भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 129

१९० नारदीयपुराणम् स्नानाथं पूजनाथं वा गच्छतो ब्राह्मणस्य यः । समायात्यंतरायत्वं तमाहुर्ब्रह्मघातिनम् ॥२५॥ परनिन्दासु निरतश्चात्मोत्कर्षरतश्च यः । असत्यनिरतश्चैव ब्रह्महा परिकीर्तितः ॥२६॥ अधर्मस्यानुमन्ता च ब्रह्महा परिकीर्तितः । अन्योद्वेगरतश्चैव अन्येषां दोषसूचकः ॥२७॥ दम्भाचाररतश्चैव ब्रह्महेत्यभिधीयते । नित्यं प्रतिग्रहग्रस्तस्तथा प्राणिवधे रतः ॥२८॥ अधर्मस्यानुमन्ता च ब्रह्महा परिकीर्तितः । ब्रह्महत्यासमं पापमेवं बहुविधं नृपः ॥२६॥ सुरापानसमं पापं प्रवक्ष्यामि समासतः । गणान्नभोजनं चैव गणिकानां निषणम् ॥३०॥ पतितान्नादनं चैव सुरापानसमं स्मृतम् । उपासनापरित्यागो देवलानां च भोजनम् ॥३१॥ सुरापयोषित्संयोगः सुरापानसमः स्मृतः । यः शूद्रेण समाहूतो भोजनं कुरुते द्विजः ॥३२॥ सुरापी स हि विज्ञेयः सर्वधर्मबहिष्कृतः । यः शूद्रेणाभ्यनुज्ञातः प्रेष्यकर्म करोति च ॥३३॥ सुरापानसमं पापं लभते स नराधमः । एवं बहुविधं पापं सुरापानसमं स्मृतम् ॥३४॥ हेमस्तेयसमं पापं प्रवक्ष्यामि निशामय । कन्दमूलफलानां च कस्तूरीपटवाससाम् ॥३५॥ सदा स्तेयं च रत्नानां स्वर्णस्तेयसमं स्मृतम् । ताम्रायस्त्रपुकांस्थानामाज्यस्य मधुनस्तथा ॥३६॥ स्तेयं सुगन्धद्रव्याणां स्वर्णस्तेयसमं स्मृतम् । क्रमुकस्यापि हरणमम्भसां चन्दनस्य च ॥३७॥ पर्णरसापहरणं स्वर्णस्तेयसमं स्मृतम् । पितृयज्ञपरित्यागो धर्मकार्यविलोपनम् ॥३८॥ यतीनां निन्दनं चैव स्वर्णस्तेयसमं स्मृतम् । भक्ष्याणां चापहरणं धान्यानां हरणं तथा ॥३६॥ रुद्राक्षहरणं चैव स्वर्णस्तेयसमं स्मृतम् । भगिनीगमनं चैव पुत्रस्त्रीगमनं तथा ॥४०॥ रजस्वलादिगमनं गुरुतल्पसमं स्मृतम् । हीनजात्याभिगमनं मद्यपस्त्रीनिषेवणम् ॥४१॥ हुए ब्राह्मण को विघ्न पहुँचाता है, उसको भी ब्रह्मघाती कहा गया है। जो सदा दूसरे की निन्दा और अपनी व्यर्थ बड़ाई में लगा रहता है और जो अधर्म कार्य का समर्थन या बढ़ावा देता है वह भी ब्रह्मघाती है। सदा दूसरों को उद्विग्न करने वाला, दूसरों के दोष देखने वाला और पाखण्डी भी ब्रह्मघाती कहे गए हैं। नित्य दान लेने वाला, प्राणहिंसा करने वाला और अधर्म का समर्थक भी ब्रह्मघाती कहा गया है। नृप ! ब्रह्म-हत्या के समान और भी बहुत से पाप हैं। अब सुरापान के समान पापों को संक्षेप में कह रहा हूँ। समूह का अन्न खाना, गणिकाओं की सेवा और पापी का अन्न लेना ये भी सुरापान के समान कहे गये हैं ॥२५-३०॥ उपासना का परित्याग, पुजारियों का अन्न खाना और सुरा पीने वाली स्त्री के साथ संयोग करना भी सुरापान के समान पाप हैं। जो शूद्र के 'हे ब्राह्मण ! मेरे यहाँ भोजन करो, इस प्रकार बुलाने पर जाकर भोजन करे वह भी सब धर्मों से बहिष्कृत सुरापी समझा जाता है। जो शूद्रों की आज्ञा से दास्यकर्म करता है, वह अधम ब्राह्मण भी सुरापान के समान पाप का भागी है। इस प्रकार सुरापान के समान बहुत से पाप होते हैं ॥३१-३४॥ अब सुवर्ण-स्तेय के समान पापों को कह रहा हूँ, सुनो। कंद, मूल, फल, कस्तूरी और रेशमी वस्त्र तथा रत्नों को चुराना सुवर्ण स्तेय के समान है। ताँबा, लोहा, रांगा, कांसा, घी, मधु और सुगन्धित द्रव्यों को चुराना सुवर्ण-स्तेय के समान है। सुपारी चुराना, चन्दन और जल चुराना, पान और रस आदि चुराना भी सुवर्ण स्तेय के ही समान है। पितृ-यज्ञ का त्याग, धर्म कार्यों को लुप्त करना और संन्यासी की निन्दा भी स्वर्णस्तेय की कोटि के पाप हैं। भोजन का अपहरण, अन्न और रुद्राक्ष माला को चुराना भी सुवर्णस्तेय ही है। बहिन और पुत्र-स्त्री के साथ दुष्कर्म और रजस्वला स्त्री के साथ गमन भी गुरुपत्नीगमन के समान कहा गया है ॥३५-४०॥ निम्नवर्ण की स्त्रियों से सहवास, मद्यपान करने वाली स्त्री और परनारी के साथ संभोग भी