भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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१०२ नारदीयपुराणम् पूर्वं कृत्वा द्विजः शौचं पश्चादप उपस्पृशेत् । अहोरात्रोषितो भूत्वा पञ्चगव्येन शुद्धयति ॥५॥ निर्गिरन्यदि मेहेत भुक्त्वा वा मेहने कृते । अहोरात्रोषितो भूत्वा जुहुयात्सर्पिषाऽनलम् ॥६॥ यदा भोजनकाले स्यादाशुचिर्ब्राह्मणः क्वचित् । भूमौ निधाय तं ग्रासं स्नात्वा शुद्धिमिवाप्नुयात् ॥७॥ भक्षयित्वा तु तद् ग्रासमुपवासेन शुद्ध्यति । अशित्वा चैव तत्सर्वं त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥८॥ अशनतश्चेद्वमिः स्याद्धै ह्यस्वस्थस्त्रिशतं जपेत् । स्वस्थस्त्रीणि सहस्राणि गायत्र्याः शोधनं परम् ॥६॥ चाण्डालैः श्वपचैः स्पृष्टो विण्मूत्रे च कृते द्विजः त्रिरात्रं तु प्रकुर्वीत भुक्तोच्छिष्टः षडाचरेत् । उदक्यां सूतिकां वापि संस्पृशेदन्त्यजो यदि ॥१०॥ त्रिरात्रेण विशुद्धिः स्यादिति शातातपोऽब्रवीत् । रजस्वला तु संस्पृष्टा श्वभिर्मातङ्गवायसैः ॥१२॥ निराहारा शुचिस्तिष्ठेत्काले स्नानेन शुद्धयति । रजस्वले यदा नार्यावन्योन्यं स्पृशतः क्वचित् ॥१३॥ शुद्धयेते ब्रह्मकूर्चेन ब्रह्मकूर्चेन चोपरि । उच्छिष्टेन च संस्पृष्टो यो न स्नानं समाचरेत् ॥१४॥ ऋतौ तु गर्भं शङ्कित्वा स्नानं मैथुनिनः स्मृतम् । अनृतौ तु स्त्रियं गत्वा शौचं मूत्रपुरीषवत् ॥१५॥ उभावप्यशुची स्यातां दम्पती याभसंगतौ । शयनादुत्थितानारी शुचिः स्यादाशुचिः पुमान् ॥१६॥ भर्तुः शरीरशुश्रूषां दौरात्म्यादप्रकुर्वती । दण्ड्या द्वादशकं नारी वर्षं त्याज्या धनं विना ॥१७॥ त्यजन्नो पतितान्बन्धून्दण्ड्यानुत्तमसाहसम् । पिता हि पतितः कामं न तु माता कदाचन ॥१८॥ हूँ तो उसकी शुद्धि का प्रकार बता रहा हूँ सुनो । वह पहले शौच से निवृत्त होकर आचमन करे और दिन रात उपवास कर पंच गव्य पान करे तब वह शुद्ध हो जाता है । भोजन करते समय यदि मूत्र त्याग हो जाय या मूत्र त्याग के पश्चात् भोजन कर ले तो वह ब्राह्मण दिन रात उपवास कर घृत से अग्नि में हवन करे । यदि कहीं भोजन करते समय ब्राह्मण अपवित्र हो जाय तो ग्रास (कवल) को भूमि पर रख दे और वह स्नान करने से से शुद्ध हो जाता है ॥४-७॥ उस अपवित्र अवस्था में यदि उस ग्रास को खा जाय तब वह उपवास से शुद्ध होता है । यदि उस परसे भोजन को खा जाय तब वह तीन रात तक अशुद्ध रहता है । भोजन करते समय यदि वमन हो जाय तो अस्वस्थ अवस्था में तीन सौ वार गायत्री मंत्र का जप करने से और स्वस्थावस्था में तीन हजार गायत्री के जप से शुद्धि होती है । द्विज मल त्याग या मूत्र त्याग किये हुए यदि चाण्डाल या श्वपच से छू जाय तो तीन रात्रि तक उपवास करे । यदि भोजन करके जूठे ही पश्चात् छू जाय तो छह दिन तक उपवास करे । यदि अन्त्यज ऋतु-मती या सूतिका स्त्री को छू दे तो तीन रात्रि के उपवास से उसकी शुद्धि होती है, ऐसा शातातप ने कहा है ॥८-११३॥ रजस्वला स्त्री यदि कूकर, हाथी या कौए से छू जाय तो निराहार रहे तदन्तर ऋतु स्नान के बाद वह शुद्ध हो जाती है । दो रजस्वला स्त्रियों का यदि परस्पर स्पर्श हो जाय तो वे ब्रह्मकूर्च व्रत करने से शुद्ध हो जाती हैं। उच्छिष्ट (जूठा) के स्पर्श हो जाने पर जो स्नान नहीं करता वह अशुद्ध रहता है। ॥१२-१४॥ ऋतु स्नाता स्त्री से सहवास करने वाला पुरुष गर्भ स्थिति का निश्चय हो जाने पर केवल स्नान से शुद्ध हो जाता है । इसके अतिरिक्त काल में स्त्री सहवास करने पर मूत्रोत्सर्ग या शौच त्याग के समान शुद्धि कार्य करना चाहिए । सम्भोग के समय स्त्री पुरुष दोनों अपवित्र हो जाते हैं; परन्तु स्त्री केवल शय्या त्याग से ही शुद्ध हो जाती है और पुरुष (तब तक) अपवित्र रहता है (जब तक वह स्नान नहीं कर लेता) । जो स्त्री अपनी दुष्टता के कारण पति की सेवा नहीं करती, उसको बारह वर्ष का गृह-निर्वासन दण्ड देना चाहिए और उसको धन से सहायता भी नहीं करनी चाहिए ॥१५-१७॥ अपतित बन्धुओं को त्यागने वाले पुरुष को एक हजार पण या उससे कोई बड़ा दण्ड देना चाहिए । पिता