बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४२ नारदीयपुराणम् महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकैः । ध्वजं विष्णोगृहे कृत्वा मुच्यते सर्वपातकैः ॥४३॥ यावद्दिनानि तिष्ठेत ध्वजो विष्णोगृहे द्विज । तावद्युगसहस्राणि हरिसारूप्यमश्नुते ॥४४॥ आरोपितं ध्वजं दृष्ट्वा येऽभिनन्दन्ति धार्मिकाः । तेऽपि सर्वे प्रमुच्यन्ते महापातककोटिभिः ॥४५॥ आरोपितो ध्वजो विष्णोगृहे धुन्वन्पटं स्वकम् । कर्तुः सर्वाणि पापानि धुनोति निमिषार्द्धतः ॥४६॥ यस्त्वारोप्य गृहे विष्णोर्ध्वजं नित्यमुपाचरेत् । स देवयानेन दिवं यातीव सुमतिर्नृपः ॥४७॥ इति श्री बृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे व्रताख्याने ध्वजारोपणन्नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥१९॥ विंशोऽध्यायः नारद उवाच भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रार्थपारग । सर्वकर्मवरिष्ठं च त्वयोक्तं ध्वजधारणम् ॥१॥ यस्तु वै सुमतिर्नाम ध्वजारोपपरो मुने । त्वयोक्तस्तस्य चरितं विस्तरेण समादिश ॥२॥ सनक उवाच शृणुष्वैकमनाः पुण्यमितिहासं पुरातनम् । ब्रह्मणा कथितं मह्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥३॥ नष्ट हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं । महापापों से युक्त अथवा सब पापों के करने वाले व्यक्ति विष्णु मन्दिर में ध्वजारोपण कर सब पापों से छूट जाते हैं ॥४१-४३॥ जितने दिनों तक वह ध्वजा रहती है वह उतने हजार युगों तक विष्णु का सारूप्य मोक्ष प्राप्त करता है । जो धार्मिक आरोपित ध्वजा को देखकर नमस्कार करते हैं, वे भी अपने करोड़ों महापापों से मुक्त हो जाते हैं । विष्णु-मन्दिर में आरोपित हुआ ध्वज अपने वस्त्र को हिलाता हुआ कर्त्ता के सब पापों को एक पल में नष्ट कर देता है । जो सुमति नामक राजा विष्णु के मन्दिर में ध्वज की स्थापना कर नित्य प्रति पूजा करता था वह आज भी देव-विमान से स्वर्ग लोक को जाता हुआ सा प्रतीत होता है ॥४४-४७॥ श्रीनारदीयपुराण में ध्वजारोपण नामक उन्नीसवां अध्याय समाप्त ॥१९॥ अध्याय २० सोमवंशी राजा सुमति का अपने पूर्वजन्म का इतिहास-कथन नारद बोले--भगवन् ! सब धर्मों के जानने वाले ! सब शास्त्रों के पारगामी ! आपने ध्वजारोपण को सब कर्मों में श्रेष्ठ कहा है । मुनिवर ! ध्वजारोपण करने वाले सुमति नामक जिस राजा के चरित्र का वर्णन अभी किया है उसको विस्तार पूर्वक मुझसे कहिए ॥१-२॥ सनक बोले--उस पुरातन, सब पापों को दूर करने वाले पुण्यदायक इतिहास को एकाग्र होकर सुनो, जिस को ब्रह्मा ने स्वयं मुझसे कहा है । बहुत पहले, कृत युग में सोमवंशी सुमति नामक राजा था, जो श्रीमान्, सातों