भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 155

१३६ नारदीयपुराणम् य इदं शृणुयाद्विप्र द्वादशीव्रतमुत्तमम् । वाचयेद्वाऽपि स नरो वाजपेयफलं लभेत् ॥११३॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे व्रताख्याने मार्गशीर्षशुक्लद्वादशीव्रतकथनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥१७॥

अष्टादशोऽध्यायः सनक उवाच अन्यद्व्रतवरं वक्ष्ये शृणुष्व मुनिसत्तम । सर्वपापहरं पुण्यं सर्वदुःखनिबर्हणम् ॥१॥ ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां योषितां तथा । समस्तकामफलदं सर्वव्रतफलप्रदम् ॥२॥ दुःस्वप्ननाशनं धर्म्यं दुष्टग्रहनिवारणम् । सर्वलोकेषु विख्यातं पूर्णिमाव्रतमुत्तमम् ॥३॥ येन चीर्णेन पापानां राशिकोटिः प्रशाम्यति मार्गशीर्षे सितेपक्षे पूर्ण्णायां नियतः शुचिः । स्नानं कुर्याद्यथाचारं दन्तधावनपूर्वकम् ॥४॥ शुक्लाम्बरधरः शुद्धो गृहमागत्य वाग्यतः । प्रक्षाल्य पादावाचम्य स्मरन्नारायणं प्रभुम् ॥५॥ नित्यं देवार्चनं कृत्वा पश्चात्सङ्कल्पपूर्वकम् । लक्ष्मीनारायणं देवमर्चयेद्भक्तिभावतः ॥६॥ आवाहनासनाद्यैश्च गन्धपुष्पादिभिर्व्रती । नमो नारायणायेति पूजयेद्भक्तितत्परः ॥७॥

विष्णुलोक को चला जाता है जहाँ जाकर किसी प्रकार का शोक नहीं होता । विप्र ! जो इस उत्तम द्वादशी व्रत की कथा को सुनता या सुनाता है वह मनुष्य वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥११२-११३॥ श्री नारदीयपुराण में द्वादशी-माहात्म्यवर्णन नामक सत्रहवां अध्याय समाप्त ॥१७॥

अध्याय १८ उद्यापन विधिसहित लक्ष्मीनारायणव्रत का वर्णन सनक बोले—मुनिवर्य ! अब सब पापों का नाश करने वाले, पुण्यदायक और सब दुःखों को दूर करने वाले श्रेष्ठव्रत को कह रहा हूँ, सुनो ॥१॥ पूर्णिमा का व्रत सब व्रतों में उत्तम, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा स्त्रियों की भी सब कामनाओं का पूर्ण करने वाला, सब व्रतों के फल को देने वाला, बुरे स्वप्नों के कुफल से बचाने वाला, धर्मप्रद, दुष्टग्रहों का निवारण करने वाला और लोक-विख्यात है, जिसके अनुष्ठान से पापों की असंख्य ढेरियां नष्ट हो जाती हैं ॥२-३॥ अगहन मास की पूर्णिमा को व्रती आचारानुकूल दातौन आदि नित्य क्रिया से निवृत्त हो संयम पूर्वक पवित्र भाव से स्नान करे । धुले श्वेत वस्त्र धारण कर मौन हो घर आकर पैरों को धोवे और प्रभु नारायण का स्मरण करता हुआ आचमन कर प्रति दिन की भाँति अपनी नित्य देव-पूजा समाप्त करे । फिर-संकल्पपूर्वक भक्तिभाव से भगवान् लक्ष्मीनारायण की पूजा करे ॥४-६॥ व्रती 'नमो नारायणाय' इस मन्त्र से श्रद्धापूर्वक आवाहन, आसनदान और गन्ध, पुष्प आदि सामग्री से भगवान् की पूजा करे । वह व्रती एकाग्रभाव से गीत,