बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११६ नारदीयपुराणम् अभोज्यभोजी संप्राप्य विड्भोज्यं तु समायुतम् । ततश्चाण्डालयोनौ तु गोमांसाशी सदा भवेत् ॥१२०॥ अवमान्य द्विजान्वाग्भिर्ब्रह्महत्यां च विन्दति । सर्वश्वियातना भुक्त्वा चाण्डालो दशजन्मसु ॥१२१॥ विप्राय दीयमाने तु यस्तु विघ्नं समाचरेत् । ब्रह्महत्यासमं तेन कर्त्तव्यं व्रतमेव च ॥१२२॥ अपहृत्य परस्यार्थं यः परेभ्यः प्रयच्छति । अपहर्ता तु निरयी यस्यार्थस्तस्य तत्फलम् ॥१२३॥ प्रतिश्रुत्याप्रदानेन लालाभक्षं व्रजेन्नरः । यतिनिन्दापरो राजन् शिलामात्रे प्रयाति हि ॥१२४॥ आरामच्छेदिनो यान्ति युगानामेकविंशतिम् । श्वभोजनं ततः सर्वा भुञ्जते यातनाः क्रमात् ॥१२५॥ देवतागृहभेत्तारस्तडागानां च भूपते । पुष्पारामभिदश्चैव यां गतिं यान्ति तच्छृणु ॥१२६॥ यातनास्वासु सर्वासु पच्यन्ते वै पृथक् पृथक् । ततश्च विष्ठाकृमयः कल्पानामेकविंशतिम् ॥१२७॥ यतश्चाण्डालयोनौ तु शतजन्मानि भूपते । ग्रामविध्वंसकानां तु दाहकानां च लुम्पताम् ॥१२८॥ महत्पापं तदादेष्टुं न क्षमोऽहं निजायुषा । उच्छिष्टभोजिनो ये च मित्रद्रोहपराश्च ये ॥१२६॥ एतेषां यातनास्तीव्रा भवन्त्याचन्द्रतारकम् । उच्छिन्नपितृदेवेज्या वेदमार्गबहिःस्थिताः ॥१३०॥ पाषण्डा इति विख्यातास्तांस्तेषां वै सर्वयातनाः । एवं बहुविधा भूप यातनाः पापकारिणाम् ॥१३१॥ तेषां तासां च संख्यानं कर्त्तुं नालमहं प्रभो । पापानां यातनानां च धर्माणां चापि भूपते ॥१३२॥ संख्यां निगदितुं लोके कः क्षमो विष्णुना विना । एतेषां सर्वपापानां धर्मशास्त्रविधानतः ॥१३३॥ प्रायश्चित्तेषु चीर्णेषु पापराशिः प्रणश्यति । प्रायश्चित्तानि कार्याणि समीपे कमलापतेः ॥१३४॥ विड्भोज्य नरक में रहने के बाद चांडाल योनि में जन्म लेता है ।। ११९-१२०।। ब्राह्मणों को वाणी द्वारा अपमानित कर ब्रह्म हत्या के बराबर दोषभागी होना पड़ता है वह सब नरकों को भोगकर दश जन्म तक चाण्डाल बनता है । जो ब्राह्मणों को दान देने के समय बाधा पहुँचाता है उसको ब्रह्महत्या के समान प्रायश्चित्त करना पड़ता है । जो दूसरे का धन छीन कर दूसरे को दे देता है, तो वह अपहरण करने वाला नरक भोगता है परन्तु जिसको धन मिलता है वह अवश्य पापफल भोगता है । दान की प्रतिज्ञा कर जो दान नहीं देता वह मनुष्य लालाभक्ष नरक में जाता है । राजन् ! संन्यासियों की निन्दा करने वाला शिलामात्र नामक नरक में जाता है । उपवन या वाटिका के विनाशक इक्कीस युगों तक श्वभोजन नरक में जाते हैं और क्रमशः सब नरकों का भोग करते हैं ।। १२१-१२५।। भूपते ! देव मन्दिरों और तालाबों को हानि पहुँचाने वाले साथ ही, पुष्प वाटिका को क्षति पहुँचाने वाले जिस गति को प्राप्त करते, उसको सुनो ! वे उपर्युक्त नरकों में पृथक्-पृथक् कष्ट पाते हैं । पुनः इक्कीस कल्पों तक विष्ठा के कृमि होकर रहते हैं । भूपते ! इतने पर भी अन्त में सौ जन्मों तक उनको चाण्डाल योनि में रहना पड़ता है ॥१२६-१२७॥ ग्राम-विध्वंसक, ग्राम जलाने वाले और गांवों को लूटने वाले मनुष्यों के पापों की गणना मैं अपने जीवन काल तक नहीं कर सकता हूँ। जो जूठा खाने वाले, मित्रद्रोही हैं उनको तीव्र यातनायें कल्पपर्यन्त भोगनी पड़ती हैं । पितृकर्म और देवयज्ञों को न करने वाले और वेदमार्ग पर न चलने वाले पाखण्डी कहे गये हैं। उनको सब प्रकार की यातनायें दी जातो हैं । प्रभो ! उन पापियों, पापों और उन नरकों की गणना करने में मैं समर्थ नहीं हूँ ॥१२८-१३१॥ भूपते ! पाप, नरक और धर्म की गणना इस विश्व में विष्णु को छोड़कर और कोई करने में समर्थ नहीं है । ऐसे सभी पापों का धर्मशास्त्रों के अनुसार प्रायश्चित्त करने से पापराशि अवश्य क्षीण हो जाती है । प्रायश्चित्तों को कमलापति विष्णु के समीप करना चाहिए, क्योंकि इससे न्यूनाधिक दोषों की पूर्ति हो जाती है । गंगा, तुलसी, सत्संग और हरिकीर्तन, इसी