बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२२ नारदीयपुराणम् सर्वलोकहितासक्ताः साधवः परिकीर्तिताः । यत्तत्सद्भिborderश्च परिरञ्जितम् ॥३०॥ आत्मनः प्रीतिजनकं तत्पुण्यं परिकीर्तितम् । सर्वं जगदिदं विष्णुर्विष्णुः सर्वस्य कारणम् ॥३१॥ अहं च विष्णुर्यज्ज्ञानं तद्विष्णुस्मरणं विदुः । सर्वदेवमयो विष्णुर्विधिना पूजयामि तम् ॥३२॥ इति या भवति श्रद्धा सा तद्भक्तिः प्रकीर्तिता । सर्वभूतमयो विष्णुः परिपूर्णः सनातनः ॥३३॥ इत्यभेदेन या बुद्धिः समता सा प्रकीर्तिता । समता शत्रुमित्रेषु वशित्वं च तथा नृप ॥३४॥ यदृच्छालाभसंतुष्टिः सा शान्तिः परिकीर्तिता । एते सर्वे समाख्यातास्तपःसिद्धिप्रदा नृणाम् ॥३५॥ समस्तपापराशीनां तरसा नाशहेतवः । अष्टाक्षरं महामन्त्रं सर्वपापप्रणाशनम् ॥३६॥ वक्ष्यामि तव राजेन्द्र पुरुषार्थैकसाधनम् । विष्णोः प्रियकरं चैव सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥३७॥ नमो नारायणायेति जपेत्प्रणवपूर्वकम् । नमो भगवते प्रोच्य वासुदेवाय तत्परम् ॥३८॥ प्रणवाद्यं महाराज द्वादशार्णमुदाहृतम् । द्वयोः समं फलं राजन्नष्टदशावर्णयोः ॥३९॥ प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च साम्यमुद्दिष्टमेतयोः । शङ्खचक्रधरं शान्तं नारायणमनामयम् ॥४०॥ लक्ष्मीसंश्रितवामाङ्कं तथाभयकरं प्रभुम् । किरीटकुण्डलधरं नानामण्डनशोभितम् ॥४१॥ भ्राजत्कौस्तुभमालाढ्यं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम् । पीताम्बरधरं देवं सुरासुरनमस्कृतम् ॥४२॥ ध्यायेदनादिनिधनं सर्वकामफलप्रदम् । अन्तर्यामी ज्ञानरूपी परिपूर्णः सनातनः ॥४३॥ एतत्सर्वं समाख्यातं यत्तु पृष्टं त्वया नृप । स्वस्ति तेऽस्तु तपःसिद्धिं गच्छ लब्धुं यथासुखम् ॥४४॥ एवमुक्तो महीपालो भृगुणा परमर्षिणा । परमां प्रीतिमापन्नः प्रपेदे तपसे वनम् ॥४५॥
की ओर मन को प्रेरित करने वाले, सज्जनों को आनन्दित करने वाले और अपने को आनन्द देने वाले जो शुभ कर्म हैं, वे पुण्य कहे गए हैं । सारा विश्व विष्णु है विष्णु ही सब के कारण हैं। मैं स्वयं विष्णु हूँ, ऐसे ज्ञान को ही विष्णु स्मरण कहा जाता है । 'विष्णु सर्वदेवमय हैं । उनकी विधिपूर्वक पूजा करूँगा' इस प्रकार की जो श्रद्धा होती है उसी को भक्ति कहा जाता है ॥२९-३२॥ 'विष्णु सब पदार्थों में व्याप्त हैं, परिपूर्ण और सनातन हैं, ऐसी जो विश्व और विष्णु में अभेद बुद्धि है, उसी को समता कहते हैं । नृप ! शत्रु और मित्र में समान भाव रखना, आत्मसंयम और जो कुछ मिल जाय उसी पर प्रसन्न रहना ही शान्ति कही जाती है । ये सभी धर्म मनुष्यों के लिए तपस्या के समान सिद्धिप्रद बतलाये गए हैं ॥३३-३५॥ हठात् सम्पूर्ण पापराशि को नष्ट करने वाला अष्टाक्षर नामक महामन्त्र है । राजेन्द्र ! पुरुषार्थ के एक मात्र साधन, सब सिद्धियां देने वाले और भगवान् के परम प्रिय मन्त्र को कह रहा हूँ । प्रणव पूर्वक 'नमो नारायणाय' मन्त्र को जपना चाहिए । प्रणव (ओं) आदि में लगाकर 'नमो भगवते' कहने के पश्चात् वासुदेवाय का उच्चारणकरे । महाराज ! इसी को द्वादशाक्षर मन्त्र कहा जाता है । राजन् ! इन द्वादशाक्षर और अष्टाक्षर मन्त्रों का समान फल कहा गया है ॥३६-३९॥ ये प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों मार्गों के लिये समान रूप से साधक हैं । शंख-चक्र-धारी, शान्त, निर्विकार, नारायण, लक्ष्मी से सुशोभित वाम भाग वाले, अभय प्रद, प्रभु, किरीट-कुण्डल-धारी, अनेक प्रकार से सुसज्जित, कौस्तुभधारी और अनेक मालाओं से विभूषित, श्रीवत्स से सुशोभित वक्षःस्थल वाले, पीताम्बरधारी, सुर और असुरों से पूजित, अनादि, अनन्त और सब मनोरथों को देने वाले भगवान् विष्णु का ध्यान करे । भगवान् अन्तर्यामी, ज्ञानस्वरूप, परिपूर्ण और सनातन हैं । ॥४०-४३॥ नृप ! तुमने जो कुछ पूछा उसके विषय में ये सारी बातें बता दी गयीं । तुम्हारा कल्याण हो । अब सुख पूर्वक तपः सिद्धि प्राप्त करने के लिये जाओ । परम ऋषि भृगु की ऐसी आज्ञा और आशीर्वाद सुनकर राजा अति प्रसन्न हो गया और तपस्या के लिये वन में गया । हिमालयपर्वत के एक