बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 142, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंषोडशोऽध्यायः १२३ हिमवद्गिरिमासाद्य पुण्यदेशे मनोहरे । नादेश्वरे महाक्षेत्रे तपस्तेपेऽतिदुश्चरम् ॥४६॥ राजा त्रिषवणस्नायी कन्दमूलफलाशनः । कृतातिथ्यर्हणश्चापि नित्यं होमपरायणः ॥४७॥ सर्वभूतहितः शान्तो नारायणपरायणः । पत्रैः पुष्पैः फलैस्तोयैस्त्रिकालं हरिपूजकः ॥४८॥ एवं बहुतित्थं कालं नीत्वा चात्यन्तधैर्यवान् । ध्यायन्नारायणं देवं शीर्णपर्णाशनोऽभवत् ॥४६॥ प्राणायामपरो भूत्वा राजा परमधार्मिकः । निरुच्छ्वासं तपस्तप्तुं ततः समुपचक्रमे ॥५०॥ ध्यायन्नारायणं देवमनन्तमपराजितम् । षष्टिवर्षसहस्राणि निरुच्छ्वासपरोऽभवत् ॥५१॥ तस्य नासापुटाद्राज्ञो वह्निर्जज्ञे भयंकरः । तं दृष्ट्वा देवताः सर्वे वित्रस्ता वह्नितापिताः ॥५२॥ अभिजग्मुर्महाविष्णुं यत्रास्ते जगतां पतिः । क्षीरोदस्योत्तरं तीरं संप्राप्य त्रिदशेश्वराः । अस्तुवन्देवदेवेशं शरणागतपालकम् ॥५३॥ देवा ऊचुः नता. स्म विष्णुं जगदेकनाथं स्मरत्समस्तार्तिहरं परेशम् । स्वभावशुद्धं परिपूर्णभावं वदन्ति यज्ज्ञानतनुं च तज्ज्ञाः ॥५४॥ ध्येयः सदा योगिवरैर्महात्मा स्वेच्छाशरीरैः कृतदेवकार्यः । जगत्स्वरूपो जगदादिनाथस्तस्मै नताः स्मः पुरुषोत्तमाय ॥५५॥ यन्नामसंकीर्त्तनतो खलानां समस्तपापानि लयं प्रयान्ति । तमीशमीड्यं पुरुषं पुराणं नताः स्म विष्णुं पुरुषार्थसिद्धयै ॥५६॥
मनोहर पुण्य भूमि नादेश्वर नामक क्षेत्र में अति दुष्कर तप करने लगा ।।४४-४६।। राजा त्रिकाल स्नान करता और कन्द मूल फल खाकर समय बिताता था । नित्य प्रति अतिथिसंवा और हवन करता था । प्राणियों का हितैषी, शान्त और नारायण का सेवक वह पत्र, पुष्प और फल से तीनों काल हरि की पूजा किया करता था । इस प्रकार परम धीर उस राजा ने बहुत समय व्यतीत किया । तदनन्तर नारायण देव का ध्यान करता हुआ पेड़ से गिरी हुई पत्तियों को चुन चुन कर खाने लगा । पुनः इससे भी सन्तोष न पाकर वह परम धार्मिक राजा प्राणायाम साधना करता हुआ श्वास रोक कर तपस्या करने लगा । ।।४७-५०।। इस प्रकार साठ हजार वर्षों तक अनन्त, अपराजित नारायण देव का श्वास निरोध पूर्वक ध्यान करता रहा । अन्त में उस राजा के नथने से भयंकर ज्वाला उत्पन्न हुई । उसको देखकर सभी देवता भयत्रस्त हो गये, वे अग्निज्वाला से सन्तप्त होकर वहाँ गये जहाँ जगन्नाथ महाविष्णु थे । देवता क्षीरसागर के उत्तर तीर पर जाकर शरणागतरक्षक देवदेवेश की स्तुति करने लगे ।।५१-५३।। देवगण बोले-- संसार के एकमात्र प्रभु, स्मरण मात्र से समस्त पीड़ाओं को दूर करने वाले, स्वभावशुद्ध और परम पूर्ण स्वरूप विष्णु को नमस्कार करते हैं । जिसको ब्रह्मज्ञानी ज्ञान रूप कहते हैं। अपनी इच्छा से शरीर धारण कर (अवतार लेकर) जो देवों का कार्य किया करते, जिस महात्मा का सर्वदा ध्यान करते, जो जगत्स्वरूप और संसार के आदि नाथ हैं उस पुरुषोत्तम को नमस्कार है । जिसके नाम-कीर्तन से समस्त पाप विनष्ट हो जाते हैं उस पूज्य परमेश पुराण पुरुष को अपनी कामना सिद्धि के लिए प्रणाम करते हैं । ।।५४-५६।। जिसके प्रकाश से सूर्य, चन्द्र आदि सर्वदा प्रकाश पूर्ण रहते और जिसके आदेश का कभी भी उल्लंघन नहीं करते उस पुरुषार्थस्वरूप, देवेश कलात्मक विष्णु को हम नमस्कार करते हैं । जिसके अनुग्रह से कमलयोनि ब्रह्मा लोक-