बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशोऽध्यायः १२१ त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम् । कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर विष्णुं सनातनम् ॥१७॥ कुरु पूजां महाविष्णोर्याहि शान्तिमनुत्तमाम् । द्वादशाष्टाक्षरं मन्त्रं जप श्रेयो भविष्यति ॥१८॥ भगीरथ उवाच सत्यं तु कीदृशं प्रोक्तं सर्वभूतहितं मुने । अनृतं कीदृशं प्रोक्तं दुर्जनाश्चापि कीदृशाः ॥१९॥ साधवः कीदृशाः प्रोक्तास्तथा पुण्यं च कीदृशम् । स्मर्तव्यश्च कथं विष्णुस्तस्य पूजा च कीदृशी ॥२०॥ शान्तिश्च कीदृशी प्रोक्ता को मन्त्रोऽष्टाक्षरो मुने । को वा द्वादशवर्णश्च मुने तत्त्वार्थकोविद ॥२१॥ कृपां कृत्वा मयि परां सर्वं व्याख्यातुमर्हसि । भृगुरुवाच साधु साधु महाप्राज्ञ तव बुद्धिरनुत्तमा । ॥२२॥ यत्पृष्टोऽहं त्वया भूप तत्सर्वं प्रवदामि ते । यथार्थकथनं यत्तत्सत्त्वमाहुर्विपश्चितः ॥२३॥ धर्माविरोधतो वाच्यं तद्धि धर्मपरायणैः । देशकालादि विज्ञाय स्वधमस्याविरोधतः ॥२४॥ यद्वचः प्रोच्यते सद्भिस्तत्सत्यमभिधीयते । सर्वेषामेव जंतूनामक्लेशजननं हि तत् ॥२५॥ अहिंसा सा नृप प्रोक्ता सर्वकामप्रदायिनी । कर्मकार्यसहायत्वमकार्यपरिपन्थिना ॥२६॥ सर्वलोकहितत्वं वै प्रोच्यते धर्मकोविदैः । इच्छानुवृत्तकथनं धर्माधर्मविवेकिनः ॥२७॥ अनृतं तद्धि विज्ञेयं सर्वश्रेयोविरोधि तत् । ये लोके द्वेषिणो मूर्खाः कुमार्गरतबुद्धयः ॥२८॥ ते राजन्दुर्जंना ज्ञेयाः सर्वधर्मबहिष्कृताः । धर्माधर्मविवेकेन वेदमार्गानुसारिणः ॥२६॥
बोलो । दुर्जन का संग छोड़ दो, साधुओं की संगति करो, रात दिन पुण्य कार्य करो सनातन विष्णु का स्मरण निरन्तर करो । महाविष्णु को पूजा करो शान्ति प्राप्त करोगे । द्वादशाक्षर (ओं नमो भगवते वासुदेवाय) और अष्टाक्षर मंत्र (ओं नमो वासुदेवाय) का जप करो तुम्हें श्रेय प्राप्त होगा ॥१३-१८॥ भगीरथ बोले--मुने ! सत्य का स्वरूप कैसा कहा गया है ? सर्व-प्राणि-हित क्या है ? अनृत किसे कहते हैं ? दुर्जनों की परिभाषा क्या है ? साधु किसे कहते हैं ? पुण्य कैसा होता है ? विष्णु का स्मरण किस प्रकार करना चाहिए ? उनकी पूजा को विधि क्या है ? शान्ति किसे कहते हैं ? अष्टाक्षर मन्त्र कौन सा है ? द्वादशवर्ण मन्त्र कौन है ? मुने ! तत्त्वार्थ के ज्ञाता ! मुझ पर अत्यधिक कृपा कर इन विषयों की व्याख्या कीजिए ॥१९-२१॥ भृगुजी बोले--महाप्राज्ञ ! धन्य हो, धन्य हो, तुम्हारी बुद्धि असाधारण है । तुमने जो कुछ मुझसे पूछा है उसको कह रहा हूँ। जो यथार्थ कथन है उसो को विद्वानों ने सत्य कहा है अर्थात् यथार्थ कथन को ही सत्य कहा जाता है । उस सत्य को धर्मपरायण व्यक्ति धर्म के अविरोध रूप से कहें । सज्जन व्यक्ति देश काल का ध्यान रखकर समन्वयात्मक दृष्टि से जो कुछ कहते हैं वही सत्य कहा जाता है। नृप ! सब प्राणियों को जिस कार्य से कष्ट न हो उसी को सब अभीष्ट वस्तुओं को देने वाली अहिंसा कहा गया है ॥२२-२५॥ धर्मतत्त्व के मर्मज्ञ जन लोक-व्यवहार में जिससे सहायता मिले और लोक-विरोध जिससे शान्त हो उसी को सर्वलोकहित कहते हैं । धर्म अधर्म का पूर्ण ज्ञान रखने वाले मनीषी जिसको अपने विवेक से अनुचित ठहराते हैं, उसको सब श्रेयसें को नष्ट करने वाला अनृत समझना चाहिए । राजन् ! इस संसार में जो द्वेष करने वाले, मूर्ख, कुमार्ग में ही सर्वदा लीन रहने वाले हैं, उन सब धर्मों से पराङ्मुख रहनेवालों को ही दुर्जन समझना चाहिए ॥२६-२८॥ धर्माधर्म के विवेक से वेदमार्ग का अनुसरण करने वाले और लोक-हितों में लगे रहने वाले व्यक्ति ही साधु माने जाते हैं। हरिभक्ति १६-नारदीयपुराण