बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 143, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंयतोजसा भान्ति दिवाकराद्या नातिक्रमन्त्यस्य कदापि शिक्षाः । कालात्मकं तं त्रिदशाधिनाथं नमामहे वै पुरुषार्थरूपम् ॥५७॥ जगत्करोऽत्यब्जभवोऽत्ति रुद्रः पुनाति लोकांञ्श्रुतिभिश्च विप्राः । तमादिदेवं गुणसन्निधानं सर्वोपदेष्टारमिताः शरण्यम् ॥५८॥ वरं वरेण्यं मधुकैटभारिं सुरासुरार्चितपादपीठम् । सद्भक्तसंकल्पितसिद्धिहेतुं ज्ञानेकवेद्यं प्रणताः स्म देवम् ॥५९॥ अनादिमध्यान्तमजं परेशमनाद्यविद्याख्यतमोविनाशम् । सच्चित्परानन्दघनस्वरूपं रूपादिहीनं प्रणताः स्म देवम् ॥६०॥ नारायणं विष्णमनन्तमेशं पीताम्बरं पद्मभवादिसेव्यम् । यज्ञप्रियं यज्ञकरं विशुद्धं नताः स्म सर्वोत्तमाव्ययं तम् ॥६१॥ इति स्तुतो महाविष्णुर्देवैरिन्द्रादिभिस्तदा । चरितं तस्य राजर्षेर्देवानां संन्यवेदयत् ॥६२॥ ततो देवान्समाश्वास्य दत्त्वाभयमनञ्जनः । जगाम यत्र राजर्षिस्तपस्तपति नारद ॥६३॥ शङ्खचक्रधरो देवः सच्चिदानन्दविग्रहः । प्रत्यक्षतामगात्तस्य राज्ञः सर्वजगद्गुरुः ॥६४॥ तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं भाभासितदिगन्तरम् । अतसीपुष्पसंकाशं स्फुरत्कुण्डलमण्डितम् ॥६५॥ स्निग्धकुन्तलवक्त्राब्जं विभ्राजन्मुकुटोज्ज्वलम् । श्रीवत्सकौस्तुभधरं वनमालाविभूषितम् ॥६६॥ दीर्घबाहुमुदाराङ्गं लोकेशार्चितपत्कजम् । ननाम दण्डवद्भूमौ भूपतिर्नम्रकंधरः ॥६७॥ अत्यन्तहर्षसंपूर्णः सरोमाञ्चः सगद्गदः । कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति श्रीकृष्णति समुच्चरन् ॥६८॥ तस्य विष्णुः प्रसन्नात्मा हृन्तर्यामी जगद्गुरुः । उवाच कृपयाविष्टो भगवान्भूतभावनः ॥६९॥
सृष्टि करते, अतिरुद्र समस्त संसार को पवित्र करते, विप्रगण वेदमन्त्रों द्वारा जिसका स्तवन करते उस गुणनिधान सबको उपदेश देने वाले, आदि देव और शरणागतपालक की शरण में हम सभी देवता आये हुए हैं । ।।५७-५८।। वर, वरेण्य, मधुकैटभ के शत्रु, सद्भक्तों के मनोरथों को सिद्ध करने वाले ज्ञान से हो एक मात्र गम्य देव को नमस्कार है, जिसके चरणों को देव और असुर सभी पूजा करते हैं । अनादि, अमध्य, अनन्त, अज, परेश और अनादि अविद्या रूपी अन्धकार को नष्ट करने वाले, रूप रहित (निर्गुण) और सच्चिदानन्द घन स्वरूप देव को नमस्कार है । ।।५९-६०।। अनन्त, ईश, पीताम्बरधारी, ब्रह्मा, शिव आदि देव के पूज्य, यज्ञप्रिय, यज्ञकर, सर्वोत्तम, विशुद्ध और अव्यय देव को नमस्कार है । इस प्रकार इन्द्र सहित सब देवताओं ने महाविष्णु की स्तुति की और उस राजर्षि भगीरथ का चरित्र कह दिया । यह सुनकर निरंजन भगवान् ने देवों को आश्वासन दिया और अभयवर प्रदानकर वे स्वयं वहाँ गये जहाँ राजर्षि भगीरथ तपस्या कर रहे थे । ।।६१-६३।। नारद ! शंख चक्र धारी, सच्चिदानन्द स्वरूप और सब लोकों के गुरु जब उस राजा के समीप गये तब उस भूपति ने कमलनयन, अलसी के पुष्प समान मनोहर वर्णी अपनी प्रभा से समस्त दिङ्मण्डल को आलोकित करने वाले, वनमाला से विभूषित, महाबाहु, श्रीवत्स और कौस्तुभ से सुशोभित, लोकपालों से पूजित चरणकमल वाले उज्ज्वल मणि जटिल मुकुट से सुशोभित शिर वाले, प्रभा पूर्ण कुण्डलों से सुशोभित और उदार अंग वाले भगवान् को विनम्र भाव से दण्डवत् प्रणाम किया और अत्यन्त आनन्द से पुलकित होकर गद् गद् वाणी से कृष्ण !, कृष्ण ! कृष्ण ! श्रीकृष्ण !!! का उच्चारण किया । अन्तर्यामी, जगद्गुरु, भूतभावन भगवान् भगीरथ को भक्ति भावना को देखकर प्रसन्न होकर कृपा पूर्वक बोले ।।६४-६९।।