भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

१२० नारदीयपुराणम् भ्रमद्भ्रमरसंघुष्टं कूजद्विहगसंकुलम् । व्रजद्वराहनिकरं चमरीपुच्छवीजितम् ॥४॥ नृत्यन्मयूरनिकरं सारङ्गादिनिषेवितम् । प्रवर्द्धितमहावृक्षं मुनिकन्याभिरादरात् ॥५॥ शालतालतमालाढ्यं नूनहिंतालमण्डितम् । मालतीयूथिकाकुन्दचम्पकाश्वत्थभूषितम् ॥६॥ उत्फुल्लकुसुमोपेतमृषिसङ्घनिषेवितम् । वेदशास्त्रमहाघोषमाश्रमं प्राविशद्भृगोः ॥७॥ गृणन्तं परमं ब्रह्मावृतं शिष्यगणैर्मुनिम् । तेजसा सूर्यसदृशं भृगुं तत्र ददर्श सः ॥८॥ प्रणनामार्थ विप्रेन्द्रं पादसंग्रहणादिना । आतिथ्यं भृगुरप्यस्य चक्रे सम्मानपूर्वकम् ॥९॥ कृतातिथ्यक्रियो राजा भृगुणा परमर्षिणा । उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा विनयान्मुनिपुङ्गवम् ॥१०॥ भगीरथ उवाच भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । पृच्छामि भवभीतोऽहं नृणामुद्धारकारणम् ॥११॥ भगवांस्तुष्यते येन कर्मणा मुनिसत्तम । तन्ममाख्याहि सर्वज्ञ अनुग्राह्योऽस्मि ते यदि ॥१२॥ भृगुरुवाच राजंस्तवेप्सितं ज्ञातं त्वं हि पुण्यवतां वरः । अन्यथा स्वकुलं सर्वं कथमुद्धर्त्तुमर्हसि ॥१३॥ यो वा को वापि भूपाल स्वकुलं शुभकर्मणा । उद्धर्त्तुकामस्तं विद्यान्नररूपधरं हरिम् ॥१४॥ कर्मणा येन देवेशो नृणामिष्टफलप्रदः । तत्प्रवक्ष्यामि राजेन्द्र शृणुष्व सुसमाहितः ॥१५॥ भव सत्यपरो राजन्न हिंसानिरतस्तथा । सर्वभूतहितो नित्यं मानृतं वद वै क्वचित् ॥१६॥

करने वाले पक्षियों की मधुर ध्वनि से वह आश्रम मुखरित था । कहीं एक ओर वराहयूथ इधर-उधर घूम रहे हैं तो कहीं चँवरी गायें अपनी मनोहर पूंछों को हिला रही हैं ॥२-४॥ नाचते हुए मयूरों और सारंगपक्षियों से वह वन सुशोभित है । जहाँ मुनि-कन्याओं ने बड़े आदर से सींच-सींचकर वट आदि वृक्षों को बड़ा बनाया है । शाल, ताल और तमाल वृक्षों से वह आश्रम व्याप्त है । हिंताल से युक्त वह मालती, जूही, कुंद, चंपा और पीपल के वृक्षों से सुशोभित है ॥५-६॥ ऐसे पुष्पित कुसुमों, तेजस्वी ऋषियों से व्याप्त उस भृगु के आश्रम में भगीरथ ने प्रवेश किया जहाँ चारों ओर वेद और शास्त्रों की ही ध्वनि सुनाई पड़ रही थी । उस आश्रम में राजा अपने तेज से सूर्य के समान भृगु मुनि को देखा जिनके चारों ओर परम ब्रह्म की चर्चा में लीन शिष्य-गण उपस्थित थे । मुनि को देखकर राजा ने चरणों पर गिर कर उस विप्रेन्द्र को प्रणाम किया, भृगु ने भी सम्मानपूर्वक राजा का आतिथ्य सत्कार किया । परम ऋषि भृगु का आतिथ्य स्वीकार करने के अनन्तर राजा हाथ जोड़कर विनत-भाव से मुनिपुंगव भृगु से बोला ॥७-१०॥ भगीरथ बोले - भगवन् ! सर्वधर्मज्ञ ! सर्वशास्त्रविशारद ! सांसारिक दुःखों से भयभीत मैं मनुष्यों के उद्धार का मार्ग पूछ रहा हूँ । यदि आप का मेरे ऊपर अनुग्रह है तो हे मुनिश्रेष्ठ ! सर्वज्ञ ! आप जिन कर्मों से भगवान् सन्तुष्ट होते हैं उनकी कृपा कर मुझको बतलाइये मैं आपका कृपापात्र हूँ ॥११-१२॥ भृगु बोले-राजन् ! मैंने तुम्हारा अभिप्राय समझ लिया । तुम पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ हो, अन्यथा अपने कुल का उद्धार करने के लिये कैसे प्रस्तुत होते ? भूपाल ! जो कोई मनुष्य अपने शुभ कर्मों से अपने कुल का उद्धार करना चाहता है उसको नररूपधारी हरि समझना चाहिए । राजेन्द्र ! जिन कर्मों से प्रसन्न होकर देवेश मनुष्यों को इष्ट फल प्रदान करते हैं, उनको बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनो । राजन् ! सत्यवादी बनो, सर्वदा अहिंसा का पालन करो, सारे प्राणियों के उपकार में ही लीन रहो और कभी भी कहीं पर असत्य वचन मत