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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

षोडशोऽध्यायः। १२७ विशालवक्षसं देवं तुहिनाद्रिसमप्रभम् । गजचर्माम्बरधरं सुरार्चितपदाम्बुजम् ॥९६॥ दृष्ट्वा पपात पादाग्रे दण्डवद्भुवि नारद । तत उत्थाय सहसा शिवाग्रे विहिताञ्जलिः ॥१००॥ प्रणनाम महादेवं कीर्तयन्शंकराद्वयम् । विज्ञाय भक्तिं भूपस्य शंकरः शशिशेखरः ॥१०१॥ उवाच राज्ञे तुष्टोऽस्मि वरं वरय वाञ्छितम् । तोषितोऽस्मि त्वया सम्यक् स्तोत्रेण तपसा तथा ॥१०२॥ एवमुक्तः स देवेन राजा संतुष्टमानसः । उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा जगतामीश्वरेश्वरम् ॥१०३॥ भगीरथ उवाच अनुग्राह्योऽस्मि यदि ते वरदानान्महेश्वर । तदा गङ्गां प्रयच्छास्मत्पितॄणां मुक्तिहेतवे ॥१०४॥ श्रीशिव उवाच दत्ता गङ्गा मया तुभ्यं पितॄणां ते गतिः परा । तुभ्यं मोक्षः परश्चेति तमुक्त्वान्तर्दधे शिवः ॥१०५॥ कपर्दिनो जटास्रस्ता गङ्गा लोकैकपाविनी । पावयन्ती जगत्सर्वमन्वगच्छद्भगीरथम् ॥१०६॥ ततः प्रभृति सा देवी निर्मला मलहारिणी । भागीरथीति विख्याता त्रिषु लोकेष्वभून्मुने ॥१०७॥ सगरस्यात्मजाः पूर्वं यत्र दग्धाः स्वपाप्मना । तं देशं प्लावयामास गङ्गा सर्वसरिद्वरा ॥१०८॥ यदा संप्लावितं भस्म सागराणां तु गङ्गया । तदैव नरके मग्ना उद्धृताश्च गतैमसः ॥१०६॥ पुरा संक्रुध्यमानेन ये यमेनातिपीडिताः । त एव पूजितास्तेन गङ्गाजलपरिप्लुताः ॥११०॥ गतपापान्स विज्ञाय यमः सगरसंभवान् । प्रणम्याभ्यर्च्य विधिवत्प्राह तान्प्रीतमानसः ॥१११॥ भो भो राजसुता यूयं नरकाद् भृशदारुणात् । मुक्ता विमानमारुह्य गच्छध्वं विष्णुमन्दिरम् ॥११२॥ इत्युक्तास्ते महात्मानो यमेन गतकल्मषाः । दिव्यदेहधरा भूत्वा विष्णुलोकं प्रपेदिरे ॥११३॥ चर्म का वस्त्र धारण करने वाले और सुरों से पूजित चरण वाले भगवान् शंकर को सामने उपस्थित देखकर भगीरथ ने दण्डवत् प्रणाम किया । तत्पश्चात् शीघ्र उठकर शंकर के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए ॥६७-१००॥ महादेव शंकर का गुणगान करते हुए बार-बार प्रणाम करने लगे । चन्द्रशेखर शंकर राजा की भक्ति देखकर बोले, राजन् ! प्रसन्न हूँ, अभीष्ट वर माँगो, तुम्हारी स्तुति और तपस्या के वशीभूत हूँ। भगवान् शंकर की ऐसी बातें सुनकर राजा संतुष्ट हो गया । उसने हाथ जोड़कर जगदीश्वर से बोला—महेश्वर ! यदि आप वरदान के द्वारा मुझे अनुगृहीत करना चाहते हैं तो कृपा कर मुझे गंगाजी को दे दें जिनसे मेरे मृत पितरों को मुक्ति प्राप्त हो ॥१०१-१०४॥ शिव बोले—मैने तुमको गंगा दे दी, जिससे तुम्हारे पितरों को परमगति की प्राप्ति होगी, तुम्हें भी परम मोक्ष प्राप्त होगा, ऐसा वर देकर शिव अन्तर्हित हो गए । तदनन्तर कपर्दी शंकर की जटा से निकलकर लोक को पवित्र करने वाली गंगा सारे संसार को पवित्र करती हुई भगीरथ के पीछे-पीछे चलो । मुने ! उसी समय से वह मलहारिणी निर्मल गंगा इस त्रिभुवन में भागीरथी नाम से विख्यात हो गयीं ।१०५-१०७॥ परम पवित्र (श्रेष्ठ) नदी गंगा ने उस स्थान को जहाँ अपने पापों के कारण सगरपुत्र भस्म हो गए थे—जलमग्न कर दिया । ज्योंही गंगाजल से सगर पुत्रों के शरीर-भस्म का स्पर्श हुआ त्योंही नरक में डूबे हुए वे पापमुक्त हो कर स्वर्ग को चले गए । जिन सगर पुत्रों को यम ने क्रुद्ध होकर पीड़ा पहुँचाई थी, गंगाजल के स्पर्श से वे ही उनके द्वारा पूजे गए । यम ने सगर पुत्रों को पाप मुक्त जानकर उनकी विधिवत् पूजा की और प्रसन्न होकर कहा ॥१०८-१११॥ हे राजपुत्रो ! तुम लोग अब इस घोर दारुण नरक से मुक्त हो गए। इस विमान पर चढ़कर विष्णु- लोक को चले जाओ । महात्मा यम की बातों को सुनकर वे निष्पाप सगर-पुत्र दिव्यरूप धारणकर विष्णुलोक को

१२८ नारदीयपुराणम् एवं प्रभावा सा गङ्गा विष्णुपादाग्रसंभवा । सर्वलोकेषु विख्याता महापातकनाशिनी ॥११४॥ य इदं पुण्यमाख्यानं महापातकनाशनम् । पठेच्च शृणुयाद्वापि गङ्गास्नानफलं लभेत् ॥११५॥ यस्त्वेतत्पुण्यमाख्यानं कथयेद्ब्राह्मणाग्रतः । स याति विष्णुभवनं पुनरावृत्तिवर्जितम् ॥११६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गामाहात्म्ये भगीरथगङ्गानयनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥१६॥ सप्तदशोऽध्यायः ऋषय ऊचुः साधु सूत महाभाग त्वयातिकरुणात्मना । श्रावितं सर्वपापघ्नं गङ्गामाहात्म्यमुत्तमम् ॥१॥ श्रुत्वा तु गङ्गामाहात्म्यं नारदो देवदर्शनः । किं पप्रच्छ पुनः सूत सनकं मुनिसत्तमम् ॥२॥ सूत उवाच शृणुध्वमृषयः सर्वे नारदेन सुरर्षिणा । पृष्टं पुनर्यथा प्राह प्रवक्ष्यामि तथैव तत् ॥३॥ नानाख्यानेतिहासाढ्यं गङ्गामाहात्म्यमुत्तमम् । श्रुत्वा ब्रह्मसुतो भूयः पृष्टवानिदमादरात् ॥४॥ नारद उवाच अहोऽतिधन्यं सुकृतैकसारं श्रुतं मया पुण्यमसंवृतार्थम् गाङ्गेयमाहात्म्यमघप्रणाशि त्वत्तो मुने कारुणिकादभीष्टम् ॥५॥ चले गए। इस प्रकार के प्रभाव वाली और विष्णु चरणों से उत्पन्न होने वाली गंगा सब लोकों में महापातक- नाशिनी नाम से विख्यात हो गई। जो मनुष्य इस महापातकनाशक परमपुण्यप्रद आख्यान को सुनता है अथवा पाठ करता है वह गंगास्नान का फल प्राप्त करता है। जो इस पुण्य आख्यान को ब्राह्मणों को सुनाता है वह मुक्ति धाम विष्णु लोक को चला जाता है। ॥११२-११६॥ श्री बृहन्नारदीयपुराण के पूर्वभाग के प्रथम पाद में गंगामाहात्म्यवर्णन नामक सोलहवां अध्याय समाप्त ॥१६॥ अध्याय १७ उद्यापन सहित शुक्लपक्षीय द्वादशीव्रत-निरूपण ऋषिगण बोले—महाभाग ! धन्य हो, तुमने बड़ी कृपा की जो आज परम उत्तम तथा सब पापों को नष्ट करने वाला यह गंगा माहात्म्य सुना दिया। सूत ! देवदर्शन नारद जी ने गंगा-माहात्म्य सुनने के बाद पुनः मुनि- श्रेष्ठ सनक जी से क्या पूछा इसको अब बतलाओ। ॥१॥ सूतजी बोले—ऋषिगण ! सुनो। देवर्षिनारद ने पुनः जो कुछ पूछा और सनक जी ने जो कुछ उत्तर दिया, उसको पूर्णरूप से कह रहा हूँ। अनेकों इतिहास और आख्यानों से भरे उत्तम गंगा माहात्म्य को सुनकर ब्रह्मपुत्र नारद ने आदर पूर्वक सनक जी से पूछा—॥२-४॥ नारद जी बोले—अहा ! मुने ! आज मैंने परम कृपालु आप से धन्य, सम्पूर्ण सुकृतों का सारभूत, पवित्र,

१२६ सप्तदशोऽध्यायः ये साधवः साधु भजन्ति विष्णुं स्वार्थं परार्थं च यतन्त एव । नानोपदेशैः सुविमुग्धचित्तं प्रबोधयन्ति प्रसभं प्रसन्नम् ॥६॥ ततः समाख्याहि हरेर्व्रतानि कृतैश्च यैः प्रीतिमुपैति विष्णुः । ददाति भक्तिं भजतां दयालुर्मुक्तिस्तु तस्या विदिता हि दासी ॥७॥ ददाति मुक्तिं भजतां मुकुन्दो व्रतार्चनध्यानपरायणानाम् । भक्तानुसेवासु महाप्रयासं विमृश्य कस्यापि न भक्तियोगम् ॥८॥ प्रवृत्तं च निवृत्तं च यत्कर्म हरितोषणम् । तदाख्याहि मुनिश्रेष्ठ विष्णुभक्तोऽसि मानद ॥६॥ सनक उवाच साधु साधु मुनिश्रेष्ठ भक्तस्त्वं पुरुषोत्तमे । भूयो भूयो यतः पृच्छेश्र्चरित्रं शार्ङ्गधन्वनः ॥१०॥ व्रतानि ते प्रवक्ष्यामि लोकोपकृतिमन्ति च । प्रसीदति हरिर्यैस्तु प्रयच्छत्यभयं तथा ॥११॥ यस्य प्रसन्नो भगवान्यज्ञलिङ्गो जनार्दनः । इहामुत्र सुखं तस्य तपोवृद्धिश्च जायते ॥१२॥ येन केनाप्युपायेन हरिपूजापरायणाः । प्रयान्ति परमं स्थानमिति प्राहुर्महर्षयः ॥१३॥ मार्गशीर्षे सिते पक्षे द्वादश्यां जलशायिनम् । उपोषितोऽर्चयेत्सम्यङ् नरः श्रद्धासमन्वितः ॥१४॥ स्नात्वा शुक्लाम्बरधरो दन्तधावनपूर्वकम् । गन्धपुष्पाक्षतैर्धूपैर्दीपेर्नैवेद्यपूर्वकैः ॥१५॥ वाग्यतो भक्तिभावेन मुनिश्रेष्ठार्चयेद्धरिम् । केशवाय नमस्तुभ्यमिति विष्णुं च पूजयेत् ॥१६॥ अष्टोत्तरशतं हुत्वा वह्नौ घृततिलाहुतीः । रात्रौ जागरणं कुर्याच्छाालग्रामसमीपतः ॥१७॥ विशद फल देने वाला, अभीष्ट और पापनाशक गंगा का माहात्म्य सुना इससे कृतार्थ हो गया। जो साधु होते हैं वे विष्णु का अनन्य भाव से भजन करते हैं और अपने स्वार्थ (भक्ति) और परोपकार दोनों की सिद्ध करते हैं, वे अपने मनोहर उपदेशामृत से पामरजनों को भी प्रसन्न कर ज्ञान का ज्योति प्रदान करते हैं। अब इसके बाद भगवान् के उन व्रतों और अनुष्ठानों को कहिए जिससे भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। कृपालु भगवान् भजन करने वालों को अपनी भक्ति प्रदान करते हैं। मुक्ति भक्ति की दासी कही गयी है। मुकुन्द भगवान् व्रत, पूजा और ध्यानोपासना में लीन रहने वाले भक्त जनों को मुक्ति देते हैं। भक्तों की सेवा में महान् प्रयास करना पड़ता है ऐसा सोचकर वे भक्तियोग किसी को नहीं देते। मुनिशिरोमणि ! प्रवृत्त, निवृत्त और जिन कर्मों से भगवान् प्रसन्न होते हैं उन कर्मों को आप बतलाइए, मानद ! आप विष्णु भक्त हैं, आप ही इन बातों को जानते हैं ॥५-९॥ सनकजी बोले-मुनिश्रेष्ठ ! तुम धन्य हो, धन्य हो, तुम पुरुषोत्तम के अनन्य भक्त हो; क्योंकि बार- बार विष्णु के चरित्र को ही तुम पूछ रहे हो। तुमसे लोक के उपकार करनेवाले उन व्रतों को कह रहा हूँ जिनके अनुष्ठान से विष्णु प्रसन्न होते हैं और अभय वर प्रदान करते हैं। जिसके ऊपर यज्ञपुरुष जनार्दन प्रसन्न होते हैं, उसको लोक एवं परलोक में सुख तो मिलेगा ही है, साथ ही उसकी तपस्या भी अक्षय हो जाती है। जिस किसी प्रकार से भगवान् की पूजा में लीन रहने वाले व्यक्ति परम उत्तम लोक को पाते हैं, ऐसा ऋषियों ने कहा है ॥१०-१३॥ अगहन मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी को मनुष्य श्रद्धापूर्वक क्षीरशायी भगवान् की विधिपूर्वक अर्चा करें। पहले दन्तधावन आदि नित्यकर्मों को समाप्त कर स्नान करें और श्वेतवस्त्र धारणकर गंध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य से मौन होकर भक्तिपूर्वक हरि की पूजा करे । केशवाय नमस्तुभ्यम्, (केशव को नमस्कार है) इस मन्त्र से विष्णु की पूजा करनी चाहिए। तदनन्तर घृत और तिल की एक सौ आठ आहुतियाँ अग्नि में देनी चाहिए, रात में शालिग्राम के समीप ही जागरण करना चाहिए और फिर एक पसेरी दूध से निर्विकार १७-नारदीयपुराणम्

१३० नारदीयपुराणम् स्नापयेत्प्रस्थपयसा नारायणमनामयम् । गीतैर्वाद्यैश्च नैवेद्यैर्भक्ष्यभोज्यैश्च केशवम् ॥१७॥ त्रिकालं पूजयेद्भक्त्या महालक्ष्म्या समन्वितम् । पुनः कल्ये समुत्थाय कृत्वा कर्म यथोचितम् ॥१८॥ पूर्ववत्पूजयेद्देवं वाग्यतो नियतः शुचिः । पायसं घृतसंमिश्रं नारिकेरफलान्वितम् ॥२०॥ मन्त्रेणानेन विप्राय दद्याद्भक्त्या सदक्षिणम् । केशवः केशिहा देवः सर्वसंपत्प्रदायकः ॥२१॥ परमान्नप्रदानेन मम स्यादिष्टदायकः । ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाच्छक्तितो बन्धुभिः सह ॥२२॥ नारायणपरो भूत्वा स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः । इति यः कुरुते भक्त्या केशवार्चनमुत्तमम् ॥२३॥ स पौण्डरीकयज्ञस्य फलमष्टगुणं लभेत् । पौषमासे सिते पक्षे द्वादश्यां समुपोषितः ॥२४॥ नमो नारायणायेति पूजयेत्प्रयतो हरिम् । पयसा स्नाप्य नैवेद्यं पायसं च समर्पयेत् ॥२५॥ रात्रौ जागरणं कुर्यात्त्रिकालार्चनतत्परः । धूपैर्दीपैश्च नैवेद्यैर्गन्धैः पुष्पैर्मनोरमैः ॥२६॥ तृणैश्च गीतवाद्याद्यैः स्तोत्रैश्चाप्यर्चयेद्धरिम् । कृशरान्नं च विप्राय दद्यात्सघृतदक्षिणम् ॥२७॥ सर्वात्मा सर्वलोकेशः सर्वव्यापी सनातनः । नारायणः प्रसन्नः स्यात्कृशरान्नप्रदानतः ॥२८॥ मंत्रणानेन विप्राय दत्त्वा वै दानमुत्तमम् । द्विजांश्च भोजयेद्भक्त्या स्वयमद्यात्स बान्धवः ॥२९॥ एवं संपूजयेद्भक्त्या देवं नारायणं प्रभुम् । अग्निष्टो्राष्टकफलं स संपूर्णमवाप्नुयात् ॥३०॥ माघस्य शुक्लद्वादश्यां पूर्ववत्समुपोषितः । नमस्ते माधवायेति हुत्वाष्टौ च घृताहुतीः ॥३१॥ पूर्वमानेन पयसा स्नापयेन्माधवं तदा । पुष्पगन्धाक्षतैरर्चेतसावधानेन चेतसा ॥३२॥ रात्रौ जागरणं कुर्यात्पूर्ववद्भक्तिसंयुतः । कल्पकर्म च निर्वर्त्य माधवं पुनरर्चयेत् ॥३३॥ प्रस्थं तिलानां विप्राय दद्याद्वै मन्त्रपूर्वकम् । सदक्षिणं सवस्त्रं च सर्वपापविमुक्तये ॥३४॥ नारायण का अभिषेक करना चाहिए ॥१४-१७॥ इस प्रकार लक्ष्मी के सहित भगवान् की नैवेद्य और अन्यान्य भोज्यपदार्थों, एवं गीत वाद्य आदि से तीनों काल भक्ति पूर्वक पूजा करनी चाहिए। फिर प्रातःकाल उठकर विधिपूर्वक नित्यकर्मों को समाप्त कर पहले की ही भाँति समय पूर्वक पवित्र भाव से पूजा करे। 'केशव केशिहन्ता और सब प्रकार की सम्पत्ति को देने वाले भगवान् इस मधुर भोजन के दान से प्रसन्न होकर मेरे मनोरथों को पूर्ण करें' इस मन्त्र से दूध, घी और नारिकेल से बने पदार्थों को दक्षिणा सहित ब्राह्मणों को दे । पश्चात् यथा शक्ति ब्राह्मणों को भोजन करावे और स्वयं भाई बन्धुओं के साथ भगवान् का ध्यान करते हुए भोजन करे । इस प्रकार विधिपूर्वक जो केशव की पूजा करता है वह पौण्डरीक यज्ञ का आठगुना फल पाता है ॥१८-२३॥ पूस मास में शुक्ल पक्ष की द्वादशी को निराहार रहकर 'नमो नारायणाय' इस मन्त्र से भक्ति पूर्वक भगवान् को दुग्ध से स्नान कराकर पायस और नैवेद्य अर्पित करे । तीनों काल भगवान् की पूजा में निरत रहकर रात में तो जागरण करे और धूप, दीप, नैवेद्य, गन्ध और मनोहर फूल और पत्तियों से हरि की पूजा करे । पुनः स्तोत्र पाठ और गीत वादन से भगवान् का मनोरंजन करे, ब्राह्मणों को 'सर्वात्मा, सब लोकों के प्रभु, सर्वव्यापक सनातन नारायण इस कृशरान्न (खिचड़ी) के दान से प्रसन्न होवें' इस मन्त्र से घी और दक्षिणा सहित खिचड़ी दे ॥२४-२८॥ शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर पश्चात् स्वयं भाई बन्धुओं के साथ भोजन करे । इस प्रकार भक्ति पूर्वक विधिवत् प्रभुनारायण की पूजा करने से आठ अग्निष्टोम यज्ञ करने का फल मिलता है । माघ शुक्ल द्वादशी को पहले की भाँति निराहार व्रत रहकर 'नमस्ते माधवाय' इस मन्त्र से घी की छह आहुतियां देकर एक पसेरी दूध से माधव को स्नान करावे । पुनः सावधान होकर पुष्प, गंध, अक्षत से भगवान् की पूजा करे और पूर्व की भाँति भक्तिपूर्वक रात में जागरण करे । कल्प-सूत्रानुसार कर्मों को समाप्त कर पुनः माधव की पूजा करे ॥२६-३३॥ साथ ही वस्त्र और दक्षिणा के साथ मन्त्र पढ़ता हुआ हुआ एक पसेरी तिल

१३१] सप्तदशोऽध्यायः माधवः सर्वभूतात्मा सर्वकर्मफलप्रदः । तिलदानेन महता सर्वान्कामान्प्रयच्छतु ॥३५॥ मन्त्रेणानेन विप्राय दत्त्वा भक्तिसमन्वितः । ब्राह्मणान्भोजयेच्छक्त्या संस्मरेन्माधवं प्रभुम् ॥३६॥ एवं यः कुरुते भक्त्या तिलदाने व्रतं मुने । वाजपेयशतस्यासौ संपूर्णं फलमाप्नुयात् ॥३७॥ फाल्गुनस्य सिते पक्षे द्वादश्यां समुपोषितः । गोविन्दाय नमस्तुभ्यमिति संपूजयेद्व्रती ॥३८॥ अष्टोत्तरशतं हुत्वा घृतमिश्रतिलाहुतीः । पूर्वमानेन पयसा गोविन्दं स्नापयेच्छुचिः ॥३६॥ रात्रौ जागरणं कुर्यात्त्रिकालं पूजयेत्तथा । प्रातःकृत्यं समाप्याथ गोविन्दं पूजयेत्पुनः ॥४०॥ व्रीह्याढकं च विप्राय दद्याद्वस्त्रं सदक्षिणम् । नमो गोविन्द सर्वेश गोपिकाजनवल्लभ ॥४१॥ अनेन धान्यदानेन प्रीतो भव जगद्गुरो । एवं कृत्वा व्रतं सम्यक् सर्वपापविवर्जितः ॥४२॥ गोमेदमखजं पुण्यं सम्पूर्णं लभते नरः । चैत्रमासे सिते पक्षे द्वादश्यां समुपोषितः ॥४३॥ नमोऽस्तु विष्णवे तुभ्यमिति पूर्ववदर्चयेत् । क्षीरेण स्नापयेद्विष्णुं पूर्वमानेन भक्तितः ॥४४॥ तथैव स्नापयेद्विप्र घृतप्रस्थेन सादरम् । कृत्वा जागरणं रात्रौ पूजयेत्पूर्ववद्व्रती ॥४५॥ ततः कल्ये समुत्थाय प्रातःकृत्यं समाप्य च । अष्टोत्तरशतं हुत्वा मध्वाज्यतिलमिश्रितम् ॥४६॥ सदक्षिणं च विप्राय दद्याद्वै तण्डुलाढकम् । प्राणरूपी महाविष्णुः प्राणदः सर्ववल्लभः ॥४७॥ तण्डुलाढकदानेन प्रीयतां मे जनार्दनः । एवं कृत्वा नरो भक्त्या सर्वपापविवर्जितः ॥४८॥ अत्यग्निष्टोमयज्ञस्य फलमष्टगुणं लभेत् । वैशाखशुक्लद्वादश्यामुपोष्य मधुसूदनम् ॥४६॥ द्रोणक्षीरेण देवेशं स्नापयेद्भक्तिसंयुतः । जागरं तत्र कर्त्तव्यं त्रिकालाचंनसयुतम् ॥५०॥ अपने सब पापों से मुक्त होने के लिए ब्राह्मण को दे। माधव सब पदार्थों में व्यापक और सब कर्मों के फल को देने वाले हैं। वे इस मन्त्रवाक्य से भक्ति पूर्वक ब्राह्मण को तिलदान देकर प्रभु माधव का स्मरण करता हुआ यथा शक्ति ब्राह्मणों को खिलावे ॥३४-३६॥ मुनिनारद ! इस प्रकार भक्ति पूर्वक जो व्यक्ति तिलदान से भगवान् को संतुष्ट करता है, वह सौ वाजपेय यज्ञों का फल पाता है। फागुन मास की शुक्ल-पक्ष-द्वादशी को निराहार रहकर व्रती 'गोविन्दाय नमस्तुभ्यम्' इस मन्त्र से घी मिले तिल को एक सौ आठ आहुतियाँ देकर एक पसेरी दूध से गोविन्द को स्नान करावे। तीनों काल विधिवत् पूजा कर रात में जागरण करे। प्रातःकालीन पूजा समाप्त हो जाने पर उसी प्रकार शेष दोनों समय गोविन्द की पूजा करे और वस्त्र दक्षिणा सहित 'गोविन्द ! सर्वेश ! गोपिकाजनबल्लभ ! आपको नमस्कार है। जगद्गुरु ! धान्य दान से प्रसन्न होइए' इस वाक्य से एक आढक धान विप्र को दे। इस प्रकार विधि पूर्वक व्रत को करने से मनुष्य अपने सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर गोमेधयज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥३७-४३॥ चैत महीने में शुक्लपक्ष-द्वादशी के दिन निराहार व्रत रहकर यथाशक्ति पूर्वोक्त विधि से 'नमोस्तु विष्णवे तुभ्यम्' इस मन्त्र से दूध से विष्णु को स्नान करावे। विप्र ! फिर आदर पूर्वक एक पसेरी घी से स्नान कराकर रात भर जागरण कर पूर्वोक्त विधि से ही पूजा करे। तदनन्तर प्रातःकाल उठकर प्रातःकालीन क्रिया समाप्त करने के बाद मधु, घी और तिल से एक सौ आठ बार आहुति दे। 'महाविष्णु प्राणरूप, प्राणदाता और सब के स्वामी भगवान् जनार्दन मेरे इस एक आढक चावल के दान से प्रसन्न हों, इस वाक्य से ब्राह्मण को दक्षिणा में एक आढक चावल भी दे ॥४४-४७॥ इस प्रकार व्रत करने से मनुष्य अपने सब पापों से युक्त होकर अग्निष्टोम यज्ञ का अठगुना फल पाता है। वैशाख-शुक्ल-द्वादशी के दिन निराहार रहकर देवेश मधुसूदन को एक द्रोण दूध से स्नान करावे, तीनों काल विधिपूर्वक भगवान् की पूजाकर रात्रि में जागरण भी करे और 'नमस्ते मधु हन्चे' (मधु हन्ता को नमस्कार है) इस मन्त्र से घी की एक सौ आठ आहुतियां दे। इस प्रकार

१३२ : नारदीयपुराणम् नमस्ते मधुहन्त्रे च जुहुयाच्छक्तितो घृतम् । अष्टोत्तरशतं प्राच्र्यं विधिवन्मधुसूदनम् ॥५१॥ विपापो ह्याश्वमेधानांमष्टानां फलमाप्नुयात् । ज्येष्ठमासे सिते पक्षे द्वादश्यामुपवासकृत् ॥५२॥ क्षीरेणाढकमानेन स्नापयेत्त्रिविक्रमम् । नमस्त्रिविक्रमायेति पूजयेद्भक्तिसंयतः ॥५३॥ जुहुयात्पायसेनेव ह्यष्टोत्तरशताहुतीः । कृत्वा जागरणं रात्रौ पुनः पूजां प्रकल्पयेत् ॥५४॥ अपूपविंशतिं दत्त्वा ब्राह्मणाय सदक्षिणाम् । देवदेव जगन्नाथ प्रसीद परमेश्वरः ॥५५॥ उपायेन च संगृह्य समाभीष्टप्रदो भव । ब्राह्मणांन्भोजयेच्छक्त्या स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः ॥५६॥ एवं यः कुरुते विप्र व्रतं त्रैविक्रमं परम् । सोऽष्टानां नरमेधानां विपापः फलमाप्नुयात् ॥५७॥ आषाढशुक्लद्वादश्यामुपवासो जितेन्द्रियः । वामनं पूर्वमानेन स्नापयेत्पयसा व्रती ॥५८॥ नमस्ते वामनायेति दूर्वाज्याष्टोत्तरं शतम् । हुत्वा च जागरं कुर्याद्वामनं चार्चयेत्पुनः ॥५९॥ सदक्षिणं च दध्यन्नं नालिकेरफलान्वितम् । भक्त्या प्रदद्याद्विप्राय वामनार्चनशीलिने ॥६०॥ वामनो बुद्धिदो होता द्रव्यस्थो वामनः सदा । वामनस्तारकोऽस्माच्च वामनाय नमो नमः ॥६१॥ अनेन दत्त्वा दध्यन्नं शक्तितो भोजयेद्विजान् । कृत्वैवमग्निष्टोमानां शतस्य फलमाप्नुयात् ॥६२॥ श्रावणस्य सिते पक्षे द्वादश्यामुपवासकृत् । क्षीरेण मधुमिश्रेण स्नापयेच्छ्रीधरं व्रती ॥६३॥ नमोऽस्तु श्रीधरायेति गन्धाद्यैः पूजयेत्क्रमात् । जुहुयात्पृषदाज्येन शतमष्टोत्तरं मुने ॥६४॥ कृत्वा च जागरं रात्रौ पुनः पूजां प्रकल्पयेत् । दातव्यं चैव विप्राय क्षीराढकमनुत्तमम् ॥६५॥ दक्षिणां च सवस्त्रां वै प्रदद्याद्धेमकुण्डले । मन्त्रेणानेन विप्रेन्द्र सर्वकामार्थसिद्धये ॥६६॥

भक्ति पूर्वक मधुसूदन को पूजा करने से मनुष्य पाप मुक्त होकर आठ अश्वमेध का फल प्राप्त करता है ॥४८-५१॥ जेठ मास की शुक्लपक्ष द्वादशी के दिन निराहार रहकर एक आढ़क दूध से भगवान् त्रिविक्रम को 'नमः त्रिविक्रमाय' इस मन्त्र से भक्ति पूर्वक पूजा करे और खीर की एक सौ आठ आहुतियां भी दे । रात्रि में जागरण कर पुनः सविधि पूजा कर 'देवदेव ! जगन्नाथ ! प्रसन्न होइए परमेश्वर ! इस उपहार से आप प्रसन्न होकर मेरे अभीष्ट फल को प्रदान कीजिए' इस वाक्य से बीस पूए ब्राह्मणों को दक्षिणा के साथ दे । स्वयं शक्ति के अनु- सार ब्राह्मण को भोजन कराकर मौन हो स्वयं भी भोजन करे । विप्र ! जो इस प्रकार त्रिविक्रम का परमोत्तम व्रत करता है वह निष्पाप होकर आठ नरमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥५२-५७॥ आषाढ़ शुक्ल द्वादशी के दिन जो जितेन्द्रिय व्रती निराहार रहकर एक द्रोण या एक आढ़क दूध से भगवान् वामन को स्नान कराता है और 'नमस्ते वामनाय' इस मन्त्र से दूब एवं घी की एक सौ आठ आहुतियां देकर रात भर जागरण करता है, फिर दक्षिणा, दही, अन्न और नारियल आदि से भगवान् की पूजाकर वामन के भक्त किसी ब्राह्मण को 'भगवान् वामन बुद्धि देने वाले, होता, सर्वदा सब द्रव्यों में रहने वाले और इस संसार-सागर से पार लगाने वाले हैं, ऐसे पूज्य वामन को नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है। इस वाक्य से यथाशक्ति दही मिला अन्नदान करता है वह इस प्रकार व्रत करने से हो अग्निष्टोम यज्ञ के समान फल पा जाता है ॥५८-६२॥ व्रती सावन की शुक्ल- पक्ष वाली द्वादशी को निराहार रहकर मधुमिश्रित दूध से भगवान् श्रीधर को स्नान करावे । 'नमस्ते श्रीधराय' इस मन्त्र से गन्ध आदि पूजन सामग्री से क्रमशः पूजन करे । मुने ! घी से एक सौ आठ बार हवन करने के अनन्तर रात भर जागरण करे और फिर पूजा करे । अपने सब मनोरथों को सिद्धि के लिए किसी ब्राह्मण को एक आढ़क शुद्ध दूध, वस्त्र, दक्षिणा और दो सुवर्ण के कुण्डल देने चाहिए । विप्रेन्द्र, दूध दान करते समय यह वाक्य पढ़ना चाहिए "क्षीरसागरशायी ! देवेश ! रमाकान्त ! जगत्पते ! इस क्षीर दान से आप प्रसन्न हों और सब

१३३ सप्तदशोऽध्यायः क्षीराब्धिशायिन्देवेश रमाकान्त जगत्पते । क्षीरदानेन सुप्रीतो भव सर्वसुखप्रदः ॥६७॥ सुखप्रदत्वाद्विप्रांश्च भोजयेच्छक्तितो व्रती । एवं कृत्वाश्वमेधानां सहस्रस्य फलं लभेत् ॥६८॥ मासि भाद्रपदे शुक्ले द्वादश्यां समुपोषितः । स्नापयेद्द्रोणपयसा हृषीकेशं जगद्गुरुम् ॥६९॥ हृषीकेशं नमस्तुभ्यमिति संपूजयेन्नरः । चरुणा मधुयुक्तेन शतमष्टोत्तरं हुनेत् ॥७०॥ जागरादीनि निर्वर्त्य दद्यादात्मविदे ततः । सार्धाढकं च गोधूमन्दक्षिणां हेमशक्तितः ॥७१॥ हृषीकेश नमस्तुभ्यं सर्वलोकैकहेतवे । मह्यं सर्वसुखं देहि गोधूमस्य प्रदानतः ॥७२॥ भोजयेद्ब्राह्मणाञ्शक्त्या स्वयं चाश्नीत वाग्यतः । सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्ममेधफलं लभेत् ॥७३॥ आश्विने मासि शुक्लायां द्वादश्यां समुपोषितः । पद्मनाभं च पयसा स्नापयेद्भक्तितः शुचिः ॥७४॥ नमस्ते पद्मनाभाय होमं कुर्यात्स्वशक्तितः । तिलव्रीहियवाज्यैश्च पूजयेच्च विधानतः ॥७५॥ जागरं निशि निर्वर्त्य पुनः पूजां समाचरेत् । दद्याद्विप्राय कुडवं मधुनस्तु सदक्षिणम् ॥७६॥ पद्मनाभ नमस्तुभ्यं सर्वलोकपितामह । मधुदानेन सुप्रीतो भव सर्वसुखप्रदः ॥७७॥ एवं यः कुरुते भक्त्या पद्मनाभव्रतं सुधीः । ब्रह्ममेधसहस्रस्य फलमाप्नोति निश्चितम् ॥७८॥ द्वादश्यां कार्तिके शुक्ले उपवासी जितेन्द्रियः । क्षीरेणाढकमानेन दध्ना वाज्येन तावता ॥७९॥ नमो दामोदरायेति स्नापयेद्भक्तिभावतः । अष्टोत्तरशतं हुत्वा मध्वाज्याक्ततिलाहुतीः ॥८०॥ जागरं नियतः कुर्यात्त्रिकालार्चनतत्परः । प्रातः संपूजयेद्देवं पद्मपुष्पैर्मनोरमैः ॥८१॥ पुनरष्टोत्तरशतं जुहुयात्सघृतैस्तिलैः । पञ्चभक्ष्ययुतं चान्नं दद्याद्विप्राय भक्तितः ॥८२॥ सुखों को प्रदान कीजिए । व्रती इस प्रकार पूजा समाप्त कर सुख प्राप्ति के लिए यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन करावे । इस प्रकार सविधि व्रत के अनुष्ठान से मनुष्य को एक हजार अश्वमेध का फल मिलता है ॥६३-६८॥ भादों मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी को निराहार रहकर एक द्रोण दूध से जगद्गुरु हृषीकेश को ‘हृषीकेश नमस्तुभ्यम्' इस मन्त्र से स्नान कराकर मधु युक्त चरु से एक सौ आठ बार हवन करे । रात्रि जागरण आदि विधि समाप्त कर किसी ज्ञानी ब्राह्मण को शक्ति के अनुसार सोना और दक्षिणा के सहित गेहूँ दे । दान देते समय 'हृषीकेश ! सारे संसार के एक मात्र कारण आपको नमस्कार है इस गेहूँ के दान से आप मुझे सम्पूर्ण सुख दें' इस वाक्य को कहे । इस प्रकार पूजा समाप्त कर यथा शक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं मौन होकर भोजन करे। इस विधि से व्रत का अनुष्ठान करने से व्रती सब पापों से मुक्त होकर 'ब्रह्ममेध' का फल प्राप्त करता है ॥६९-७३॥ कुआर के शुक्लपल की द्वादशी को व्रती उपवास करे, पवित्र होकर श्रद्धापूर्वक भगवान् पद्मनाभ को दूध से नहलावे । 'नमस्ते पद्मनाभाय' इस मन्त्र से तिल, चावल, घी और उसकी आहुति दे । शास्त्रविधि से पूजा करने के अनन्तर रातभर जागरण करे और पुनः विधिवत् पूजा कर किसी ब्राह्मण को दक्षिणा सहित एक पाव मधु का दान दे । दान करते समय 'सब लोकों के पितामह ! पद्मनाभ ! आपको नमस्कार है' इस मधुदान से आप प्रसन्न होकर सब सुखों को प्रदान करें। इस वाक्य का उच्चारण करे । नारद ! इस प्रकार जो बुद्धिमान् व्यक्ति भक्ति पूर्वक पद्मनाभ व्रत का अनुष्ठान करता है वह एक हजार ब्रह्ममेध यज्ञ का फल पाता है ॥७४-७८॥ कार्तिक-शुक्ल-द्वादशी को व्रती संयम पूर्वक निराहार व्रत रहे । 'नमो दामोदराय' इस मन्त्र से श्रद्धा-भाव से एक आढक दूध, दही अथवा उतने ही घी से भगवान् दामोदर को नहलावे । स्नान कराने के पश्चात् मधु, घी से मिश्रित तिल की एक सौ आठ बार आहुति दे ! नियम पूर्वक तोनों समय पूजा कर रात्रि में जागरण करे । दूसरे दिन प्रातःकाल भगवान् को मनोहर कमलपुष्प से अनन्य भाव से पूजा करे और पुनः घी मिश्रित तिल से एक सौ आठ बार आहुति दे । व्रत की निर्विघ्न समाप्ति के लिए पाँचों प्रकार के भक्ष्य पदार्थ सहित अन्न किसी वेदपाठी कुटुम्बी ब्राह्मण को दे । दान का मन्त्र यह है 'दामोदर ! जगन्नाथ !

१३४ नारदीयपुराणम् दामोदर जगन्नाथ सर्वकारणकारण । त्राहि मां कृपया देव शरणागतपालक ॥८३॥ अनेन दत्त्वा दानं च श्रोत्रियाय कुटुम्बिने । दक्षिणां च यथाशक्त्या ब्राह्मणांश्चापि भोजयेत् ॥८४॥ एवं गत्वा व्रतं सम्यगश्नीयाद्बन्धुभिः सह । अश्वमेधसहस्राणां द्विगुणं फलमश्नुते ॥८५॥ एवं कुर्याद्व्रती यस्तु द्वादशीव्रतमुत्तमम् । संवत्सरं मुनिश्रेष्ठ स याति परमं पदम् ॥८६॥ एकमासे द्विमासे वा यः कुर्याद्भक्तितत्परः । तत्तत्फलमवाप्नोति प्राप्नोति च हरेः पदम् ॥८७॥ पूर्णं संवत्सरं कृत्वा कुर्यादुद्यापनं व्रती । मार्गशीर्षसिते पक्षे द्वादश्यां च मुनीश्वर ॥८८॥ स्नात्वा प्रातर्यथाचारं दन्तधावनपूर्वकम् । शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लगन्धानुलेपनः ॥८९॥ मण्डपं कारयेद्दिव्यं चतुरस्रं सुशोभनम् । घण्टाचामरसंयुक्तं किङ्किणीरवशोभितम् ॥९०॥ अलंकृतं पुष्पमाल्यैर्वितानध्वजराजितम् । छादितं शुक्लवस्त्रेण दीपमालाविभूषितम् ॥९१॥ तन्मध्ये सर्वतोभद्रं कुर्यात्सम्यगलंकृतम् । तस्योपरि न्यसेत्कुम्भां द्वादशाम्बुप्रपूरितान् ॥९२॥ एकेन शुक्लवस्त्रेण सम्यक्संशोधितेन च । सर्वान्नाच्छादयेत्कुम्भान्पञ्चरत्नसमन्वितान् ॥९३॥ लक्ष्मीनारायणं देवं कारयेद्भक्तिमान्व्रती । हेम्ना वा रजतेनापि तथा ताम्रेण वा द्विज ॥९४॥ स्थापयेत्प्रतिमां तां च कुम्भोपरि सुसंयमी । तन्मूल्यं वा द्विजश्रेष्ठ काञ्चनं च स्वशक्तितः ॥९५॥ सर्वव्रतेषु मतिमान्वित्तशाठ्यं विवर्जयेत् । यदि कुर्यात्क्षयं यान्ति तस्यायुर्धनसंपदः ॥९६॥ अनन्तशायिनं देवं नारायणमनामयम् । पञ्चामृतेन प्रथमं स्नापयेद्भक्तिसंयुतः ॥९७॥ सकल कारणों के कारण ! शरणागतपालक ! देव ! कृपा कर मेरी रक्षा कीजिए । दक्षिणा सहित अन्नदान के बाद व्रती श्रद्धापूर्वक यथा शक्ति ब्राह्मणों को खिलावे और दक्षिणा भी दे । इस प्रकार व्रत सम्पन्न करके व्रती स्वयं परिवार सहित भोजन करे । नारद ! इस प्रकार जा व्रती द्वादशी व्रत का अनुष्ठान करता है वह सहस्रों अश्व- मेध यज्ञों का द्विगुण फल पाता है ॥७६-८५॥ मुनिश्रेष्ठ ! जो व्रतो उपर्युक्त विधि से एक वर्ष तक इस उत्तम द्वादशी व्रत का अनुष्ठान करता है वह परम पद को प्राप्त कर लेता है । जो केवल एक मास या दो मास तक भक्तिपूर्वक इस व्रत को करता है वह पूर्वोक्त फल के साथ भगवान् के लोक भी प्राप्त कर लेता है । व्रती एक-एक वर्ष तक व्रत को पूरा कर इसका उद्यापन१ करे ॥८६-८७॥ मुनीश्वर ! अगहन मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी को प्रातःकाल आचार के अनुसार दन्तधावन कर स्नान करे, श्वेत वस्त्र पहन कर श्वेत सुगन्धित चन्दन लगावे । इस प्रकार स्वयं पवित्र होकर भूमि पर एक चौकोर दिव्य मण्डप बनावे । घंटा चँवर से सुशोभित कर बीच में किंकिणी लटकावे, जिसकी मधुर ध्वनि से सारा मण्डप गुंजित रहे । चारों ओर पताकाओं, फूलों की माला और चाँदवे से उसको सजाकर श्वेत वस्त्र से उसको आच्छादित कर दे और चारों ओर दीप जलाकर रख दे । उस मण्डप के मध्य में अति मनोहर सर्वतोभद्र चक्र बनाकर उस पर जल से परिपूर्ण बारह कलश रख दे ॥८८-९२॥ उन कलशों में पंच रत्न छोड़कर एक ही भलीभाँति शुद्ध किए हुए श्वेत वस्त्र से सबको ढक दे । द्विज ! भक्त व्रती अपनी शक्ति के अनु- सार सोना, चाँदी या तांबे की लक्ष्मो-नारायण की मूर्ति बनवावे ॥९३-९४॥ उसके प्रतिमा को वह संयमो भक्त कलश के ऊपर रखे । यदि मूर्ति न बनी हो तो मूर्ति का मूल्य अथवा सोना ही यथा शक्ति उस पर रख दे । द्विजवर्य ! बुद्धिमान् व्यक्ति सभी प्रकार के व्रतों में कृपणता न करे, यदि ऐसा करेगा तो उसकी आयु, धन-सम्पत्ति आदि सब कुछ नष्ट हो जायगा । सबसे पहले भक्ति पूर्वक शेषशायी, निर्विकार, भगवान् नारायण को पंचामृत १. यह विधि इस उद्देश्य से की जाती है कि पुनः व्रत न करना पड़े । इसे 'व्रत का बैठाना' कहा जाता है ।

१३५ सप्तदशोऽध्यायः नामभिः केशवाद्यैश्च ह्युपचारान्प्रकल्पयेत् । रात्रौ जागरण कुर्यात्पुराणश्रवणादिभिः ॥६८॥ जितनिद्रो भवेत्सम्यक्सोपवासो जितेन्द्रियः । त्रिकालमर्चयेद्देवं यथाविभवविस्तरम् ॥६६॥ ततः प्रातः समुत्थाय प्रातः कृत्यं समाप्य च । तिलहोमान्व्याहृतिभिः सहस्त्रं कारयेद्विजैः ॥१००॥ ततः संपूजयेद्देवं गन्धपुष्पादिभिः क्रमात् । देवस्य पुरतः कुर्यात्पुराणश्रवणं ततः ॥१०१॥ दद्याद्द्वादशविप्रेभ्यो दध्यन्नं पायसं तथा । अपूपैर्दशभिर्युक्तं सघृतं च सदक्षिणम् ॥१०२॥ देवदेवजगन्नाथ भक्तानुग्रहविग्रह । गृहाणोपायनं कृष्ण सर्वाभीष्टप्रदो भव ॥१०३॥ अनेनोपायनं दत्त्वा प्रार्थयेत्प्राञ्जलिः स्थितः । आधाय जानुनी भूमौ विनयावनतो व्रती ॥१०४॥ नमो नमस्ते सुरराजराज, नमोऽस्तु ते देव जगन्निवास । कुरुष्व सम्पूर्णफलं ममाद्य, नमोऽस्तु तुभ्यं पुरुषोत्तमाय ॥१०५॥ इति संप्रार्थयेद्विप्रान्देवं च पुरुषोत्तमम् । दद्यादर्घ्यं च देवाय महालक्ष्मीयुताय वै ॥१०६॥ लक्ष्मीपते नमस्तुभ्यं क्षीरार्णवनिवासिने । अर्घ्यं गृहाण देवेश लक्ष्म्या च सहितः प्रभो ॥१०७॥ यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु । न्यूनं संपुर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥१०८॥ इति विज्ञाप्य देवेशं तत्सर्वं संयमी व्रते । प्रतिमां दक्षिणायुक्तामाचार्याय निवेदयेत् ॥१०६॥ ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाच्छक्त्या दद्याच्च दक्षिणाम् । भुञ्जीत वंग्यतः पश्चात्स्वयं बंधुजनैर्वृतः ॥११०॥ आसायं शृणुयाद्विष्णोः कथां विद्वज्जनैः सह । इत्येवं कुरुते यस्तु मनुजो द्वादशीव्रतम् ॥१११॥ सर्वान्कामान्स आप्नोति परत्रेह च नारद । विसप्तकुलसंयुक्तः सर्वपापविवर्जितः ॥ प्रयाति विष्णुभवनं यत्र गत्वा न शोचति ॥११२॥

स्नान करावे। केशव आदि नामों का कीर्तन करता हुआ विभिन्न उपचारों से पूजन करो। रात को पुराण श्रवण के द्वारा जग कर ही बिता दे ॥६५-६८॥ वह संयमी व्रती निद्रा को वश में कर निराहार रहकर अपने वैभव के अनुसार तीनों काल भगवान् का पूजन करे। तदनन्तर दूसरे दिन प्रातःकाल उठकर नित्यक्रिया से निवृत्त हो ब्राह्मणों के द्वारा व्याहृति मंत्रों से तिल का हवन करावे। पुनः यथाक्रम गन्ध, पुष्प आदि से भगवान् की पूजा कर उनके सामने ही पुराण का श्रवण करे। बारह ब्राह्मणों को दही, खीर, घी और दक्षिणा सहित दस पूये का दान करे। (दानका मन्त्र यह है--) ॥६६-१०२॥ 'देवदेव ! जगन्नाथ ! भक्तों पर कृपा करने वाले ! कृष्ण ! मेरे सब मनोरथों को पूर्ण कीजिए'। इस प्रकार उपहार दान के पश्चात् व्रतो पृथ्वो पर घुटने टेक कर विनम्र भाव से हाथ जोड़ कर भगवान् की स्तुति करे 'सुरराज ! आपको नमस्कार है। देव ! जगन्निवास ! नमस्कार है। आज मेरी सम्पूर्ण कामनायें पूर्ण कीजिए। पुरुषोत्तम ! आप को नमस्कार है' ॥१०३-१०५॥ इस प्रकार विप्रों और भगवान् की प्रार्थना के बाद महालक्ष्मी सहित भगवान् को अर्घ्य दे। अर्घ्य का मन्त्र यह है 'लक्ष्मीपते ! क्षीरसागर में सोने वाले आप को नमस्कार है, देवेश ! प्रभो ! लक्ष्मी के सहित आप मेरे इस अर्घ्य को ग्रहण करे। जिसके स्मरण और नाम कीर्तन से तप, यज्ञ आदि अनुष्ठान को न्यूनतायें अतिशीघ्र दूर हो जाती हैं उस अच्युत देव को नमस्कार है' इस प्रकार भगवान् को स्तुति कर वह व्रती प्रतिमा सहित उन सब सामग्रियों का आचार्य के लिए अर्पित कर दे। यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा देकर व्रत को समाप्त कर दे ॥१०६-१११॥ इसके बाद स्वयं भाई-बन्धुओं के सहित मौन होकर भोजन करे और सायंकाल तक विद्वज्जनों के साथ बैठकर पुराण कथा सुने। नारद ! जो मनुष्य इस विधि से द्वादशी का व्रत करता है वह लौकिक पारलौकिक सभी कामनाओं का प्राप्त करता है। वह अपने इक्कीस कुलों के उस

१३६ नारदीयपुराणम् य इदं शृणुयाद्विप्र द्वादशीव्रतमुत्तमम् । वाचयेद्वाऽपि स नरो वाजपेयफलं लभेत् ॥११३॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे व्रताख्याने मार्गशीर्षशुक्लद्वादशीव्रतकथनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥१७॥

अष्टादशोऽध्यायः सनक उवाच अन्यद्व्रतवरं वक्ष्ये शृणुष्व मुनिसत्तम । सर्वपापहरं पुण्यं सर्वदुःखनिबर्हणम् ॥१॥ ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां योषितां तथा । समस्तकामफलदं सर्वव्रतफलप्रदम् ॥२॥ दुःस्वप्ननाशनं धर्म्यं दुष्टग्रहनिवारणम् । सर्वलोकेषु विख्यातं पूर्णिमाव्रतमुत्तमम् ॥३॥ येन चीर्णेन पापानां राशिकोटिः प्रशाम्यति मार्गशीर्षे सितेपक्षे पूर्ण्णायां नियतः शुचिः । स्नानं कुर्याद्यथाचारं दन्तधावनपूर्वकम् ॥४॥ शुक्लाम्बरधरः शुद्धो गृहमागत्य वाग्यतः । प्रक्षाल्य पादावाचम्य स्मरन्नारायणं प्रभुम् ॥५॥ नित्यं देवार्चनं कृत्वा पश्चात्सङ्कल्पपूर्वकम् । लक्ष्मीनारायणं देवमर्चयेद्भक्तिभावतः ॥६॥ आवाहनासनाद्यैश्च गन्धपुष्पादिभिर्व्रती । नमो नारायणायेति पूजयेद्भक्तितत्परः ॥७॥

विष्णुलोक को चला जाता है जहाँ जाकर किसी प्रकार का शोक नहीं होता । विप्र ! जो इस उत्तम द्वादशी व्रत की कथा को सुनता या सुनाता है वह मनुष्य वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥११२-११३॥ श्री नारदीयपुराण में द्वादशी-माहात्म्यवर्णन नामक सत्रहवां अध्याय समाप्त ॥१७॥

अध्याय १८ उद्यापन विधिसहित लक्ष्मीनारायणव्रत का वर्णन सनक बोले—मुनिवर्य ! अब सब पापों का नाश करने वाले, पुण्यदायक और सब दुःखों को दूर करने वाले श्रेष्ठव्रत को कह रहा हूँ, सुनो ॥१॥ पूर्णिमा का व्रत सब व्रतों में उत्तम, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा स्त्रियों की भी सब कामनाओं का पूर्ण करने वाला, सब व्रतों के फल को देने वाला, बुरे स्वप्नों के कुफल से बचाने वाला, धर्मप्रद, दुष्टग्रहों का निवारण करने वाला और लोक-विख्यात है, जिसके अनुष्ठान से पापों की असंख्य ढेरियां नष्ट हो जाती हैं ॥२-३॥ अगहन मास की पूर्णिमा को व्रती आचारानुकूल दातौन आदि नित्य क्रिया से निवृत्त हो संयम पूर्वक पवित्र भाव से स्नान करे । धुले श्वेत वस्त्र धारण कर मौन हो घर आकर पैरों को धोवे और प्रभु नारायण का स्मरण करता हुआ आचमन कर प्रति दिन की भाँति अपनी नित्य देव-पूजा समाप्त करे । फिर-संकल्पपूर्वक भक्तिभाव से भगवान् लक्ष्मीनारायण की पूजा करे ॥४-६॥ व्रती 'नमो नारायणाय' इस मन्त्र से श्रद्धापूर्वक आवाहन, आसनदान और गन्ध, पुष्प आदि सामग्री से भगवान् की पूजा करे । वह व्रती एकाग्रभाव से गीत,

१३७ अष्टादशोऽध्यायः गीतैर्वाद्यैश्च नृत्यैश्च पुराणपठनादिभिः । स्तोत्रैर्वारराधयेद्देवं व्रतकृत्सुसमाहितः ॥७॥ देवस्य पुरतः कृत्वा स्थण्डिलं चतुरस्रकम् । अरत्निमात्रं तत्राग्निं स्थापयेद्गृह्यमार्गतः । आज्यभागान्तपर्यन्तं कृत्वा पुरुषसूक्ततः । चरुणा च तिलैश्चापि घृतेन जुहुयात्तथा ॥८॥ एकवारं द्विवारं वा त्रिवारं वापि शक्तितः । होमं कुर्यात्प्रयत्नेन सर्वपापनिवृत्तये ॥१०॥ प्रायश्चित्तादिकं सर्वं स्वगृह्योक्तविधानतः । समाप्य होमं विधिवच्छान्तिसूक्तं जपेद्बुधः ॥११॥ पश्चाद्देवं समागत्य पुनः पूजां प्रकल्पयेत् । तथोपवासं देवाय ह्यर्पयेद्भक्तिसंयुक्तः ॥१२॥ पौर्णमास्यां निराहारः स्थित्वा देव तवाज्ञया । भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष परेऽह्नि शरणं भव ॥१३॥ इति विज्ञाप्य देवाय ह्यर्थ्यं दद्यात्तथैन्दवे । जानुभ्यामवनीं गत्वा शुक्लपुष्पाक्षतान्वितः ॥१४॥ क्षीरोदार्णवसंभूत अत्रिगोत्रसमुद्भव । गृहाणार्घ्यं मया दत्तं रोहिणीनायक प्रभो । एवमर्घ्यं प्रदायेन्दोः प्रार्थयेत्प्राञ्जलिस्ततः ॥१५॥ तिष्ठन्पूर्वमुखो भूत्वा पश्यन्निन्दुं च नारद ॥१६॥ नमः शुक्लांशवे तुभ्यं द्विजराजाय ते नमः । रोहिणीपतये तुभ्यं लक्ष्मीभ्रात्रे नमोऽस्तु ते ॥१७॥ ततश्च जागरं कुर्यात्पुराणश्रवणादिभिः । जितेन्द्रियश्च संशुद्धः पाषण्डालोकवर्जितः ॥१८॥ ततः प्रातः प्रकुर्वीत स्वाचारं च यथाविधि । पुनः संपूजयेद्देवं यथा विभवविस्तरम् ॥१९॥ ब्राह्मणान्भोजयेच्छक्त्या ततश्च प्रयतो नरः । बन्धुभृत्यादिभिः सार्धं स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः ॥२०॥ एवं पौषादिमासेषु पूर्णमास्यामुपोषितः । अर्चयेद्भक्तिसंयुक्तो नारायणमनामयम् ॥२१॥ एवं संवत्सरं कृत्वा कार्तिकां पूर्णिमादिने । उद्यापनं प्रकुर्वीत तद्विधानं वदामि ते ॥२२॥ वाद्य, नृत्य, पुराणपाठ और स्तोत्र आदि से भगवान् की आराधना करे ॥७-८॥ इसके बाद भगवान् के आगे एक अरत्नि (बँधी मुट्ठी वाला हाथ) लम्बी वर्गाकार वेदी बनाकर गृह्य सूत्रोक्त विधि से अग्नि स्थापन करे । आज्य भाग तक की विधि सम्पन्न कर सब पापों की निवृत्ति के लिए पुरुष सूक्तों के मन्त्रों से एक बार, दो बार तथा तीन बार तक शक्ति के अनुसार चरु, तिल और घी का यत्नपूर्वक हवन करे । ज्ञानी व्रती अपने गृह्यसूत्रों की विधि से हवन और प्रायश्चित्तादि कर्म समाप्त कर विधि पूर्वक शान्ति सूक्त का जप करे ॥९-११॥ इतनी विधि करने के पश्चात् पुनः भगवान् की पूजाकर अपने उपवास आदि व्रत को भक्तिपूर्वक भगवान् को ही 'देव ! निराहार रहकर पूर्णिमा व्रत का अनुष्ठान करने के बाद दूसरे दिन भोजन करूँगा, पुण्डरीकाक्ष ! आप मेरे शरणदायक होइए' यह कह कर अर्पित करे । तत्पश्चात् भगवान् को अर्घ्य दे और पृथ्वी पर घुटने टेक कर हाथ में श्वेत पुष्प, अक्षत लेकर 'क्षीर सागर से उत्पन्न ! अत्रिवंशज ! रोहिणीनायक ! प्रभो ! मेरे दिये अर्घ्य को ग्रहण कीजिए ।' इस मन्त्र से चन्द्रमा को अर्घ्य दे ॥१२-१५॥ नारद ! इस प्रकार चन्द्रमा को अर्घ्य देने के बाद हाथ जोड़कर पूर्वाभिमुख हो चन्द्रमा को देखता हुआ इस मन्त्र से प्रार्थना करे । मन्त्र- 'श्वेत किरणों वाले तुमको नमस्कार है, द्विजराज को नमस्कार है, रोहिणी के पति और लक्ष्मी के भ्राता तुमको नमस्कार है।' इतनी क्रिया समाप्त करने के अनन्तर वह संयमी, पवित्र, व्रती पाखण्ड और दुर्जन की संगति से अपने को अलग रख कर पुराण श्रवण, कीर्तन आदि से रात्रि को जागरण करे ॥१६-१८॥ प्रातःकाल यथाविधि अपनी नित्य क्रियाओं से निवृत्त होकर पुनः अपने विभव के अनुकूल भगवान् की पूजा कर यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन करावे । तदनन्तर स्वयं व्रती भाई और सेवकों के सहित भोजन करे। इसी प्रकार पौष आदि मासों में पूर्णिमा के दिन निराहार रहकर भक्तिपूर्वक निर्विकार नारायण की पूजा करे ॥१९-२१॥ इस प्रकार वर्ष भर पूर्णिमा का व्रत करने के बाद कार्तिक की पूर्णिमा को व्रत का उद्यापन करना १८-नारदीयपुराणम्

१३८ नारदीयपुराणम् मण्डपं कारयेद्दिव्यं चतुरस्रं सुमङ्गलम् । शोभितं पुष्पमालाभिर्वितानध्वजराजितम् ॥२३॥ बहुदीपसमाकीर्णं किङ्किणीजालशोभितम् । दर्पणैश्चामरैश्चैव कलशैश्च समावृतम् ॥२४॥ तन्मध्ये सर्वतोभद्रं पञ्चवर्णविराजितम् । जलपूर्णं ततः कुम्भं न्यसेत्तस्योपरि द्विज ॥२५॥ पिधाय कुम्भं वस्त्रेण सुसूक्ष्मेणातिशोभितम् । हेम्ना वा रजतेनापि तथा ताम्रेण वा द्विज । लक्ष्मीनारायणं देवं कृत्वा तस्योपरि न्यसेत् ॥२६॥ पञ्चामृतेन संस्नाप्याभ्यर्च्य गन्धादिभिः क्रमात् । भक्ष्यैर्भोज्यादिनैवेद्यैर्भक्तितः संयतेन्द्रियः ॥२७॥ जागरं च तथा कुर्यात्सम्यक्श्रद्धासमन्वितः । परेऽह्नि प्रातर्विधिवत्पूर्ववद्विष्णुमर्चयेत् ॥२८॥ आचार्याय प्रदातव्या प्रतिमा दक्षिणान्विता । ब्राह्मणान्भोजयेच्छक्त्या विभवे सत्यवारितम् ॥२९॥ तिलदानं प्रकुर्वीत यथाशक्त्या समाहितः । कुर्यादग्नौ च विधिवत्तिलहोमं विचक्षणः ॥३०॥ एवं कृत्वा नरः सम्यक् लक्ष्मीनारायणव्रतम् । इह भुक्त्वा महाभोगान्पुत्रपौत्रसमन्वितः ॥३१॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः कुलायुतसमन्वितः । प्रयाति विष्णुभवनं योगिनामपि दुर्लभम् ॥३२॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे व्रताख्याने मार्गशीर्षपौर्णिमायां लक्ष्मीनारायणव्रतं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥१८॥ चाहिए। व्रत उद्यापन की जो विधि है उसको कह रहा हूँ सुनो। पहले चौकोर, शुभ और दिव्य मण्डप बनावे। उसको, फूलों की माला, चंदवा और ध्वजाओं से सजावे। दीपक, किंकिणी, दर्पण, चामर और कलशों से भली भाँति सुशोभित करे। मध्य भाग में पाँच रंगों से रंगा हुआ सर्वतोभद्र चक्र बनावे ॥२२-२४॥ द्विज ! उस चक्र पर जल से भरा एक मंगल-कलश रख कर उसको अति सूक्ष्म वस्त्र से ढंक दे। द्विज ! सोना, चाँदी अथवा अथवा ताँबे की लक्ष्मीनारायण की मूर्ति बनाकर उसे कलश के ऊपर रखे। संयम रखने वाला वह व्रती भक्ति पूर्वक पंचामृत से भगवान् को नहलाकर गंध, पुष्प, नैवेद्य आदि नाना मधुर भोज्य पदार्थों से पूजन करे। रात्रि में श्रद्धा पूर्वक कीर्तन, पाठ आदि करता हुआ जागरण करे और दूसरे दिन प्रातःकाल पूर्व की भाँति विधिवत् पूजा करे फिर दक्षिणा के सहित उस प्रतिमा को आचार्य के हाथ दान कर दे ॥२५-२८॥ सम्पत्ति रहने पर यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन कराने के बाद वह विद्वान् व्रती शक्ति के अनुसार एकाग्रभाव से तिल दान करे और विधिवत् हवन भी करे। इस विधि से भली भाँति लक्ष्मीनारायण-व्रत का अनुष्ठान कर मनुष्य इस लोक में पुत्र, पौत्र आदि के सहित लौकिक भोगों को भोगता है और मृत्यु के बाद अपने दश सहस्र कुलों के साथ पाप-मुक्त होकर योगियों के लिए भी दुर्लभ विष्णुलोक को प्राप्त करता है ॥२६-३२॥ श्रीनारदीय पुराण के व्रताख्यान प्रकरण में मार्गशीर्ष पूर्णिमा को किये किये जाने वाले लक्ष्मीनारायणव्रत का वर्णन नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त ॥१८॥

एकोनविंशोऽध्यायः सनक उवाच अन्यद्व्रतं प्रवक्ष्यामि ध्वजारोपणसंज्ञितम्। सर्वपापहरं पुण्यं विष्णुप्रीणनकारणम् ॥१॥ यः कुर्याद्विष्णुभवने ध्वजारोपणमुत्तमम्। संपूज्यते विरिञ्चाद्यैः किमन्यैर्बहुभाषितैः ॥२॥ हेमभारसहस्रं तु यो ददाति कुटुम्बिने। तत्फलं तुल्यमात्रं स्याद्ध्वजारोपणकर्मणः ॥३॥ ध्वजारोपणतुल्यं स्याद्गङ्गास्नानमनुत्तमम्। अथवा तुलसीसेवा शिवलिङ्गप्रपूजनम् ॥४॥ अहोऽपूर्वमहोऽपूर्वमहोऽपूर्वमिदं द्विज। सर्वपापहरं कर्म ध्वजारोपणसंज्ञितम् ॥५॥ सन्ति वै यानि कार्याणि ध्वजारोपणकर्मणि। तानि सर्वाणि वक्ष्यामि शृणुष्व गदतो मम ॥६॥ कार्तिकस्य सिते पक्षे दशम्यां प्रयतो नरः। स्नानं कुर्यात्प्रयत्नेन दन्तधावनपूर्वकम् ॥७॥ एकाशी ब्रह्मचारी च स्वपेन्नारायणं स्मरन्। धौताम्बरधरः शुद्धो विप्रो नारायणप्रतः ॥८॥ ततः प्रातः समुत्थाय स्नात्वाचम्य यथाविधि। नित्यकर्माणि निर्वर्त्य पश्चाद्विष्णुं समर्चयेत् ॥९॥ चतुर्भिर्ब्राह्मणैः सार्द्धं कृत्वा च स्वस्तिवाचनम्। नान्दीश्राद्धं प्रकुर्वीत ध्वजारोपणकर्मणि ॥१०॥ ध्वजस्तम्भौ च गायत्र्या प्रोक्षयेद्वस्त्रसंयुतौ। सूर्यं च वैनतेयं च हिमांशुं तत्परोऽर्चयेत् ॥११॥ धातारं च विधातारं पूजयेद्ध्वजदण्डके। हरिद्राक्षतगन्धाद्यैः शुक्लपुष्पैर्विशेषतः ॥१२॥ अध्याय १६ विष्णु-मन्दिर में ध्वजारोपण सनक बोले--दूसरे ध्वजारोपण नामक व्रत के विषय में, जो सब पापों को नष्ट करने वाला, पुण्यदा- यक और भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने वाला है, कह रहा हूँ। जो मनुष्य विष्णु मन्दिर में भली भाँति ध्वजा- रोपण कर्म करता है वह ब्रह्मा आदि देवताओं से भी पूजित होता है, इसके विषय में और अधिक क्या कहा जाय। जो व्यक्ति किसी परिवार वाले ब्राह्मण को एक हजार भार सोना दान में देता है, उसके बराबर फल ध्वजारोपण कर्म से प्राप्त होता है। ध्वजारोपण कर्म परमोत्तम गंगास्नान, तुलसीसेवा अथवा शिवलिङ्ग की पूजा के समान फल को देने वाला है ॥१-४॥ द्विज ! क्या ही यह अपूर्व कर्म है, अपूर्वकर्म है, अपूर्वकर्म है, यह ध्वजा- रोपण नामक कर्म सब पापों को दूर करने वाला है, इस ध्वजारोपण कर्म की जितनी विधियाँ हैं, उनको कह रहा हूँ, सुनो ॥५-६॥ कार्तिक-शुक्ल-दशमी को मनुष्य संयम पूर्वक रहे, दातोन आदि से छुटकारा पाकर भली भाँति स्नान करे। विप्र ! ब्रह्मचर्य और एकाहार व्रत धारण कर वह व्रती शुद्धता के साथ स्वच्छ वस्त्र पहने और भगवान् नारायण के सामने ही नामस्मरण करता हुआ सोये। प्रातः काल उठकर यथा विधि आचमन, स्नान आदि नित्य कर्मों से निवृत्त होने के बाद विष्णु की पूजा करे। ध्वजारोपण कर्म में सबसे पहले चार ब्राह्मणों के साथ स्वस्ति पाठ कर नान्दी-श्राद्ध करे ॥७-१०॥ गायत्री मन्त्र से दो ध्वज-स्तम्भों को, जिनमें वस्त्र लपेटे गये हों, नहलाये। तदनन्तर सूर्य, गरुड़ और चन्द्रमा की पूजा करे। ध्वज-दण्ड पर हल्दी, गंध, अक्षत और विशेष रूप से श्वेत पुष्प

१४० नारदीयपुराणम् ततो गोचर्ममात्रं तु स्थण्डिलं चोपलिप्य वै । आधायाग्निं स्वगृह्योक्त्याह्याज्यभागादिकं क्रमात् ॥१३॥ जुहुयात्पायसं चैव साज्यमष्टोत्तरं शतम् । प्रथमं पौरुषं सूक्तं विष्णोर्नुकमिरावतीम् ॥१४॥ ततश्च वैनतेयाय स्वाहेत्यष्टाहुतीस्तथा । सोमो धेनुर्मुदुत्वं च जुहुयाच्च ततो द्विज ॥१५॥ सौरमन्त्रान्जपेत्तत्र शान्तिसूक्तानि शक्तितः । रात्रौ जागरणं कुर्यादुपकण्ठं हरेः शुचिः ॥१६॥ ततः प्रातः समुत्थाय नित्यकर्म समाप्य च । गन्धपुष्पादिभिर्देवमर्चयेत्पूर्ववत्क्रमात् ॥१७॥ ततो मङ्गलवाद्यैश्च सूक्तपाठैश्च शोभनम् । नृत्यैश्च स्तोत्रपठनैर्नयेद्विष्णवालये ध्वजम् ॥१८॥ देवस्य द्वारदेशे वा शिखरे वा मुदान्वितः । सुस्थिरं स्थापयेद्विप्रध्वजं सुस्तम्भसंयुतम् ॥१९॥ गन्धपुष्पाक्षतैर्देवं धूपदीपैर्मनोहरैः । भक्ष्यभोज्यादिसंयुक्तैर्नैवेद्यैश्च हरिं यजेत् ॥२०॥ एवं देवालये स्थाप्य शोभनं ध्वजमुत्तमम् । प्रदक्षिणमनुव्रज्य स्तोत्रमेतदुदीरयेत् ॥२१॥ नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन । नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुष पूर्वज ॥२२॥ येनेदमखिलं जातं यत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् । लयमेष्यति यत्रैवं तं प्रपन्नोऽस्मि केशवम् ॥२३॥ न जानन्ति परं भावं यस्य ब्रह्मादयः सुराः । योगिनो यं न पश्यन्ति तं वन्दे ज्ञानरूपिणम् ॥२४॥ अन्तरिक्षं तु यन्नाभिद्यौर्मूर्द्धा यस्य चैव हि । पादोऽभूद्यस्य पृथिवी तं वन्दे विश्वरूपिणम् ॥२५॥ यस्य श्रोत्रे दिशः सर्वा यच्चक्षुर्दिनकृच्छशी । ऋक्सामयजुषी येन तं वन्दे ब्रह्मरूपिणम् ॥२६॥ यन्मुखाद्ब्राह्मणा जाता यद्बाह्वोर्भवन्नृपाः । वैश्या यस्योरुतो जाताः पद्भ्यां शूद्रो व्यजायत ॥२७॥ से धाता और विधाता की पूजा करे । इतनी क्रिया के बाद गौ के चमड़े के बराबर विस्तार वाली भूमि को भली भाँति लीपकर अपने गृह्य सूत्र की विधि से अग्नि स्थापन और क्रमशः आज्य भाग आदि विधियाँ करे । एक सौ आठ बार खीर की आहुतियाँ दे । पहले पुरुष सूक्त से विष्णु, ब्रह्मा और लक्ष्मी के लिए हवन करे । तत्पश्चात् वैनतेयाय स्वाहा, इस मन्त्र से आठ आहुतियाँ दे । द्विज ! इसके बाद चन्द्रमा, कामधेनु और सूर्य के निमित्त आहुतियाँ दे ॥११-१५॥ वहाँ हरि के समीप शक्ति के अनुसार सौर मन्त्र और शान्ति सूक्त का जप करे । उसी मन्दिर में भगवान् के समीप हो जागरण के द्वारा रात को बितावे । प्रातः काल उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर क्रमशः गंध, पुष्प आदि से भगवान् की पूजा करे । पूजन के बाद मांगलिक बाजे बजाते हुए, नृत्य-गीत गाते हुए सूक्त, स्तोत्र का पाठ करते हुए विष्णु मन्दिर में उस ध्वजा को ले जाना चाहिए ॥१६-१८॥ विप्र ! देव- मन्दिर के द्वार पर अथवा मन्दिर के शिखर पर प्रसन्नता के साथ किसी स्तम्भ से मिलाकर उसको स्थिरतापूर्वक स्थापित करना चाहिए । गंध, पुष्प, अक्षत और मनोहर धूप, दीप और सुस्वादु भोज्य पदार्थों के सहित मधुर अन्न से विष्णु की पूजा करनी चाहिए । इस विधि से देवालय में उत्तम सुन्दर ध्वजा की स्थापना करने के पश्चात् प्रदक्षिणा कर स्तोत्र पाठ करना चाहिए—पुण्डरीकाक्ष ! तुमको नमस्कार है, विश्वव्यापक ! नमस्कार है, हृषीकेश ! महापुरुषों के पूर्वज ! नमस्कार है ॥१६-२२॥ जिससे यह सारा विश्व उत्पन्न हुआ, जिसमें यह स्थित और जिसमें पुनः लीन होता है उस केशव की शरण में हूँ। जिसके परम तत्त्व को ब्रह्मा आदि देवता नहीं जान पाते हैं, योगी जिसको नहीं देख पाते हैं उस ज्ञान स्वरूप ब्रह्म को नमस्कार है । अन्तरिक्ष जिसकी नाभि, आकाश मूर्द्धा और पृथ्वी जिसका चरण है उस विश्वरूप को नमस्कार है । जिसके दोनों कान दिशायें, सूर्य और चन्द्रमा जिसके नेत्र और ऋक् यजुस् और साम जिससे व्याप्त हैं उस वेद रूप भगवान् की वन्दना करता हूँ ॥२३-२६॥ माया के संसर्ग मात्र से जिसके मुख से ब्राह्मण और भुजाओं से सब क्षत्रिय उत्पन्न हुए, जिसके ऊरु (जंघा) से वैश्य और चरणों

१४१ एकोनविंशोऽध्यायः स्वभावविमलं शुद्धं निर्विकारं निरञ्जनम् ॥२८॥ मायासाङ्गममात्रेण वदन्ति पुरुषं त्वजम् । सद्‌भक्तवत्सलं विष्णुं भक्तिगम्यं नमाम्यहम् ॥२६॥ क्षीराब्धिशायिनं देवमनन्तमपराजितम् । सूक्ष्मासूक्ष्माणि येनास॑स्तं वन्दे सर्वतोमुखम् ॥३०॥ पृथिव्यादीनि भूतानि तन्मात्राणीन्द्रियाणि च । निर्गुणं परमं सूक्ष्मं प्रणतोऽस्मि पुनः पुनः ॥३१॥ यद्ब्रह्म परमं धाम सर्वलोकोत्तमोत्तमम् । यमाममन्ति योगीन्द्राः सर्वकारणकारणम् ॥३२॥ अविकारमजं शुद्धं सर्वतोबाहुमीश्वरम् । जगन्मयः । निर्गुणः परमात्मा च स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥३३॥ यो देवः सर्वभूतानामन्तरात्मा ज्ञानिनां सर्वगो यस्तु स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥३४॥ हृदयस्थोऽपि दूरस्थो मायया मोहितात्मनाम् । हूयते च पुनद्वाभ्यां स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥३५॥ चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च । गतिदाता विश्वसृग्यः स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥३६॥ ज्ञानिनां कर्मिणां चैव तथा भक्तिमतां नृणाम् । तानर्चयन्ति विबुधाः स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥३७॥ जगद्धितार्थं ये देहा ध्रियन्ते लीलया हरेः । निर्गुणं च गुणाधारं स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥३८॥ यमाममन्ति वै सन्तः सच्चिदानन्दविग्रहम् । आचार्यम् पूजयेत्पश्चाद्दक्षिणाच्छादनादिभिः ॥३६॥ इति स्तुत्वा नमेद्विष्णुं ब्राह्मणांश्च प्रपूजयेत् । पुत्रमित्रकलत्रायैः स्वयं च सह बन्धुभिः ॥४०॥ ब्राह्मणाम्भोजयेच्छक्त्या भक्तिभावसमन्वितः । कुर्वीत पारणं विप्र नारायणपरायणः । तस्य पुण्यफलं वक्ष्ये शृणुष्व सुसमाहितः ॥४१॥ यस्त्वेतत्कर्म कुर्वीत ध्वजारोपणमुत्तमम् । तावन्ति पापजालानि नश्यन्त्येव न संशयः ॥४२॥ पटो ध्वजस्य विप्रेन्द्र यावच्चलति वायुना । से शुद्ध उत्पन्न हुए जिसको अज, पुरुष, स्वभाव शुद्ध, पवित्र, निर्विकार, निरंजन, क्षीरसागरशायी, देव, अनन्त, अपराजित, सद्‌भक्तवत्सल कहते हैं, और जो भक्ति से प्राप्त करने योग्य है उस विष्णु को नमस्कार करता हूँ। जिससे पृथ्वी आदि पंच महाभूत, गन्ध आदि तन्मात्रायें, १ सब इन्द्रियाँ, सूक्ष्म और असूक्ष्म पदार्थ उत्पन्न हुए, उस सर्वतोमुख की वन्दना करता हूँ ॥२७-३०॥ जो ब्रह्म परम धाम, सब लोकों में परमोत्तम, निर्गुण, परम और सूक्ष्म है उसको बार-बार नमस्कार करता हूँ। सब कारणों के भी कारण, निर्विकार, अज, शुद्ध, सर्वतोबाहु और ईश्वर जिसको योगीन्द्र प्रणाम करते हैं, जो देव सब प्राणियों के अन्तरात्मा, जगन्मय, निर्गुण, परमात्मा हैं, वे विष्णु मेरे ऊपर प्रसन्न हों ॥३१-३३॥ जो माया मोहित जनों के हृदय में रहते हुए भी उनसे दूर हैं, जो ज्ञानी मनुष्यों के लिए सर्वथा प्राप्य हैं वे विष्णु मेरे ऊपर प्रसन्न हों। जो चार, चार, दो-दो और पाँच आहुतियों से हविस् ग्रहण करते हैं अर्थात् जिसके निमित्त सर्वप्रथम चार-चार, दो-दो और पाँच बार आहुतियाँ दी जाती हैं वे विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों ॥३४-३५॥ जो ज्ञानी, कर्मी और भक्त जनों के गति-दाता, विश्व के एकमात्र प्राप्य हैं वे विष्णु मेरे ऊपर प्रसन्न हों। भगवान् विष्णु जगत्कल्याण के लिए लीलापूर्वक जिन शरीरों को धारण करते हैं, देवता जिनकी पूजा करते हैं, वे विष्णु मेरे ऊपर प्रसन्न हों। सन्त लोग जिस सच्चिदानन्द स्वरूप धारण करने वाले भगवान् की पूजा करते हैं, जो निर्गुण, निराधार हैं वे विष्णु मेरे ऊपर प्रसन्न हों ॥३६-३८॥ इस प्रकार विष्णु की स्तुति करने के बाद उन्हें नमस्कार करे; फिर ब्राह्मणों की पूजा के अनन्तर आचार्य की दक्षिणा, वस्त्र आदि से विधिवत् पूजा करनी चाहिए । विप्र ! भक्तिभाव से यथा शक्ति ब्राह्मण भोजन करा कर स्वयं पुत्र, मित्र, स्त्री और बन्धुजनों के साथ नारायण- परायण होकर पारण करना चाहिए । ॥३६-४०॥ विप्र ! जो व्यक्ति इस उत्तम ध्वजारोपण कर्म को करता है, उसके पुण्य-फल को कह रहे हैं, सावधान होकर सुनो । विप्रेन्द्र ! उस ध्वजा का वस्त्र जितने दिनों तक वायु से फहराता रहता है उसके उतने ही पाप-समूह १. गन्ध, रूप, रस, स्पर्श और रूप तन्मात्रा कहलाते हैं।

१४२ नारदीयपुराणम् महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकैः । ध्वजं विष्णोगृहे कृत्वा मुच्यते सर्वपातकैः ॥४३॥ यावद्दिनानि तिष्ठेत ध्वजो विष्णोगृहे द्विज । तावद्युगसहस्राणि हरिसारूप्यमश्नुते ॥४४॥ आरोपितं ध्वजं दृष्ट्वा येऽभिनन्दन्ति धार्मिकाः । तेऽपि सर्वे प्रमुच्यन्ते महापातककोटिभिः ॥४५॥ आरोपितो ध्वजो विष्णोगृहे धुन्वन्पटं स्वकम् । कर्तुः सर्वाणि पापानि धुनोति निमिषार्द्धतः ॥४६॥ यस्त्वारोप्य गृहे विष्णोर्ध्वजं नित्यमुपाचरेत् । स देवयानेन दिवं यातीव सुमतिर्नृपः ॥४७॥ इति श्री बृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे व्रताख्याने ध्वजारोपणन्नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥१९॥ विंशोऽध्यायः नारद उवाच भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रार्थपारग । सर्वकर्मवरिष्ठं च त्वयोक्तं ध्वजधारणम् ॥१॥ यस्तु वै सुमतिर्नाम ध्वजारोपपरो मुने । त्वयोक्तस्तस्य चरितं विस्तरेण समादिश ॥२॥ सनक उवाच शृणुष्वैकमनाः पुण्यमितिहासं पुरातनम् । ब्रह्मणा कथितं मह्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥३॥ नष्ट हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं । महापापों से युक्त अथवा सब पापों के करने वाले व्यक्ति विष्णु मन्दिर में ध्वजारोपण कर सब पापों से छूट जाते हैं ॥४१-४३॥ जितने दिनों तक वह ध्वजा रहती है वह उतने हजार युगों तक विष्णु का सारूप्य मोक्ष प्राप्त करता है । जो धार्मिक आरोपित ध्वजा को देखकर नमस्कार करते हैं, वे भी अपने करोड़ों महापापों से मुक्त हो जाते हैं । विष्णु-मन्दिर में आरोपित हुआ ध्वज अपने वस्त्र को हिलाता हुआ कर्त्ता के सब पापों को एक पल में नष्ट कर देता है । जो सुमति नामक राजा विष्णु के मन्दिर में ध्वज की स्थापना कर नित्य प्रति पूजा करता था वह आज भी देव-विमान से स्वर्ग लोक को जाता हुआ सा प्रतीत होता है ॥४४-४७॥ श्रीनारदीयपुराण में ध्वजारोपण नामक उन्नीसवां अध्याय समाप्त ॥१९॥ अध्याय २० सोमवंशी राजा सुमति का अपने पूर्वजन्म का इतिहास-कथन नारद बोले--भगवन् ! सब धर्मों के जानने वाले ! सब शास्त्रों के पारगामी ! आपने ध्वजारोपण को सब कर्मों में श्रेष्ठ कहा है । मुनिवर ! ध्वजारोपण करने वाले सुमति नामक जिस राजा के चरित्र का वर्णन अभी किया है उसको विस्तार पूर्वक मुझसे कहिए ॥१-२॥ सनक बोले--उस पुरातन, सब पापों को दूर करने वाले पुण्यदायक इतिहास को एकाग्र होकर सुनो, जिस को ब्रह्मा ने स्वयं मुझसे कहा है । बहुत पहले, कृत युग में सोमवंशी सुमति नामक राजा था, जो श्रीमान्, सातों

१४३ विंशोऽध्यायः श्रीमान्सप्तद्वीपैकनायकः ॥४॥ आसीत्पुरा कृतयुगे सुमतिर्नाम भूपतिः । सोमवंशोद्भवः सर्वसंपद्विभूषितः ॥५॥ धर्मात्मा सत्यसंपन्नः शुचिवंश्योऽतिथिप्रियः । सर्वलक्षणसंपन्नः शुश्रूषुर्निरहंकृतिः ॥६॥ सदा हरिकथासेवी हरिपूजापरायणः । हरिभक्तपराणां च कीर्तिमांस्तथा ॥७॥ पूज्यपूजारतो नित्यं समदर्शी गुणान्वितः । सर्वभूतहितः शान्तः कृतज्ञः सत्यमतिर्मुने ॥८॥ तस्य भार्या महाभागः सर्वलक्षणसंयुता । पतिव्रता पतिप्राणा नाम्ना सत्यपरायणौ ॥६॥ तावुभौ दम्पती नित्यं हरिपूजापरायणौ । जातिस्मरौ महाभागौ सत्यज्ञौ तडागारामवप्रादीनसंख्यातानन्वितैनतुः ॥१०॥ अन्नदानरतौ नित्यं जलदानपरायणौ । मनोज्ञा मञ्जुवादिनी ॥११॥ सा तु सत्यमतिर्नित्यं शुचिर्विष्णोगृहे सती । नृत्यत्यत्यन्तसन्तुष्टा मनोज्ञं बहुविस्तरम् ॥१२॥ सोऽपि राजा महाभागौ द्वादशीद्वादशीदिने । ध्वजमारोपयत्येव प्रियांसत्यमति चास्य देवा अपि सदास्तुवन् ॥१३॥ एवं हरिपरं नित्यं राजानं धर्मकोविदम् । त्रिलोके विश्रुतौ ज्ञात्वा दम्पती धर्मकोविदौ । आययौ बहुभिः शिष्यैर्द्रष्टुकामो विभाण्डकः ॥१४॥ तमायांतं मुनिं श्रुत्वा स तु राजा विभाण्डकम् । प्रत्युद्ययौ सपत्नीकः पूजाभिर्बहुविस्तरम् ॥१५॥ कृतातिथ्यक्रियं शान्तं कृतासनपरिग्रहम् । नीचासनस्थितो भूपः प्राञ्जलिर्मुनिमब्रवीत् ॥१६॥ राजोवाच भगवन्कृतकृत्योऽस्मि त्वदभ्यागमनेन वै । सतामागमनं सन्तः प्रशंसन्ति सुखावहम् ॥१७॥ यत्र स्यान्महतां प्रेम तत्र स्युः सर्वसंपदः । तेजः कीर्तिर्धनं पुत्रा इति प्राहुर्विपश्चितः ॥१८॥ द्वीपों का एकमात्र शासक, धर्मात्मा, सत्यप्रेमी, शुद्ध परिवार वाला, अतिथिसवेक, सब लक्षणों से युक्त और सब ऐश्वर्यों से सम्पन्न था ॥३-५॥ वह सर्वदा हरि-कथा में मग्न और भगवान् की पूजा को ही अपना लक्ष्य समझता था । अहंकार-रहित होकर हरि-भक्तों की सेवा किया करता था । समदर्शी, गुणी वह राजा पूज्यों की पूजा करता तथा सब प्राणियों के हित में लगा रहता था । वह परम शान्त, कृतज्ञ और यशस्वी था ॥६-७॥ मुनि ! उस राजा की सत्यमति नाम की सौभाग्यवती, सब शुभ लक्षणों से युक्त, पतिव्रता और पति को प्राणों से भी बढ़कर समझने वाली स्त्री थी । वे दोनों पति-पत्नी सर्वदा विष्णु की पूजा किया करते थे । भाग्यशाली, सत्य के जानने वाले और सत्यपरायण उन दोनों को पूर्व जन्म की बातों का भी ज्ञान था । वे नित्य अन्न और जल का दान करते थे और असंख्य, तालाब, वाटिका और धर्मशाला आदि बनवाते थे । वह मंजुभाषिणी सत्यमति प्रति दिन पवित्र भाव से विष्णु मन्दिर में प्रसन्न होकर नृत्य करती थी ॥८-११॥ वह राजा भी प्रति द्वादशी को मनोहर और बहुत बड़ी ध्वजा की स्थापना किया करता था । ऐसे हरिभक्त, धर्मज्ञ, राजा और उसकी रानी सत्यमति की देवता भी सर्वदा स्तुति किया करते थे । उस धर्मज्ञ दम्पती का तीनों लोकों में यश सुनकर अनेकों शिष्यों के साथ विभांडक ऋषि मिलने के लिए आये । राजा ने मुनि विभांडक का आगमन सुनकर पत्नी सहित बड़े समारोह के साथ अगवानी की । बड़ी श्रद्धा से अतिथिसत्कार कर उस शान्त मुनि को आसन पर बैठाया । राजा स्वयं मुनि के समीप एक लघु आसन पर बैठकर हाथ जोड़कर मुनि से बोला ॥१२-१६॥ राजा बोला--भगवन् ! आपके इस शुभागमन से मैं कृतकृत्य हूँ, सज्जन व्यक्ति सुखदायक सज्जन सन्तों के आगमन की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं । जिस व्यक्ति पर पुण्यात्माओं का स्नेह होता है उसको सारी संपत्तियाँ, तेज, यश, धन, और पुत्र आदि सब कुछ प्राप्त होते हैं, ऐसा विद्वानों ने कहा है । मुनिवर्य ! प्रभो ! जिस पर सज्जनों

१५४ नारदीयपुराणम् तत्र वृद्धिमपायान्ति श्रेयांस्यनुदिनं मुने । यत्र सन्तः प्रकुर्वन्ति महतीं करुणां प्रभो ॥१९६॥ यो मूर्ध्नि धारयेद्ब्रह्मन्महत्पादजलं रजः । स स्नातः सर्वतीर्थेषु पुण्यात्मा नात्र संशयः ॥२०॥ मम पुत्राश्च दाराश्च संपत्त्वयि समर्पिताः । मामाज्ञापय विप्रेन्द्र किं प्रियं करवाणि ते ॥२१॥ विनयावनतं भूपं स निरीक्ष्य मुनीश्वरः । स्पृशन्करेण तं प्रीत्या प्रत्युवाचातिहर्षितः ॥२२॥ ऋषिरुवाच राजन्यदुक्तं भवता तत्सर्वं त्वत्कुलोचितम् । विनयावनतः सर्वो बहुश्रेयो लभेदित ॥२३॥ धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्च नृपसत्तम । विनयाल्लभते मर्त्यो दुर्लभं किं महात्मनाम् ॥२४॥ प्रीतोऽस्मि तव भूपाल सन्मार्गपरिवर्तिनः । स्वस्ति ते सततं भूयाद्यत्पृच्छामि तदुच्यताम् ॥२५॥ पूजाबहुविधाः सन्ति हरितुष्टिविधायिकाः । तासु नित्यं ध्वजारोपे वर्तसे त्वं सदोद्यतः ॥२६॥ भार्यापि तव साध्वीयं नित्यं नृत्यपरायणा । किमर्थमेतद्वृत्तान्तं यथावद्वक्तुमर्हसि ॥२७॥ राजोवाच शृणुष्व भगवन्सर्वं यत्पृच्छसि वदामि तत् । आश्चर्यभूतं लोकानामावयोश्चरितं त्विह ॥२८॥ अहमासं पुरा शूद्रो मालिनिर्नाम सत्तम । कुमार्गनिरतो नित्यं सर्वलोकाहिते रतः ॥२९॥ पिशुनो धर्मविद्वेषी देवद्रव्यापहारकः । गोघ्नश्च ब्रह्महा चौरः सर्वप्राणिवधे रतः ॥३०॥ नित्यं निष्ठुरवक्ता च पापी वेश्यापरायणः । एवं स्थितः कियत्कालमनादृत्य महद्वचः ॥३१॥ सर्वबन्धुपरित्यक्तो दुःखी वनमुपागतः । मृगमांसाशनो नित्यं तथा पान्थविलुम्पकः ॥३२॥ की महान् कृपा होती है, उसके श्रेय और पुण्य दिनों दिन बढ़ते हैं। ब्रह्मन् ! जो महापुरुषों के चरणोदक और चरणरज को अपने शिर पर धारण करता है उस पुण्यात्मा ने मानो सब तीर्थों में स्नान कर लिया, इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं । मेरे पुत्र, स्त्री और सारा कोश आपकी सेवा में अर्पित है । विप्रेन्द्र ! मुझे आज्ञा दीजिए, कौन सी आपकी प्रिय सेवा करूँ । वे मुनिश्वर उस विनीत राजा को देखकर उसके शरीर पर हाथ फेरते हुए बड़े प्रेम से बोले ॥१९७-२२॥ ऋषि बोले--राजन् ! जो कुछ तुमने कहा, वह सब तुम्हारे कुल के सर्वथा अनुरूप है, इस संसार में विनय- शील व्यक्ति को सब श्रेय प्राप्त होते हैं नृपवर्य ! मनुष्य विनय के द्वारा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सब कुछ प्राप्त करता है, महापुरुषों के लिए इस संसार में दुर्लभ क्या है ? भूपाल ! सन्मार्ग का प्रदर्शन करने वाले तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ,तुम्हारा सर्वदा कल्याण हो, आज मैं जो कुछ पूछ रहा हूँ, उसका उत्तर दो । भगवान् को प्रसन्न करने वाली बहुत सी पूजा-विधियाँ हैं, परन्तु तुम उनमें सर्वदा ध्वजारोपण ही उत्साह के साथ किया करते हो, तुम्हारी वह साध्वी भार्या भी नित्य मन्दिर में नृत्य किया करती है, इस विषय में मुझे यथार्थ बात बतलाओ ॥२३-२७॥ राजा ने कहा-- भगवन् ! आप जो कुछ-पूछ रहे हैं, उसको मैं बता रहा हूँ, सुनिए । इस संसार में हम दोनों का चरित्र लोक के लिए आश्चर्यजनक है । मुनिसत्तम ! मैं पहले मालिनि नामक शूद्र था । सर्वदा मैं कुमार्ग में लगा रहता और प्राणियों का अहित किया करता था । सदा धर्म से द्वेष करना, देव सम्पत्ति का अपहरण करना, चुगली करना, गोहत्या, ब्रह्महत्या, चोरी और प्राणिवध मेरा काम था ॥२८-३०॥ निष्ठुर बातें करना, वेश्यागमन और पापाचरण ही मेरे नित्य के प्रिय कार्य थे । कुछ काल तक महापुरुषों की बातों के अनादर कर इसी प्रकार असत्कर्म करता रहा । निदान मैं सब बान्धवों और परिवार को छोड़कर दुःखी हो वन में चला गया । उस निर्जन वन में मृग मांस खाकर दिन बिताता और प्रति दिन पथिकों को लूटता था, इस प्रकार अकेला उद्वेगजनक कार्यों को करता हुआ वन में रहने लगा । एक दिन भूख-प्यास से व्याकुल ग्रीष्म की ज्वाला

विंशोऽध्यायः १४५ एकाकी दुःखबहुलो न्यवसन्निर्जने वने । एकदा क्षुत्परिश्रान्तो निदाघार्त्तः पिपासितः ॥३३॥ जीर्णं देवालयं विष्णोरपश्यं विजने वने । हंसकारण्डवाकीर्णं तत्समीपे महत्सरः ॥३४॥ पर्यन्तवनपुष्पौघच्छादितं तन्मुनीश्वर । अपिबं तत्र पानीयं तत्तीरे विगतश्रमः ॥३५॥ फलानि जग्ध्वा शीर्णानि स्वयं क्षुच्च निवारिता । तस्मिञ्जीर्णालये विष्णोर्निवासं कृतवानहम् ॥३६॥ जीर्णस्फुटितसंधानं तस्य नित्यमकारिषम् । पर्णैस्तृणैश्च काष्ठौघैर्गृहं सम्यक् प्रकल्पितम् ॥३७॥ स्वसुखार्थं तु तद्भूमिर्मया लिप्ता मुनीश्वर । तत्राहं व्याधवद्वृत्तिस्थो हत्वा बहुविधान्मृगान् ॥३८॥ आजीवं वर्तयन्नित्यं वर्षाणां विंशतिः स्थितः । अथेयमागता साध्वी विन्ध्यदेशसमुद्भवा ॥३६॥ निषादकुलजा विप्र नाम्ना ख्यातावकोकिला । बन्धुवर्गपरित्यक्ता दुःखिता जीर्णविग्रहा ॥४०॥ क्षुत्तृड्घर्मपरिश्रान्ता शोचन्ती स्वकृतं ह्यघम् । दैवयोगात्समायाता भ्रमन्ती विजने वने ॥४१॥ ग्रीष्मतापार्दिता बाह्य स्वान्ते चार्धिनिपीडिता । इमां दुःखार्दितां दृष्ट्वा जाता मे विपुला दया ॥४२॥ दत्तं मया जलं चास्यै मांसं वन्यफलानि च । गतश्रमा त्वियं ब्रह्मन्मया पृष्टा यथातथम् ॥४३॥ अवेदयत्स्ववृत्तान्तं तच्छृणुष्व महामुने । नाम्नावकोकिला चाहं निषादकुलसम्भवा ॥४४॥ दारुकस्य सुता चाहं विन्ध्यपर्वतवासिनी । परस्वहारिणी नित्यं सदा पैशुन्यवादिनौ ॥४५॥ पुंश्चलीत्येवमुक्त्वा तु बन्धुवर्गैः समुज्झिता । कियत्कालं ततः पत्या भृताहं लोकनिन्दिता ॥४६॥ दैवात्सोऽपि गतो लोकं यमस्यात्र विहाय माम् । कान्तारे विजने चैका भ्रमन्ती दुःखपीडिता ॥४७॥ दैवात्तत्सविधं प्राप्ता जीविताहं त्वयाधुना । इत्येवं स्वकृतं कर्म मह्यं सर्वं न्यवेदयत् ॥४८॥ से संतप्त और थका हुआ सा इधर-उधर घूम रहा था, इतने में उस निर्जन वन में एक विष्णु का टूटा हुआ मन्दिर दिखलायी दिया ॥३१-३३॥ उसके समीप ही हंस और कारंडव पक्षियों से सुशोभित एक महान् सरोवर था। मुनीश्वर ! उसका तट प्रदेश वन्य पुष्पों से आच्छादित था। वहाँ मैंने पानी पिया और तीर पर बैठकर सारी थकावट दूर की। भूमि पर गिरे पके फलों को खाकर अपनी भूख मिटाई। उस जीर्ण शीर्ण देव-मन्दिर में मैंने अपना निवास-स्थान बनाया ॥३४-३६॥ प्रतिदिन उसकी जीर्ण और फटी दरारों को स्वयं जोड़ना प्रारम्भ किया। पत्तियों, घासों और लकड़ियों से एक अच्छा घर भी बना लिया। मुनीश्वर ! अपने सुख के लिए उस भूमि को लीप पोत कर रहने के योग्य बनाया। वहाँ मैं व्याध को भाँति अनेक प्रकार के पशुओं को मारकर अपनी जीविका चलाता था, इस प्रकार वहाँ रहकर बीस वर्ष बिताये । विप्र ! इसके अनन्तर विन्ध्य प्रदेश की रहने वाली, निषाद कुल की यह साध्वी जिसका नाम अवकोकिला था—आई । अपने बन्धु जनों से छोड़ी हुई, दुःखी, दुबली-पतली, भूख-प्यास और धूप से व्याकुल, अपने किये पापों पर पश्चात्ताप करती हुई दैव योग से उस विजन वन में घूमती हुई वहाँ आई ॥३७-४१॥ उस समय धूप से जली हुई वह स्त्री शारीरिक और मानसिक पीड़ा से अत्यन्त पीड़ित थी। दुःख से पीड़ित इसको देखकर मुझे बड़ी दया आई। मैंने इसको पानी, मांस और जंगली फलों को खाने के लिए दिया। ब्रह्मन् ! जब इसकी थकावट दूर हो गई तब इससे जो कुछ पूछा और इसने जो कुछ अपना वृत्तान्त कहा उसको उसी रूप में कह रहा हूँ महामुने ! उसको सुनिए ॥४२-४४॥ मैं निषाद कुल में उत्पन्न हुई हूँ, मेरा नाम अवकोकिला है, मैं दारुक की पुत्री हूँ और विन्ध्य पर्वत पर निवास करती हूँ। पहले मैं सर्वदा चुगली खाती और दूसरे के धन को चुराया करती थी । परिवार वालों ने मुझे पुंश्चली कह कर घर से अलग कर दिया। कुछ समय तक पति ने लोक-निन्दित मेरा भरण-पोषण किया। दैव योग से वह भी यहाँ मुझको अकेली छोड़कर यमलोक को चला गया। मैं दुःखी अकेली इस विजन वन में भटकती हुई दैव योग से यहाँ आपके पास आई हूँ, आपने मुझे इस समय जीवन दान दिया, इस प्रकार इसने अपने किये हुए सब कर्मों को मुझसे कह सुनाया ॥४५-४८॥ इसके अनन्तर हम दोनों उस देव-मन्दिर में दम्पति बन कर दस १९--नारदीयपुराणम्

१४६ नारदीयपुराणम् ततो देवालये तस्मिन्दम्पतीभावमाश्रितौ । स्थितौ वर्षाणि दश च आवां मांसफलाशिनौ ॥४६॥ एकदा मद्यपानेन प्रमत्तौ निर्भरं मुने । तत्र देवालये रात्रौ मुदितौ मांसभोजनात् ॥५०॥ तनुवस्त्रापरिज्ञानौ नृत्यं चक्रुव मोहितौ । प्रारब्धकर्मभोगान्तमावां युगपदागतौ ॥५१॥ यमदूतास्तदायाताः पाशहस्ता भयंकराः । नेतुमावां नृत्यरतौ सुघोरां यमयातनाम् ॥५२॥ ततः प्रसन्नो भगवान्कर्मणा मम मानद । देवावसथसंस्कारसंज्ञितेन कृतेन नः ॥५३॥ स्वदूतान्प्रेषयामास स्वभक्तावनतत्परः । ते दूता देवदेवस्य शङ्खचक्रगदाधराः ॥५४॥ सहस्रसूर्यसंकाशाः सर्वे चारुचतुर्भुजाः । किरीटकुण्डलधरा हारिणो वनमालिनः ॥५५॥ दिशो वितिमिरा विप्र कुर्वन्तः स्वेन तेजसा । भयंकरान्याशहस्तान्दंष्ट्रिणो यमकिङ्करान् ॥५६॥ आवयोर्ग्रहणे यत्तान्‌ऊचुः कृष्णपरायणः ॥५७॥ विष्णुदूता ऊचुः भो भो क्रूरा दुराचारा विवेकपरिवर्जिताः । मुञ्चध्वमेतौ निष्पापौ दम्पती हरिवल्लभौ ॥५८॥ विवेकस्त्रिषु लोकेषु संपदामदिकारणम् । अपापे पापधीर्यस्तु तं विद्यात्पुरुषाधमम् ॥५९॥ पापे त्वपापधीर्यस्तु तं विद्यादधमाधमम् ॥६०॥ यमदूता ऊचुः युष्माभिः सत्यमेवोक्तं कि त्वेतौ पापिसत्तमौ । यमेन पापिनो दण्ड यास्तन्नेष्यामो वयं दिवमौ ॥६१॥ श्रुतिप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः । धर्माधर्मविवेकोऽयं तन्नेष्यामो यमान्तिकम् ॥६२॥ वर्ष बिताये, प्रति दिन मांस और वन्य फलों का ही भोजन होता था । मुनिवर ! एक दिन हम लोग अधिक मदिरा पी लेने से मतवाले हो गए, रात में उस देव मन्दिर में मांस भोजन कर अत्यन्त आनन्द मनाया । मद विह्वल हो शरीर और वस्त्र की सुध बुध खोकर हम दोनों नाचने लगे । अकस्मात् एक ही साथ हम दोनों के प्रारब्ध कर्म के भोग का अन्त भी आ गया ॥४६-५१॥ उस समय भयंकर यमदूत हाथ में पाश लिए हुए नृत्य-रत हम दोनों को घोर नरक यातना में ले जाने के लिए आये । हे मानदाता ! अपने भक्तों की रक्षा करने में तत्पर रहने वाले, भगवान् हम दोनों पर देवमन्दिर के संस्कार आदि के करने के कारण प्रसन्न होकर अपने दूतों को भेजा । देवाधिदेव भगवान् के वे दूत शंख, चक्र और गदा हाथ में लिए हुए, किरीटकुण्डलधारी, वनमाला और हार गले में पहने हुए, सहस्र सूर्य के समान तेजस्वी और सुन्दर चार भुजा वाले थे । विप्र ! कृष्ण रूप धारी दूत अपने तेज से सब दिशा- ओं को प्रकाशित करते हुए उन भयंकर, और बड़े-बड़े दाँतों वाले यम दूतों से बोले जो हाथ में पाश लेकर हम दोनों को बाँधने के लिए उद्यत थे ॥५२-५७॥ विष्णु दूत बोले—अरे क्रूर, दुराचारी, विवेकहीन यमदूतो ! इस भगवद्भक्त, निष्पाप स्त्री-पुरुष को छोड़ दो । देखो विवेक ही तीनों लोकों में सम्पत्ति का एक मात्र कारण माना गया है । जो पाप-रहित प्राणियों को पापी समझता है, उसको नराधम समझना चाहिए । इसी प्रकार जो पापी को पुण्यात्मा समझता है उसको परम अधम समझना चाहिए, ॥५८-६०॥ यमदूत बोले— तुम लोगों ने सत्य ही कहा, किन्तु ये दोनों तो घोर पापी हैं। प्रभु यम द्वारा पापी दण्ड पाते हैं, इस लिए हम इन दोनों को अवश्य ले जायेंगे । वेदों की आज्ञायें ही धर्म हैं और वेद-विरुद्ध बातें ही अधर्म कही जाती हैं । धर्म और अधर्म के विषय में यही निर्णय है। अतः हम अवश्य इन दोनों को यम के समीप