भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 138

पञ्चदशोऽध्यायः ११६ सनक उवाच इत्युक्त्वा मुनिशार्दूल महाराजं भगीरथम् । धर्मात्मानं धर्मराजः सद्यश्चान्तर्दधे तदा ॥१६६॥ स तु राजा महाप्राज्ञः सर्वशास्त्रार्थपारगः । निक्षिप्य पृथिवीं सर्वां सचिवेबु ययौ वनम् ॥१६७॥ तुहिनाद्रौ ततो गत्वा नरनारायणाश्रमात् । पश्चिमे तुहिनाक्रान्ते शृङ्गेषोडशयोजने ॥१६८॥ तपस्तप्त्वाऽनयामास गङ्गां त्रैलोक्यपावनीम् ॥१६६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे धर्माख्याने धर्मराजोपदेशेन भगीरथस्य गङ्गानयनोद्यमवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥

षोडशोऽध्यायः नारद उवाच हिमवद्गिरिमासाद्य किं चकार महीपतिः । कथमानीतवान्गङ्गामेतन्मे वक्तुमर्हसि ॥१॥ सनक उवाच भगीरथो महाराजो जटाचीरधरो मुने । गच्छन्हिमाद्रिं तपसे प्राप्तो गोदावरीतटम् ॥२॥ तत्रापश्यन्महारण्ये भृगोराश्रममुत्तमम् । कृष्णसारसमाकीर्णं मातङ्गगणसेवितम् ॥३॥

सनक बोले—मुनिशार्दूल ! इस प्रकार धर्मात्मा महाराज भगीरथ से कहकर धर्मराज तत्काल अन्तर्हित हो गए । वह परम बुद्धिमान्, सब शास्त्रों का पारगामी विद्वान् राजा मन्त्रियों को पृथ्वी का शासनभार सौंपकर वन को चला गया । इसके पश्चात् हिमालय पर्वत पर नर-नारायणाश्रम के पश्चिम दिशा के सोलह योजन विस्तीर्ण हिमाच्छाद्य शिखर पर घोर तपस्या कर इस पृथ्वीपर त्रिभुवन पावनी गंगा को ले आया ॥१६६-१६९॥ श्रीनारदीयपुराण में धर्मराजोपदेश और भगीरथ द्वारा गङ्गाआनयन नामक पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त ॥१५॥

अध्याय १६ गङ्गा का आनयन और अपने कुल का उद्धार नारदजी बोले—महीपति ने हिमालय पर्वत पर जाकर क्या किया और किस प्रकार गंगा को पृथ्वी पर लाया, इस आख्यान को मुझसे कहिए ॥१॥ सनक बोले—मुने ! जटा, वल्कल धारणकर महाराज भगीरथ तपस्या करने के लिए हिमालय में गोदावरी के तट पर गए । वहाँ उन्होंने उस महावन में भृगु के उत्तम आश्रम को देखा, जहाँ कृष्णसार मृग इधर-उधर क्रीड़ा कर रहे थे, मतवाले हाथी निःशङ्क होकर घूम रहे थे, चञ्चल भौंरों की गुंजार और कलकूजन