भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 148

१२६ सप्तदशोऽध्यायः ये साधवः साधु भजन्ति विष्णुं स्वार्थं परार्थं च यतन्त एव । नानोपदेशैः सुविमुग्धचित्तं प्रबोधयन्ति प्रसभं प्रसन्नम् ॥६॥ ततः समाख्याहि हरेर्व्रतानि कृतैश्च यैः प्रीतिमुपैति विष्णुः । ददाति भक्तिं भजतां दयालुर्मुक्तिस्तु तस्या विदिता हि दासी ॥७॥ ददाति मुक्तिं भजतां मुकुन्दो व्रतार्चनध्यानपरायणानाम् । भक्तानुसेवासु महाप्रयासं विमृश्य कस्यापि न भक्तियोगम् ॥८॥ प्रवृत्तं च निवृत्तं च यत्कर्म हरितोषणम् । तदाख्याहि मुनिश्रेष्ठ विष्णुभक्तोऽसि मानद ॥६॥ सनक उवाच साधु साधु मुनिश्रेष्ठ भक्तस्त्वं पुरुषोत्तमे । भूयो भूयो यतः पृच्छेश्र्चरित्रं शार्ङ्गधन्वनः ॥१०॥ व्रतानि ते प्रवक्ष्यामि लोकोपकृतिमन्ति च । प्रसीदति हरिर्यैस्तु प्रयच्छत्यभयं तथा ॥११॥ यस्य प्रसन्नो भगवान्यज्ञलिङ्गो जनार्दनः । इहामुत्र सुखं तस्य तपोवृद्धिश्च जायते ॥१२॥ येन केनाप्युपायेन हरिपूजापरायणाः । प्रयान्ति परमं स्थानमिति प्राहुर्महर्षयः ॥१३॥ मार्गशीर्षे सिते पक्षे द्वादश्यां जलशायिनम् । उपोषितोऽर्चयेत्सम्यङ् नरः श्रद्धासमन्वितः ॥१४॥ स्नात्वा शुक्लाम्बरधरो दन्तधावनपूर्वकम् । गन्धपुष्पाक्षतैर्धूपैर्दीपेर्नैवेद्यपूर्वकैः ॥१५॥ वाग्यतो भक्तिभावेन मुनिश्रेष्ठार्चयेद्धरिम् । केशवाय नमस्तुभ्यमिति विष्णुं च पूजयेत् ॥१६॥ अष्टोत्तरशतं हुत्वा वह्नौ घृततिलाहुतीः । रात्रौ जागरणं कुर्याच्छाालग्रामसमीपतः ॥१७॥ विशद फल देने वाला, अभीष्ट और पापनाशक गंगा का माहात्म्य सुना इससे कृतार्थ हो गया। जो साधु होते हैं वे विष्णु का अनन्य भाव से भजन करते हैं और अपने स्वार्थ (भक्ति) और परोपकार दोनों की सिद्ध करते हैं, वे अपने मनोहर उपदेशामृत से पामरजनों को भी प्रसन्न कर ज्ञान का ज्योति प्रदान करते हैं। अब इसके बाद भगवान् के उन व्रतों और अनुष्ठानों को कहिए जिससे भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। कृपालु भगवान् भजन करने वालों को अपनी भक्ति प्रदान करते हैं। मुक्ति भक्ति की दासी कही गयी है। मुकुन्द भगवान् व्रत, पूजा और ध्यानोपासना में लीन रहने वाले भक्त जनों को मुक्ति देते हैं। भक्तों की सेवा में महान् प्रयास करना पड़ता है ऐसा सोचकर वे भक्तियोग किसी को नहीं देते। मुनिशिरोमणि ! प्रवृत्त, निवृत्त और जिन कर्मों से भगवान् प्रसन्न होते हैं उन कर्मों को आप बतलाइए, मानद ! आप विष्णु भक्त हैं, आप ही इन बातों को जानते हैं ॥५-९॥ सनकजी बोले-मुनिश्रेष्ठ ! तुम धन्य हो, धन्य हो, तुम पुरुषोत्तम के अनन्य भक्त हो; क्योंकि बार- बार विष्णु के चरित्र को ही तुम पूछ रहे हो। तुमसे लोक के उपकार करनेवाले उन व्रतों को कह रहा हूँ जिनके अनुष्ठान से विष्णु प्रसन्न होते हैं और अभय वर प्रदान करते हैं। जिसके ऊपर यज्ञपुरुष जनार्दन प्रसन्न होते हैं, उसको लोक एवं परलोक में सुख तो मिलेगा ही है, साथ ही उसकी तपस्या भी अक्षय हो जाती है। जिस किसी प्रकार से भगवान् की पूजा में लीन रहने वाले व्यक्ति परम उत्तम लोक को पाते हैं, ऐसा ऋषियों ने कहा है ॥१०-१३॥ अगहन मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी को मनुष्य श्रद्धापूर्वक क्षीरशायी भगवान् की विधिपूर्वक अर्चा करें। पहले दन्तधावन आदि नित्यकर्मों को समाप्त कर स्नान करें और श्वेतवस्त्र धारणकर गंध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य से मौन होकर भक्तिपूर्वक हरि की पूजा करे । केशवाय नमस्तुभ्यम्, (केशव को नमस्कार है) इस मन्त्र से विष्णु की पूजा करनी चाहिए। तदनन्तर घृत और तिल की एक सौ आठ आहुतियाँ अग्नि में देनी चाहिए, रात में शालिग्राम के समीप ही जागरण करना चाहिए और फिर एक पसेरी दूध से निर्विकार १७-नारदीयपुराणम्