भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 137

११८ नारदीयपुराणम् एवं दशविधा भक्तिः संसारच्छेदकारिणी । तत्रापि सात्त्विकी भक्तिः सर्वकामफलप्रदा ॥१५१॥ तस्माच्छृणुष्व भूपाल संसारविजिगीषुणा । स्वकर्मणो विरोधेन भक्तिः कार्या जनार्दने ॥१५२॥ यः स्वधर्मं परित्यज्य भक्तिमात्रेण जीवति । न तस्य तुष्यते विष्णुराचारेणैव तुष्यते ॥१५३॥ सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते । आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥१५४॥ तस्मात्कार्या हरेर्भक्तिः स्वधर्मस्याविरोधिनी । सदाचारविहीनानां धर्मो अप्यसुखप्रदाः ॥१५५॥ स्वधर्महीना भक्तिश्चाप्यकृतेव प्रकीर्तिता । यत्तु पृष्टं त्वया भूयस्तत्सर्वं गदितं मया ॥१५६॥ तस्माद्धर्मपरो भूत्वा पूजयस्व जनार्दनम् । नारायणमणीयांसं सुखमेष्यसि शाश्वतम् ॥१५७॥ शिव एव हरिः साक्षाद्धरिरेव शिवः स्वयंम् । द्वयोरन्तरदृग्याति नरकान्कोटिशः खलः ॥१५८॥ तस्माद्विष्णुं शिवं वापि समं बुद्ध्वा समर्चय । भेदकृद्दुःखमाप्नोति इह लोके परत्र च ॥१५९॥ यदर्थमहमायातःत्वत्समीपं जनाधिप । तत्ते वक्ष्यामि सुमति सावधानं निशामय ॥१६०॥ आत्मघातकपाप्मानो दग्धा कपिलकोषतः । वसन्ति नरके ते तु राजंस्तव पितामहाः ॥१६१॥ तानुद्धर महाभाग गङ्गानयनकर्मणा । गङ्गा सर्वाणि पापानि नाशयत्येव भूपते ॥१६२॥ केशास्थिनखदन्तांश्च भस्मापि नृपसत्तम । नयति विष्णुसदनं स्पृष्टा गङ्गेण वारिणा ॥१६३॥ यस्यास्थि भस्म वा राजन् गङ्गायां क्षिप्यते नरैः । स सर्वपापनिर्मुक्तः प्रयाति भवनं हरेः ॥१६४॥ यानि कानि च पापानि प्रोक्तानि तब भूपते । तानि सर्वाणि नश्यन्ति गङ्गाबिन्दुभिषेचनात् ॥१६५॥

का नाश करने वाली है, इनमें सात्त्विक भक्ति सब प्रकार की कामनाओं को देने वाली है ॥१४७-१५१॥ भूपाल ! इसलिए सुनो—संसारिक अभाव या बन्धनों पर विजय पाने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति अपने आश्रम धर्म का निर्वाह करता हुआ भगवान् जनार्दन में अपनी निष्ठा रखे । जो अपने धर्म का त्याग कर केवल भक्ति मात्र से जीवित रहता या जीविका चलाता है उसके ऊपर भगवान् प्रसन्न नहीं होते वे तो केवल आचार पालन से ही प्रसन्न रहते हैं। आचार ही सब प्रकार के धर्मों की प्राप्ति का प्रथम कारण है। आचार द्वारा ही धर्म की रक्षा होती है और धर्म के प्रभु भगवान् हैं। अतएव हरि की भक्ति अपने अपने आचार धर्म के पालन के साथ ही (अविरोधभाव से) करनी चाहिए। सदाचारहीन व्यक्ति के लिए धर्म भी कष्टप्रद ही होता है ॥१५२-१५५॥ अपने धर्म से हीन भक्ति केवल प्राकृत भक्ति कही गई है । तुमने मुझसे जो कुछ पूछा, उसको मैंने सम्पूर्ण रूपसे कह दिया । इसलिए तुम धर्म पूर्वक भगवत्स्वरूप भगवान् जनार्दन की पूजा करो तभी तुम शाश्वत सुख प्राप्त करोगे । चाहे हरि की पूजा करो या शिव की दोनों में कोई भेद नहीं, क्योंकि शिव ही साक्षात् हरि और हरि ही साक्षात् शंकर हैं, इन दोनों में भेद बुद्धि रखने वाला दुष्टमानव करोड़ों नरकों में जाता है ॥१५६-१५८॥ इसलिए समभाव से विष्णु या शिव की पूजा करो । भेद भाव रखने वाला दुष्टभक्त न तो इस लोक में ही सुख पाता है न पर लोक में । जनाधिप ! जिसलिए मैं यहाँ तुम्हारे निकट आया हूँ, उसको कह रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो । राजन् ! तुम्हारे आत्मघाती पापी पितामह कपिल के क्रोधानल से भस्म होकर अब तक नरक में पड़े हुए हैं। महाभाग ! गंगा को यहां लाकर उनका उद्धार करो । भूपते ! गंगा मनुष्य के पापों को नष्ट कर ही देती हैं ॥१५९-१६२॥ नृपश्रेष्ठ ! मृत व्यक्तियों के केश, हड्डियां, नख, दांत यहाँ तक कि केवल श्मशान भस्म भी यदि गंगा जल से छू जाय तो मृत व्यक्ति अवश्य विष्णुपलोक को चला जाता है। राजन् ! मानव यदि किसी मृत व्यक्ति की हड्डी अथवा शव भस्म को ही गंगा में फेंक दे तो वह मृत व्यक्ति सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को चला जाता है। भूपते ! जो कुछ पाप तुम्हारे सामने कहे गये हैं वे सभी पाप गंगाजल के अभिषेक मात्र से नष्ट हो जाते हैं ॥१६३-१६५॥