बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२६ नारदीयपुराणम् नमस्ते सर्वभूताय घण्टाहस्ताय ते नमः । नमः पञ्चास्यदेवाय क्षेत्राणां पतये नमः ॥८४॥ नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते । अनेकरूपरूपाय निर्गुणाय परात्मने ॥८५॥ नमोगणाधिदेवाय गणानां पतये नमः । नमो हिरण्यगर्भाय हिरण्यपतये नमः ॥८६॥ हिरण्यरेतसे तुभ्यं नमो हिरण्यबाहवे । नमो ध्यानस्वरूपाय नमस्ते ध्यानसाक्षिणे ॥८७॥ नमस्ते ध्यानसंस्थाय ध्यानगम्याय ते नमः । येनेदं विश्वमखिलं चराचरविराजितम् ॥८८॥ वर्षेवाभ्रेण जनितं प्रधानपुरुषात्मना ॥८९॥ स्वप्रकाशं महात्मानं परं ज्योतिः सनातनम् । यमामनन्ति तत्त्वज्ञाः सवितारं नृचक्षुषाम् ॥९०॥ उमाकांतंनन्दिकेशं नीलकण्ठं सदाशिवम् । मृत्युंजयं महादेवं परात्परतरं विभुम् ॥९१॥ परं शब्दब्रह्मरूपं तं वन्देऽखिलकारणम् । कपर्दिने नमस्तुभ्यं सद्योजाताय वै नमः ॥९२॥ भवोद्भवाय शुद्धाय ज्येष्ठाय च कनीयसे । मन्यवे त इषे वध्याः पतये यज्ञतन्तवे ॥९३॥ ऊर्जे दिशां च पतये कालायाघोररूपिणे । कृशानुरेतसे तुभ्यं नमोऽस्तु सुमहात्मने ॥९४॥ यतः समुद्राः सरितोऽद्रयश्च गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घाः । स्थाणुर्चरिष्णुर्महदल्पकं च असच्च सञ्जीवमजीवमास ॥९५॥ नतोऽस्मि तं योगिनतांघ्रिपद्मं सर्वान्तरात्मानमरूपमीशम् । स्वतंत्रमेकं गुणिनां गुणं च नमामि भूयः प्रणमामि भूयः ॥९६॥ इत्थं स्तुतो महादेवः शंकरो लोकशंकरः । आविर्बभूव भूपस्य संतप्ततपसोग्रतः ॥९७॥ पञ्चवक्त्रं दशभुजं चन्द्रार्द्धकृतशेखरम् । त्रिलोचनमुदाराङ्गं नागयज्ञोपवीतिनम् ॥९८॥ नमस्कार है। पाँच मुख वाले को नमस्कार है। क्षेत्रों के पति को नमस्कार है ॥८२-८४॥ भू को धारण करने वाले और समस्त भूतों के आदि भूत को नमस्कार है। अनेक अनेक रूपों को धारण करने वाले, निर्गुण, परात्मन्, गणाधि- देव को नमस्कार है। गणों के स्वामी को नमस्कार है। हिरण्यगर्भ को नमस्कार है। हिरण्यपति को नमस्कार है। हिरण्यरेतस् तुमको नमस्कार है। हिरण्यबाहु के लिए नमस्कार है। ध्यानस्वरूप को नमस्कार है। ध्यान- साक्षी को नमस्कार है। ध्यानस्थ को नमस्कार है। ध्यानगम्य को नमस्कार है। जिससे यह अखिल चराचरा- त्मक जगत् व्याप्त है ॥८५-८८॥ जिस जगत् को प्रधान पुरुष (शिव) ने मेघों से उत्पन्न वर्षा की भाँति उत्पन्न किया, उसको नमस्कार है। स्वप्रकाश, परं ज्योति, सनातन, महात्मा और जो मनुष्यों के नेत्र हैं उस सविता सूर्य को नमस्कार है। उमाकान्त, नन्दिकेश, नीलकण्ठ, सदाशिव, मृत्युंजय, महादेव, परात्पर, विभु, वाणी से अगोचर और अखिल सृष्टि के कारण ब्रह्म की वन्दना करता हूँ। कपर्दी ! तुमको नमस्कार है। सद्यःजात को नमस्कार है ॥८९-९२॥ भव के आदि कारण, शुद्ध, ज्येष्ठ, सबसे छोटे, क्रोधस्वरूप, सर्वव्यापक, वेदपति, यज्ञ के प्रवर्द्धक, ऊर्ज (बल), दिक्पति, काल, अघोर रूप, अग्निरेतस् और महात्मा तुमको नमस्कार है। समुद्र, नदियाँ, पहाड़, गन्धर्व, यक्ष, असुर, सिद्धसंघ, चर, स्थावर, महान्, लघु, असत् और सत् भी जिससे उत्पन्न हुए हैं, उस सर्वान्तरात्मा, अरूप, ईश, स्वतन्त्र, एक, गुणशील और गुणरूप शंकर को प्रणाम करता हूँ। जिसके चरणकमलों में योगी जन नतमस्तक रहते हैं, ऐसे देव को पुनः-पुनः प्रणाम करता हूँ ॥९३-९६॥ लोककल्याणकारी शंकर की इस प्रकार स्तुति करने पर शंकर जी उस तपोजर्जर भूप के सामने प्रकट हुए। नारद ! इस प्रकार पंचमुख, दशभुज, द्वितीया के चन्द्रमा को शिर पर धारण किये, त्रिनेत्र, उदाररूप, सर्प का यज्ञोपवीत पहने हुए, विशाल वक्षःस्थल वाले, कैलाश के समान गौर वर्ण, गज-