बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३५ सप्तदशोऽध्यायः नामभिः केशवाद्यैश्च ह्युपचारान्प्रकल्पयेत् । रात्रौ जागरण कुर्यात्पुराणश्रवणादिभिः ॥६८॥ जितनिद्रो भवेत्सम्यक्सोपवासो जितेन्द्रियः । त्रिकालमर्चयेद्देवं यथाविभवविस्तरम् ॥६६॥ ततः प्रातः समुत्थाय प्रातः कृत्यं समाप्य च । तिलहोमान्व्याहृतिभिः सहस्त्रं कारयेद्विजैः ॥१००॥ ततः संपूजयेद्देवं गन्धपुष्पादिभिः क्रमात् । देवस्य पुरतः कुर्यात्पुराणश्रवणं ततः ॥१०१॥ दद्याद्द्वादशविप्रेभ्यो दध्यन्नं पायसं तथा । अपूपैर्दशभिर्युक्तं सघृतं च सदक्षिणम् ॥१०२॥ देवदेवजगन्नाथ भक्तानुग्रहविग्रह । गृहाणोपायनं कृष्ण सर्वाभीष्टप्रदो भव ॥१०३॥ अनेनोपायनं दत्त्वा प्रार्थयेत्प्राञ्जलिः स्थितः । आधाय जानुनी भूमौ विनयावनतो व्रती ॥१०४॥ नमो नमस्ते सुरराजराज, नमोऽस्तु ते देव जगन्निवास । कुरुष्व सम्पूर्णफलं ममाद्य, नमोऽस्तु तुभ्यं पुरुषोत्तमाय ॥१०५॥ इति संप्रार्थयेद्विप्रान्देवं च पुरुषोत्तमम् । दद्यादर्घ्यं च देवाय महालक्ष्मीयुताय वै ॥१०६॥ लक्ष्मीपते नमस्तुभ्यं क्षीरार्णवनिवासिने । अर्घ्यं गृहाण देवेश लक्ष्म्या च सहितः प्रभो ॥१०७॥ यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु । न्यूनं संपुर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥१०८॥ इति विज्ञाप्य देवेशं तत्सर्वं संयमी व्रते । प्रतिमां दक्षिणायुक्तामाचार्याय निवेदयेत् ॥१०६॥ ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाच्छक्त्या दद्याच्च दक्षिणाम् । भुञ्जीत वंग्यतः पश्चात्स्वयं बंधुजनैर्वृतः ॥११०॥ आसायं शृणुयाद्विष्णोः कथां विद्वज्जनैः सह । इत्येवं कुरुते यस्तु मनुजो द्वादशीव्रतम् ॥१११॥ सर्वान्कामान्स आप्नोति परत्रेह च नारद । विसप्तकुलसंयुक्तः सर्वपापविवर्जितः ॥ प्रयाति विष्णुभवनं यत्र गत्वा न शोचति ॥११२॥
स्नान करावे। केशव आदि नामों का कीर्तन करता हुआ विभिन्न उपचारों से पूजन करो। रात को पुराण श्रवण के द्वारा जग कर ही बिता दे ॥६५-६८॥ वह संयमी व्रती निद्रा को वश में कर निराहार रहकर अपने वैभव के अनुसार तीनों काल भगवान् का पूजन करे। तदनन्तर दूसरे दिन प्रातःकाल उठकर नित्यक्रिया से निवृत्त हो ब्राह्मणों के द्वारा व्याहृति मंत्रों से तिल का हवन करावे। पुनः यथाक्रम गन्ध, पुष्प आदि से भगवान् की पूजा कर उनके सामने ही पुराण का श्रवण करे। बारह ब्राह्मणों को दही, खीर, घी और दक्षिणा सहित दस पूये का दान करे। (दानका मन्त्र यह है--) ॥६६-१०२॥ 'देवदेव ! जगन्नाथ ! भक्तों पर कृपा करने वाले ! कृष्ण ! मेरे सब मनोरथों को पूर्ण कीजिए'। इस प्रकार उपहार दान के पश्चात् व्रतो पृथ्वो पर घुटने टेक कर विनम्र भाव से हाथ जोड़ कर भगवान् की स्तुति करे 'सुरराज ! आपको नमस्कार है। देव ! जगन्निवास ! नमस्कार है। आज मेरी सम्पूर्ण कामनायें पूर्ण कीजिए। पुरुषोत्तम ! आप को नमस्कार है' ॥१०३-१०५॥ इस प्रकार विप्रों और भगवान् की प्रार्थना के बाद महालक्ष्मी सहित भगवान् को अर्घ्य दे। अर्घ्य का मन्त्र यह है 'लक्ष्मीपते ! क्षीरसागर में सोने वाले आप को नमस्कार है, देवेश ! प्रभो ! लक्ष्मी के सहित आप मेरे इस अर्घ्य को ग्रहण करे। जिसके स्मरण और नाम कीर्तन से तप, यज्ञ आदि अनुष्ठान को न्यूनतायें अतिशीघ्र दूर हो जाती हैं उस अच्युत देव को नमस्कार है' इस प्रकार भगवान् को स्तुति कर वह व्रती प्रतिमा सहित उन सब सामग्रियों का आचार्य के लिए अर्पित कर दे। यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा देकर व्रत को समाप्त कर दे ॥१०६-१११॥ इसके बाद स्वयं भाई-बन्धुओं के सहित मौन होकर भोजन करे और सायंकाल तक विद्वज्जनों के साथ बैठकर पुराण कथा सुने। नारद ! जो मनुष्य इस विधि से द्वादशी का व्रत करता है वह लौकिक पारलौकिक सभी कामनाओं का प्राप्त करता है। वह अपने इक्कीस कुलों के उस