भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 1008 में से

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पञ्चदशोऽध्यायः ११७. न्यूनातिरिक्तकृत्यानां संपूर्तिकरणाय च । गङ्गा च तुलसी चैव सत्सङ्गो हरिकीर्त्तनम् ॥१३५॥ अनसूया ह्यहिंसा च सर्वेष्येते हि पापहा । विष्ण्वर्पितानि कर्माणि सफ़लानि भवन्ति हि ॥१३६॥ अनर्पितानि कर्माणि भस्मविन्यस्तहव्यवत् । नित्यं नैमित्तिकं काम्यं यच्चान्यन्मोक्षसाधनम् ॥१३७॥ विष्णौ समर्पितं सर्वं सात्त्विकं सफलं भवेत् । हरिभक्तिः परा नृणां सर्वपापप्रणाशिनी ॥१३८॥ सा भक्तिर्दशधा ज्ञेया पापारण्यदवोपमा । तामसो राजसैश्चैव सात्त्विकैश्च नृपोत्तम ॥१३६॥ यच्चान्यस्य विनाशार्थं भजनं श्रीपतेर्नृप । सा तामस्यधमा भक्तिः खलभावधरा यतः ॥१४०॥ योऽर्चयेत्कैतवधिया स्वैरिणी स्वपतिं यथा । नारायणं जगन्नाथं तामसी मध्यमा तु सा ॥१४१॥ देवपूजापरन्दृष्ट्वा मात्सर्याद्योऽर्चयेद्धरिम् । सा भक्तिः पृथिवीपाल तामसी चोत्तमा स्मृता ॥१४२॥ धनधान्यादिकं यस्तु प्रार्थयन्नर्चयेद्धरिम् । श्रद्धया परया युक्तः सा राजस्यधमा स्मृता ॥१४३॥ यः सर्वलोकविख्यातकीर्तिमुद्दिश्य माधवम् । अर्चयेत्परया भक्त्या सा मध्या राजसी मता ॥१४४॥ सालोक्यादि पदं यस्तु समुद्दिश्यार्चयेद्धरिम् । सा राजस्युत्तमा भक्तिः कीर्तिता पृथिवीपते ॥१४५॥ यस्तु स्वकृतपापानां क्षयार्थं प्रार्चयेद्धरिम् । श्रद्धया परयोपेतः सा सात्त्विक्यधमा स्मृता ॥१४६॥ हरेरिदं प्रियमिति शुश्रूषां कुरुते तु यः । श्रद्धया संयुतो भूयः सात्त्विकी मध्यमा तु सा ॥१४७॥ विधिबुद्ध्याचार्चयेद्यस्तु दासबच्च्छ्रीपतिं नृप । भक्तीनां प्रवरा सा तु उत्तमा सात्त्विकी स्मृता ॥१४८॥ महिमानं हरेर्यस्तु किञ्चित्कृत्वा प्रियो नरः । तन्मयत्वेन संतुष्टः सा भक्तिरुत्तमोत्तमा ॥१४६॥ अहमेव परो विष्णुर्मयि सर्वमिदं जगत् । इति यः सततं पश्येत्तं विद्यादुत्तमोत्तमम् ॥१५०॥ प्रकार अनसूया (उदारता) और अहिंसा ये भी पाप-विनाशक हैं । विष्णु को अर्पित किये हुए सभी शुभ कर्म सफल होते हैं । विष्णु को न अर्पित किये हुए कर्म उसी प्रकार निष्फल होते जैसे भस्म में दी हुई आहुति । नित्य, नैमित्तिक, काम्य अथवा और जितने मोक्षदायक कर्म हैं वे विष्णु को अर्पित करने से सात्त्विक फल प्रदान करते हैं। परा हरिभक्ति मनुष्यों के सभी पापों को नष्ट कर देती है ॥१३२-१३८॥ नृपोत्तम ! यह पाप रूपो वन को दावानल के समान भस्म करने वाली भक्ति तामस, राजस और सात्त्विक भेदों से इस प्रकार की होती है। नृप ! दूसरे के विनाश के लिए जो विष्णु का भजन किया जाता है वह तामसो अधमा भक्ति है, क्योंकि यह दुष्टजनों की भक्ति के समान है । जिस प्रकार कुलटा स्त्री अपने पति के प्रति कपट प्रेम दिखलाती है, उसो प्रकार जो व्यक्ति कपट भाव से नारायण जगन्नाथ की पूजा करता है, उसकी भक्ति मध्यमा तामसी है ॥१३९- १४१॥ जो दूसरे को देवपूजा में देखकर ईर्ष्यावश स्वयं ईश्वर की पूजा करता है वह उत्तमा तामसो भक्ति कही जाती है । जो धन सम्पत्ति आदि की इच्छा से परम श्रद्धापूर्वक भगवान् को पूजा करता है, वह अधमा- राजसी भक्ति है । जो सारे संसार में विख्यात-यश प्राप्त करने के लिए परमश्रद्धा से माधव को पूजा करता है वह भक्ति मध्यम राजसी कही जाती है । पृथ्बीपते ! जो सालोक्य आदि पद को पाने के लिए हरि की उपासना करता है, वह उत्तम राजसी भक्ति मानी गई है। जो अति श्रद्धा से अपने पापों के क्षय के लिए हरि की अर्चा करता है, वह अधम सात्त्विक भक्ति कही गई है । ।१४२-१४६॥ जो हरि को यह मेरा कार्य प्रिय है इस बुद्धि से श्रद्धायुत होकर हरि की शुश्रूषा करता है वह मध्यम सात्विक भक्ति बताई गई है । नृप ! जो विधि (शास्त्राज्ञा या कर्त्तव्य) बुद्धि से दास की भांति श्रीपति विष्णु की पूजा करता है वह भक्तियों में श्रेष्ठ उत्तम सात्त्विक भक्ति है । जो मनुष्य हरि की महिमा का स्मरणकर तन्मय होकर प्रसन्नतापूर्वक भगवान् की पूजा करता है उस भक्ति को उत्तमोत्तम भक्ति कहते हैं । मैं ही परम विष्णु हूँ मुझमें यह सारा जगत् व्याप्त है, इस प्रकार की भावना जिसके हृदय में रहती है उसको उत्तमोत्तम भक्त कहा जाता है। इस प्रकार की दशविध भक्ति संसार की माया

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