भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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१३४ नारदीयपुराणम् दामोदर जगन्नाथ सर्वकारणकारण । त्राहि मां कृपया देव शरणागतपालक ॥८३॥ अनेन दत्त्वा दानं च श्रोत्रियाय कुटुम्बिने । दक्षिणां च यथाशक्त्या ब्राह्मणांश्चापि भोजयेत् ॥८४॥ एवं गत्वा व्रतं सम्यगश्नीयाद्बन्धुभिः सह । अश्वमेधसहस्राणां द्विगुणं फलमश्नुते ॥८५॥ एवं कुर्याद्व्रती यस्तु द्वादशीव्रतमुत्तमम् । संवत्सरं मुनिश्रेष्ठ स याति परमं पदम् ॥८६॥ एकमासे द्विमासे वा यः कुर्याद्भक्तितत्परः । तत्तत्फलमवाप्नोति प्राप्नोति च हरेः पदम् ॥८७॥ पूर्णं संवत्सरं कृत्वा कुर्यादुद्यापनं व्रती । मार्गशीर्षसिते पक्षे द्वादश्यां च मुनीश्वर ॥८८॥ स्नात्वा प्रातर्यथाचारं दन्तधावनपूर्वकम् । शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लगन्धानुलेपनः ॥८९॥ मण्डपं कारयेद्दिव्यं चतुरस्रं सुशोभनम् । घण्टाचामरसंयुक्तं किङ्किणीरवशोभितम् ॥९०॥ अलंकृतं पुष्पमाल्यैर्वितानध्वजराजितम् । छादितं शुक्लवस्त्रेण दीपमालाविभूषितम् ॥९१॥ तन्मध्ये सर्वतोभद्रं कुर्यात्सम्यगलंकृतम् । तस्योपरि न्यसेत्कुम्भां द्वादशाम्बुप्रपूरितान् ॥९२॥ एकेन शुक्लवस्त्रेण सम्यक्संशोधितेन च । सर्वान्नाच्छादयेत्कुम्भान्पञ्चरत्नसमन्वितान् ॥९३॥ लक्ष्मीनारायणं देवं कारयेद्भक्तिमान्व्रती । हेम्ना वा रजतेनापि तथा ताम्रेण वा द्विज ॥९४॥ स्थापयेत्प्रतिमां तां च कुम्भोपरि सुसंयमी । तन्मूल्यं वा द्विजश्रेष्ठ काञ्चनं च स्वशक्तितः ॥९५॥ सर्वव्रतेषु मतिमान्वित्तशाठ्यं विवर्जयेत् । यदि कुर्यात्क्षयं यान्ति तस्यायुर्धनसंपदः ॥९६॥ अनन्तशायिनं देवं नारायणमनामयम् । पञ्चामृतेन प्रथमं स्नापयेद्भक्तिसंयुतः ॥९७॥ सकल कारणों के कारण ! शरणागतपालक ! देव ! कृपा कर मेरी रक्षा कीजिए । दक्षिणा सहित अन्नदान के बाद व्रती श्रद्धापूर्वक यथा शक्ति ब्राह्मणों को खिलावे और दक्षिणा भी दे । इस प्रकार व्रत सम्पन्न करके व्रती स्वयं परिवार सहित भोजन करे । नारद ! इस प्रकार जा व्रती द्वादशी व्रत का अनुष्ठान करता है वह सहस्रों अश्व- मेध यज्ञों का द्विगुण फल पाता है ॥७६-८५॥ मुनिश्रेष्ठ ! जो व्रतो उपर्युक्त विधि से एक वर्ष तक इस उत्तम द्वादशी व्रत का अनुष्ठान करता है वह परम पद को प्राप्त कर लेता है । जो केवल एक मास या दो मास तक भक्तिपूर्वक इस व्रत को करता है वह पूर्वोक्त फल के साथ भगवान् के लोक भी प्राप्त कर लेता है । व्रती एक-एक वर्ष तक व्रत को पूरा कर इसका उद्यापन१ करे ॥८६-८७॥ मुनीश्वर ! अगहन मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी को प्रातःकाल आचार के अनुसार दन्तधावन कर स्नान करे, श्वेत वस्त्र पहन कर श्वेत सुगन्धित चन्दन लगावे । इस प्रकार स्वयं पवित्र होकर भूमि पर एक चौकोर दिव्य मण्डप बनावे । घंटा चँवर से सुशोभित कर बीच में किंकिणी लटकावे, जिसकी मधुर ध्वनि से सारा मण्डप गुंजित रहे । चारों ओर पताकाओं, फूलों की माला और चाँदवे से उसको सजाकर श्वेत वस्त्र से उसको आच्छादित कर दे और चारों ओर दीप जलाकर रख दे । उस मण्डप के मध्य में अति मनोहर सर्वतोभद्र चक्र बनाकर उस पर जल से परिपूर्ण बारह कलश रख दे ॥८८-९२॥ उन कलशों में पंच रत्न छोड़कर एक ही भलीभाँति शुद्ध किए हुए श्वेत वस्त्र से सबको ढक दे । द्विज ! भक्त व्रती अपनी शक्ति के अनु- सार सोना, चाँदी या तांबे की लक्ष्मो-नारायण की मूर्ति बनवावे ॥९३-९४॥ उसके प्रतिमा को वह संयमो भक्त कलश के ऊपर रखे । यदि मूर्ति न बनी हो तो मूर्ति का मूल्य अथवा सोना ही यथा शक्ति उस पर रख दे । द्विजवर्य ! बुद्धिमान् व्यक्ति सभी प्रकार के व्रतों में कृपणता न करे, यदि ऐसा करेगा तो उसकी आयु, धन-सम्पत्ति आदि सब कुछ नष्ट हो जायगा । सबसे पहले भक्ति पूर्वक शेषशायी, निर्विकार, भगवान् नारायण को पंचामृत १. यह विधि इस उद्देश्य से की जाती है कि पुनः व्रत न करना पड़े । इसे 'व्रत का बैठाना' कहा जाता है ।