भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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१३१] सप्तदशोऽध्यायः माधवः सर्वभूतात्मा सर्वकर्मफलप्रदः । तिलदानेन महता सर्वान्कामान्प्रयच्छतु ॥३५॥ मन्त्रेणानेन विप्राय दत्त्वा भक्तिसमन्वितः । ब्राह्मणान्भोजयेच्छक्त्या संस्मरेन्माधवं प्रभुम् ॥३६॥ एवं यः कुरुते भक्त्या तिलदाने व्रतं मुने । वाजपेयशतस्यासौ संपूर्णं फलमाप्नुयात् ॥३७॥ फाल्गुनस्य सिते पक्षे द्वादश्यां समुपोषितः । गोविन्दाय नमस्तुभ्यमिति संपूजयेद्व्रती ॥३८॥ अष्टोत्तरशतं हुत्वा घृतमिश्रतिलाहुतीः । पूर्वमानेन पयसा गोविन्दं स्नापयेच्छुचिः ॥३६॥ रात्रौ जागरणं कुर्यात्त्रिकालं पूजयेत्तथा । प्रातःकृत्यं समाप्याथ गोविन्दं पूजयेत्पुनः ॥४०॥ व्रीह्याढकं च विप्राय दद्याद्वस्त्रं सदक्षिणम् । नमो गोविन्द सर्वेश गोपिकाजनवल्लभ ॥४१॥ अनेन धान्यदानेन प्रीतो भव जगद्गुरो । एवं कृत्वा व्रतं सम्यक् सर्वपापविवर्जितः ॥४२॥ गोमेदमखजं पुण्यं सम्पूर्णं लभते नरः । चैत्रमासे सिते पक्षे द्वादश्यां समुपोषितः ॥४३॥ नमोऽस्तु विष्णवे तुभ्यमिति पूर्ववदर्चयेत् । क्षीरेण स्नापयेद्विष्णुं पूर्वमानेन भक्तितः ॥४४॥ तथैव स्नापयेद्विप्र घृतप्रस्थेन सादरम् । कृत्वा जागरणं रात्रौ पूजयेत्पूर्ववद्व्रती ॥४५॥ ततः कल्ये समुत्थाय प्रातःकृत्यं समाप्य च । अष्टोत्तरशतं हुत्वा मध्वाज्यतिलमिश्रितम् ॥४६॥ सदक्षिणं च विप्राय दद्याद्वै तण्डुलाढकम् । प्राणरूपी महाविष्णुः प्राणदः सर्ववल्लभः ॥४७॥ तण्डुलाढकदानेन प्रीयतां मे जनार्दनः । एवं कृत्वा नरो भक्त्या सर्वपापविवर्जितः ॥४८॥ अत्यग्निष्टोमयज्ञस्य फलमष्टगुणं लभेत् । वैशाखशुक्लद्वादश्यामुपोष्य मधुसूदनम् ॥४६॥ द्रोणक्षीरेण देवेशं स्नापयेद्भक्तिसंयुतः । जागरं तत्र कर्त्तव्यं त्रिकालाचंनसयुतम् ॥५०॥ अपने सब पापों से मुक्त होने के लिए ब्राह्मण को दे। माधव सब पदार्थों में व्यापक और सब कर्मों के फल को देने वाले हैं। वे इस मन्त्रवाक्य से भक्ति पूर्वक ब्राह्मण को तिलदान देकर प्रभु माधव का स्मरण करता हुआ यथा शक्ति ब्राह्मणों को खिलावे ॥३४-३६॥ मुनिनारद ! इस प्रकार भक्ति पूर्वक जो व्यक्ति तिलदान से भगवान् को संतुष्ट करता है, वह सौ वाजपेय यज्ञों का फल पाता है। फागुन मास की शुक्ल-पक्ष-द्वादशी को निराहार रहकर व्रती 'गोविन्दाय नमस्तुभ्यम्' इस मन्त्र से घी मिले तिल को एक सौ आठ आहुतियाँ देकर एक पसेरी दूध से गोविन्द को स्नान करावे। तीनों काल विधिवत् पूजा कर रात में जागरण करे। प्रातःकालीन पूजा समाप्त हो जाने पर उसी प्रकार शेष दोनों समय गोविन्द की पूजा करे और वस्त्र दक्षिणा सहित 'गोविन्द ! सर्वेश ! गोपिकाजनबल्लभ ! आपको नमस्कार है। जगद्गुरु ! धान्य दान से प्रसन्न होइए' इस वाक्य से एक आढक धान विप्र को दे। इस प्रकार विधि पूर्वक व्रत को करने से मनुष्य अपने सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर गोमेधयज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥३७-४३॥ चैत महीने में शुक्लपक्ष-द्वादशी के दिन निराहार व्रत रहकर यथाशक्ति पूर्वोक्त विधि से 'नमोस्तु विष्णवे तुभ्यम्' इस मन्त्र से दूध से विष्णु को स्नान करावे। विप्र ! फिर आदर पूर्वक एक पसेरी घी से स्नान कराकर रात भर जागरण कर पूर्वोक्त विधि से ही पूजा करे। तदनन्तर प्रातःकाल उठकर प्रातःकालीन क्रिया समाप्त करने के बाद मधु, घी और तिल से एक सौ आठ बार आहुति दे। 'महाविष्णु प्राणरूप, प्राणदाता और सब के स्वामी भगवान् जनार्दन मेरे इस एक आढक चावल के दान से प्रसन्न हों, इस वाक्य से ब्राह्मण को दक्षिणा में एक आढक चावल भी दे ॥४४-४७॥ इस प्रकार व्रत करने से मनुष्य अपने सब पापों से युक्त होकर अग्निष्टोम यज्ञ का अठगुना फल पाता है। वैशाख-शुक्ल-द्वादशी के दिन निराहार रहकर देवेश मधुसूदन को एक द्रोण दूध से स्नान करावे, तीनों काल विधिपूर्वक भगवान् की पूजाकर रात्रि में जागरण भी करे और 'नमस्ते मधु हन्चे' (मधु हन्ता को नमस्कार है) इस मन्त्र से घी की एक सौ आठ आहुतियां दे। इस प्रकार