बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशोऽध्यायः ५११ परस्त्रीगमनं चैव गुरुतल्पसमं स्मृतम् । भ्रातृस्त्रीगमनं चैव वयस्यस्त्रीनिषेवणम् ॥४२॥ विश्वस्तागमनं चैव गुरुतल्पसमं स्मृतम् । अकाले कर्मकरणं पुत्रीगमनमेव च ॥४३॥ धर्मलोपः शास्त्रनिन्दा गुरुतल्पसमं स्मृतम् । इत्येवमादयो राजन्महापातकसंज्ञिताः ॥४४॥ एतेष्वेकतमेनापि सङ्गकृत्तत्समो भवेत् । यथाकथंचित्पापानामेतेषां परमर्षिभिः ॥४५॥ शान्तेस्तु निष्कृतिर्दृष्टा प्रायश्चित्तादिकल्पनैः । प्रायश्चित्तविहीनानि पापानि शृणु भूपते ॥४६॥ समस्तपापतुल्यानि महानरकदानि च । ब्रह्महत्यादिपापानां कथंचिन्निष्कृतिर्भवेत् ॥४७॥ ब्राह्मणं द्वेष्टि यस्तस्य निष्कृतिर्नास्ति कुत्रचित् । विश्वासघातिनां चैव कृतघ्नानां नरेश्वरः ॥४८॥ शूद्रस्त्रीसङ्गिनां चैव निष्कृतिर्नास्ति कुत्रचित् । शूद्रान्नपुष्टदेहानां वेदनिन्दारतात्मनाम् ॥४९॥ सत्कथानिन्दकानां च नेहामुत्र च निष्कृतिः । ॥५०॥ बौद्धालयं विशेद्यस्तु महापद्यपि वै द्विजः । न तस्य निष्कृतिर्दृष्टा प्रायश्चित्तशतैरपि ॥५१॥ बौद्धाः पाषण्डिनः प्रोक्ता यतो वेदविनिन्दकाः । तस्माद्द्विजस्तान्नेक्षेत यतो धर्मबहिष्कृताः ॥५२॥ ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि द्विजो बौद्धालयं विशेत् । ज्ञात्वा चेन्निष्कृतिर्नास्ति शास्त्राणामिति निश्चयः ॥५३॥ एतेषां पापबाहुल्यान्नरकं कोटिकल्पकम् । प्रायश्चित्तविहीनानि प्रोक्तान्यन्यानि च प्रभो ॥५४॥ पापानि तेषां नरकान्गदतो मे निशामय ॥५५॥ महापातकिनस्तेषु प्रत्येकं युगवासिनः । तदन्ते पृथिवीमेत्य सप्तजन्मसु गर्दभाः ॥५६॥ ततः श्वानो विद्धवेहा भवेयुर्दशजन्मसु । आशताब्दं विट्कृमयः सर्पा द्वादशजन्मसु ॥५७॥ गुरु-तल्प-गमन के समान है । भाई की स्त्री, मित्र की स्त्री के साथ सहवास और विधवा स्त्री के साथ संगम भी गुरुतल्पगमन ही है । शास्त्रवर्जित समय में कोई कर्म करना, पुत्री-गमन, धर्म का लोप करना और शास्त्रों की निन्दा गुरुतल्पगमन के समान है । राजन् ! ऐसे ही पाप महापाप कहे गए हैं । ऐसे महापाप करने वाले पापियों से संसर्ग रखने वाले भी वैसे ही पापी समझे जाते हैं । महर्षियों ने पापों के लिए प्रायश्चित्तादि के द्वारा किसी प्रकार से निवृत्ति पाने का आदेश दिया है । परन्तु भूपते ! कुछ ऐसे भी पाप हैं जिनके लिए प्रायश्चित्त का विधान नहीं कहा गया है, उनको सुनो ॥४१-४६॥ महान् नरक में ले जाने वाले सब पाप समान हैं । ब्रह्महत्या आदि पापों से किसी प्रकार मनुष्य को प्रायश्चित्त आदि से छुटकारा मिल जाता है, परन्तु ब्राह्मणों से जो द्वेष करता है उसके लिए कहीं कोई प्रायश्चित्त नहीं । नरेश्वर ! विश्वासघाती, कृतघ्न और शूद्र स्त्री के साथ सहवास करने वालों के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है । शूद्रों के अन्न से जीने वाले, वेद-निन्दा में लीन रहने वाले और सत्कथा की निन्दा करने वाले के लिए न तो इस लोक में और न परलोक में ही कोई उद्धार का मार्ग है ॥४७-५०॥ जो ब्राह्मण घोर विपत्ति पड़ने पर भी बौद्ध मठों में निवास करता है उसका सैंकड़ों प्रायश्चित्त करने पर भी क्या उद्धार हो सकता है ? बौद्ध पाखण्डी हैं, क्योंकि वे वेद-निन्दक हैं । अतः द्विज उनको देखे तक नहीं वे धर्म से बहिष्कृत व्यक्ति हैं । जो ब्राह्मण जान बूझकर या अनजान में बौद्ध मठ में प्रवेश करता है; उसमें भी यदि जान बूझकर जाता है तब तो उसके लिए कोई प्रायश्चित्त ही नहीं है, ऐसा शास्त्रों का निर्णय है और यदि अनजान में जाता है तो ऐसे पापी को पाप की अधिकता के कारण कोटि कल्प तक नरक में रहना पड़ता है । प्रभो ! ऐसे पाप जिनके लिए प्रायश्चित्त नहीं कहे गए हैं और दूसरे पापों के कारण जो जो नरक मिलते हैं उनको सुनो—उन नरकों में महापापी युगों तक रहते हैं । तदनन्तर पृथ्वी पर आकर सात जन्म तक गधे बनते हैं । पुनः दश जन्म तक रोगी और छिन्न शरीर वाले कुत्ते बनते हैं ॥५१-५६॥ सौ वर्षों तक विष्ठा के कीड़े और तत्पश्चात् बारह जन्म तक सर्प बनते हैं ॥५७॥ नृप ! तदनन्तर सहस्र जन्म तक मृग आदि पशु योनियों