकूर्चेन चोपरि । उच्छिष्टेन च संस्पृष्टो यो न स्नानं समाचरेत् ॥१४॥ ऋतौ तु गर्भं शङ्कित्वा स्नानं मैथुनिनः स्मृतम् । अनृतौ तु स्त्रियं गत्वा शौचं मूत्रपुरीषवत् ॥१५॥ उभावप्यशुची स्यातां दम्पती याभसंगतौ । शयनादुत्थितानारी शुचिः स्यादाशुचिः पुमान् ॥१६॥ भर्तुः शरीरशुश्रूषां दौरात्म्यादप्रकुर्वती । दण्ड्या द्वादशकं नारी वर्षं त्याज्या धनं विना ॥१७॥ त्यजन्नो पतितान्बन्धून्दण्ड्यानुत्तमसाहसम् । पिता हि पतितः कामं न तु माता कदाचन ॥१८॥ हूँ तो उसकी शुद्धि का प्रकार बता रहा हूँ सुनो । वह पहले शौच से निवृत्त होकर आचमन करे और दिन रात उपवास कर पंच गव्य पान करे तब वह शुद्ध हो जाता है । भोजन करते समय यदि मूत्र त्याग हो जाय या मूत्र त्याग के पश्चात् भोजन कर ले तो वह ब्राह्मण दिन रात उपवास कर घृत से अग्नि में हवन करे । यदि कहीं भोजन करते समय ब्राह्मण अपवित्र हो जाय तो ग्रास (कवल) को भूमि पर रख दे और वह स्नान करने से से शुद्ध हो जाता है ॥४-७॥ उस अपवित्र अवस्था में यदि उस ग्रास को खा जाय तब वह उपवास से शुद्ध होता है । यदि उस परसे भोजन को खा जाय तब वह तीन रात तक अशुद्ध रहता है । भोजन करते समय यदि वमन हो जाय तो अस्वस्थ अवस्था में तीन सौ वार गायत्री मंत्र का जप करने से और स्वस्थावस्था में तीन हजार गायत्री के जप से शुद्धि होती है । द्विज मल त्याग या मूत्र त्याग किये हुए यदि चाण्डाल या श्वपच से छू जाय तो तीन रात्रि तक उपवास करे । यदि भोजन करके जूठे ही पश्चात् छू जाय तो छह दिन तक उपवास करे । यदि अन्त्यज ऋतु-मती या सूतिका स्त्री को छू दे तो तीन रात्रि के उपवास से उसकी शुद्धि होती है, ऐसा शातातप ने कहा है ॥८-११३॥ रजस्वला स्त्री यदि कूकर, हाथी या कौए से छू जाय तो निराहार रहे तदन्तर ऋतु स्नान के बाद वह शुद्ध हो जाती है । दो रजस्वला स्त्रियों का यदि परस्पर स्पर्श हो जाय तो वे ब्रह्मकूर्च व्रत करने से शुद्ध हो जाती हैं। उच्छिष्ट (जूठा) के स्पर्श हो जाने पर जो स्नान नहीं करता वह अशुद्ध रहता है। ॥१२-१४॥ ऋतु स्नाता स्त्री से सहवास करने वाला पुरुष गर्भ स्थिति का निश्चय हो जाने पर केवल स्नान से शुद्ध हो जाता है । इसके अतिरिक्त काल में स्त्री सहवास करने पर मूत्रोत्सर्ग या शौच त्याग के समान शुद्धि कार्य करना चाहिए । सम्भोग के समय स्त्री पुरुष दोनों अपवित्र हो जाते हैं; परन्तु स्त्री केवल शय्या त्याग से ही शुद्ध हो जाती है और पुरुष (तब तक) अपवित्र रहता है (जब तक वह स्नान नहीं कर लेता) । जो स्त्री अपनी दुष्टता के कारण पति की सेवा नहीं करती, उसको बारह वर्ष का गृह-निर्वासन दण्ड देना चाहिए और उसको धन से सहायता भी नहीं करनी चाहिए ॥१५-१७॥ अपतित बन्धुओं को त्यागने वाले पुरुष को एक हजार पण या उससे कोई बड़ा दण्ड देना चाहिए । पिता

त्रयोदशोऽध्यायः १०३ आत्मानं घातयेद्यस्तु रज्ज्वादिभिरुपक्रमैः । मृते मेध्येन लेपव्यो जीवतो द्विशतं दमः ॥१९॥ दण्डचास्तत्पुत्रमित्राणि प्रत्येकं पणिकं दमम् । प्रायश्चित्तं ततः कुर्य्युर्यथाशास्त्रप्रचोदितम् ॥२०॥ जलाग्न्युद्बन्धनभ्रष्टाः प्रव्रज्यानाशकच्युताः । विषप्रपतनध्वस्ताः शस्त्रघातहताश्च ये ॥२१॥ न चैते प्रत्यवसिताः सर्वलोकबहिष्कृताः । चान्द्रायणेन शुद्ध्यन्ति तप्तकृच्छ्रद्वयेन वा ॥२२॥ उभयावसितः पापश्यामच्छबलकाच्च्युतः । चान्द्रायणाभ्यां शुद्धयेत दत्त्वा धेनुं तथा वृषम् ॥२३॥ श्वशृगालप्लवङ्गाद्यैर्मानुषैश्च रतिं विना । स्पृष्टः स्नात्वा शुचिः सद्यो दिवा संध्यासु रात्रिषु ॥२४॥ अज्ञानाद्वा तु यो भुक्त्वा चाण्डालान्नं कथंचन । गोमूत्रयावकाहारो मासार्द्धेन विशुद्ध्यति ॥२५॥ गोब्राह्मणगृहं दग्ध्वा मृतं चोद्बद्धन्धनादिना । पाशं छित्त्वा तथा तस्य कृच्छ्रमेकं चरेद्विजः ॥२६॥ चाण्डालपुल्कसानां च भुक्त्वा हत्वा च योषितम् । कृच्छ्रार्द्धमाचरेज्ज्ञानादज्ञानाद्दैन्दवद्वयम् ॥२७॥ कापालिकान्नभोक्तॄणां तन्नारीगामिनां तथा । अगम्यागमने विप्रो मद्यगोमांसभक्षणे ॥२८॥ तप्तकृच्छ्रपरिक्षिप्तो मौर्वीहोमेन शुद्धयति । महापातककर्त्तारश्चत्वारोऽथ विशेषतः ॥२९॥ अग्निं प्रविश्य शुद्ध्यन्ति स्थित्वा वा महति क्रतौ । रहस्यकरणोऽप्येवं मासमभ्यस्य पूरुषः ॥३०॥ अघमर्षणसूक्तं वा शुद्ध्येदन्तर्जले जपन् । रजकश्चर्मकारश्च नटो बुरुड एव च ॥३१॥ कैवर्त्तमेदभिल्लाश्च सप्तैते ह्यन्त्यजाः स्मृताः । भुक्त्वा चैषां स्त्रियो गत्वा पीत्वा यः प्रतिगृह्यते ॥३२॥ भले पतित हो सकता है किन्तु माता कभी पतित नहीं हो सकती है। जो रस्सी आदि का फन्दा लगाकर आत्म- हत्या करता है, उसके मरने पर पवित्र वस्तु (चन्दन आदि) से उसके शरीर को लिप्त कर देना चाहिए और यदि वह जीवित रह जाय तो उसके ऊपर दो सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए। उसके पुत्र-मित्रों को भी पण का दण्ड देना चाहिए। फिर वे लोग शास्त्रनिर्देशानुसार प्रायश्चित्त करें। जो जल, अग्नि तथा फाँसी लगाकर मरने से बच जाते हैं, संन्यास नष्ट करने से बच जाते हैं, विष तथा शस्त्रघात से बच जाते हैं, उनका प्रायश्चित्त नहीं है। वे सब लोगों से बहिष्कृत हैं। अथवा एक चान्द्रायण व्रत और दो तप्तकृच्छ्र व्रत करने से वे शुद्ध हो सकते हैं। जो जितेन्द्रियहीनता के कारण चित्र-विचित्र पाप-कर्मों से विरत नहीं हो सका, वह दो चान्द्रायण व्रत तथा धेनु और वृष दान करने से शुद्ध हो जाता है। बिना प्रेम के कुत्ते, सियार, बन्दर तथा मनुष्य से स्पर्श हो जाने पर दिन, सन्ध्यासमय तथा रात्रि में सद्यः स्नान करने से शुद्धि होती है ॥१९-२४॥ जो भूल से चाण्डाल का अन्न खा ले वह एक पक्ष तक गोमूत्र और कुल्थी का आहार करने से शुद्ध होता है। जो गौ और ब्राह्मण का घर जला दे और उसके कारण कोई बँधा हुआ पशु मर जाय तो वह ब्राह्मण पहले उसका वन्धन तोड़े और उसकी शान्ति के लिए कृच्छ्र चान्द्रायण व्रत करे। चाण्डाल और पुल्कस का अन्न खाने और किसी स्त्री की हत्या करने पर यदि जान बूझ कर यह कार्य हुआ हो तब तो अर्द्धकृच्छ्र चान्द्रायण करे और यदि बिना जाने हो गया हो तो दो सोम व्रत करे। कापालिक का अन्न खाने वाला और उसकी स्त्री से भोग करने वाला अथवा मद्यप, मांस भोजी और अगम्यागमन करने वाला ब्राह्मण तप्तकृच्छ्र व्रत से और मौर्वी होम से शुद्ध होता है ॥२५-२८॥ विशेष रूप से चार प्रकार के महापाप करने वाले अग्नि में प्रवेश से शुद्ध होते अथवा महान् यज्ञ (अश्वमेघ, सौम्ययाग आदि यज्ञों को) करने से भी वह शुद्ध होता है। इसी प्रकार मनुष्य कोई गुप्त भेद या पाप कर्म में सहायता पहुँचाने पर जल के भीतर डूबकर 'अघमर्षण' मन्त्र का जाप करने से शुद्ध होता है। धोबी, चमार, नट, बुरु, केवट, मेद और भिल्ल ये सात अन्त्यज कहे गए हैं। जानबूझकर इनका अन्न खाने, इनकी स्त्रियों के साथ सहवास करने, इनका जल पीने और दान लेने पर विप्र अर्द्धकृच्छ्र चन्द्रायण व्रत करने से शुद्ध होता है और यदि अनजान से हुआ हो तब तो दो बार सोमव्रत करने से शुद्धि होती है। माता, गुरुपत्नी,

१०४ नारदीयपुराणम् कृच्छ्रार्द्धमाचरेज्ज्ञानादज्ञानाद्वैन्दवद्वयम् । मातरं गुरुपत्नीं च दुहितृभगिनीस्नुषाः ॥३३॥ संगम्य प्रविशेदग्निं नान्या शुद्धिर्विधीयते । राज्ञीं प्रब्रजितां धात्रीं तथा वर्णोत्तमामपि ॥३४॥ गत्वा कृच्छ्रद्वयं कुर्यात्सगोत्रामभिगम्य च । अमूषु पितृगोत्रासु मातृगोत्रगतासु च ॥३५॥ परदारेषु सर्वेषु कृच्छ्रार्द्धं तपनं चरेत् । वेश्याभिगमने पापं व्यपोहन्ति द्विजास्तथा ॥३६॥ पीत्वा सकृत्सुतप्तं च पञ्चरात्रं कुशोदकम् । गुरुतल्पगतो कुर्याद्ब्राह्मणो विधिवद्व्रतम् ॥३७॥ गोघ्नस्य केचिदिच्छन्ति केचिच्चैवावकीर्णिनः । दण्डादूर्ध्वं प्रहारेण यस्तु गां विनिपातयेत् ॥३८॥ द्विगुणं गोव्रतं तस्य प्रायश्चित्तं विशोधयेत् । अङ्गुष्ठमात्रस्थूलस्तु बाहुमात्रप्रमाणकः ॥३९॥ सार्द्रकस्सपलाशश्च गोदण्डः परिकीर्त्तितः । गवां निपातने चैव गर्भोऽपि संभवेद्यदि ॥४०॥ एकैकशश्चरेत्कृच्छ्रं एषा गोघ्नस्य निष्कृतिः । बन्धने रोधने चैव पोषणे वा गवां रुजाम् ॥४१॥ संपद्यते चेन्मरणं निमित्तेनैव लिप्यते । मूच्छितः पतितो वापि दण्डेनाभिहतस्ततः ॥४२॥ उत्थाय षट्पदं गच्छेद्सप्त पञ्चदशापि वा । ग्रासं वा यदि गृह्णीयात्तोयं वापि पिबेद्यदि ॥४३॥ सर्वव्याधिप्रनष्टानां प्रायश्चित्तं न विद्यते । काष्ठलोष्टाश्मभिर्गावः शस्त्रैर्वा निहता यदि ॥४४॥ प्रायश्चित्तं स्मृतं तत्र शस्त्रे शस्त्रे निगद्यते । कष्ठे सान्तपनं प्रोक्तं प्राजापत्यं तु लोष्टके ॥४५॥ तप्तकृच्छ्रं तु पाषाणे शस्त्रे चाप्यतिकृच्छ्रकम् । औषधं स्नेहमाहारं दद्याद्गोब्राह्मणेषु च ॥४६॥ कन्या, बहिन और पतोहू इनसे संगम करने से मनुष्य के लिए केवल अग्नि में जलकर मर जाना ही एक मात्र प्रायश्चित्त है और कोई दूसरी शुद्धि नहीं ॥२६-३३॥ रानी, संन्यासिनी धाय, और उत्तम वर्ण की स्त्री अथवा सगोत्रा से सहवास करने पर मनुष्य दो कृच्छ्र व्रत करे । पितृ गोत्र और मातृ गोत्र वाली स्त्री के साथ संगम करने वाले के लिए यही प्रायश्चित्त है । पर स्त्रियों के साथ सहवास करने पर अर्द्धकृच्छ्र व्रत का पालन करना चाहिए । वेश्यागमन करने से ब्राह्मण पाँच रात्रि तक एक-एक बार बहुत गर्म कुश-जल से स्नान करने से उस पाप से मुक्त हो सकता है । गुरुपत्नीगामी ब्राह्मण विधिपूर्वक व्रत का पालन करे । कोई कहते हैं कि गोहन्ता को जो व्रत करना चाहिए वही व्रत गुरुपत्नीगामी भी करे । और किन्हीं का कहना है कि ब्रह्मचर्यव्रत-भंग करने पर जो प्रायश्चित्त होता है वही उसको करना चाहिए । जो डंडे से मारकर गौ को गिरा दे उसकी शुद्धि दूने गोव्रत से होतो है ॥३४-३८॥ एक अंगुल मोटा एक हाथ लम्बा पलाश या और किसी गीली लकड़ी का दण्ड गोदण्ड कहा गया है । गौ यदि सगर्भा हो और वह चोट खाकर गिर जाय तो प्रत्येक जीव के लिए एक-एक बार कृच्छ्र व्रत करे, यही गोहत्या करने वाले के लिए प्रायश्चित्त है । बाँधने से, घर में बन्द करने से, उसको चारा खिलाने से या रोग दूर करने के लिए ओषधि देने से यदि गौ मर जाय तो भी निमित्त (मृत्युकारण) का दोष लगता है ॥३९-४१॥३ डंडा मारने से यदि गाय मूर्च्छित होकर-गिर जाय और फिर इसके बाद छह पग या दश पन्द्रह पग चले, या घास खाने लगे या पानी पीने लगे तो दण्ड प्रहार जन्य पीड़ा के शीघ्र नष्ट हो जाने से कोई प्राय- श्चित्त नहीं कहा गया है । काठ, पत्थर, ढेला या शस्त्र की मार से यदि गाय मर जाय तो इसके लिए भिन्न भिन्न प्रकार से प्रायश्चित्त कहा गया है ॥४२-४४३॥ काठ के डंडे के मारने पर शान्तपन और ईंट से मारने पर प्राजापत्य, पत्थर से मारने पर तप्तकृच्छ्र और शास्त्र से मारने पर अति कृच्छ्र व्रत करना चाहिए । गौ और ब्राह्मण को ओषधि, तेल अथवा भोजन देने से यदि कोई घटना हो जाय तो उसके लिए प्रायश्चित्त नहीं करना पड़ता । इसी प्रकार तेल या ओषधि पिलाने या खिलाने से यदि कोई अप्रिय घटना हो जाय तो उसके

चतुर्दशोऽध्यायः १०५ दीयमाने विपत्तिः स्यात्प्रायश्चित्तं तदा नहि। तैलभेषजपाने च भेषजानां च भक्षणे ॥४७॥ निश्शल्यकरणे चैव प्रायश्चित्तं न विद्यते। वत्सानां कण्ठबन्धेन क्रियया भेषजेन तु ॥४८॥ सायं संगोपनार्थं च त्वदोषो रोधबन्धयोः। पादे चैवास्य रोमाणि द्विपादे श्मश्रु केवलम् ॥४९॥ त्रिपादे तु शिखावज्रं मूले सर्वं समाचरेत्। सर्वान्केशान्समुद्धृत्य छेदयेदङ्गुलद्वयम् ॥५०॥ एवमेव तु नारीणां मुण्डनं शिरसः स्मृतम्। न स्त्रिया वपनं कार्यं न च वीरासनं स्मृतम् ॥५१॥ न च गोष्ठे निवासोऽस्ति न गच्छन्तीमनुव्रजेत्। राजा वा राजपुत्रो वा ब्राह्मणो वा बहुश्रुतः ॥५२॥ अकृत्वा वपनं तेषां प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत्। केशानां रक्षणार्थं च द्विगुणं व्रतमादिशेत् ॥५३॥ द्विगुणे तु व्रते चीर्णे द्विगुणा व्रतदक्षिणा ॥५४॥ पापं न क्षीयते हन्तुर्दाता च नरकं व्रजेत्। अश्रौतस्मार्तविहितं प्रायश्चित्तं वदन्ति ये ॥५५॥ तान्धर्मविघ्नकर्तृंश्च राजा दण्डेन पीडयेत्। न चैतान्पीडयेद्राजा कथंचित्काममोहितः ॥५६॥ तत्पापं शतधा भूत्वा तमेव परिसर्पति। प्रायश्चित्ते ततश्चीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ॥५७॥ विंशतिर्गा वृषं चैकं दद्यात्तेषां च दक्षिणम्। क्रिमिभिस्तृणसंभूतैर्मक्षिकादिनिपातितैः ॥५८॥ कृच्छ्राद्धं स प्रकुर्वीत शक्त्या दद्याच्च दक्षिणाम्। प्रायश्चित्तं च कृत्वा वै भोजयित्वा द्विजोत्तमान् ॥५९॥ सुवर्णमानिकं दद्यात्ततः शुद्धिर्विधीयते। चाण्डालश्वपचैः स्पृष्टे निशि स्नानं विधीयते ॥६०॥ न वसेत्तत्र रात्रौ तु सद्यः स्नानेन शुद्ध्यति। वसेदथ यदां रात्रावज्ञानादविचक्षणः ॥६१॥ तदा तस्य तु तत्पापं शतधा परिवर्त्तते। उदग्गच्छन्ति च नक्षत्राण्युपरिष्टाच्च ये ग्रहाः ॥६२॥ लिए प्रायश्चित्त नहीं कहा गया है। गाय के शरीर से काँटे आदि निकालने में भी प्रायश्चित्त नहीं है ॥४५-४७३॥ बछड़ों के गले में रस्सी बाँधने, ओषधि पिलाने तथा सायंकाल सुरक्षा के लिए उन्हें बाँधने या उन पर क्रोध करने में भी कोई दोष नहीं है। एकपाद प्रायश्चित्त में कुछ रोम कटावे, द्विपाद प्रायश्चित्त में केवल दाढ़ी-मूंछ कटावे, त्रिपाद प्रायश्चित्त में शिखा छोड़कर मुंडन करावे और पूर्ण प्रायश्चित्त में यथोक्त सब विधियों का पालन करे। सभी केशों को पकड़कर दो अंगुल परिमाण में कटा दे। इसी प्रकार नारियों के सिर का मुंडन भी करावे अर्थात् उनके दो अंगुल बालों को कटावे। क्योंकि स्त्रियों के लिए केश- वपन और वीरासन वर्जित हैं। स्त्री गोष्ठ में निवास न करे तथा चलती हुई गाय के पीछे भी न चले। राजा, राजपुत्र या बहुज्ञ ब्राह्मण के लिए बिना केशवपन के ही प्रायश्चित्त का विधान है। केश की रक्षा की दृष्टि से इनके लिए दूने व्रत का विधान है। व्रत पालन हो जाने के अनन्तर दूनी दक्षिणा देने की भी विधि है ॥४८-५३॥ जो व्यक्ति श्रुति-स्मृति के विरुद्ध प्रायश्चित्त बतलाते हैं, वे तो स्वयं नरक में गिरते ही हैं उस गोहत्या करने वाले के पाप भी नष्ट नहीं होते। ऐसे धर्म में विघ्न डालने वाले को राजा दण्ड देकर पीड़ित करे। यदि कदाचित् राजा इच्छा वश या किसी पक्षपात वश ऐसा नहीं करता तो वह पाप सौगुना होकर उसी के मत्थे पड़ जाता है। प्रायश्चित्त हो जाने पर ब्राह्मण-भोजन परमावश्यक है और ऐसे कार्य में बीस गायें और एक बैल दक्षिणा में देना आवश्यक है ॥५४-५७३॥ घास के कीड़ों से यदि गाय की मृत्यु हो बाय तो आधा कृच्छ्र व्रत करे और यथाशक्ति दक्षिणा दे। प्रायश्चित्त के उपरान्त उत्तम ब्राह्मणों को भोजन कराकर उनको सुवर्ण की गुरिया देनी चाहिए तभी शुद्धि होती है ॥५८-५६३॥ चाण्डाल और श्वपच के स्पर्श हो जाने से रात्रि में स्नान का विधान है। उस रात्रि को वह यों न रहे प्रत्युत तत्काल स्नान कर ले। ऐसा करने से वह शीघ्र शुद्ध हो जाता है। यदि कोई अज्ञानी व्यक्ति यों ही रह जाय तो वह पाप सौगुना होकर बढ़ता जाता है। जो ग्रह और नक्षत्र आकाश में उगे रहते १४-नार०

Here is the complete line-by-line transcription in Sanskrit/Hindi Devanagari script:

१०६ नारदीयपुराणम् वृष्टे रश्मिभिस्तेषामुदकस्नानमाचरेत् । याश्चान्तर्जल्वल्मीकमूषिकोखरवर्त्मसु ॥६३॥ श्मशाने शौचशेषे च न ग्राह्याः सप्त मृत्तिकाः । इष्टापूर्तं तु कर्तव्यं ब्राह्मणेन प्रयत्नतः ॥६४॥ इष्टेन लभते स्वर्गं मोक्षं पूर्तेन चाप्नुयात् । वित्तक्षेपो भवेदिष्टं तडागं पूर्तमुच्यते ॥६५॥ आरामश्च विशेषेण देवद्रोण्यस्तथैव च । वापीकूपतडागानि देवतायतनानि च ॥६६॥ पतितान्युद्धरेद्यस्तु स पूर्वफलमश्नुते । शुक्लाया आहरेन्मूत्रं कृष्णाया गोः शकृत्तथा ॥६७॥ ताम्रायाश्च पयो ग्राह्यं श्वेतायाश्च दधि स्मृतम् । कपिलाया घृतं ग्राह्यं महापातकनाशनम् ॥६८॥ कुशैस्तीर्थनदीतोयैः सर्वद्रव्यं पृथक् पृथक् । आहत्य प्रणवेनैव उत्थाप्यं प्रणवेन च ॥६६॥ प्रणवेन समालोड्य प्रणवेनैव संपिबेत् । पालाशे मध्यमे पर्णभाण्डे ताम्रमये शुभे ॥७०॥ पिबेत्पुष्करपर्णे वा मृन्मये वा कुशोदकम् । सूतके तु समुत्पन्ने द्वितीये समुपस्थिते ॥७१॥ द्वितीये नास्ति दोषस्तु प्रथमेनैव शुध्यति । जातेन शुध्यते जातं मृतेन मृतकं तथा ॥७२॥ गर्भसंलवणे मासे त्रीण्यहानि विनिर्देशेत् ॥७३॥ रात्रिभिर्मासतुल्याभिर्गर्भस्रावे विशुद्ध्यति । रजस्युपरते साध्वी स्नानेन स्त्री रजस्वला ॥७४॥ स्वगोत्राद्भ्रश्यते नारी विवाहात्सप्तमे पदे । स्वामिगोत्रेण कर्त्तव्यास्तस्याः पिण्डोदकक्रियाः ॥७५॥ उद्देशयं पिण्डदाने स्यात्पिण्डे पिण्डे द्विनामतः । षण्णां देयास्त्रयः पिण्डा एवं दाता न मुह्यति ॥७६॥ स्वेन भर्त्रा सहस्राब्दं माता भुक्ता सुदैवतम् । पितामह्यपि स्वेनैव स्वेनैव प्रपितामही ॥७७॥ हैं उनकी किरणों से अशुद्ध अवस्था में स्पर्श हो जाने पर जल से स्नान करना चाहिए। जल के भीतर की मिट्टी, वल्मीक (दीमकों का घर), चूहे के बिल की मिट्टी, ऊसर भूमि, मार्ग, श्मशान और शौच के लिए ली हुई मिट्टी इन सात प्रकार की मिट्टियों को उपयोग में नहीं लाना चाहिए। ब्राह्मण को यत्नपूर्वक इष्ट और पूर्त कार्य करना चाहिए। इष्ट से स्वर्ग प्राप्त होता है और पूर्त कर्म से मोक्ष मिलता है। धन से सम्पन्न किये जाने वाले यज्ञ, आतिथ्य आदि इष्ट कर्म और तड़ाग आदि बनवाना पूर्तक हा जाता है ॥६०-६५॥ आराम (वाटिका), देवद्रोणी, वावली, कुएं, तड़ाग और देव-मन्दिरों का पुनरुद्धार करने से पूर्व-वर्णित फल प्राप्त होते हैं। पञ्चगव्य को विधि बता रहे हैं—शुक्ल गौ का मूत्र, कृष्णा गो का गोबर, लाल गौ का दूध-धवल गौ का दधि और कपिला गौ का घृत लेना चाहिए। ये महापापों के नाशक हैं। कुश, तीर्थ और नदी के जल से इन सब द्रव्यों को पृथक्-पृथक् 'ओंकार' उच्चारण कर के ले आना चाहिए ॥६६-६६॥ उनको प्रणवोच्चारण से हो एक में मिलाना चाहिए और प्रणव उच्चारण पूर्वक ही उसको पी जाना चाहिए। पलाश के मध्य के पत्ते में, स्वच्छ तांबे के वर्तन, कमल-पत्र अथवा मिट्टी के पात्र में कुशोदक पीना चाहिए। एक सूतक के आ जाने पर यदि बीच में दूसरा भी सूतक आ जाय तो दूसरे के लिए पृथक् शुद्धि नहीं प्रत्युत पहले से ही दोष-शान्ति हो जाती है। प्रथम जनन शौच से द्वितीय जनन शौच और प्रथम मृत शौच से द्वितीय की भी शुद्धि हो जाती है ॥७०-७२॥ जिस मास में गर्भस्राव हो तो गर्भस्राव के पश्चात् तीन दिन तक दोष रहता है, मास के अनु- कूल अर्थात् जितने मास के गर्भ होने के अनन्तर गर्भस्राव हो उतनी रात्रि तक दोष रहता है। तदनन्तर वह शुद्ध हो जाती है। रजस्वला स्त्री रजस्राव के अनन्तर स्नान करने से शुद्ध हो जाती है। विवाह के समय सप्तपदी हो जाने से स्त्री अपने गोत्र से च्युत हो जाती है, अतः पति के गोत्र से ही स्त्री का श्राद्ध करना चाहिए, प्रत्येक पिण्ड में दो नामों का निर्देश करना चाहिए। छह को तीन पिण्ड देना चाहिए, ऐसा करने से भी दाता को कोई दोष नहीं लगता ॥७३-७६॥ माता अपने पति के साथ सहस्र वर्षों तक स्वर्ग सुख भोगती है। इसी प्रकार दादी (पितामही) और प्रपितामही (परदादी) भी अपने अपने पति के साथ स्वर्ग में निवास करती हैं। अतः वर्ष-वर्ष में माता-पिता का श्राद्ध करना चाहिए। श्राद्ध में ज्योतिषी को नहीं

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चतुर्दशोऽध्यायः १०७ वर्षे वर्षे तु कुर्वीत मातापित्रोस्तु सत्कृतिम् । अदेवं भोजयेच्छ्राद्धं पिण्डमेकं तु निर्वपेत् ॥७८॥ नित्यं नैमित्तिकं काम्यं वृद्धिश्राद्धमथापरम् । पार्वणं चेति विज्ञेयं श्राद्धं पञ्चविधं बुधैः ॥७६॥ ग्रहोपरागे संक्रान्तौ पर्वोत्सवेमहालये । निर्वपेत्त्रीन्नरः पिण्डानेकमेव मृतेऽहनि ॥८०॥ अनूढा न पृथक्कन्या पिण्डे गोत्रे च सूतके । पाणिग्रहणमन्त्राभ्यां स्वगोत्राद्भ्रश्यते ततः ॥८१॥ येन येन तु वर्णेन या कन्या परिणीयते । तत्समं सूतकं याति तथा पिण्डोदकेऽपि च ॥८२॥ विवाहे चैव संवृत्ते चतुर्थेऽहनि रात्रिषु । एकत्वं सा व्रजेद्भर्तुः पिण्डे गोत्रे च सूतके ॥८३॥ प्रथमेऽह्नि द्वितीये वा तृतीये वा चतुर्थके । अस्थिसंचयनं कार्यं बन्धुभिर्हितबुद्धिभिः ॥८४॥ चतुर्थे पञ्चमे चैव सप्तमे नवमे तथा । अस्थिसंचयनं प्रोक्तं वर्णानामनुपूर्वशः ॥८५॥ एकादशाहे प्रेतस्य यस्य चोत्सृज्यते वृषः । मुच्यते प्रेतलोकात्स स्वर्गलोके महीयते ॥८६॥ नाभिमात्रे जले स्थित्वा हृदयेन तु चिन्तयेत् । आगच्छन्तु मे पितरो गृह्णन्त्वेताञ्जलाञ्जलीन् ॥८७॥ हस्तौ कृत्वा तु संयुक्तौ पूरयित्वा जलेन च । गोशृङ्गमात्रमुद्धृत्य जलमध्ये विनिःक्षिपेत् ॥८८॥ आकाशे च क्षिपेद्वारि वारिस्थो दक्षिणामुखः । पितॄणां स्थानमाकाशं दक्षिणादिक् तथैव च ॥८६॥ आपो देवगणाः प्रोक्ता आपः पितृगणास्तथा । तस्मादस्य जलं देयं पितॄणां हितमिच्छता ॥६०॥ दिवा सूर्याशुसंतप्तं रात्रौ नक्षत्रमाहतैः । मध्ययोरप्युभाभ्यां च पवित्रं सर्वदा जलम् ॥६१॥ स्वभावयुक्तमव्यक्तममेध्येन सदा शुचिः । भाण्डस्थं धरणीस्थं वा पवित्रं सर्वदा जलम् ॥६२॥


खिलाना चाहिए और श्राद्ध में उन लोगों के निमित्त एक पिण्ड देना चाहिए । नित्य-नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि और पार्वण ये पाँच श्राद्ध पंडितों ने बतलाये हैं ॥७७-७६॥ ग्रहण, संक्रान्ति, पर्वोत्सव, और महालय (पितृ- पक्ष) में मनुष्य मृत्युदिन को तीन पिण्ड तीनों के निमित्त दे । अविवाहित कन्या पिण्डकर्म, गोत्र और सूतक नादि में पृथक् नहीं समझी जाती, जब पाणिग्रहण के मन्त्र पढ़े जाते तभी वह गोत्र से पृथक् होकर पति-गोत्र की हो जाती है । जो कन्या जिस वर्ण के पति से ब्याही जाती है उसी पति के गोत्रानुकूल सूतक और श्राद्ध- क्रिया होती है । विवाह हो जाने पर चौथे दिन के रात्रि से वह पति के गोत्रानुसार सूतक, पिण्ड और गोत्र में एक हो जाती है । मरने के पश्चात् पहले, दूसरे, तीसरे ओर चौथे दिन में मृतक को हितदृष्टि से बन्धुओं को मृतक के लिए अस्थिसंचयन कर्म करना चाहिए ॥८०-८४॥ वर्णों के क्रमानुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय क्रम से चौथे, पाँचवें, सातवें और नवें दिन अस्थि-संचयन करना करना चाहिए । एकादशाह के दिन जिस के निमित्त 'वृषोत्सर्ग'१ किया जाता वह शीघ्र यमलोक से छूट कर स्वर्गलोक में आदरपूर्वक चला जाता है। नाभि पर्यन्त गहरे जल में जाकर हृदय से प्रेत के स्मरण करने के पश्चात् 'आगच्छन्तु मे पितरो गृह्णन्त्वेताञ्जलाञ्जलीन्, 'मेरे पितर आओ इस जलांजलि को ग्रहण करो' इस मन्त्र से अञ्जलि बांधकर उसको जल से पूर्णकर गौ के सींग की ऊँचाई से जल में छोड़ दे । जल में रहकर ही दक्षिण को ओर मुंह कर आकाश में जल छोड़ना चाहिए क्योंकि पितरों का स्थान आकाश है और दक्षिण दिशा पितरों की दिशा है ॥८५-८६॥ जल देवगण है और जल को ही पितृगण कहा गया है, अतएव पितरों का हितेच्छु, मनुष्य पितृहित के लिए जल दे। दिन में सूर्य को किरणों से तपने के कारण और रात्रि में नक्षत्र और और वायु के स्पर्श से, संध्याकाल में सूर्य-चन्द्रमा दोनों के स्पर्श से जल सर्वदा पवित्र रहता है। प्राकृतिक अव्यक्त जल


१. श्राद्ध में त्रिशूल और चक्र से चिह्नित करके वृषभ छोड़ा जाता है इसी से वृषोत्सर्ग कहते हैं ।

१०८ नारदीयपुराणम् देवतानां पितॄणां च जलं दद्याज्जलाञ्जलीन् । असंस्कृतप्रमीतानां स्थले दद्याद्विचक्षणः ॥६३॥ श्राद्धे हवनकाले च दद्यादेकेन पाणिना । उभाभ्यां तर्पणे दद्यादेष धर्मो व्यवस्थितः ॥६४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे धर्मशान्तिनिर्देशो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥ पञ्चदशोऽध्यायः धर्मराज उवाच पापभेदान्प्रवक्ष्यामि यथा स्थूलाश्च यातनाः । शृणुष्व धैर्यमास्थाय रौद्रा ये नरका यतः ॥१॥ पापिनो ये दुरात्मानो नरकाग्निषु सन्ततम् । पच्यन्ते येषु तान्वक्ष्ये भयंकरफलप्रदान् ॥२॥ तपनो बालुकाकुम्भो महारौरवरौरवौ । कुम्भीपाको निरुच्छ्वासः कालसूत्रः प्रमर्दनः ॥३॥ असिपत्रवनं घोरं लालाभक्षो हिमोत्कटः । मूषावस्था वसाकूपस्तथा वैतरणी नदी ॥४॥ भक्ष्यन्ते मूत्रपानं च पुरीषह्रद एव च । तप्तशूलं तप्तशिला शाल्मलीद्रुम एव च ॥५॥ तथा शोणितकूपश्च घोरः शोणितभोजनः । श्वमांसभोजनं चैव वह्निज्वालानिवेशनम् ॥६॥ शिलावृष्टिः शस्त्रवृष्टिर्वह्निवृष्टिस्तथैव च । क्षारोदकं चोष्णतोयं तप्तायः पिण्डभक्षणम् ॥७॥ सर्वदा पवित्र होता है। पात्र में रखा हुआ और पृथ्वीतल का, सरोवर, तड़ाग आदि का जल सर्वदा पवित्र रहता है। देवता और पितरों को जलांजलि देनी चाहिए। संस्कार तथा प्रमाण से हीन व्यक्तियों के लिए भूमि पर जल छोड़ना चाहिए। श्राद्ध और हवनकाल में एक हाथ से जल देना चाहिए और तर्पण में दोनों हाथ से जल देना चाहिए ॥६०-६४॥ श्रीनारदीयपुराण के धर्मशान्तिनिर्देश नामक चौदहवां अध्याय समाप्त ॥१४॥ अध्याय १५ नरकयातना तथा गंगानयनवर्णन धर्मराज बोले—हे राजन् ! अब पापों के भेद और तदनुकूल घोर नरकों की यातनाओं को बता रहा हूँ, धैर्यपूर्वक सुनो ! क्योंकि नरक अत्यन्त भयङ्कर होते हैं। जो दुरात्मा पापी जन हैं वे सदा जिन नरकों की ज्वाला में जलते रहते हैं, उन भयङ्कर फल देने वाले नरकों का वर्णन कर रहा हूँ ॥१-२॥ तपन, बालुकाकुम्भ, महारौरव, रौरव, कुम्भीपाक, निरुच्छ्वास (?) कालसूत्र, प्रमर्दन, घोर असिपत्रवन, लालाभक्ष, हिमोत्कट, मूषावस्था, वसा- कूप और वैतरणी नदी ये कुछ नरकों के नाम हैं। पुरीषह्रद (विष्ठा के तालाब) में मूत्रपान और विष्ठा का भक्षण करना पड़ता है। तप्तशूल, तप्तशिला (जलती हुई चट्टानों का नरक) शाल्मलीद्रुम ॥३-५॥ शोणितकूप (रक्त का कुँआ), घोर शोणितभोजन, श्वमांसभोजन (कुत्ते का मांस खाना), वह्निज्वालानिवेशन, शिलावृष्टि, शस्त्र- वृष्टि, वह्निवृष्टि, क्षारोदक (खारा जल), उष्णतोय (गरम जल), तप्तायःपिण्डभक्षण¹, शिरःशोषण, मरुत्प्रपतन, १. जलते लोहे का गोला खाना ।

षष्ठ षष्ठोऽध्यायः १०३ अथ शिरःशोषणं च मरुत्प्रपतनं तथा। तथा पाषाणवर्षं च कृमिभोजनमेव च ॥८॥ क्षारोदपानं भ्रमणं तथा क्रकचदारणम्। पुरीषलेपनं चैव पुरीषस्य च भोजनम् ॥६॥ रेतः पानं महाघोरं सर्वसन्धिषु दाहनम् । धूमपानं पाशबन्धं ज्ञाना शूलानुलेपनम् ॥१०॥ अङ्गारशयनं चैव तथा मुसलमर्दनम् । बहूनि काष्ठयन्त्राणि कषणं छेदनं तथा ॥११॥ पतनोत्पतनं चैव गदादण्डादिपीडनम् । गजदन्तप्रहरणं नानासपैश्च दंशनम् ॥१२॥ शीताम्बुसेचनं चैव नासायां च मुखे तथा । घोरक्षाराम्बुपानं च तथा लवणभक्षणम् ॥१३॥ स्नायुच्छेदं स्नायुबन्धमस्थिच्छेदं तथैव च। क्षाराम्बुपूर्णरन्ध्राणां प्रवेशं मांसभोजनम् ॥१४॥ पित्तपानं महाघोरं तथैव श्लेष्मभोजनम् । वृक्षात्प्रापातनं चैव जलान्तर्मज्जनं तथा ॥१५॥ पाषाणधारणं चैव शयनं कण्टकोपरि । पिपीलिकादंशनं च वृश्चिकैश्चापि पीडनम् ॥१६॥ व्याघ्रपीडा शिवापीडा तथा महिषपीडनम् । कदर्द्मे शयनं चैव दुर्गन्धपरिपूरणम् ॥१७॥ बहुशश्चार्द्धशयनं महातिक्तनिषेवणम् । अत्युष्णतैलपानं च महाकटुनिषेवणम् ॥१८॥ कषायोदकपानं च तप्तपाषाणतक्षणम् । अत्युष्णशीतस्नानं च तथा दशनशीर्णनम् ॥१९॥ तप्तायः शयनं चैव ह्ययोभारस्य बन्धनम् । एवमाद्या महाभाग यातना कोटिकोटिशः ॥२०॥ अपि वर्षसहस्रेण नाहं निगदितुं क्षमः । एतेषु यस्य यत्प्राप्तं पापिनः क्षितिरक्षक ॥२१॥ तत्सर्वं संप्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु । ब्रह्महा च सुरापी च स्तेयो च गुरुतल्पगः ॥२२॥ महापातकिनस्त्वेते तत्संगी च पञ्चमः । पंक्तिभेदी वृथापाकी नित्यं ब्राह्मणदूषकः ॥२३॥ आदेशी वेदविक्रेता पञ्चैते ब्रह्मघातकाः । ब्राह्मणं यः समाहूय दास्यामीति धनादिकम् ॥ पश्चान्नास्तीति यो ब्रूयात्तमाहुर्ब्रह्मघातिनम् ॥२४॥

पत्थरवर्ष, कृमिभोजन, क्षारोदपान, भ्रमण, क्रकचदारण, पुरीषलेपन, पुरीषभोजन, रेतः (वीर्य) पान, महाघोर सब सन्धियों (जोड़ों) में दाहन, धूमपान, पाशबन्ध, नाना शूलानुलेपन, ॥६-१०॥ अंगारशयन, मुसलमर्दन, बहुत से काठ के बने यन्त्रों में दबाना और काटना, पतनोत्पतन, गदा, दण्ड आदि से पीड़ित करना, गजदन्तप्रहरण, नानासपर्दंशन (अनेक सापों से कटवाना) नाक में और मुंह में शीतल जल छोड़ना, अतिकड़वा जल पिलाना, नमक खिलाना स्नायुओं को काटना, स्नायुबन्ध, अस्थिच्छेदन, खारे जल से भरी नालियों में घुसाना, मांस खिलाना, पित्त पिलाना, महाघोर श्लेष्मभोजन, ऊंचे वृक्ष से गिराना, जल में डुबाना, शिला से दबाना, कांटे पर सुलाना, चींटियों से कटाना, बिच्छू से डंसवाना, बाघ और सियारों से नुचवाना, भैंसे से दबवाना, कीचड़ में सुलाना, दुर्गन्ध से भरे स्थान में बन्द करना ॥११-१७॥ अति तिक्त पदार्थों को खिलाना, देर तक मुर्गा बनाना, खौलता तैल पिलाना, अति कटु पदार्थों को खिलाना, कसैला जल पिलाना, जलते पत्थरों को कटवाना, अत्यन्त खौलते और अत्यन्त शीतल जल से नहलाना, दांतों को तोड़ देना, जलते लोहे पर सुलाना और जलते लोहे के भार में बांधना ॥१८-१६॥ महाभाग ! ऐसी अनेक करोड़ों यातनायें हैं, जिनको हजारों वर्षों में भी मैं नहीं कह सकता । भूमिरक्षक ! जो पापी जिन नरकों में जाते हैं, उनको कह रहा हूँ, सुनो । ब्रह्महत्या करने वाला, शराबी, सुवर्ण चुराने वाला और गुरुपत्नीगामी ये महापापी हैं। पाँचवां महापापी इन चारों प्रकार के महापापियों के निकट रहने वाला भी है । पंक्ति भेद करने वाला (एक पंक्ति में बैठाकर भिन्न-भिन्न प्रकार का भोजन देने वाला), अमेध्य पदार्थ पकाने वाला, सर्वदा ब्राह्मणों की निन्दा करने वाला, ब्राह्मणों को आज्ञा देने वाला, वेद विक्रेता ये पाँच ब्रह्मघातक हैं । जो पहले ब्राह्मणों को धन देने के लिए बुलावे और पीछे 'मेरे पास नहीं है' ऐसा कहकर लौटा दे, उसको भी ब्रह्मघाती कहा जाता है ॥२०-२४॥ जो स्नान या पूजा के लिए जावे

१९० नारदीयपुराणम् स्नानाथं पूजनाथं वा गच्छतो ब्राह्मणस्य यः । समायात्यंतरायत्वं तमाहुर्ब्रह्मघातिनम् ॥२५॥ परनिन्दासु निरतश्चात्मोत्कर्षरतश्च यः । असत्यनिरतश्चैव ब्रह्महा परिकीर्तितः ॥२६॥ अधर्मस्यानुमन्ता च ब्रह्महा परिकीर्तितः । अन्योद्वेगरतश्चैव अन्येषां दोषसूचकः ॥२७॥ दम्भाचाररतश्चैव ब्रह्महेत्यभिधीयते । नित्यं प्रतिग्रहग्रस्तस्तथा प्राणिवधे रतः ॥२८॥ अधर्मस्यानुमन्ता च ब्रह्महा परिकीर्तितः । ब्रह्महत्यासमं पापमेवं बहुविधं नृपः ॥२६॥ सुरापानसमं पापं प्रवक्ष्यामि समासतः । गणान्नभोजनं चैव गणिकानां निषणम् ॥३०॥ पतितान्नादनं चैव सुरापानसमं स्मृतम् । उपासनापरित्यागो देवलानां च भोजनम् ॥३१॥ सुरापयोषित्संयोगः सुरापानसमः स्मृतः । यः शूद्रेण समाहूतो भोजनं कुरुते द्विजः ॥३२॥ सुरापी स हि विज्ञेयः सर्वधर्मबहिष्कृतः । यः शूद्रेणाभ्यनुज्ञातः प्रेष्यकर्म करोति च ॥३३॥ सुरापानसमं पापं लभते स नराधमः । एवं बहुविधं पापं सुरापानसमं स्मृतम् ॥३४॥ हेमस्तेयसमं पापं प्रवक्ष्यामि निशामय । कन्दमूलफलानां च कस्तूरीपटवाससाम् ॥३५॥ सदा स्तेयं च रत्नानां स्वर्णस्तेयसमं स्मृतम् । ताम्रायस्त्रपुकांस्थानामाज्यस्य मधुनस्तथा ॥३६॥ स्तेयं सुगन्धद्रव्याणां स्वर्णस्तेयसमं स्मृतम् । क्रमुकस्यापि हरणमम्भसां चन्दनस्य च ॥३७॥ पर्णरसापहरणं स्वर्णस्तेयसमं स्मृतम् । पितृयज्ञपरित्यागो धर्मकार्यविलोपनम् ॥३८॥ यतीनां निन्दनं चैव स्वर्णस्तेयसमं स्मृतम् । भक्ष्याणां चापहरणं धान्यानां हरणं तथा ॥३६॥ रुद्राक्षहरणं चैव स्वर्णस्तेयसमं स्मृतम् । भगिनीगमनं चैव पुत्रस्त्रीगमनं तथा ॥४०॥ रजस्वलादिगमनं गुरुतल्पसमं स्मृतम् । हीनजात्याभिगमनं मद्यपस्त्रीनिषेवणम् ॥४१॥ हुए ब्राह्मण को विघ्न पहुँचाता है, उसको भी ब्रह्मघाती कहा गया है। जो सदा दूसरे की निन्दा और अपनी व्यर्थ बड़ाई में लगा रहता है और जो अधर्म कार्य का समर्थन या बढ़ावा देता है वह भी ब्रह्मघाती है। सदा दूसरों को उद्विग्न करने वाला, दूसरों के दोष देखने वाला और पाखण्डी भी ब्रह्मघाती कहे गए हैं। नित्य दान लेने वाला, प्राणहिंसा करने वाला और अधर्म का समर्थक भी ब्रह्मघाती कहा गया है। नृप ! ब्रह्म-हत्या के समान और भी बहुत से पाप हैं। अब सुरापान के समान पापों को संक्षेप में कह रहा हूँ। समूह का अन्न खाना, गणिकाओं की सेवा और पापी का अन्न लेना ये भी सुरापान के समान कहे गये हैं ॥२५-३०॥ उपासना का परित्याग, पुजारियों का अन्न खाना और सुरा पीने वाली स्त्री के साथ संयोग करना भी सुरापान के समान पाप हैं। जो शूद्र के 'हे ब्राह्मण ! मेरे यहाँ भोजन करो, इस प्रकार बुलाने पर जाकर भोजन करे वह भी सब धर्मों से बहिष्कृत सुरापी समझा जाता है। जो शूद्रों की आज्ञा से दास्यकर्म करता है, वह अधम ब्राह्मण भी सुरापान के समान पाप का भागी है। इस प्रकार सुरापान के समान बहुत से पाप होते हैं ॥३१-३४॥ अब सुवर्ण-स्तेय के समान पापों को कह रहा हूँ, सुनो। कंद, मूल, फल, कस्तूरी और रेशमी वस्त्र तथा रत्नों को चुराना सुवर्ण स्तेय के समान है। ताँबा, लोहा, रांगा, कांसा, घी, मधु और सुगन्धित द्रव्यों को चुराना सुवर्ण-स्तेय के समान है। सुपारी चुराना, चन्दन और जल चुराना, पान और रस आदि चुराना भी सुवर्ण स्तेय के ही समान है। पितृ-यज्ञ का त्याग, धर्म कार्यों को लुप्त करना और संन्यासी की निन्दा भी स्वर्णस्तेय की कोटि के पाप हैं। भोजन का अपहरण, अन्न और रुद्राक्ष माला को चुराना भी सुवर्णस्तेय ही है। बहिन और पुत्र-स्त्री के साथ दुष्कर्म और रजस्वला स्त्री के साथ गमन भी गुरुपत्नीगमन के समान कहा गया है ॥३५-४०॥ निम्नवर्ण की स्त्रियों से सहवास, मद्यपान करने वाली स्त्री और परनारी के साथ संभोग भी

पञ्चदशोऽध्यायः ५११ परस्त्रीगमनं चैव गुरुतल्पसमं स्मृतम् । भ्रातृस्त्रीगमनं चैव वयस्यस्त्रीनिषेवणम् ॥४२॥ विश्वस्तागमनं चैव गुरुतल्पसमं स्मृतम् । अकाले कर्मकरणं पुत्रीगमनमेव च ॥४३॥ धर्मलोपः शास्त्रनिन्दा गुरुतल्पसमं स्मृतम् । इत्येवमादयो राजन्महापातकसंज्ञिताः ॥४४॥ एतेष्वेकतमेनापि सङ्गकृत्तत्समो भवेत् । यथाकथंचित्पापानामेतेषां परमर्षिभिः ॥४५॥ शान्तेस्तु निष्कृतिर्दृष्टा प्रायश्चित्तादिकल्पनैः । प्रायश्चित्तविहीनानि पापानि शृणु भूपते ॥४६॥ समस्तपापतुल्यानि महानरकदानि च । ब्रह्महत्यादिपापानां कथंचिन्निष्कृतिर्भवेत् ॥४७॥ ब्राह्मणं द्वेष्टि यस्तस्य निष्कृतिर्नास्ति कुत्रचित् । विश्वासघातिनां चैव कृतघ्नानां नरेश्वरः ॥४८॥ शूद्रस्त्रीसङ्गिनां चैव निष्कृतिर्नास्ति कुत्रचित् । शूद्रान्नपुष्टदेहानां वेदनिन्दारतात्मनाम् ॥४९॥ सत्कथानिन्दकानां च नेहामुत्र च निष्कृतिः । ॥५०॥ बौद्धालयं विशेद्यस्तु महापद्यपि वै द्विजः । न तस्य निष्कृतिर्दृष्टा प्रायश्चित्तशतैरपि ॥५१॥ बौद्धाः पाषण्डिनः प्रोक्ता यतो वेदविनिन्दकाः । तस्माद्द्विजस्तान्नेक्षेत यतो धर्मबहिष्कृताः ॥५२॥ ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि द्विजो बौद्धालयं विशेत् । ज्ञात्वा चेन्निष्कृतिर्नास्ति शास्त्राणामिति निश्चयः ॥५३॥ एतेषां पापबाहुल्यान्नरकं कोटिकल्पकम् । प्रायश्चित्तविहीनानि प्रोक्तान्यन्यानि च प्रभो ॥५४॥ पापानि तेषां नरकान्गदतो मे निशामय ॥५५॥ महापातकिनस्तेषु प्रत्येकं युगवासिनः । तदन्ते पृथिवीमेत्य सप्तजन्मसु गर्दभाः ॥५६॥ ततः श्वानो विद्धवेहा भवेयुर्दशजन्मसु । आशताब्दं विट्कृमयः सर्पा द्वादशजन्मसु ॥५७॥ गुरु-तल्प-गमन के समान है । भाई की स्त्री, मित्र की स्त्री के साथ सहवास और विधवा स्त्री के साथ संगम भी गुरुतल्पगमन ही है । शास्त्रवर्जित समय में कोई कर्म करना, पुत्री-गमन, धर्म का लोप करना और शास्त्रों की निन्दा गुरुतल्पगमन के समान है । राजन् ! ऐसे ही पाप महापाप कहे गए हैं । ऐसे महापाप करने वाले पापियों से संसर्ग रखने वाले भी वैसे ही पापी समझे जाते हैं । महर्षियों ने पापों के लिए प्रायश्चित्तादि के द्वारा किसी प्रकार से निवृत्ति पाने का आदेश दिया है । परन्तु भूपते ! कुछ ऐसे भी पाप हैं जिनके लिए प्रायश्चित्त का विधान नहीं कहा गया है, उनको सुनो ॥४१-४६॥ महान् नरक में ले जाने वाले सब पाप समान हैं । ब्रह्महत्या आदि पापों से किसी प्रकार मनुष्य को प्रायश्चित्त आदि से छुटकारा मिल जाता है, परन्तु ब्राह्मणों से जो द्वेष करता है उसके लिए कहीं कोई प्रायश्चित्त नहीं । नरेश्वर ! विश्वासघाती, कृतघ्न और शूद्र स्त्री के साथ सहवास करने वालों के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है । शूद्रों के अन्न से जीने वाले, वेद-निन्दा में लीन रहने वाले और सत्कथा की निन्दा करने वाले के लिए न तो इस लोक में और न परलोक में ही कोई उद्धार का मार्ग है ॥४७-५०॥ जो ब्राह्मण घोर विपत्ति पड़ने पर भी बौद्ध मठों में निवास करता है उसका सैंकड़ों प्रायश्चित्त करने पर भी क्या उद्धार हो सकता है ? बौद्ध पाखण्डी हैं, क्योंकि वे वेद-निन्दक हैं । अतः द्विज उनको देखे तक नहीं वे धर्म से बहिष्कृत व्यक्ति हैं । जो ब्राह्मण जान बूझकर या अनजान में बौद्ध मठ में प्रवेश करता है; उसमें भी यदि जान बूझकर जाता है तब तो उसके लिए कोई प्रायश्चित्त ही नहीं है, ऐसा शास्त्रों का निर्णय है और यदि अनजान में जाता है तो ऐसे पापी को पाप की अधिकता के कारण कोटि कल्प तक नरक में रहना पड़ता है । प्रभो ! ऐसे पाप जिनके लिए प्रायश्चित्त नहीं कहे गए हैं और दूसरे पापों के कारण जो जो नरक मिलते हैं उनको सुनो—उन नरकों में महापापी युगों तक रहते हैं । तदनन्तर पृथ्वी पर आकर सात जन्म तक गधे बनते हैं । पुनः दश जन्म तक रोगी और छिन्न शरीर वाले कुत्ते बनते हैं ॥५१-५६॥ सौ वर्षों तक विष्ठा के कीड़े और तत्पश्चात् बारह जन्म तक सर्प बनते हैं ॥५७॥ नृप ! तदनन्तर सहस्र जन्म तक मृग आदि पशु योनियों

११२ नारदीयपुराणम् ततः सहस्रजन्मानि मृगाद्याः पशवो नृप । शताब्दं स्थावराश्चैव ततो गोधाशरीरिणः ॥५८॥ ततस्तु सप्तजन्मानि चाण्डालाः पापकारिणः । ततः षोडश जन्मानि शूद्राद्या हीनजातयः ॥५९॥ ततस्तु जन्मद्वितये दरिद्रा व्याधिपीडिताः । प्रतिग्रहपरा नित्यं ततो निरयगाः पुनः ॥६०॥ असूयाविष्टमनसो रौरवे नरके स्मृतम् । तत्र कल्पद्वयं स्थित्वा चाण्डालाः शतजन्मसु ॥६१॥ मा ददस्वेति यो ब्रूयाद्गवाग्निब्राह्मणेषु च । शुनां योनिशतं गत्वा चाण्डालेषूपजायते ॥६२॥ ततो विष्ठाकृमिश्चैव ततो व्याघ्रास्त्रिजन्मसु । तदंते नरकं याति युगानामेकविंशतिम् ॥६३॥ परनिन्दापरा ये च ये च निष्ठुरभाषिणः । दानानां विघ्नकर्त्तारस्तेषां पापफलं शृणु ॥६४॥ मुशलोलूखलाभ्यां तु चूर्ण्यन्ते तस्करा भृशम् । तदन्ते तप्तपाषाणग्रहणं वत्सरत्रयम् ॥६५॥ ततश्च कालसूत्रेण भिद्यन्ते सप्त वत्सरान् । शोचन्तः स्वानि कर्माणि परद्रव्यापहारकाः ॥६६॥ कर्मणा तत्र पच्यन्ते नरकाग्निषु सन्ततम् ॥६७॥ परस्वसूचकानां च नरकं शृणु दारुणम् । यावद्युगसहस्रं तु तप्तायःपिण्डभक्षणम् ॥६८॥ संपीड्यते च रसना संदंशैर्भृशदारुणैः । निरुच्छ्वासं महाघोरे कल्पाद्धं निवसन्ति ते ॥६९॥ परस्त्रीलोलुपानां च नरकं कथयामि ते । तप्तताम्रास्त्रियस्तेन सुरूपाभरणैर्युताः ॥७०॥ यादृशीस्तादृशीस्ताश्च रमन्ते प्रसभं बहु । विद्रवन्तं भयेनासां गृह्णन्ति प्रसभं बलम् ॥७१॥ कथयन्तश्च तत्कर्म नयन्ते नरकान्क्रमात् । अन्यं भजन्ते भूपाल पतिं त्यक्त्वा च याः स्त्रियः ॥७२॥ तप्तायः पुरुषास्तास्तु तप्तायः शयने बलात् । पातयित्वा रमन्ते च बहुकालं बलान्विताः ॥७३॥ ततस्तैर्योषितो मुक्ता हुताशनसमोज्ज्वलम् । अयःस्तम्भं समाश्लिष्य तिष्ठन्त्यब्दसहस्रकम् ॥७४॥ में रहते हैं। सौ वर्षों तक स्थावर (वृक्ष) और पुनः गोह (गोधा) योनि में जाते हैं। सात जन्म तक पाप कर्म करने वाले चाण्डाल और तदनन्तर सोलह जन्म तक शूद्र आदि हीन जाति में जन्म लेते हैं। तत्पश्चात् दूसरे जन्म में व्याधिपीड़ित दरिद्र मनुष्य होते हैं, जो सर्वदा दूसरों के दान पर ही जीवित रहते हैं और अन्त में पुनः नरकगामी होते हैं। सर्वदा ईर्ष्या करने वाले जीव रौरव नरक के भागी होते हैं। वहाँ वे दो कल्प तक रहकर पुनः सौ जन्म चाण्डाल बनते हैं ॥५७-६१॥ जो 'गो ब्राह्मण को कुछ मत दो'—ऐसा कहते हैं वे सौ जन्म तक कुत्ते की योनि में रहकर पुनः चाण्डाल-योनि में उत्पन्न होते हैं। तदनन्तर वे विष्ठा के कीड़े होते और पुनः तीन जन्म तक बाघ बनते हैं। इस योनि से छूटकर इक्कीस युगों तक नरक में निवास करते हैं। ॥५८-६३॥ जो दूसरों की निन्दा करते रहते, जो निष्ठुरभाषी होते और जो दान में विघ्न पहुँचाते हैं, उनके पाप-फल को सुनो। चोर मूसल और ओखली में डालकर अत्यन्त चूर-चूर बनाये जाते हैं, तदनन्तर तपे पत्थर में तीन वर्ष तक चिपकाये जाते हैं और उस यातना के अनन्तर कालसूत्र से सात वर्ष तक काटे जाते हैं। दूसरों का शोषण करने वाले और दूसरों का धन चुराने वाले अपने पापों के फलस्वरूप नरक-कुण्ड में सर्वदा घोर पीड़ा पाते रहते हैं ॥६४-६७॥ दूसरों के धन का चोरों को पता बताने वाले पापियों के फल को सुनो— हजार युगों तक उनको जलता हुआ लोहे का गोला खाना पड़ता है और उनकी जिह्वा को अत्यन्त दारुण चिमटे से दबाया जाता है और वे महाघोर नरक-कुण्ड में तीव्र श्वास खींचते हुए आधे कल्प तक रहते हैं ॥६८-६९॥ परस्त्रीलोलुपों को जो नरक मिलते हैं उनको कह रहा हूँ, सुनो—उनको ताँबे की बनी स्त्री- प्रतिमा के साथ जो अत्यन्त रूपवती, सब आभूषणों सुसज्जित और पूर्वजन्म की-सी आकृति की होती है हठात् रमण करना पड़ता है। उनके भय से जब वे भागने लगते तब उनको बलात् पकड़ लिया जाता है और उनके पापों का उल्लेख कर क्रमशः नरकों में डाला जाता है। भूपाल ! जो स्त्रियाँ अपने पति को छोड़कर अन्यपुरुष से प्रेम करती हैं उनको तप्त लोहे की बनी पुरुषमूर्तियां जलती शय्या पर बलात् गिराकर बहुत समय तक सहवास करते हैं ॥७०-७३॥ तदन्तर उनसे मुक्त होकर अग्नि के समान उज्ज्वल लौह-स्तम्भ का आलिङ्गन कर एक हजार

पञ्चदशोऽध्यायः ११३ ततः क्षारोदकस्नानं क्षारोदकनिषेवणम् । तदन्ते नरकान् सर्वान् भुञ्जतेऽब्दशतं शतम् ॥७५॥ यो हन्ति ब्राह्मणं गां च क्षत्रियं च नृपोत्तमम् । स चापि यातनाः सर्वा भुङ्क्ते कल्पेषु पञ्चसु ॥७६॥ यः शृणोति महन्निन्दां सादरं तत्फलं शृणु । तेषां कर्णेषु दाप्यन्ते तप्तायःकीलसंचयाः ॥७७॥ ततश्च तेषु छिद्रेषु तैलमत्युष्णमुल्बणम् । पूर्यते च ततश्चापि कुम्भीपाकं प्रपद्यते ॥७८॥ नास्तिकानां प्रवक्ष्यामि विमुखानां हरे हरौ । अब्दानां कोटिपर्यन्तं लवणं भुञ्जते हि ते ॥७९॥ ततश्च कल्पपर्यन्तं रौरवे तप्तसैकते । भज्यंते पापकर्मणोऽन्येष्वप्येवं नराधिप ॥८०॥ ब्राह्मणान्ये निरीक्षन्ते कोपदृष्टचा नराधमाः । तप्तसूचीसहस्रेण चक्षुस्तेषां प्रसूर्यते ॥८१॥ ततः क्षाराम्बुधाराभिः सेच्यन्ते नृपसत्तम । ततश्च क्रकचैर्घोरैर्भिद्यन्ते पापकर्मणः ॥८२॥ विश्वासघातिनां चैव मर्यादाभेदिनां तथा । परान्नलोलुपानां च नरकं शृणु दारुणम् ॥८३॥ स्वमांसभोजिनो नित्यं भक्ष्यमाणाः श्वभिस्तु ते । नरकेषु समस्तेषु प्रत्येकं ह्यब्दवासिनः ॥८४॥ प्रतिग्रहरता ये च ये वै नक्षत्रपाठकाः । ये च देवलकान्नानां भोजिनस्ताञ्छृणुष्व मे ॥८५॥ राजन्नाकल्पपर्यन्तं यातनास्वासु दुःखिताः । पच्यन्ते सततं पापाविष्टा भोगरताः सदा ॥८६॥ ततस्तैलेन पुर्यन्ते कालसूत्रप्रपीडिताः । ततः क्षारोदकस्नानं मूत्रविष्ठानिषेवणम् ॥८७॥ तदन्ते भुवमासाद्य भवन्ति म्लेच्छजातयः । अन्योद्वेगरता ये तु यान्ति वैतरणीं नदीम् ॥८८॥ त्यक्तपञ्चमहायज्ञा लालाभक्षं व्रजन्ति हि । उपासनापरित्यागो रौरवं नरकं व्रजेत् ॥८९॥ वर्ष तक रहती हैं। इस घोरयातना को भोगने के पश्चात् उनके खारे जल से स्नान करना पड़ता और वही पीना पड़ता है ॥७०-७५॥ जो किसी ब्राह्मण, गौ और उत्तम क्षत्रिय राजा को मारता है वह भी पाँच कल्प तक सब प्रकार की यातनाओं को भोगता है । जो दूसरे की निन्दा बड़े चाव से सुनता है उसका फल सुनो—उनके कानों में जलते लोहे की कीलें डाल दी जाती हैं और उनके छिद्रों को खौलते हुए तेल से भर दिया जाता है और पुनः उनको कुंभीपाक में छोड़ा जाता है । जो नास्तिक विष्णु अथवा शंकर से विमुख रहते उनके पापों का वर्णन कह रहा हूँ सुनो—वे करोड़ वर्षों तक नमक खाते रहते हैं और पुनः कल्पान्त तक तप्त बालुका से भरे रौरवनरक में रहते हैं ॥७६-७६॥ नराधिप ! उसी प्रकार अन्य पापों के करने वाले भी विभिन्न नरकों का भोग करते हैं। जो नराधम ब्राह्मणों को काप दृष्टि से देखते हैं उनकी आंखों में जलती हजारों सुइयाँ चुभोई जाती हैं। नृप- सत्तम ! पुनः उनकी आंखों में खारे जल की धार गिराई जाती है और पापों के अनुसार वे आरे से फाड़े जाते हैं । अब विश्वासघाती, लोकमर्यादा भङ्ग करने वाले और परान्नलोलुप पापियों के दारुण नरकों का वर्णन सुनो ॥८०-८३॥ वे सर्वदा अपना ही मांस नोच-नोच कर खाते रहते हैं और कुत्ते भी उनको नोच कर खाते हैं । पुनः प्रत्येक नरक में करोड़ों वर्षों तक उन्हें रहना पड़ता है। जो सर्वदा दूसरों से दान ही लिया करते हैं और जो ज्योतिषी तथा पुजारियों का अन्न खाया करते हैं उनके पापों को मुझसे सुनो। राजन् ! कल्पान्त तक वह उपर्युक्त यातनाभय नरकों में दुःख भोग करते और सर्वदा अपने पापों के फल-भोग में निरत रहते हैं। तदनन्तर काल सूत्र से पीड़ित होकर जलते तेल से भरे कुण्ड में छोड़े जाते और पुनः खारे जल से स्नान करने के बाद मूत्र और विष्ठा को खाते हैं । भोग के अनन्तर इस पृथ्वो पर आकर म्लेच्छ जाति में जन्म लेता है। जो दूसरों को उद्विग्न करने में लगे रहते हैं वे वैतरणी नदी में गिराये जाते हैं ॥८४-८८॥ जो पञ्चमहायज्ञ¹ नहीं करते वे १. स्वाध्याय, अग्नि होत्र, अतिथि पूजन, पितृ तर्पण और बलिकर्म । १५