भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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१४३ विंशोऽध्यायः श्रीमान्सप्तद्वीपैकनायकः ॥४॥ आसीत्पुरा कृतयुगे सुमतिर्नाम भूपतिः । सोमवंशोद्भवः सर्वसंपद्विभूषितः ॥५॥ धर्मात्मा सत्यसंपन्नः शुचिवंश्योऽतिथिप्रियः । सर्वलक्षणसंपन्नः शुश्रूषुर्निरहंकृतिः ॥६॥ सदा हरिकथासेवी हरिपूजापरायणः । हरिभक्तपराणां च कीर्तिमांस्तथा ॥७॥ पूज्यपूजारतो नित्यं समदर्शी गुणान्वितः । सर्वभूतहितः शान्तः कृतज्ञः सत्यमतिर्मुने ॥८॥ तस्य भार्या महाभागः सर्वलक्षणसंयुता । पतिव्रता पतिप्राणा नाम्ना सत्यपरायणौ ॥६॥ तावुभौ दम्पती नित्यं हरिपूजापरायणौ । जातिस्मरौ महाभागौ सत्यज्ञौ तडागारामवप्रादीनसंख्यातानन्वितैनतुः ॥१०॥ अन्नदानरतौ नित्यं जलदानपरायणौ । मनोज्ञा मञ्जुवादिनी ॥११॥ सा तु सत्यमतिर्नित्यं शुचिर्विष्णोगृहे सती । नृत्यत्यत्यन्तसन्तुष्टा मनोज्ञं बहुविस्तरम् ॥१२॥ सोऽपि राजा महाभागौ द्वादशीद्वादशीदिने । ध्वजमारोपयत्येव प्रियांसत्यमति चास्य देवा अपि सदास्तुवन् ॥१३॥ एवं हरिपरं नित्यं राजानं धर्मकोविदम् । त्रिलोके विश्रुतौ ज्ञात्वा दम्पती धर्मकोविदौ । आययौ बहुभिः शिष्यैर्द्रष्टुकामो विभाण्डकः ॥१४॥ तमायांतं मुनिं श्रुत्वा स तु राजा विभाण्डकम् । प्रत्युद्ययौ सपत्नीकः पूजाभिर्बहुविस्तरम् ॥१५॥ कृतातिथ्यक्रियं शान्तं कृतासनपरिग्रहम् । नीचासनस्थितो भूपः प्राञ्जलिर्मुनिमब्रवीत् ॥१६॥ राजोवाच भगवन्कृतकृत्योऽस्मि त्वदभ्यागमनेन वै । सतामागमनं सन्तः प्रशंसन्ति सुखावहम् ॥१७॥ यत्र स्यान्महतां प्रेम तत्र स्युः सर्वसंपदः । तेजः कीर्तिर्धनं पुत्रा इति प्राहुर्विपश्चितः ॥१८॥ द्वीपों का एकमात्र शासक, धर्मात्मा, सत्यप्रेमी, शुद्ध परिवार वाला, अतिथिसवेक, सब लक्षणों से युक्त और सब ऐश्वर्यों से सम्पन्न था ॥३-५॥ वह सर्वदा हरि-कथा में मग्न और भगवान् की पूजा को ही अपना लक्ष्य समझता था । अहंकार-रहित होकर हरि-भक्तों की सेवा किया करता था । समदर्शी, गुणी वह राजा पूज्यों की पूजा करता तथा सब प्राणियों के हित में लगा रहता था । वह परम शान्त, कृतज्ञ और यशस्वी था ॥६-७॥ मुनि ! उस राजा की सत्यमति नाम की सौभाग्यवती, सब शुभ लक्षणों से युक्त, पतिव्रता और पति को प्राणों से भी बढ़कर समझने वाली स्त्री थी । वे दोनों पति-पत्नी सर्वदा विष्णु की पूजा किया करते थे । भाग्यशाली, सत्य के जानने वाले और सत्यपरायण उन दोनों को पूर्व जन्म की बातों का भी ज्ञान था । वे नित्य अन्न और जल का दान करते थे और असंख्य, तालाब, वाटिका और धर्मशाला आदि बनवाते थे । वह मंजुभाषिणी सत्यमति प्रति दिन पवित्र भाव से विष्णु मन्दिर में प्रसन्न होकर नृत्य करती थी ॥८-११॥ वह राजा भी प्रति द्वादशी को मनोहर और बहुत बड़ी ध्वजा की स्थापना किया करता था । ऐसे हरिभक्त, धर्मज्ञ, राजा और उसकी रानी सत्यमति की देवता भी सर्वदा स्तुति किया करते थे । उस धर्मज्ञ दम्पती का तीनों लोकों में यश सुनकर अनेकों शिष्यों के साथ विभांडक ऋषि मिलने के लिए आये । राजा ने मुनि विभांडक का आगमन सुनकर पत्नी सहित बड़े समारोह के साथ अगवानी की । बड़ी श्रद्धा से अतिथिसत्कार कर उस शान्त मुनि को आसन पर बैठाया । राजा स्वयं मुनि के समीप एक लघु आसन पर बैठकर हाथ जोड़कर मुनि से बोला ॥१२-१६॥ राजा बोला--भगवन् ! आपके इस शुभागमन से मैं कृतकृत्य हूँ, सज्जन व्यक्ति सुखदायक सज्जन सन्तों के आगमन की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं । जिस व्यक्ति पर पुण्यात्माओं का स्नेह होता है उसको सारी संपत्तियाँ, तेज, यश, धन, और पुत्र आदि सब कुछ प्राप्त होते हैं, ऐसा विद्वानों ने कहा है । मुनिवर्य ! प्रभो ! जिस पर सज्जनों