बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशोऽध्यायः। १२७ विशालवक्षसं देवं तुहिनाद्रिसमप्रभम् । गजचर्माम्बरधरं सुरार्चितपदाम्बुजम् ॥९६॥ दृष्ट्वा पपात पादाग्रे दण्डवद्भुवि नारद । तत उत्थाय सहसा शिवाग्रे विहिताञ्जलिः ॥१००॥ प्रणनाम महादेवं कीर्तयन्शंकराद्वयम् । विज्ञाय भक्तिं भूपस्य शंकरः शशिशेखरः ॥१०१॥ उवाच राज्ञे तुष्टोऽस्मि वरं वरय वाञ्छितम् । तोषितोऽस्मि त्वया सम्यक् स्तोत्रेण तपसा तथा ॥१०२॥ एवमुक्तः स देवेन राजा संतुष्टमानसः । उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा जगतामीश्वरेश्वरम् ॥१०३॥ भगीरथ उवाच अनुग्राह्योऽस्मि यदि ते वरदानान्महेश्वर । तदा गङ्गां प्रयच्छास्मत्पितॄणां मुक्तिहेतवे ॥१०४॥ श्रीशिव उवाच दत्ता गङ्गा मया तुभ्यं पितॄणां ते गतिः परा । तुभ्यं मोक्षः परश्चेति तमुक्त्वान्तर्दधे शिवः ॥१०५॥ कपर्दिनो जटास्रस्ता गङ्गा लोकैकपाविनी । पावयन्ती जगत्सर्वमन्वगच्छद्भगीरथम् ॥१०६॥ ततः प्रभृति सा देवी निर्मला मलहारिणी । भागीरथीति विख्याता त्रिषु लोकेष्वभून्मुने ॥१०७॥ सगरस्यात्मजाः पूर्वं यत्र दग्धाः स्वपाप्मना । तं देशं प्लावयामास गङ्गा सर्वसरिद्वरा ॥१०८॥ यदा संप्लावितं भस्म सागराणां तु गङ्गया । तदैव नरके मग्ना उद्धृताश्च गतैमसः ॥१०६॥ पुरा संक्रुध्यमानेन ये यमेनातिपीडिताः । त एव पूजितास्तेन गङ्गाजलपरिप्लुताः ॥११०॥ गतपापान्स विज्ञाय यमः सगरसंभवान् । प्रणम्याभ्यर्च्य विधिवत्प्राह तान्प्रीतमानसः ॥१११॥ भो भो राजसुता यूयं नरकाद् भृशदारुणात् । मुक्ता विमानमारुह्य गच्छध्वं विष्णुमन्दिरम् ॥११२॥ इत्युक्तास्ते महात्मानो यमेन गतकल्मषाः । दिव्यदेहधरा भूत्वा विष्णुलोकं प्रपेदिरे ॥११३॥ चर्म का वस्त्र धारण करने वाले और सुरों से पूजित चरण वाले भगवान् शंकर को सामने उपस्थित देखकर भगीरथ ने दण्डवत् प्रणाम किया । तत्पश्चात् शीघ्र उठकर शंकर के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए ॥६७-१००॥ महादेव शंकर का गुणगान करते हुए बार-बार प्रणाम करने लगे । चन्द्रशेखर शंकर राजा की भक्ति देखकर बोले, राजन् ! प्रसन्न हूँ, अभीष्ट वर माँगो, तुम्हारी स्तुति और तपस्या के वशीभूत हूँ। भगवान् शंकर की ऐसी बातें सुनकर राजा संतुष्ट हो गया । उसने हाथ जोड़कर जगदीश्वर से बोला—महेश्वर ! यदि आप वरदान के द्वारा मुझे अनुगृहीत करना चाहते हैं तो कृपा कर मुझे गंगाजी को दे दें जिनसे मेरे मृत पितरों को मुक्ति प्राप्त हो ॥१०१-१०४॥ शिव बोले—मैने तुमको गंगा दे दी, जिससे तुम्हारे पितरों को परमगति की प्राप्ति होगी, तुम्हें भी परम मोक्ष प्राप्त होगा, ऐसा वर देकर शिव अन्तर्हित हो गए । तदनन्तर कपर्दी शंकर की जटा से निकलकर लोक को पवित्र करने वाली गंगा सारे संसार को पवित्र करती हुई भगीरथ के पीछे-पीछे चलो । मुने ! उसी समय से वह मलहारिणी निर्मल गंगा इस त्रिभुवन में भागीरथी नाम से विख्यात हो गयीं ।१०५-१०७॥ परम पवित्र (श्रेष्ठ) नदी गंगा ने उस स्थान को जहाँ अपने पापों के कारण सगरपुत्र भस्म हो गए थे—जलमग्न कर दिया । ज्योंही गंगाजल से सगर पुत्रों के शरीर-भस्म का स्पर्श हुआ त्योंही नरक में डूबे हुए वे पापमुक्त हो कर स्वर्ग को चले गए । जिन सगर पुत्रों को यम ने क्रुद्ध होकर पीड़ा पहुँचाई थी, गंगाजल के स्पर्श से वे ही उनके द्वारा पूजे गए । यम ने सगर पुत्रों को पाप मुक्त जानकर उनकी विधिवत् पूजा की और प्रसन्न होकर कहा ॥१०८-१११॥ हे राजपुत्रो ! तुम लोग अब इस घोर दारुण नरक से मुक्त हो गए। इस विमान पर चढ़कर विष्णु- लोक को चले जाओ । महात्मा यम की बातों को सुनकर वे निष्पाप सगर-पुत्र दिव्यरूप धारणकर विष्णुलोक को