भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 122

त्रयोदशोऽध्यायः १०३ आत्मानं घातयेद्यस्तु रज्ज्वादिभिरुपक्रमैः । मृते मेध्येन लेपव्यो जीवतो द्विशतं दमः ॥१९॥ दण्डचास्तत्पुत्रमित्राणि प्रत्येकं पणिकं दमम् । प्रायश्चित्तं ततः कुर्य्युर्यथाशास्त्रप्रचोदितम् ॥२०॥ जलाग्न्युद्बन्धनभ्रष्टाः प्रव्रज्यानाशकच्युताः । विषप्रपतनध्वस्ताः शस्त्रघातहताश्च ये ॥२१॥ न चैते प्रत्यवसिताः सर्वलोकबहिष्कृताः । चान्द्रायणेन शुद्ध्यन्ति तप्तकृच्छ्रद्वयेन वा ॥२२॥ उभयावसितः पापश्यामच्छबलकाच्च्युतः । चान्द्रायणाभ्यां शुद्धयेत दत्त्वा धेनुं तथा वृषम् ॥२३॥ श्वशृगालप्लवङ्गाद्यैर्मानुषैश्च रतिं विना । स्पृष्टः स्नात्वा शुचिः सद्यो दिवा संध्यासु रात्रिषु ॥२४॥ अज्ञानाद्वा तु यो भुक्त्वा चाण्डालान्नं कथंचन । गोमूत्रयावकाहारो मासार्द्धेन विशुद्ध्यति ॥२५॥ गोब्राह्मणगृहं दग्ध्वा मृतं चोद्बद्धन्धनादिना । पाशं छित्त्वा तथा तस्य कृच्छ्रमेकं चरेद्विजः ॥२६॥ चाण्डालपुल्कसानां च भुक्त्वा हत्वा च योषितम् । कृच्छ्रार्द्धमाचरेज्ज्ञानादज्ञानाद्दैन्दवद्वयम् ॥२७॥ कापालिकान्नभोक्तॄणां तन्नारीगामिनां तथा । अगम्यागमने विप्रो मद्यगोमांसभक्षणे ॥२८॥ तप्तकृच्छ्रपरिक्षिप्तो मौर्वीहोमेन शुद्धयति । महापातककर्त्तारश्चत्वारोऽथ विशेषतः ॥२९॥ अग्निं प्रविश्य शुद्ध्यन्ति स्थित्वा वा महति क्रतौ । रहस्यकरणोऽप्येवं मासमभ्यस्य पूरुषः ॥३०॥ अघमर्षणसूक्तं वा शुद्ध्येदन्तर्जले जपन् । रजकश्चर्मकारश्च नटो बुरुड एव च ॥३१॥ कैवर्त्तमेदभिल्लाश्च सप्तैते ह्यन्त्यजाः स्मृताः । भुक्त्वा चैषां स्त्रियो गत्वा पीत्वा यः प्रतिगृह्यते ॥३२॥ भले पतित हो सकता है किन्तु माता कभी पतित नहीं हो सकती है। जो रस्सी आदि का फन्दा लगाकर आत्म- हत्या करता है, उसके मरने पर पवित्र वस्तु (चन्दन आदि) से उसके शरीर को लिप्त कर देना चाहिए और यदि वह जीवित रह जाय तो उसके ऊपर दो सौ पणों का दण्ड लगाना चाहिए। उसके पुत्र-मित्रों को भी पण का दण्ड देना चाहिए। फिर वे लोग शास्त्रनिर्देशानुसार प्रायश्चित्त करें। जो जल, अग्नि तथा फाँसी लगाकर मरने से बच जाते हैं, संन्यास नष्ट करने से बच जाते हैं, विष तथा शस्त्रघात से बच जाते हैं, उनका प्रायश्चित्त नहीं है। वे सब लोगों से बहिष्कृत हैं। अथवा एक चान्द्रायण व्रत और दो तप्तकृच्छ्र व्रत करने से वे शुद्ध हो सकते हैं। जो जितेन्द्रियहीनता के कारण चित्र-विचित्र पाप-कर्मों से विरत नहीं हो सका, वह दो चान्द्रायण व्रत तथा धेनु और वृष दान करने से शुद्ध हो जाता है। बिना प्रेम के कुत्ते, सियार, बन्दर तथा मनुष्य से स्पर्श हो जाने पर दिन, सन्ध्यासमय तथा रात्रि में सद्यः स्नान करने से शुद्धि होती है ॥१९-२४॥ जो भूल से चाण्डाल का अन्न खा ले वह एक पक्ष तक गोमूत्र और कुल्थी का आहार करने से शुद्ध होता है। जो गौ और ब्राह्मण का घर जला दे और उसके कारण कोई बँधा हुआ पशु मर जाय तो वह ब्राह्मण पहले उसका वन्धन तोड़े और उसकी शान्ति के लिए कृच्छ्र चान्द्रायण व्रत करे। चाण्डाल और पुल्कस का अन्न खाने और किसी स्त्री की हत्या करने पर यदि जान बूझ कर यह कार्य हुआ हो तब तो अर्द्धकृच्छ्र चान्द्रायण करे और यदि बिना जाने हो गया हो तो दो सोम व्रत करे। कापालिक का अन्न खाने वाला और उसकी स्त्री से भोग करने वाला अथवा मद्यप, मांस भोजी और अगम्यागमन करने वाला ब्राह्मण तप्तकृच्छ्र व्रत से और मौर्वी होम से शुद्ध होता है ॥२५-२८॥ विशेष रूप से चार प्रकार के महापाप करने वाले अग्नि में प्रवेश से शुद्ध होते अथवा महान् यज्ञ (अश्वमेघ, सौम्ययाग आदि यज्ञों को) करने से भी वह शुद्ध होता है। इसी प्रकार मनुष्य कोई गुप्त भेद या पाप कर्म में सहायता पहुँचाने पर जल के भीतर डूबकर 'अघमर्षण' मन्त्र का जाप करने से शुद्ध होता है। धोबी, चमार, नट, बुरु, केवट, मेद और भिल्ल ये सात अन्त्यज कहे गए हैं। जानबूझकर इनका अन्न खाने, इनकी स्त्रियों के साथ सहवास करने, इनका जल पीने और दान लेने पर विप्र अर्द्धकृच्छ्र चन्द्रायण व्रत करने से शुद्ध होता है और यदि अनजान से हुआ हो तब तो दो बार सोमव्रत करने से शुद्धि होती है। माता, गुरुपत्नी,

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 122, कुल 1008 में से · BharatKosha