भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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११२ नारदीयपुराणम् ततः सहस्रजन्मानि मृगाद्याः पशवो नृप । शताब्दं स्थावराश्चैव ततो गोधाशरीरिणः ॥५८॥ ततस्तु सप्तजन्मानि चाण्डालाः पापकारिणः । ततः षोडश जन्मानि शूद्राद्या हीनजातयः ॥५९॥ ततस्तु जन्मद्वितये दरिद्रा व्याधिपीडिताः । प्रतिग्रहपरा नित्यं ततो निरयगाः पुनः ॥६०॥ असूयाविष्टमनसो रौरवे नरके स्मृतम् । तत्र कल्पद्वयं स्थित्वा चाण्डालाः शतजन्मसु ॥६१॥ मा ददस्वेति यो ब्रूयाद्गवाग्निब्राह्मणेषु च । शुनां योनिशतं गत्वा चाण्डालेषूपजायते ॥६२॥ ततो विष्ठाकृमिश्चैव ततो व्याघ्रास्त्रिजन्मसु । तदंते नरकं याति युगानामेकविंशतिम् ॥६३॥ परनिन्दापरा ये च ये च निष्ठुरभाषिणः । दानानां विघ्नकर्त्तारस्तेषां पापफलं शृणु ॥६४॥ मुशलोलूखलाभ्यां तु चूर्ण्यन्ते तस्करा भृशम् । तदन्ते तप्तपाषाणग्रहणं वत्सरत्रयम् ॥६५॥ ततश्च कालसूत्रेण भिद्यन्ते सप्त वत्सरान् । शोचन्तः स्वानि कर्माणि परद्रव्यापहारकाः ॥६६॥ कर्मणा तत्र पच्यन्ते नरकाग्निषु सन्ततम् ॥६७॥ परस्वसूचकानां च नरकं शृणु दारुणम् । यावद्युगसहस्रं तु तप्तायःपिण्डभक्षणम् ॥६८॥ संपीड्यते च रसना संदंशैर्भृशदारुणैः । निरुच्छ्वासं महाघोरे कल्पाद्धं निवसन्ति ते ॥६९॥ परस्त्रीलोलुपानां च नरकं कथयामि ते । तप्तताम्रास्त्रियस्तेन सुरूपाभरणैर्युताः ॥७०॥ यादृशीस्तादृशीस्ताश्च रमन्ते प्रसभं बहु । विद्रवन्तं भयेनासां गृह्णन्ति प्रसभं बलम् ॥७१॥ कथयन्तश्च तत्कर्म नयन्ते नरकान्क्रमात् । अन्यं भजन्ते भूपाल पतिं त्यक्त्वा च याः स्त्रियः ॥७२॥ तप्तायः पुरुषास्तास्तु तप्तायः शयने बलात् । पातयित्वा रमन्ते च बहुकालं बलान्विताः ॥७३॥ ततस्तैर्योषितो मुक्ता हुताशनसमोज्ज्वलम् । अयःस्तम्भं समाश्लिष्य तिष्ठन्त्यब्दसहस्रकम् ॥७४॥ में रहते हैं। सौ वर्षों तक स्थावर (वृक्ष) और पुनः गोह (गोधा) योनि में जाते हैं। सात जन्म तक पाप कर्म करने वाले चाण्डाल और तदनन्तर सोलह जन्म तक शूद्र आदि हीन जाति में जन्म लेते हैं। तत्पश्चात् दूसरे जन्म में व्याधिपीड़ित दरिद्र मनुष्य होते हैं, जो सर्वदा दूसरों के दान पर ही जीवित रहते हैं और अन्त में पुनः नरकगामी होते हैं। सर्वदा ईर्ष्या करने वाले जीव रौरव नरक के भागी होते हैं। वहाँ वे दो कल्प तक रहकर पुनः सौ जन्म चाण्डाल बनते हैं ॥५७-६१॥ जो 'गो ब्राह्मण को कुछ मत दो'—ऐसा कहते हैं वे सौ जन्म तक कुत्ते की योनि में रहकर पुनः चाण्डाल-योनि में उत्पन्न होते हैं। तदनन्तर वे विष्ठा के कीड़े होते और पुनः तीन जन्म तक बाघ बनते हैं। इस योनि से छूटकर इक्कीस युगों तक नरक में निवास करते हैं। ॥५८-६३॥ जो दूसरों की निन्दा करते रहते, जो निष्ठुरभाषी होते और जो दान में विघ्न पहुँचाते हैं, उनके पाप-फल को सुनो। चोर मूसल और ओखली में डालकर अत्यन्त चूर-चूर बनाये जाते हैं, तदनन्तर तपे पत्थर में तीन वर्ष तक चिपकाये जाते हैं और उस यातना के अनन्तर कालसूत्र से सात वर्ष तक काटे जाते हैं। दूसरों का शोषण करने वाले और दूसरों का धन चुराने वाले अपने पापों के फलस्वरूप नरक-कुण्ड में सर्वदा घोर पीड़ा पाते रहते हैं ॥६४-६७॥ दूसरों के धन का चोरों को पता बताने वाले पापियों के फल को सुनो— हजार युगों तक उनको जलता हुआ लोहे का गोला खाना पड़ता है और उनकी जिह्वा को अत्यन्त दारुण चिमटे से दबाया जाता है और वे महाघोर नरक-कुण्ड में तीव्र श्वास खींचते हुए आधे कल्प तक रहते हैं ॥६८-६९॥ परस्त्रीलोलुपों को जो नरक मिलते हैं उनको कह रहा हूँ, सुनो—उनको ताँबे की बनी स्त्री- प्रतिमा के साथ जो अत्यन्त रूपवती, सब आभूषणों सुसज्जित और पूर्वजन्म की-सी आकृति की होती है हठात् रमण करना पड़ता है। उनके भय से जब वे भागने लगते तब उनको बलात् पकड़ लिया जाता है और उनके पापों का उल्लेख कर क्रमशः नरकों में डाला जाता है। भूपाल ! जो स्त्रियाँ अपने पति को छोड़कर अन्यपुरुष से प्रेम करती हैं उनको तप्त लोहे की बनी पुरुषमूर्तियां जलती शय्या पर बलात् गिराकर बहुत समय तक सहवास करते हैं ॥७०-७३॥ तदन्तर उनसे मुक्त होकर अग्नि के समान उज्ज्वल लौह-स्तम्भ का आलिङ्गन कर एक हजार