भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 1008 में से

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षोडशोऽध्यायः १२५ श्रीभगवानुवाच भगीरथ महाभाग तवाभीष्टं भविष्यति । आगमिष्यन्ति मल्लोकं तव पूर्वपितामहाः ॥७०॥ मम मूर्त्यन्तरं शम्भुं राजन्स्तोत्रैः स्वशक्तितः । स्तुहि ते सकलं कामं स वै सद्यः करिष्यति ॥७१॥ यस्तु जग्राह शशिनं शरणं समुपागतम् । तस्मादाराधयेशानं स्तोत्रैः स्तुत्यं सुखप्रदम् ॥७२॥ अनादिनिधनो देवः सर्वकामफलप्रदः । त्वया संपूजितो राजन्सद्यः श्रेयो विधास्यति ॥७३॥ इत्युक्त्वा देवदेवेशो जगतां पतिरच्युतिः । अन्तर्दधे मुनिश्रेष्ठ उत्तस्थौ सोऽपि भूपतिः ॥७४॥ किमिदं स्वप्न आहोस्वित्सत्यं साक्षाद्द्विजोत्तम । भूपतिर्विस्मयं प्राप्तः किं करोमीति विस्मितः ॥७५॥ अथान्तरिक्षे वागुच्चैः प्राह तं भ्रान्तचेतसम् । सत्यमेतदिति व्यक्तं न चिन्तां कर्तुमर्हसि ॥७६॥ तन्निशाम्यावनीपाल ईशानं सर्वकारणम् । समस्तदेवताराजमस्तोषीद् भक्तितत्परः ॥७७॥ भगीरथ उवाच प्रणमामि जगन्नाथं प्रणतार्तिप्रणाशनम् । प्रमाणागोचरं देवमीशानं प्रणवात्मकम् ॥७८॥ जगद्रूपमजं नित्यं सर्गस्थित्यंतकारणम् । विश्वरूपं विरूपाक्ष प्रणतोऽस्म्युग्ररेतसम् ॥७९॥ आदिमध्यान्तरहितमनन्तमजमव्ययम् । समामनन्ति योगीन्द्रास्तं वन्दे पुष्टिवर्धनम् ॥८०॥ नमो लोकाधिनाथाय वञ्चते परिवञ्चते । नमोऽस्तु नीलग्रीवाय पशूनां पतये नमः ॥८१॥ नमश्चैतन्यरूपाय पुष्टानां पतये नमः । नमोऽकल्पप्रकल्पाय भूतानां पतये नमः ॥८२॥ नमः पिनाकहस्ताय शूलहस्ताय ते नमः । नमः कपालहस्ताय पाशमुद्गरधारिणे ॥८३॥ भगवान् बोले-भगीरथ ! महाभाग ! तुम्हारी मनःकामना सिद्ध होगी और तुम्हारे पूर्वज पितामह मेरे लोक को अवश्य प्राप्त करेंगे । परन्तु राजन् ! तुम अपनी शक्ति के अनुसार मेरी अपर मूर्ति शंकर की स्तोत्रों से स्तुति करो । वे तुम्हारे सब मनोरथों को तत्काल पूर्ण करेंगे । जिसने शरणागत चन्द्रमा को शरण दी, उस सुखप्रद, पूज्य ईशानदेव की आराधना करो ॥७०-७२॥ वे अनादि और अनन्त देव सब मनोरथों को पूर्ण करने वाले हैं । राजन् ! तुम्हारी पूजा से प्रसन्न होकर वे शीघ्र तुम्हें कल्याण प्रदान करेंगे । यह कह कर जगत्पति, अच्युत, देवदेवेश अन्तर्हित हो गये और मुनिश्रेष्ठ ! वह भूपति भी उठा और आश्चर्य चकित होकर सोचने लगा कि यह सत्य है या स्वप्न ! अब क्या करूं ? इस प्रकार वह अत्यन्त विस्मित हो गया । भ्रान्त राजा को इस प्रकार आकाशवाणी सुनाई पड़ी कि यह सत्य है, इस विषय में चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं । आकाशवाणी सुनकर भूमिपाल भगीरथ सबके एक मात्र कारण सब देवताओं के स्वामी ईशान की भक्ति पूर्वक स्तुति करने लगे ॥७३-७७॥ भगीरथ बोले- जगन्नाथ ! भक्तों की पीड़ा दूर करने वाले, (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द) प्रमाणों से परे और ओंकार रूप ईशान देव को प्रणाम करता हूँ । जगत्स्वरूप, अज, नित्य, सृष्टि, स्थिति और प्रलय करने वाले, विश्वरूप, विरूपाक्ष और उग्रवीर्य को प्रणाम है । आदि, मध्य और अन्त से हीन, अनन्त, अज, अव्यय और योगीन्द्र लोग जिसकी वन्दना करते हैं, उस पुष्टिवर्धन को नमस्कार है । लोकाधिनाथ और लोक को मायावश करने वाले परम वंचक को नमस्कार है । नीलग्रीव को नमस्कार है । पशुपति को नमस्कार है ॥७८- ८१॥ चैतन्यरूप शिव को नमस्कार है। पुष्टों (भूतों) के पति को नमस्कार है । कल्प के रचयिता को नमस्कार है । भूतों के पति को नमस्कार है । पिनाकपाणि को नमस्कार है । शूलहस्त को नमस्कार है । कपालपाणि को नमस्कार है । पाश और मुद्गर धारण करने वाले को प्रणाम है । सर्वभूत को नमस्कार है । घंटाहस्त को

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