बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशोऽध्यायः ११३ ततः क्षारोदकस्नानं क्षारोदकनिषेवणम् । तदन्ते नरकान् सर्वान् भुञ्जतेऽब्दशतं शतम् ॥७५॥ यो हन्ति ब्राह्मणं गां च क्षत्रियं च नृपोत्तमम् । स चापि यातनाः सर्वा भुङ्क्ते कल्पेषु पञ्चसु ॥७६॥ यः शृणोति महन्निन्दां सादरं तत्फलं शृणु । तेषां कर्णेषु दाप्यन्ते तप्तायःकीलसंचयाः ॥७७॥ ततश्च तेषु छिद्रेषु तैलमत्युष्णमुल्बणम् । पूर्यते च ततश्चापि कुम्भीपाकं प्रपद्यते ॥७८॥ नास्तिकानां प्रवक्ष्यामि विमुखानां हरे हरौ । अब्दानां कोटिपर्यन्तं लवणं भुञ्जते हि ते ॥७९॥ ततश्च कल्पपर्यन्तं रौरवे तप्तसैकते । भज्यंते पापकर्मणोऽन्येष्वप्येवं नराधिप ॥८०॥ ब्राह्मणान्ये निरीक्षन्ते कोपदृष्टचा नराधमाः । तप्तसूचीसहस्रेण चक्षुस्तेषां प्रसूर्यते ॥८१॥ ततः क्षाराम्बुधाराभिः सेच्यन्ते नृपसत्तम । ततश्च क्रकचैर्घोरैर्भिद्यन्ते पापकर्मणः ॥८२॥ विश्वासघातिनां चैव मर्यादाभेदिनां तथा । परान्नलोलुपानां च नरकं शृणु दारुणम् ॥८३॥ स्वमांसभोजिनो नित्यं भक्ष्यमाणाः श्वभिस्तु ते । नरकेषु समस्तेषु प्रत्येकं ह्यब्दवासिनः ॥८४॥ प्रतिग्रहरता ये च ये वै नक्षत्रपाठकाः । ये च देवलकान्नानां भोजिनस्ताञ्छृणुष्व मे ॥८५॥ राजन्नाकल्पपर्यन्तं यातनास्वासु दुःखिताः । पच्यन्ते सततं पापाविष्टा भोगरताः सदा ॥८६॥ ततस्तैलेन पुर्यन्ते कालसूत्रप्रपीडिताः । ततः क्षारोदकस्नानं मूत्रविष्ठानिषेवणम् ॥८७॥ तदन्ते भुवमासाद्य भवन्ति म्लेच्छजातयः । अन्योद्वेगरता ये तु यान्ति वैतरणीं नदीम् ॥८८॥ त्यक्तपञ्चमहायज्ञा लालाभक्षं व्रजन्ति हि । उपासनापरित्यागो रौरवं नरकं व्रजेत् ॥८९॥ वर्ष तक रहती हैं। इस घोरयातना को भोगने के पश्चात् उनके खारे जल से स्नान करना पड़ता और वही पीना पड़ता है ॥७०-७५॥ जो किसी ब्राह्मण, गौ और उत्तम क्षत्रिय राजा को मारता है वह भी पाँच कल्प तक सब प्रकार की यातनाओं को भोगता है । जो दूसरे की निन्दा बड़े चाव से सुनता है उसका फल सुनो—उनके कानों में जलते लोहे की कीलें डाल दी जाती हैं और उनके छिद्रों को खौलते हुए तेल से भर दिया जाता है और पुनः उनको कुंभीपाक में छोड़ा जाता है । जो नास्तिक विष्णु अथवा शंकर से विमुख रहते उनके पापों का वर्णन कह रहा हूँ सुनो—वे करोड़ वर्षों तक नमक खाते रहते हैं और पुनः कल्पान्त तक तप्त बालुका से भरे रौरवनरक में रहते हैं ॥७६-७६॥ नराधिप ! उसी प्रकार अन्य पापों के करने वाले भी विभिन्न नरकों का भोग करते हैं। जो नराधम ब्राह्मणों को काप दृष्टि से देखते हैं उनकी आंखों में जलती हजारों सुइयाँ चुभोई जाती हैं। नृप- सत्तम ! पुनः उनकी आंखों में खारे जल की धार गिराई जाती है और पापों के अनुसार वे आरे से फाड़े जाते हैं । अब विश्वासघाती, लोकमर्यादा भङ्ग करने वाले और परान्नलोलुप पापियों के दारुण नरकों का वर्णन सुनो ॥८०-८३॥ वे सर्वदा अपना ही मांस नोच-नोच कर खाते रहते हैं और कुत्ते भी उनको नोच कर खाते हैं । पुनः प्रत्येक नरक में करोड़ों वर्षों तक उन्हें रहना पड़ता है। जो सर्वदा दूसरों से दान ही लिया करते हैं और जो ज्योतिषी तथा पुजारियों का अन्न खाया करते हैं उनके पापों को मुझसे सुनो। राजन् ! कल्पान्त तक वह उपर्युक्त यातनाभय नरकों में दुःख भोग करते और सर्वदा अपने पापों के फल-भोग में निरत रहते हैं। तदनन्तर काल सूत्र से पीड़ित होकर जलते तेल से भरे कुण्ड में छोड़े जाते और पुनः खारे जल से स्नान करने के बाद मूत्र और विष्ठा को खाते हैं । भोग के अनन्तर इस पृथ्वो पर आकर म्लेच्छ जाति में जन्म लेता है। जो दूसरों को उद्विग्न करने में लगे रहते हैं वे वैतरणी नदी में गिराये जाते हैं ॥८४-८८॥ जो पञ्चमहायज्ञ¹ नहीं करते वे १. स्वाध्याय, अग्नि होत्र, अतिथि पूजन, पितृ तर्पण और बलिकर्म । १५