भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 160

१४१ एकोनविंशोऽध्यायः स्वभावविमलं शुद्धं निर्विकारं निरञ्जनम् ॥२८॥ मायासाङ्गममात्रेण वदन्ति पुरुषं त्वजम् । सद्‌भक्तवत्सलं विष्णुं भक्तिगम्यं नमाम्यहम् ॥२६॥ क्षीराब्धिशायिनं देवमनन्तमपराजितम् । सूक्ष्मासूक्ष्माणि येनास॑स्तं वन्दे सर्वतोमुखम् ॥३०॥ पृथिव्यादीनि भूतानि तन्मात्राणीन्द्रियाणि च । निर्गुणं परमं सूक्ष्मं प्रणतोऽस्मि पुनः पुनः ॥३१॥ यद्ब्रह्म परमं धाम सर्वलोकोत्तमोत्तमम् । यमाममन्ति योगीन्द्राः सर्वकारणकारणम् ॥३२॥ अविकारमजं शुद्धं सर्वतोबाहुमीश्वरम् । जगन्मयः । निर्गुणः परमात्मा च स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥३३॥ यो देवः सर्वभूतानामन्तरात्मा ज्ञानिनां सर्वगो यस्तु स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥३४॥ हृदयस्थोऽपि दूरस्थो मायया मोहितात्मनाम् । हूयते च पुनद्वाभ्यां स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥३५॥ चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च । गतिदाता विश्वसृग्यः स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥३६॥ ज्ञानिनां कर्मिणां चैव तथा भक्तिमतां नृणाम् । तानर्चयन्ति विबुधाः स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥३७॥ जगद्धितार्थं ये देहा ध्रियन्ते लीलया हरेः । निर्गुणं च गुणाधारं स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥३८॥ यमाममन्ति वै सन्तः सच्चिदानन्दविग्रहम् । आचार्यम् पूजयेत्पश्चाद्दक्षिणाच्छादनादिभिः ॥३६॥ इति स्तुत्वा नमेद्विष्णुं ब्राह्मणांश्च प्रपूजयेत् । पुत्रमित्रकलत्रायैः स्वयं च सह बन्धुभिः ॥४०॥ ब्राह्मणाम्भोजयेच्छक्त्या भक्तिभावसमन्वितः । कुर्वीत पारणं विप्र नारायणपरायणः । तस्य पुण्यफलं वक्ष्ये शृणुष्व सुसमाहितः ॥४१॥ यस्त्वेतत्कर्म कुर्वीत ध्वजारोपणमुत्तमम् । तावन्ति पापजालानि नश्यन्त्येव न संशयः ॥४२॥ पटो ध्वजस्य विप्रेन्द्र यावच्चलति वायुना । से शुद्ध उत्पन्न हुए जिसको अज, पुरुष, स्वभाव शुद्ध, पवित्र, निर्विकार, निरंजन, क्षीरसागरशायी, देव, अनन्त, अपराजित, सद्‌भक्तवत्सल कहते हैं, और जो भक्ति से प्राप्त करने योग्य है उस विष्णु को नमस्कार करता हूँ। जिससे पृथ्वी आदि पंच महाभूत, गन्ध आदि तन्मात्रायें, १ सब इन्द्रियाँ, सूक्ष्म और असूक्ष्म पदार्थ उत्पन्न हुए, उस सर्वतोमुख की वन्दना करता हूँ ॥२७-३०॥ जो ब्रह्म परम धाम, सब लोकों में परमोत्तम, निर्गुण, परम और सूक्ष्म है उसको बार-बार नमस्कार करता हूँ। सब कारणों के भी कारण, निर्विकार, अज, शुद्ध, सर्वतोबाहु और ईश्वर जिसको योगीन्द्र प्रणाम करते हैं, जो देव सब प्राणियों के अन्तरात्मा, जगन्मय, निर्गुण, परमात्मा हैं, वे विष्णु मेरे ऊपर प्रसन्न हों ॥३१-३३॥ जो माया मोहित जनों के हृदय में रहते हुए भी उनसे दूर हैं, जो ज्ञानी मनुष्यों के लिए सर्वथा प्राप्य हैं वे विष्णु मेरे ऊपर प्रसन्न हों। जो चार, चार, दो-दो और पाँच आहुतियों से हविस् ग्रहण करते हैं अर्थात् जिसके निमित्त सर्वप्रथम चार-चार, दो-दो और पाँच बार आहुतियाँ दी जाती हैं वे विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों ॥३४-३५॥ जो ज्ञानी, कर्मी और भक्त जनों के गति-दाता, विश्व के एकमात्र प्राप्य हैं वे विष्णु मेरे ऊपर प्रसन्न हों। भगवान् विष्णु जगत्कल्याण के लिए लीलापूर्वक जिन शरीरों को धारण करते हैं, देवता जिनकी पूजा करते हैं, वे विष्णु मेरे ऊपर प्रसन्न हों। सन्त लोग जिस सच्चिदानन्द स्वरूप धारण करने वाले भगवान् की पूजा करते हैं, जो निर्गुण, निराधार हैं वे विष्णु मेरे ऊपर प्रसन्न हों ॥३६-३८॥ इस प्रकार विष्णु की स्तुति करने के बाद उन्हें नमस्कार करे; फिर ब्राह्मणों की पूजा के अनन्तर आचार्य की दक्षिणा, वस्त्र आदि से विधिवत् पूजा करनी चाहिए । विप्र ! भक्तिभाव से यथा शक्ति ब्राह्मण भोजन करा कर स्वयं पुत्र, मित्र, स्त्री और बन्धुजनों के साथ नारायण- परायण होकर पारण करना चाहिए । ॥३६-४०॥ विप्र ! जो व्यक्ति इस उत्तम ध्वजारोपण कर्म को करता है, उसके पुण्य-फल को कह रहे हैं, सावधान होकर सुनो । विप्रेन्द्र ! उस ध्वजा का वस्त्र जितने दिनों तक वायु से फहराता रहता है उसके उतने ही पाप-समूह १. गन्ध, रूप, रस, स्पर्श और रूप तन्मात्रा कहलाते हैं।