भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पञ्चविशोऽध्यायः ११५ स याति नरकं घोरं यावदाचन्द्रतारकम् । ब्रह्मस्वहरणं राजन्निहामुत्र च दुःखदम् ॥१०६॥ इह संपद्विनाशाय परत्र नरकाय च । कूटसाक्ष्यं वदेद्यस्तु तस्य पापफलं शृणु ॥१०७॥ स याति यातनाः सर्वा यावदिन्द्राश्चतुर्दश । इह पुत्राश्च पौत्राश्च विनश्यन्ति परत्र च ॥१०८॥ रौरवं नरकं भुङ्क्ते ततोऽन्यानपि च क्रमात् । येऽप्यतिकामिनो मर्त्या ये च मिथ्याप्रवादिनः ॥१०६॥ तेषां मुखे जलौकास्तु पूर्यन्ते पन्नगोपमाः । एवं षष्टिसहस्राब्दे ततः क्षाराम्बुसेचनम् ॥११०॥ ये वृथामांसनिरतास्ते यान्ति क्षारकद्दमम् । ततो गजैर्निपात्यन्ते मरुत्पतनं यथा ॥१११॥ तदन्ते भवमासाद्य हीनाङ्गाः प्रभवन्ति च । यस्त्वृतौ नाभिगच्छेत स्वस्त्रियं मनुजेश्वर ॥११२॥ स याति रौरवं घोरं ब्रह्महत्यां च विन्दति । अनाचाररतं दृष्ट्वा यः शक्तो न निवारयेत् ॥११३॥ तत्पापं समवाप्नोति नरकं तावुभावपि । पापिनां पापगणनां कृत्वान्येभ्यो दिशन्ति च ॥११४॥ अस्तित्वे तुल्यपापास्ते मिथ्यात्वे द्विगुणा नृप । अपापे पातकं यस्तु समारोप्य विनिन्दति ॥११५॥ स याति नरकं घोरं यावच्चंद्रार्कतारकम् । पापिनां निन्द्यमानानां पापाद्धं क्षयमेति च ॥११६॥ यस्तु व्रतानि संगृह्य असमाप्य परित्यज्येत् । सोऽसिपत्रेऽनुभूयार्ति हीनाङ्गो जायते भुवि ॥११७॥ अन्यैः संगृह्यमाणानां व्रतानां विघ्नकृन्नरः । अतीव दुःखदं रौद्रं स याति श्लेष्मभोजनम् ॥११८॥ न्याये च धर्मशिक्षायां पक्षपातं करोति यः । न तस्य निष्कृतिर्भूयः प्रायश्चित्तायुतैरपि ॥११९॥ चन्दन आदि को चुराता है वह कल्पान्त तक घोर नरक में रखा जाता है । ब्राह्मणों की सम्पत्ति छीनना लोक परलोक दोनों में दुःखदायी होता है । उससे अपनी सम्पत्ति का नाश तो होता ही है अन्त में नरक का भी भोग करना पड़ता है । जो झूठी गवाही देता है उसके पापफल को सुनो ॥१०४-१०७॥ वह जब तक चौदहों इन्द्रों का भोग काल रहता है तब तक सब नरकों का भोग करता है । उसके सब पुत्र और पौत्र तो नष्ट हो ही जाते हैं; इसके अतिरिक्त उसको परलोक में रौरव नरक और अन्यान्य नरकों का क्रमशः भोग करना पड़ता है । जो अत्यन्त कामी, मिथ्या बोलने वाले होते हैं उनके मुख सांप के समान जोंकों से भर दिये जाते हैं । इसके पश्चात् साठ हजार वर्ष तक खारे जल से नहलाया जाता है ॥१०८-११०॥ जो सदा व्यर्थ में (यज्ञ के अतिरिक्त) मांस खाते रहते वे क्षारकर्दम नरक में गिराये जाते हैं । तदनन्तर हाथियों पर से गिराये जाते और पुनः आंधियों में उनको लुढ़काया जाता है । इतने भोग के अनन्तर वे संसार में आकर लंगड़े-लूले और काने होते हैं । मुनेश्वर ! जो ऋतुकाल में अपनो स्त्री के समीप नहीं जाते वे रौरव नरक को जाते हैं और ब्रह्महत्या के समान पाप भोग करते हैं । जो समर्थ होते हुये भी किसी को दुराचार से नहीं रोकता वह भी उसी के समान पापभागी होता और वे दोनों नरक भोग करते हैं ॥१११-११४॥ नृप ! जो पापियों के पापों की गणना करके दूसरों से कहता है, यदि वे पाप सत्य हैं तब तो तुल्यपाप का भागी होता है यदि असत्य हैं तब तो दूने पापों का भोग करना पड़ता है । जो सच्चरित्र व्यक्ति पर पापों का आरोप कर उसकी निन्दा करता है, वह कल्पपर्यन्त घोर नरक में निवास करता है और पापियों की निन्दा करने से पापियों के आधे पाप धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं ॥११५-११६॥ जो व्रत को प्रारम्भ कर बिना समाप्त किये छोड़ देते हैं वे असिपत्र वन नामक नरक को भोगने के पश्चात् मृत्युलोक में हीनाङ्ग होकर जन्म लेते हैं। जो दूसरों के व्रत पालन में विघ्न उपस्थित करता है वह अतीव दुःखदायी घोर श्लेष्मभोजन नामक नरक में गिराया जाता है । जो न्याय अथवा धर्म शिक्षा में पक्षपात करता है उसके पापों का नाश दस सहस्र प्रायश्चित्त करने पर भी नहीं होता है । अभोज्य भोजन करने वाला और गोमांस खाने वाला विशेषरूप से हजार वर्ष तक