बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३० नारदीयपुराणम् स्नापयेत्प्रस्थपयसा नारायणमनामयम् । गीतैर्वाद्यैश्च नैवेद्यैर्भक्ष्यभोज्यैश्च केशवम् ॥१७॥ त्रिकालं पूजयेद्भक्त्या महालक्ष्म्या समन्वितम् । पुनः कल्ये समुत्थाय कृत्वा कर्म यथोचितम् ॥१८॥ पूर्ववत्पूजयेद्देवं वाग्यतो नियतः शुचिः । पायसं घृतसंमिश्रं नारिकेरफलान्वितम् ॥२०॥ मन्त्रेणानेन विप्राय दद्याद्भक्त्या सदक्षिणम् । केशवः केशिहा देवः सर्वसंपत्प्रदायकः ॥२१॥ परमान्नप्रदानेन मम स्यादिष्टदायकः । ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाच्छक्तितो बन्धुभिः सह ॥२२॥ नारायणपरो भूत्वा स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः । इति यः कुरुते भक्त्या केशवार्चनमुत्तमम् ॥२३॥ स पौण्डरीकयज्ञस्य फलमष्टगुणं लभेत् । पौषमासे सिते पक्षे द्वादश्यां समुपोषितः ॥२४॥ नमो नारायणायेति पूजयेत्प्रयतो हरिम् । पयसा स्नाप्य नैवेद्यं पायसं च समर्पयेत् ॥२५॥ रात्रौ जागरणं कुर्यात्त्रिकालार्चनतत्परः । धूपैर्दीपैश्च नैवेद्यैर्गन्धैः पुष्पैर्मनोरमैः ॥२६॥ तृणैश्च गीतवाद्याद्यैः स्तोत्रैश्चाप्यर्चयेद्धरिम् । कृशरान्नं च विप्राय दद्यात्सघृतदक्षिणम् ॥२७॥ सर्वात्मा सर्वलोकेशः सर्वव्यापी सनातनः । नारायणः प्रसन्नः स्यात्कृशरान्नप्रदानतः ॥२८॥ मंत्रणानेन विप्राय दत्त्वा वै दानमुत्तमम् । द्विजांश्च भोजयेद्भक्त्या स्वयमद्यात्स बान्धवः ॥२९॥ एवं संपूजयेद्भक्त्या देवं नारायणं प्रभुम् । अग्निष्टो्राष्टकफलं स संपूर्णमवाप्नुयात् ॥३०॥ माघस्य शुक्लद्वादश्यां पूर्ववत्समुपोषितः । नमस्ते माधवायेति हुत्वाष्टौ च घृताहुतीः ॥३१॥ पूर्वमानेन पयसा स्नापयेन्माधवं तदा । पुष्पगन्धाक्षतैरर्चेतसावधानेन चेतसा ॥३२॥ रात्रौ जागरणं कुर्यात्पूर्ववद्भक्तिसंयुतः । कल्पकर्म च निर्वर्त्य माधवं पुनरर्चयेत् ॥३३॥ प्रस्थं तिलानां विप्राय दद्याद्वै मन्त्रपूर्वकम् । सदक्षिणं सवस्त्रं च सर्वपापविमुक्तये ॥३४॥ नारायण का अभिषेक करना चाहिए ॥१४-१७॥ इस प्रकार लक्ष्मी के सहित भगवान् की नैवेद्य और अन्यान्य भोज्यपदार्थों, एवं गीत वाद्य आदि से तीनों काल भक्ति पूर्वक पूजा करनी चाहिए। फिर प्रातःकाल उठकर विधिपूर्वक नित्यकर्मों को समाप्त कर पहले की ही भाँति समय पूर्वक पवित्र भाव से पूजा करे। 'केशव केशिहन्ता और सब प्रकार की सम्पत्ति को देने वाले भगवान् इस मधुर भोजन के दान से प्रसन्न होकर मेरे मनोरथों को पूर्ण करें' इस मन्त्र से दूध, घी और नारिकेल से बने पदार्थों को दक्षिणा सहित ब्राह्मणों को दे । पश्चात् यथा शक्ति ब्राह्मणों को भोजन करावे और स्वयं भाई बन्धुओं के साथ भगवान् का ध्यान करते हुए भोजन करे । इस प्रकार विधिपूर्वक जो केशव की पूजा करता है वह पौण्डरीक यज्ञ का आठगुना फल पाता है ॥१८-२३॥ पूस मास में शुक्ल पक्ष की द्वादशी को निराहार रहकर 'नमो नारायणाय' इस मन्त्र से भक्ति पूर्वक भगवान् को दुग्ध से स्नान कराकर पायस और नैवेद्य अर्पित करे । तीनों काल भगवान् की पूजा में निरत रहकर रात में तो जागरण करे और धूप, दीप, नैवेद्य, गन्ध और मनोहर फूल और पत्तियों से हरि की पूजा करे । पुनः स्तोत्र पाठ और गीत वादन से भगवान् का मनोरंजन करे, ब्राह्मणों को 'सर्वात्मा, सब लोकों के प्रभु, सर्वव्यापक सनातन नारायण इस कृशरान्न (खिचड़ी) के दान से प्रसन्न होवें' इस मन्त्र से घी और दक्षिणा सहित खिचड़ी दे ॥२४-२८॥ शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर पश्चात् स्वयं भाई बन्धुओं के साथ भोजन करे । इस प्रकार भक्ति पूर्वक विधिवत् प्रभुनारायण की पूजा करने से आठ अग्निष्टोम यज्ञ करने का फल मिलता है । माघ शुक्ल द्वादशी को पहले की भाँति निराहार व्रत रहकर 'नमस्ते माधवाय' इस मन्त्र से घी की छह आहुतियां देकर एक पसेरी दूध से माधव को स्नान करावे । पुनः सावधान होकर पुष्प, गंध, अक्षत से भगवान् की पूजा करे और पूर्व की भाँति भक्तिपूर्वक रात में जागरण करे । कल्प-सूत्रानुसार कर्मों को समाप्त कर पुनः माधव की पूजा करे ॥२६-३३॥ साथ ही वस्त्र और दक्षिणा के साथ मन्त्र पढ़ता हुआ हुआ एक पसेरी तिल