बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशोऽध्यायः १०१ तालकांस्यादिनिनदं कुर्वन् विष्णुगृहे नरः । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकमवाप्नुयात् ॥१४६॥ यो देवः सर्वदृग्विष्णुर्ज्ञानरूपी निरञ्जनः । सर्वधर्मफलं पूर्णं संतुष्टः प्रददाति च ॥१५०॥ यस्य स्मरणमात्रेण देवदेवस्य चक्रिणः । सफलानि भवन्त्येव सर्वकर्माणि भूपते ॥१५१॥ परमात्मा जगन्नाथः सर्वकर्मफलप्रदः । सत्कर्मकर्तृभिर्नित्यं स्मृतः सर्वार्तिनाशनः ॥ तमुद्दिश्य कृतं यच्च तदानन्त्याय कल्पते ।१५२॥ धर्माणि विष्णुश्च फलानि विष्णुः कर्माणि विष्णुश्च फलानि भोक्ता । कार्यं च विष्णुः करणानि विष्णुरस्मान्न किंचिद्व्यतिरिक्तमस्ति ॥१५३॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे धर्मानुकथनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः धर्मराज उवाच श्रुतिस्मृत्युदितं धर्मं वर्णानामनुपूर्वशः । प्रवक्ष्यामि नृपश्रेष्ठ तं शृणुष्व समाहितः ॥१॥ यो भुञ्जानोऽशुचिर्वापि चाण्डालं पतितं स्पृशेत् । क्रोधादज्ञानतो वापि तस्य वक्ष्यामि निष्कृतिम् ॥२॥ त्रिरात्रं वाथ षड्रात्रं यथासंख्यं समाचरेत् । स्नानं त्रिषवणं विप्र पञ्चगव्येन शुध्यति ॥३॥ भुञ्जानस्य तु विप्रस्य कदाचित्स्रवते गुदम् । उत्तिष्ठेत्त्वेऽशुचित्वे च तस्य शुद्धिं वदामि ते ॥४॥
मनुष्य विष्णु मन्दिर में ताल, कांस्य (झाल) आदि बाजे बजाकर सब पापों से छूट जाता है और विष्णुलोक को प्राप्त करता है। जो विष्णु ज्ञान स्वरूप, निरञ्जन और सब को देखने वाले हैं वे प्रसन्न होने पर सब धर्म-फलों को पूर्ण रूप से प्रदान करते हैं ॥१४६-१५०॥ भूपते ! जिस देवाधि-देव चक्रधर विष्णु के स्मरण मात्र से सब कार्य पूर्ण हो जाते हैं और जो देव परमात्मा, जगन्नाथ, सब मनोरथों को देने वाले और जिनके स्मरण मात्र से सत्कर्म करने वाले मनुष्यों की सारी विपदायें नष्ट हो जाती हैं, उनके उद्देश्य से जो कुछ कार्य किया जाता है वह अनन्त फल को प्रदान करने में समर्थ होता है । विष्णु ही सब धर्म, सब फल, सब कर्म और सब फलों के भोग करने वाले हैं । वे ही कार्य और वे ही कारण भी हैं । इस भगवान् विष्णु को छोड़कर इस संसार में दूसरा कुछ नहीं है । ॥१५१-१५३॥ "श्री नारदीय महापुराण में धर्मानुकथन नामक तेरहवां अध्याय समाप्त ॥१३॥
अध्याय १४ पापों का प्रायश्चित्त तथा श्राद्ध-पञ्चक निरूपण धर्मराज बोले-नृपश्रेष्ठ ! अब मैं श्रुतिस्मृति में कहे गए वर्णों के धर्म को अक्षरशः कह रहा हूँ, उसको ध्यान पूर्वक सुनो । जो भोजन करते समय क्रोध-वश या अज्ञान-वश अपवित्र, पतित या चाण्डाल को छू देता है, उसका प्रायश्चित्त कहता हूँ । वह तीन रात या छह रात्रि तक व्रत रखे और तीनों काल स्नान करे और पंच गव्य पान करे तब वह शुद्ध होता है ॥१-३॥ यदि कदाचित् भोजन करते समय किसी ब्राह्मण को मल स्राव हो जाय