भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 1008 में से

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१३३ सप्तदशोऽध्यायः क्षीराब्धिशायिन्देवेश रमाकान्त जगत्पते । क्षीरदानेन सुप्रीतो भव सर्वसुखप्रदः ॥६७॥ सुखप्रदत्वाद्विप्रांश्च भोजयेच्छक्तितो व्रती । एवं कृत्वाश्वमेधानां सहस्रस्य फलं लभेत् ॥६८॥ मासि भाद्रपदे शुक्ले द्वादश्यां समुपोषितः । स्नापयेद्द्रोणपयसा हृषीकेशं जगद्गुरुम् ॥६९॥ हृषीकेशं नमस्तुभ्यमिति संपूजयेन्नरः । चरुणा मधुयुक्तेन शतमष्टोत्तरं हुनेत् ॥७०॥ जागरादीनि निर्वर्त्य दद्यादात्मविदे ततः । सार्धाढकं च गोधूमन्दक्षिणां हेमशक्तितः ॥७१॥ हृषीकेश नमस्तुभ्यं सर्वलोकैकहेतवे । मह्यं सर्वसुखं देहि गोधूमस्य प्रदानतः ॥७२॥ भोजयेद्ब्राह्मणाञ्शक्त्या स्वयं चाश्नीत वाग्यतः । सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्ममेधफलं लभेत् ॥७३॥ आश्विने मासि शुक्लायां द्वादश्यां समुपोषितः । पद्मनाभं च पयसा स्नापयेद्भक्तितः शुचिः ॥७४॥ नमस्ते पद्मनाभाय होमं कुर्यात्स्वशक्तितः । तिलव्रीहियवाज्यैश्च पूजयेच्च विधानतः ॥७५॥ जागरं निशि निर्वर्त्य पुनः पूजां समाचरेत् । दद्याद्विप्राय कुडवं मधुनस्तु सदक्षिणम् ॥७६॥ पद्मनाभ नमस्तुभ्यं सर्वलोकपितामह । मधुदानेन सुप्रीतो भव सर्वसुखप्रदः ॥७७॥ एवं यः कुरुते भक्त्या पद्मनाभव्रतं सुधीः । ब्रह्ममेधसहस्रस्य फलमाप्नोति निश्चितम् ॥७८॥ द्वादश्यां कार्तिके शुक्ले उपवासी जितेन्द्रियः । क्षीरेणाढकमानेन दध्ना वाज्येन तावता ॥७९॥ नमो दामोदरायेति स्नापयेद्भक्तिभावतः । अष्टोत्तरशतं हुत्वा मध्वाज्याक्ततिलाहुतीः ॥८०॥ जागरं नियतः कुर्यात्त्रिकालार्चनतत्परः । प्रातः संपूजयेद्देवं पद्मपुष्पैर्मनोरमैः ॥८१॥ पुनरष्टोत्तरशतं जुहुयात्सघृतैस्तिलैः । पञ्चभक्ष्ययुतं चान्नं दद्याद्विप्राय भक्तितः ॥८२॥ सुखों को प्रदान कीजिए । व्रती इस प्रकार पूजा समाप्त कर सुख प्राप्ति के लिए यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन करावे । इस प्रकार सविधि व्रत के अनुष्ठान से मनुष्य को एक हजार अश्वमेध का फल मिलता है ॥६३-६८॥ भादों मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी को निराहार रहकर एक द्रोण दूध से जगद्गुरु हृषीकेश को ‘हृषीकेश नमस्तुभ्यम्' इस मन्त्र से स्नान कराकर मधु युक्त चरु से एक सौ आठ बार हवन करे । रात्रि जागरण आदि विधि समाप्त कर किसी ज्ञानी ब्राह्मण को शक्ति के अनुसार सोना और दक्षिणा के सहित गेहूँ दे । दान देते समय 'हृषीकेश ! सारे संसार के एक मात्र कारण आपको नमस्कार है इस गेहूँ के दान से आप मुझे सम्पूर्ण सुख दें' इस वाक्य को कहे । इस प्रकार पूजा समाप्त कर यथा शक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं मौन होकर भोजन करे। इस विधि से व्रत का अनुष्ठान करने से व्रती सब पापों से मुक्त होकर 'ब्रह्ममेध' का फल प्राप्त करता है ॥६९-७३॥ कुआर के शुक्लपल की द्वादशी को व्रती उपवास करे, पवित्र होकर श्रद्धापूर्वक भगवान् पद्मनाभ को दूध से नहलावे । 'नमस्ते पद्मनाभाय' इस मन्त्र से तिल, चावल, घी और उसकी आहुति दे । शास्त्रविधि से पूजा करने के अनन्तर रातभर जागरण करे और पुनः विधिवत् पूजा कर किसी ब्राह्मण को दक्षिणा सहित एक पाव मधु का दान दे । दान करते समय 'सब लोकों के पितामह ! पद्मनाभ ! आपको नमस्कार है' इस मधुदान से आप प्रसन्न होकर सब सुखों को प्रदान करें। इस वाक्य का उच्चारण करे । नारद ! इस प्रकार जो बुद्धिमान् व्यक्ति भक्ति पूर्वक पद्मनाभ व्रत का अनुष्ठान करता है वह एक हजार ब्रह्ममेध यज्ञ का फल पाता है ॥७४-७८॥ कार्तिक-शुक्ल-द्वादशी को व्रती संयम पूर्वक निराहार व्रत रहे । 'नमो दामोदराय' इस मन्त्र से श्रद्धा-भाव से एक आढक दूध, दही अथवा उतने ही घी से भगवान् दामोदर को नहलावे । स्नान कराने के पश्चात् मधु, घी से मिश्रित तिल की एक सौ आठ बार आहुति दे ! नियम पूर्वक तोनों समय पूजा कर रात्रि में जागरण करे । दूसरे दिन प्रातःकाल भगवान् को मनोहर कमलपुष्प से अनन्य भाव से पूजा करे और पुनः घी मिश्रित तिल से एक सौ आठ बार आहुति दे । व्रत की निर्विघ्न समाप्ति के लिए पाँचों प्रकार के भक्ष्य पदार्थ सहित अन्न किसी वेदपाठी कुटुम्बी ब्राह्मण को दे । दान का मन्त्र यह है 'दामोदर ! जगन्नाथ !

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