भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 147

१२८ नारदीयपुराणम् एवं प्रभावा सा गङ्गा विष्णुपादाग्रसंभवा । सर्वलोकेषु विख्याता महापातकनाशिनी ॥११४॥ य इदं पुण्यमाख्यानं महापातकनाशनम् । पठेच्च शृणुयाद्वापि गङ्गास्नानफलं लभेत् ॥११५॥ यस्त्वेतत्पुण्यमाख्यानं कथयेद्ब्राह्मणाग्रतः । स याति विष्णुभवनं पुनरावृत्तिवर्जितम् ॥११६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गामाहात्म्ये भगीरथगङ्गानयनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥१६॥ सप्तदशोऽध्यायः ऋषय ऊचुः साधु सूत महाभाग त्वयातिकरुणात्मना । श्रावितं सर्वपापघ्नं गङ्गामाहात्म्यमुत्तमम् ॥१॥ श्रुत्वा तु गङ्गामाहात्म्यं नारदो देवदर्शनः । किं पप्रच्छ पुनः सूत सनकं मुनिसत्तमम् ॥२॥ सूत उवाच शृणुध्वमृषयः सर्वे नारदेन सुरर्षिणा । पृष्टं पुनर्यथा प्राह प्रवक्ष्यामि तथैव तत् ॥३॥ नानाख्यानेतिहासाढ्यं गङ्गामाहात्म्यमुत्तमम् । श्रुत्वा ब्रह्मसुतो भूयः पृष्टवानिदमादरात् ॥४॥ नारद उवाच अहोऽतिधन्यं सुकृतैकसारं श्रुतं मया पुण्यमसंवृतार्थम् गाङ्गेयमाहात्म्यमघप्रणाशि त्वत्तो मुने कारुणिकादभीष्टम् ॥५॥ चले गए। इस प्रकार के प्रभाव वाली और विष्णु चरणों से उत्पन्न होने वाली गंगा सब लोकों में महापातक- नाशिनी नाम से विख्यात हो गई। जो मनुष्य इस महापातकनाशक परमपुण्यप्रद आख्यान को सुनता है अथवा पाठ करता है वह गंगास्नान का फल प्राप्त करता है। जो इस पुण्य आख्यान को ब्राह्मणों को सुनाता है वह मुक्ति धाम विष्णु लोक को चला जाता है। ॥११२-११६॥ श्री बृहन्नारदीयपुराण के पूर्वभाग के प्रथम पाद में गंगामाहात्म्यवर्णन नामक सोलहवां अध्याय समाप्त ॥१६॥ अध्याय १७ उद्यापन सहित शुक्लपक्षीय द्वादशीव्रत-निरूपण ऋषिगण बोले—महाभाग ! धन्य हो, तुमने बड़ी कृपा की जो आज परम उत्तम तथा सब पापों को नष्ट करने वाला यह गंगा माहात्म्य सुना दिया। सूत ! देवदर्शन नारद जी ने गंगा-माहात्म्य सुनने के बाद पुनः मुनि- श्रेष्ठ सनक जी से क्या पूछा इसको अब बतलाओ। ॥१॥ सूतजी बोले—ऋषिगण ! सुनो। देवर्षिनारद ने पुनः जो कुछ पूछा और सनक जी ने जो कुछ उत्तर दिया, उसको पूर्णरूप से कह रहा हूँ। अनेकों इतिहास और आख्यानों से भरे उत्तम गंगा माहात्म्य को सुनकर ब्रह्मपुत्र नारद ने आदर पूर्वक सनक जी से पूछा—॥२-४॥ नारद जी बोले—अहा ! मुने ! आज मैंने परम कृपालु आप से धन्य, सम्पूर्ण सुकृतों का सारभूत, पवित्र,