बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४० नारदीयपुराणम् ततो गोचर्ममात्रं तु स्थण्डिलं चोपलिप्य वै । आधायाग्निं स्वगृह्योक्त्याह्याज्यभागादिकं क्रमात् ॥१३॥ जुहुयात्पायसं चैव साज्यमष्टोत्तरं शतम् । प्रथमं पौरुषं सूक्तं विष्णोर्नुकमिरावतीम् ॥१४॥ ततश्च वैनतेयाय स्वाहेत्यष्टाहुतीस्तथा । सोमो धेनुर्मुदुत्वं च जुहुयाच्च ततो द्विज ॥१५॥ सौरमन्त्रान्जपेत्तत्र शान्तिसूक्तानि शक्तितः । रात्रौ जागरणं कुर्यादुपकण्ठं हरेः शुचिः ॥१६॥ ततः प्रातः समुत्थाय नित्यकर्म समाप्य च । गन्धपुष्पादिभिर्देवमर्चयेत्पूर्ववत्क्रमात् ॥१७॥ ततो मङ्गलवाद्यैश्च सूक्तपाठैश्च शोभनम् । नृत्यैश्च स्तोत्रपठनैर्नयेद्विष्णवालये ध्वजम् ॥१८॥ देवस्य द्वारदेशे वा शिखरे वा मुदान्वितः । सुस्थिरं स्थापयेद्विप्रध्वजं सुस्तम्भसंयुतम् ॥१९॥ गन्धपुष्पाक्षतैर्देवं धूपदीपैर्मनोहरैः । भक्ष्यभोज्यादिसंयुक्तैर्नैवेद्यैश्च हरिं यजेत् ॥२०॥ एवं देवालये स्थाप्य शोभनं ध्वजमुत्तमम् । प्रदक्षिणमनुव्रज्य स्तोत्रमेतदुदीरयेत् ॥२१॥ नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन । नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुष पूर्वज ॥२२॥ येनेदमखिलं जातं यत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् । लयमेष्यति यत्रैवं तं प्रपन्नोऽस्मि केशवम् ॥२३॥ न जानन्ति परं भावं यस्य ब्रह्मादयः सुराः । योगिनो यं न पश्यन्ति तं वन्दे ज्ञानरूपिणम् ॥२४॥ अन्तरिक्षं तु यन्नाभिद्यौर्मूर्द्धा यस्य चैव हि । पादोऽभूद्यस्य पृथिवी तं वन्दे विश्वरूपिणम् ॥२५॥ यस्य श्रोत्रे दिशः सर्वा यच्चक्षुर्दिनकृच्छशी । ऋक्सामयजुषी येन तं वन्दे ब्रह्मरूपिणम् ॥२६॥ यन्मुखाद्ब्राह्मणा जाता यद्बाह्वोर्भवन्नृपाः । वैश्या यस्योरुतो जाताः पद्भ्यां शूद्रो व्यजायत ॥२७॥ से धाता और विधाता की पूजा करे । इतनी क्रिया के बाद गौ के चमड़े के बराबर विस्तार वाली भूमि को भली भाँति लीपकर अपने गृह्य सूत्र की विधि से अग्नि स्थापन और क्रमशः आज्य भाग आदि विधियाँ करे । एक सौ आठ बार खीर की आहुतियाँ दे । पहले पुरुष सूक्त से विष्णु, ब्रह्मा और लक्ष्मी के लिए हवन करे । तत्पश्चात् वैनतेयाय स्वाहा, इस मन्त्र से आठ आहुतियाँ दे । द्विज ! इसके बाद चन्द्रमा, कामधेनु और सूर्य के निमित्त आहुतियाँ दे ॥११-१५॥ वहाँ हरि के समीप शक्ति के अनुसार सौर मन्त्र और शान्ति सूक्त का जप करे । उसी मन्दिर में भगवान् के समीप हो जागरण के द्वारा रात को बितावे । प्रातः काल उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर क्रमशः गंध, पुष्प आदि से भगवान् की पूजा करे । पूजन के बाद मांगलिक बाजे बजाते हुए, नृत्य-गीत गाते हुए सूक्त, स्तोत्र का पाठ करते हुए विष्णु मन्दिर में उस ध्वजा को ले जाना चाहिए ॥१६-१८॥ विप्र ! देव- मन्दिर के द्वार पर अथवा मन्दिर के शिखर पर प्रसन्नता के साथ किसी स्तम्भ से मिलाकर उसको स्थिरतापूर्वक स्थापित करना चाहिए । गंध, पुष्प, अक्षत और मनोहर धूप, दीप और सुस्वादु भोज्य पदार्थों के सहित मधुर अन्न से विष्णु की पूजा करनी चाहिए । इस विधि से देवालय में उत्तम सुन्दर ध्वजा की स्थापना करने के पश्चात् प्रदक्षिणा कर स्तोत्र पाठ करना चाहिए—पुण्डरीकाक्ष ! तुमको नमस्कार है, विश्वव्यापक ! नमस्कार है, हृषीकेश ! महापुरुषों के पूर्वज ! नमस्कार है ॥१६-२२॥ जिससे यह सारा विश्व उत्पन्न हुआ, जिसमें यह स्थित और जिसमें पुनः लीन होता है उस केशव की शरण में हूँ। जिसके परम तत्त्व को ब्रह्मा आदि देवता नहीं जान पाते हैं, योगी जिसको नहीं देख पाते हैं उस ज्ञान स्वरूप ब्रह्म को नमस्कार है । अन्तरिक्ष जिसकी नाभि, आकाश मूर्द्धा और पृथ्वी जिसका चरण है उस विश्वरूप को नमस्कार है । जिसके दोनों कान दिशायें, सूर्य और चन्द्रमा जिसके नेत्र और ऋक् यजुस् और साम जिससे व्याप्त हैं उस वेद रूप भगवान् की वन्दना करता हूँ ॥२३-२६॥ माया के संसर्ग मात्र से जिसके मुख से ब्राह्मण और भुजाओं से सब क्षत्रिय उत्पन्न हुए, जिसके ऊरु (जंघा) से वैश्य और चरणों