बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 133, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें११४ नारदीयपुराणम् विप्रग्रामकरादानं कुर्वतां शृणु भूपते । यातनास्वासु पच्यन्ते यावदाचन्द्रतारकम् ॥८०॥ ग्रामेषु भूपालवरो यः कुर्यादधिकं करम् । स सहस्रकुलो भुङ्क्ते नरकं कल्पपञ्चसु ॥८१॥ विप्रग्रामकरादाने योऽनुमन्ता तु पापकृत् । स एव कृतवान् राजन्ब्रह्महत्यासहस्रकम् ॥८२॥ कालसूत्रे महाघोरे स वसेद्द्विचतुर्युगम् । अयोनौ च वियोनौ च पशुयोनौ च यो नरः ॥८३॥ त्यजेद्रेतो महापापी स रेतोभोजनं लभेत् । वसाकूपं ततः प्राप्य स्थित्वा दिव्याब्दसप्तकम् ॥८४॥ रेतोभोजी भवेन्मर्त्यः सर्वलोकेषु निन्दितः । उपवासदिने राजन्दन्तधावनकृन्नरः ॥८५॥ स घोरं नरकं याति व्याघ्रपक्षं चतुर्युगम् । यः स्वकर्मपरित्यागी पाषण्डीत्युच्यते बुधैः ॥८६॥ तत्संगकृतमोहः स्यात्तावुभावतिपापिनौ । कल्पकोटिसहस्रेषु प्राप्नुतो नरकान्क्रमात् ॥८७॥ देवद्रव्यापहतारो गुरुद्रव्यापहारकाः । ब्रह्महत्याव्रतसमं दुष्कृतं भुञ्जते नृप ॥८८॥ अनाथधनहर्तारो ह्यनाथं ये द्विषन्ति च । कल्पकोटिसहस्राणि नरके ते वसन्ति च ॥८९॥ स्त्रीशूद्राणां समीपे तु ये वेदाध्ययने रताः । तेषां पापफलं वक्ष्ये शृणुष्व सुसमाहितः ॥१००॥ अधःशीर्षोर्ध्वपादाश्च कीलिताः स्तम्भकद्वये । धूम्रपानरता नित्यं तिष्ठन्त्याब्रह्मवत्सरम् ॥१०१॥ जले देवालये वापि यस्त्यजेद्देहजं मलम् । भ्रूणहत्यासमं पापं संप्राप्नोत्यतिदारुणम् ॥१०२॥ दन्तास्थ्यकेशनखराण्य् त्यजन्त्यमरालये । जले वा भुक्तशेषं च तेषां पापफलं शृणु ॥१०३॥ प्रासप्रोता हलीभिन्ना आर्त्तरावविराविणः । अत्युष्णतैलपाकेऽतितप्यन्ते भृशदारुणं ॥१०४॥ कुर्वन्ति दुःखसंतप्तास्ततोऽन्येषु व्रजन्ति च । ब्रह्म संहरते यस्तु गन्धकाष्ठं तथैव च ॥१०५॥ लालाभक्ष में जाते हैं। देव उपासना न करने वाला रौरव नरक में जाता है भूपते ! जो ब्राह्मणों के गाँव से कर लेता है उनके पाप-फल को सुनो वे इन नरकों में कल्पान्त तक रहते हैं। भूपाल ! जो ब्राह्मण-ग्रामों पर अधिक कर बढ़ा देते हैं वे अपने सहस्र कुलों के सहित पांच कल्प तक नरक भोग करते हैं । राजन् ! जो ब्राह्मणों की बस्ती से कर लेने में अपनी अनुमति देता है उसने मानो हजारों ब्रह्महत्यायें कर दीं और वह महाघोर काल सूत्र में दो चतुर्युगों तक रहता है। जो मनुष्य अयोनित, वियोनि और पशुयोनि में वीर्य त्याग करता है। वह महापापो उसी वीर्य को पोता है। तदन्तर वसाकूप नरक में जाकर देवताओं के वर्ष के प्रमाण से सात वर्ष तक रहता है। फिर वीर्यभोजी मनुष्य होकर सब लोकों में निन्दित होता है। जो व्रत के दिन दातून करता है वह चारयुग तक व्याघ्र पक्ष नामक घोर नरक में पड़ता है। जो अपने शास्त्रविहित कर्मों को नहीं करता, उसको पंडित जन पाखण्डी कहते हैं ॥८६-१६॥ जो उस पापी को संगति करता है, वह भी अति पापी कहा जाता है। वे दोनों हजार करोड़ कल्प तक क्रम-क्रम से नरकों में गिराये जाते हैं। नृप ! देव-द्रव्य और गुरुद्रव्य के चुराने वाले ब्रह्महत्या के समान पापों का भोग करते हैं। जो अनाथों का द्रव्य हरते और अनाथों से द्वेष करते हैं, वे हजार कोटि कल्प तक नरक में रहते हैं ॥६७-६६॥ जो स्त्री और शूद्रों के समीप वेद अध्ययन करते हैं उनके पापों को बतला रहा हूँ ध्यानपूर्वक सुनो ॥१००॥ उनका शिर नीचे और पैर ऊपर कर दो खम्भों में कील से जड़ दिये जाते हैं और इसी स्थिति में उनको ब्रह्मा के एक वर्ष तक धुआं पोकर रहना पड़ता है। जो जल या देवालय में अपने शरीर के मल को फेंकता है वह भ्रूण हत्या के समान अति दारुण पापों का भोग करता है। जो देवालय में दाँत, हड्डी, केश, नख, अथवा अन्य अपवित्र पदार्थों को छोड़ते अथवा जल में अपना जूठा फेंकते हैं, उनके पाप-फल को सुनो ॥१०१-१०३॥ वे भाले से मारे जाते, हल से फाड़े जाते और आर्त्तनाद करने वाले उन लोगों को पुनः अति घोर तप्त तैलपाक में भोंक दिया जाता है। इस प्रकार दुःखों से कष्ट पाकर पुनः अन्य घृणित योनियों में भेजे जाते हैं। जो वेदों को चुराता या नष्ट करना और