बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
१२० नारदीयपुराणम् भ्रमद्भ्रमरसंघुष्टं कूजद्विहगसंकुलम् । व्रजद्वराहनिकरं चमरीपुच्छवीजितम् ॥४॥ नृत्यन्मयूरनिकरं सारङ्गादिनिषेवितम् । प्रवर्द्धितमहावृक्षं मुनिकन्याभिरादरात् ॥५॥ शालतालतमालाढ्यं नूनहिंतालमण्डितम् । मालतीयूथिकाकुन्दचम्पकाश्वत्थभूषितम् ॥६॥ उत्फुल्लकुसुमोपेतमृषिसङ्घनिषेवितम् । वेदशास्त्रमहाघोषमाश्रमं प्राविशद्भृगोः ॥७॥ गृणन्तं परमं ब्रह्मावृतं शिष्यगणैर्मुनिम् । तेजसा सूर्यसदृशं भृगुं तत्र ददर्श सः ॥८॥ प्रणनामार्थ विप्रेन्द्रं पादसंग्रहणादिना । आतिथ्यं भृगुरप्यस्य चक्रे सम्मानपूर्वकम् ॥९॥ कृतातिथ्यक्रियो राजा भृगुणा परमर्षिणा । उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा विनयान्मुनिपुङ्गवम् ॥१०॥ भगीरथ उवाच भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । पृच्छामि भवभीतोऽहं नृणामुद्धारकारणम् ॥११॥ भगवांस्तुष्यते येन कर्मणा मुनिसत्तम । तन्ममाख्याहि सर्वज्ञ अनुग्राह्योऽस्मि ते यदि ॥१२॥ भृगुरुवाच राजंस्तवेप्सितं ज्ञातं त्वं हि पुण्यवतां वरः । अन्यथा स्वकुलं सर्वं कथमुद्धर्त्तुमर्हसि ॥१३॥ यो वा को वापि भूपाल स्वकुलं शुभकर्मणा । उद्धर्त्तुकामस्तं विद्यान्नररूपधरं हरिम् ॥१४॥ कर्मणा येन देवेशो नृणामिष्टफलप्रदः । तत्प्रवक्ष्यामि राजेन्द्र शृणुष्व सुसमाहितः ॥१५॥ भव सत्यपरो राजन्न हिंसानिरतस्तथा । सर्वभूतहितो नित्यं मानृतं वद वै क्वचित् ॥१६॥
करने वाले पक्षियों की मधुर ध्वनि से वह आश्रम मुखरित था । कहीं एक ओर वराहयूथ इधर-उधर घूम रहे हैं तो कहीं चँवरी गायें अपनी मनोहर पूंछों को हिला रही हैं ॥२-४॥ नाचते हुए मयूरों और सारंगपक्षियों से वह वन सुशोभित है । जहाँ मुनि-कन्याओं ने बड़े आदर से सींच-सींचकर वट आदि वृक्षों को बड़ा बनाया है । शाल, ताल और तमाल वृक्षों से वह आश्रम व्याप्त है । हिंताल से युक्त वह मालती, जूही, कुंद, चंपा और पीपल के वृक्षों से सुशोभित है ॥५-६॥ ऐसे पुष्पित कुसुमों, तेजस्वी ऋषियों से व्याप्त उस भृगु के आश्रम में भगीरथ ने प्रवेश किया जहाँ चारों ओर वेद और शास्त्रों की ही ध्वनि सुनाई पड़ रही थी । उस आश्रम में राजा अपने तेज से सूर्य के समान भृगु मुनि को देखा जिनके चारों ओर परम ब्रह्म की चर्चा में लीन शिष्य-गण उपस्थित थे । मुनि को देखकर राजा ने चरणों पर गिर कर उस विप्रेन्द्र को प्रणाम किया, भृगु ने भी सम्मानपूर्वक राजा का आतिथ्य सत्कार किया । परम ऋषि भृगु का आतिथ्य स्वीकार करने के अनन्तर राजा हाथ जोड़कर विनत-भाव से मुनिपुंगव भृगु से बोला ॥७-१०॥ भगीरथ बोले - भगवन् ! सर्वधर्मज्ञ ! सर्वशास्त्रविशारद ! सांसारिक दुःखों से भयभीत मैं मनुष्यों के उद्धार का मार्ग पूछ रहा हूँ । यदि आप का मेरे ऊपर अनुग्रह है तो हे मुनिश्रेष्ठ ! सर्वज्ञ ! आप जिन कर्मों से भगवान् सन्तुष्ट होते हैं उनकी कृपा कर मुझको बतलाइये मैं आपका कृपापात्र हूँ ॥११-१२॥ भृगु बोले-राजन् ! मैंने तुम्हारा अभिप्राय समझ लिया । तुम पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ हो, अन्यथा अपने कुल का उद्धार करने के लिये कैसे प्रस्तुत होते ? भूपाल ! जो कोई मनुष्य अपने शुभ कर्मों से अपने कुल का उद्धार करना चाहता है उसको नररूपधारी हरि समझना चाहिए । राजेन्द्र ! जिन कर्मों से प्रसन्न होकर देवेश मनुष्यों को इष्ट फल प्रदान करते हैं, उनको बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनो । राजन् ! सत्यवादी बनो, सर्वदा अहिंसा का पालन करो, सारे प्राणियों के उपकार में ही लीन रहो और कभी भी कहीं पर असत्य वचन मत
षोडशोऽध्यायः १२१ त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम् । कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर विष्णुं सनातनम् ॥१७॥ कुरु पूजां महाविष्णोर्याहि शान्तिमनुत्तमाम् । द्वादशाष्टाक्षरं मन्त्रं जप श्रेयो भविष्यति ॥१८॥ भगीरथ उवाच सत्यं तु कीदृशं प्रोक्तं सर्वभूतहितं मुने । अनृतं कीदृशं प्रोक्तं दुर्जनाश्चापि कीदृशाः ॥१९॥ साधवः कीदृशाः प्रोक्तास्तथा पुण्यं च कीदृशम् । स्मर्तव्यश्च कथं विष्णुस्तस्य पूजा च कीदृशी ॥२०॥ शान्तिश्च कीदृशी प्रोक्ता को मन्त्रोऽष्टाक्षरो मुने । को वा द्वादशवर्णश्च मुने तत्त्वार्थकोविद ॥२१॥ कृपां कृत्वा मयि परां सर्वं व्याख्यातुमर्हसि । भृगुरुवाच साधु साधु महाप्राज्ञ तव बुद्धिरनुत्तमा । ॥२२॥ यत्पृष्टोऽहं त्वया भूप तत्सर्वं प्रवदामि ते । यथार्थकथनं यत्तत्सत्त्वमाहुर्विपश्चितः ॥२३॥ धर्माविरोधतो वाच्यं तद्धि धर्मपरायणैः । देशकालादि विज्ञाय स्वधमस्याविरोधतः ॥२४॥ यद्वचः प्रोच्यते सद्भिस्तत्सत्यमभिधीयते । सर्वेषामेव जंतूनामक्लेशजननं हि तत् ॥२५॥ अहिंसा सा नृप प्रोक्ता सर्वकामप्रदायिनी । कर्मकार्यसहायत्वमकार्यपरिपन्थिना ॥२६॥ सर्वलोकहितत्वं वै प्रोच्यते धर्मकोविदैः । इच्छानुवृत्तकथनं धर्माधर्मविवेकिनः ॥२७॥ अनृतं तद्धि विज्ञेयं सर्वश्रेयोविरोधि तत् । ये लोके द्वेषिणो मूर्खाः कुमार्गरतबुद्धयः ॥२८॥ ते राजन्दुर्जंना ज्ञेयाः सर्वधर्मबहिष्कृताः । धर्माधर्मविवेकेन वेदमार्गानुसारिणः ॥२६॥
बोलो । दुर्जन का संग छोड़ दो, साधुओं की संगति करो, रात दिन पुण्य कार्य करो सनातन विष्णु का स्मरण निरन्तर करो । महाविष्णु को पूजा करो शान्ति प्राप्त करोगे । द्वादशाक्षर (ओं नमो भगवते वासुदेवाय) और अष्टाक्षर मंत्र (ओं नमो वासुदेवाय) का जप करो तुम्हें श्रेय प्राप्त होगा ॥१३-१८॥ भगीरथ बोले--मुने ! सत्य का स्वरूप कैसा कहा गया है ? सर्व-प्राणि-हित क्या है ? अनृत किसे कहते हैं ? दुर्जनों की परिभाषा क्या है ? साधु किसे कहते हैं ? पुण्य कैसा होता है ? विष्णु का स्मरण किस प्रकार करना चाहिए ? उनकी पूजा को विधि क्या है ? शान्ति किसे कहते हैं ? अष्टाक्षर मन्त्र कौन सा है ? द्वादशवर्ण मन्त्र कौन है ? मुने ! तत्त्वार्थ के ज्ञाता ! मुझ पर अत्यधिक कृपा कर इन विषयों की व्याख्या कीजिए ॥१९-२१॥ भृगुजी बोले--महाप्राज्ञ ! धन्य हो, धन्य हो, तुम्हारी बुद्धि असाधारण है । तुमने जो कुछ मुझसे पूछा है उसको कह रहा हूँ। जो यथार्थ कथन है उसो को विद्वानों ने सत्य कहा है अर्थात् यथार्थ कथन को ही सत्य कहा जाता है । उस सत्य को धर्मपरायण व्यक्ति धर्म के अविरोध रूप से कहें । सज्जन व्यक्ति देश काल का ध्यान रखकर समन्वयात्मक दृष्टि से जो कुछ कहते हैं वही सत्य कहा जाता है। नृप ! सब प्राणियों को जिस कार्य से कष्ट न हो उसी को सब अभीष्ट वस्तुओं को देने वाली अहिंसा कहा गया है ॥२२-२५॥ धर्मतत्त्व के मर्मज्ञ जन लोक-व्यवहार में जिससे सहायता मिले और लोक-विरोध जिससे शान्त हो उसी को सर्वलोकहित कहते हैं । धर्म अधर्म का पूर्ण ज्ञान रखने वाले मनीषी जिसको अपने विवेक से अनुचित ठहराते हैं, उसको सब श्रेयसें को नष्ट करने वाला अनृत समझना चाहिए । राजन् ! इस संसार में जो द्वेष करने वाले, मूर्ख, कुमार्ग में ही सर्वदा लीन रहने वाले हैं, उन सब धर्मों से पराङ्मुख रहनेवालों को ही दुर्जन समझना चाहिए ॥२६-२८॥ धर्माधर्म के विवेक से वेदमार्ग का अनुसरण करने वाले और लोक-हितों में लगे रहने वाले व्यक्ति ही साधु माने जाते हैं। हरिभक्ति १६-नारदीयपुराण
१२२ नारदीयपुराणम् सर्वलोकहितासक्ताः साधवः परिकीर्तिताः । यत्तत्सद्भिborderश्च परिरञ्जितम् ॥३०॥ आत्मनः प्रीतिजनकं तत्पुण्यं परिकीर्तितम् । सर्वं जगदिदं विष्णुर्विष्णुः सर्वस्य कारणम् ॥३१॥ अहं च विष्णुर्यज्ज्ञानं तद्विष्णुस्मरणं विदुः । सर्वदेवमयो विष्णुर्विधिना पूजयामि तम् ॥३२॥ इति या भवति श्रद्धा सा तद्भक्तिः प्रकीर्तिता । सर्वभूतमयो विष्णुः परिपूर्णः सनातनः ॥३३॥ इत्यभेदेन या बुद्धिः समता सा प्रकीर्तिता । समता शत्रुमित्रेषु वशित्वं च तथा नृप ॥३४॥ यदृच्छालाभसंतुष्टिः सा शान्तिः परिकीर्तिता । एते सर्वे समाख्यातास्तपःसिद्धिप्रदा नृणाम् ॥३५॥ समस्तपापराशीनां तरसा नाशहेतवः । अष्टाक्षरं महामन्त्रं सर्वपापप्रणाशनम् ॥३६॥ वक्ष्यामि तव राजेन्द्र पुरुषार्थैकसाधनम् । विष्णोः प्रियकरं चैव सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥३७॥ नमो नारायणायेति जपेत्प्रणवपूर्वकम् । नमो भगवते प्रोच्य वासुदेवाय तत्परम् ॥३८॥ प्रणवाद्यं महाराज द्वादशार्णमुदाहृतम् । द्वयोः समं फलं राजन्नष्टदशावर्णयोः ॥३९॥ प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च साम्यमुद्दिष्टमेतयोः । शङ्खचक्रधरं शान्तं नारायणमनामयम् ॥४०॥ लक्ष्मीसंश्रितवामाङ्कं तथाभयकरं प्रभुम् । किरीटकुण्डलधरं नानामण्डनशोभितम् ॥४१॥ भ्राजत्कौस्तुभमालाढ्यं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम् । पीताम्बरधरं देवं सुरासुरनमस्कृतम् ॥४२॥ ध्यायेदनादिनिधनं सर्वकामफलप्रदम् । अन्तर्यामी ज्ञानरूपी परिपूर्णः सनातनः ॥४३॥ एतत्सर्वं समाख्यातं यत्तु पृष्टं त्वया नृप । स्वस्ति तेऽस्तु तपःसिद्धिं गच्छ लब्धुं यथासुखम् ॥४४॥ एवमुक्तो महीपालो भृगुणा परमर्षिणा । परमां प्रीतिमापन्नः प्रपेदे तपसे वनम् ॥४५॥
की ओर मन को प्रेरित करने वाले, सज्जनों को आनन्दित करने वाले और अपने को आनन्द देने वाले जो शुभ कर्म हैं, वे पुण्य कहे गए हैं । सारा विश्व विष्णु है विष्णु ही सब के कारण हैं। मैं स्वयं विष्णु हूँ, ऐसे ज्ञान को ही विष्णु स्मरण कहा जाता है । 'विष्णु सर्वदेवमय हैं । उनकी विधिपूर्वक पूजा करूँगा' इस प्रकार की जो श्रद्धा होती है उसी को भक्ति कहा जाता है ॥२९-३२॥ 'विष्णु सब पदार्थों में व्याप्त हैं, परिपूर्ण और सनातन हैं, ऐसी जो विश्व और विष्णु में अभेद बुद्धि है, उसी को समता कहते हैं । नृप ! शत्रु और मित्र में समान भाव रखना, आत्मसंयम और जो कुछ मिल जाय उसी पर प्रसन्न रहना ही शान्ति कही जाती है । ये सभी धर्म मनुष्यों के लिए तपस्या के समान सिद्धिप्रद बतलाये गए हैं ॥३३-३५॥ हठात् सम्पूर्ण पापराशि को नष्ट करने वाला अष्टाक्षर नामक महामन्त्र है । राजेन्द्र ! पुरुषार्थ के एक मात्र साधन, सब सिद्धियां देने वाले और भगवान् के परम प्रिय मन्त्र को कह रहा हूँ । प्रणव पूर्वक 'नमो नारायणाय' मन्त्र को जपना चाहिए । प्रणव (ओं) आदि में लगाकर 'नमो भगवते' कहने के पश्चात् वासुदेवाय का उच्चारणकरे । महाराज ! इसी को द्वादशाक्षर मन्त्र कहा जाता है । राजन् ! इन द्वादशाक्षर और अष्टाक्षर मन्त्रों का समान फल कहा गया है ॥३६-३९॥ ये प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों मार्गों के लिये समान रूप से साधक हैं । शंख-चक्र-धारी, शान्त, निर्विकार, नारायण, लक्ष्मी से सुशोभित वाम भाग वाले, अभय प्रद, प्रभु, किरीट-कुण्डल-धारी, अनेक प्रकार से सुसज्जित, कौस्तुभधारी और अनेक मालाओं से विभूषित, श्रीवत्स से सुशोभित वक्षःस्थल वाले, पीताम्बरधारी, सुर और असुरों से पूजित, अनादि, अनन्त और सब मनोरथों को देने वाले भगवान् विष्णु का ध्यान करे । भगवान् अन्तर्यामी, ज्ञानस्वरूप, परिपूर्ण और सनातन हैं । ॥४०-४३॥ नृप ! तुमने जो कुछ पूछा उसके विषय में ये सारी बातें बता दी गयीं । तुम्हारा कल्याण हो । अब सुख पूर्वक तपः सिद्धि प्राप्त करने के लिये जाओ । परम ऋषि भृगु की ऐसी आज्ञा और आशीर्वाद सुनकर राजा अति प्रसन्न हो गया और तपस्या के लिये वन में गया । हिमालयपर्वत के एक
षोडशोऽध्यायः १२३ हिमवद्गिरिमासाद्य पुण्यदेशे मनोहरे । नादेश्वरे महाक्षेत्रे तपस्तेपेऽतिदुश्चरम् ॥४६॥ राजा त्रिषवणस्नायी कन्दमूलफलाशनः । कृतातिथ्यर्हणश्चापि नित्यं होमपरायणः ॥४७॥ सर्वभूतहितः शान्तो नारायणपरायणः । पत्रैः पुष्पैः फलैस्तोयैस्त्रिकालं हरिपूजकः ॥४८॥ एवं बहुतित्थं कालं नीत्वा चात्यन्तधैर्यवान् । ध्यायन्नारायणं देवं शीर्णपर्णाशनोऽभवत् ॥४६॥ प्राणायामपरो भूत्वा राजा परमधार्मिकः । निरुच्छ्वासं तपस्तप्तुं ततः समुपचक्रमे ॥५०॥ ध्यायन्नारायणं देवमनन्तमपराजितम् । षष्टिवर्षसहस्राणि निरुच्छ्वासपरोऽभवत् ॥५१॥ तस्य नासापुटाद्राज्ञो वह्निर्जज्ञे भयंकरः । तं दृष्ट्वा देवताः सर्वे वित्रस्ता वह्नितापिताः ॥५२॥ अभिजग्मुर्महाविष्णुं यत्रास्ते जगतां पतिः । क्षीरोदस्योत्तरं तीरं संप्राप्य त्रिदशेश्वराः । अस्तुवन्देवदेवेशं शरणागतपालकम् ॥५३॥ देवा ऊचुः नता. स्म विष्णुं जगदेकनाथं स्मरत्समस्तार्तिहरं परेशम् । स्वभावशुद्धं परिपूर्णभावं वदन्ति यज्ज्ञानतनुं च तज्ज्ञाः ॥५४॥ ध्येयः सदा योगिवरैर्महात्मा स्वेच्छाशरीरैः कृतदेवकार्यः । जगत्स्वरूपो जगदादिनाथस्तस्मै नताः स्मः पुरुषोत्तमाय ॥५५॥ यन्नामसंकीर्त्तनतो खलानां समस्तपापानि लयं प्रयान्ति । तमीशमीड्यं पुरुषं पुराणं नताः स्म विष्णुं पुरुषार्थसिद्धयै ॥५६॥
मनोहर पुण्य भूमि नादेश्वर नामक क्षेत्र में अति दुष्कर तप करने लगा ।।४४-४६।। राजा त्रिकाल स्नान करता और कन्द मूल फल खाकर समय बिताता था । नित्य प्रति अतिथिसंवा और हवन करता था । प्राणियों का हितैषी, शान्त और नारायण का सेवक वह पत्र, पुष्प और फल से तीनों काल हरि की पूजा किया करता था । इस प्रकार परम धीर उस राजा ने बहुत समय व्यतीत किया । तदनन्तर नारायण देव का ध्यान करता हुआ पेड़ से गिरी हुई पत्तियों को चुन चुन कर खाने लगा । पुनः इससे भी सन्तोष न पाकर वह परम धार्मिक राजा प्राणायाम साधना करता हुआ श्वास रोक कर तपस्या करने लगा । ।।४७-५०।। इस प्रकार साठ हजार वर्षों तक अनन्त, अपराजित नारायण देव का श्वास निरोध पूर्वक ध्यान करता रहा । अन्त में उस राजा के नथने से भयंकर ज्वाला उत्पन्न हुई । उसको देखकर सभी देवता भयत्रस्त हो गये, वे अग्निज्वाला से सन्तप्त होकर वहाँ गये जहाँ जगन्नाथ महाविष्णु थे । देवता क्षीरसागर के उत्तर तीर पर जाकर शरणागतरक्षक देवदेवेश की स्तुति करने लगे ।।५१-५३।। देवगण बोले-- संसार के एकमात्र प्रभु, स्मरण मात्र से समस्त पीड़ाओं को दूर करने वाले, स्वभावशुद्ध और परम पूर्ण स्वरूप विष्णु को नमस्कार करते हैं । जिसको ब्रह्मज्ञानी ज्ञान रूप कहते हैं। अपनी इच्छा से शरीर धारण कर (अवतार लेकर) जो देवों का कार्य किया करते, जिस महात्मा का सर्वदा ध्यान करते, जो जगत्स्वरूप और संसार के आदि नाथ हैं उस पुरुषोत्तम को नमस्कार है । जिसके नाम-कीर्तन से समस्त पाप विनष्ट हो जाते हैं उस पूज्य परमेश पुराण पुरुष को अपनी कामना सिद्धि के लिए प्रणाम करते हैं । ।।५४-५६।। जिसके प्रकाश से सूर्य, चन्द्र आदि सर्वदा प्रकाश पूर्ण रहते और जिसके आदेश का कभी भी उल्लंघन नहीं करते उस पुरुषार्थस्वरूप, देवेश कलात्मक विष्णु को हम नमस्कार करते हैं । जिसके अनुग्रह से कमलयोनि ब्रह्मा लोक-
यतोजसा भान्ति दिवाकराद्या नातिक्रमन्त्यस्य कदापि शिक्षाः । कालात्मकं तं त्रिदशाधिनाथं नमामहे वै पुरुषार्थरूपम् ॥५७॥ जगत्करोऽत्यब्जभवोऽत्ति रुद्रः पुनाति लोकांञ्श्रुतिभिश्च विप्राः । तमादिदेवं गुणसन्निधानं सर्वोपदेष्टारमिताः शरण्यम् ॥५८॥ वरं वरेण्यं मधुकैटभारिं सुरासुरार्चितपादपीठम् । सद्भक्तसंकल्पितसिद्धिहेतुं ज्ञानेकवेद्यं प्रणताः स्म देवम् ॥५९॥ अनादिमध्यान्तमजं परेशमनाद्यविद्याख्यतमोविनाशम् । सच्चित्परानन्दघनस्वरूपं रूपादिहीनं प्रणताः स्म देवम् ॥६०॥ नारायणं विष्णमनन्तमेशं पीताम्बरं पद्मभवादिसेव्यम् । यज्ञप्रियं यज्ञकरं विशुद्धं नताः स्म सर्वोत्तमाव्ययं तम् ॥६१॥ इति स्तुतो महाविष्णुर्देवैरिन्द्रादिभिस्तदा । चरितं तस्य राजर्षेर्देवानां संन्यवेदयत् ॥६२॥ ततो देवान्समाश्वास्य दत्त्वाभयमनञ्जनः । जगाम यत्र राजर्षिस्तपस्तपति नारद ॥६३॥ शङ्खचक्रधरो देवः सच्चिदानन्दविग्रहः । प्रत्यक्षतामगात्तस्य राज्ञः सर्वजगद्गुरुः ॥६४॥ तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं भाभासितदिगन्तरम् । अतसीपुष्पसंकाशं स्फुरत्कुण्डलमण्डितम् ॥६५॥ स्निग्धकुन्तलवक्त्राब्जं विभ्राजन्मुकुटोज्ज्वलम् । श्रीवत्सकौस्तुभधरं वनमालाविभूषितम् ॥६६॥ दीर्घबाहुमुदाराङ्गं लोकेशार्चितपत्कजम् । ननाम दण्डवद्भूमौ भूपतिर्नम्रकंधरः ॥६७॥ अत्यन्तहर्षसंपूर्णः सरोमाञ्चः सगद्गदः । कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति श्रीकृष्णति समुच्चरन् ॥६८॥ तस्य विष्णुः प्रसन्नात्मा हृन्तर्यामी जगद्गुरुः । उवाच कृपयाविष्टो भगवान्भूतभावनः ॥६९॥
सृष्टि करते, अतिरुद्र समस्त संसार को पवित्र करते, विप्रगण वेदमन्त्रों द्वारा जिसका स्तवन करते उस गुणनिधान सबको उपदेश देने वाले, आदि देव और शरणागतपालक की शरण में हम सभी देवता आये हुए हैं । ।।५७-५८।। वर, वरेण्य, मधुकैटभ के शत्रु, सद्भक्तों के मनोरथों को सिद्ध करने वाले ज्ञान से हो एक मात्र गम्य देव को नमस्कार है, जिसके चरणों को देव और असुर सभी पूजा करते हैं । अनादि, अमध्य, अनन्त, अज, परेश और अनादि अविद्या रूपी अन्धकार को नष्ट करने वाले, रूप रहित (निर्गुण) और सच्चिदानन्द घन स्वरूप देव को नमस्कार है । ।।५९-६०।। अनन्त, ईश, पीताम्बरधारी, ब्रह्मा, शिव आदि देव के पूज्य, यज्ञप्रिय, यज्ञकर, सर्वोत्तम, विशुद्ध और अव्यय देव को नमस्कार है । इस प्रकार इन्द्र सहित सब देवताओं ने महाविष्णु की स्तुति की और उस राजर्षि भगीरथ का चरित्र कह दिया । यह सुनकर निरंजन भगवान् ने देवों को आश्वासन दिया और अभयवर प्रदानकर वे स्वयं वहाँ गये जहाँ राजर्षि भगीरथ तपस्या कर रहे थे । ।।६१-६३।। नारद ! शंख चक्र धारी, सच्चिदानन्द स्वरूप और सब लोकों के गुरु जब उस राजा के समीप गये तब उस भूपति ने कमलनयन, अलसी के पुष्प समान मनोहर वर्णी अपनी प्रभा से समस्त दिङ्मण्डल को आलोकित करने वाले, वनमाला से विभूषित, महाबाहु, श्रीवत्स और कौस्तुभ से सुशोभित, लोकपालों से पूजित चरणकमल वाले उज्ज्वल मणि जटिल मुकुट से सुशोभित शिर वाले, प्रभा पूर्ण कुण्डलों से सुशोभित और उदार अंग वाले भगवान् को विनम्र भाव से दण्डवत् प्रणाम किया और अत्यन्त आनन्द से पुलकित होकर गद् गद् वाणी से कृष्ण !, कृष्ण ! कृष्ण ! श्रीकृष्ण !!! का उच्चारण किया । अन्तर्यामी, जगद्गुरु, भूतभावन भगवान् भगीरथ को भक्ति भावना को देखकर प्रसन्न होकर कृपा पूर्वक बोले ।।६४-६९।।
षोडशोऽध्यायः १२५ श्रीभगवानुवाच भगीरथ महाभाग तवाभीष्टं भविष्यति । आगमिष्यन्ति मल्लोकं तव पूर्वपितामहाः ॥७०॥ मम मूर्त्यन्तरं शम्भुं राजन्स्तोत्रैः स्वशक्तितः । स्तुहि ते सकलं कामं स वै सद्यः करिष्यति ॥७१॥ यस्तु जग्राह शशिनं शरणं समुपागतम् । तस्मादाराधयेशानं स्तोत्रैः स्तुत्यं सुखप्रदम् ॥७२॥ अनादिनिधनो देवः सर्वकामफलप्रदः । त्वया संपूजितो राजन्सद्यः श्रेयो विधास्यति ॥७३॥ इत्युक्त्वा देवदेवेशो जगतां पतिरच्युतिः । अन्तर्दधे मुनिश्रेष्ठ उत्तस्थौ सोऽपि भूपतिः ॥७४॥ किमिदं स्वप्न आहोस्वित्सत्यं साक्षाद्द्विजोत्तम । भूपतिर्विस्मयं प्राप्तः किं करोमीति विस्मितः ॥७५॥ अथान्तरिक्षे वागुच्चैः प्राह तं भ्रान्तचेतसम् । सत्यमेतदिति व्यक्तं न चिन्तां कर्तुमर्हसि ॥७६॥ तन्निशाम्यावनीपाल ईशानं सर्वकारणम् । समस्तदेवताराजमस्तोषीद् भक्तितत्परः ॥७७॥ भगीरथ उवाच प्रणमामि जगन्नाथं प्रणतार्तिप्रणाशनम् । प्रमाणागोचरं देवमीशानं प्रणवात्मकम् ॥७८॥ जगद्रूपमजं नित्यं सर्गस्थित्यंतकारणम् । विश्वरूपं विरूपाक्ष प्रणतोऽस्म्युग्ररेतसम् ॥७९॥ आदिमध्यान्तरहितमनन्तमजमव्ययम् । समामनन्ति योगीन्द्रास्तं वन्दे पुष्टिवर्धनम् ॥८०॥ नमो लोकाधिनाथाय वञ्चते परिवञ्चते । नमोऽस्तु नीलग्रीवाय पशूनां पतये नमः ॥८१॥ नमश्चैतन्यरूपाय पुष्टानां पतये नमः । नमोऽकल्पप्रकल्पाय भूतानां पतये नमः ॥८२॥ नमः पिनाकहस्ताय शूलहस्ताय ते नमः । नमः कपालहस्ताय पाशमुद्गरधारिणे ॥८३॥ भगवान् बोले-भगीरथ ! महाभाग ! तुम्हारी मनःकामना सिद्ध होगी और तुम्हारे पूर्वज पितामह मेरे लोक को अवश्य प्राप्त करेंगे । परन्तु राजन् ! तुम अपनी शक्ति के अनुसार मेरी अपर मूर्ति शंकर की स्तोत्रों से स्तुति करो । वे तुम्हारे सब मनोरथों को तत्काल पूर्ण करेंगे । जिसने शरणागत चन्द्रमा को शरण दी, उस सुखप्रद, पूज्य ईशानदेव की आराधना करो ॥७०-७२॥ वे अनादि और अनन्त देव सब मनोरथों को पूर्ण करने वाले हैं । राजन् ! तुम्हारी पूजा से प्रसन्न होकर वे शीघ्र तुम्हें कल्याण प्रदान करेंगे । यह कह कर जगत्पति, अच्युत, देवदेवेश अन्तर्हित हो गये और मुनिश्रेष्ठ ! वह भूपति भी उठा और आश्चर्य चकित होकर सोचने लगा कि यह सत्य है या स्वप्न ! अब क्या करूं ? इस प्रकार वह अत्यन्त विस्मित हो गया । भ्रान्त राजा को इस प्रकार आकाशवाणी सुनाई पड़ी कि यह सत्य है, इस विषय में चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं । आकाशवाणी सुनकर भूमिपाल भगीरथ सबके एक मात्र कारण सब देवताओं के स्वामी ईशान की भक्ति पूर्वक स्तुति करने लगे ॥७३-७७॥ भगीरथ बोले- जगन्नाथ ! भक्तों की पीड़ा दूर करने वाले, (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द) प्रमाणों से परे और ओंकार रूप ईशान देव को प्रणाम करता हूँ । जगत्स्वरूप, अज, नित्य, सृष्टि, स्थिति और प्रलय करने वाले, विश्वरूप, विरूपाक्ष और उग्रवीर्य को प्रणाम है । आदि, मध्य और अन्त से हीन, अनन्त, अज, अव्यय और योगीन्द्र लोग जिसकी वन्दना करते हैं, उस पुष्टिवर्धन को नमस्कार है । लोकाधिनाथ और लोक को मायावश करने वाले परम वंचक को नमस्कार है । नीलग्रीव को नमस्कार है । पशुपति को नमस्कार है ॥७८- ८१॥ चैतन्यरूप शिव को नमस्कार है। पुष्टों (भूतों) के पति को नमस्कार है । कल्प के रचयिता को नमस्कार है । भूतों के पति को नमस्कार है । पिनाकपाणि को नमस्कार है । शूलहस्त को नमस्कार है । कपालपाणि को नमस्कार है । पाश और मुद्गर धारण करने वाले को प्रणाम है । सर्वभूत को नमस्कार है । घंटाहस्त को
१२६ नारदीयपुराणम् नमस्ते सर्वभूताय घण्टाहस्ताय ते नमः । नमः पञ्चास्यदेवाय क्षेत्राणां पतये नमः ॥८४॥ नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते । अनेकरूपरूपाय निर्गुणाय परात्मने ॥८५॥ नमोगणाधिदेवाय गणानां पतये नमः । नमो हिरण्यगर्भाय हिरण्यपतये नमः ॥८६॥ हिरण्यरेतसे तुभ्यं नमो हिरण्यबाहवे । नमो ध्यानस्वरूपाय नमस्ते ध्यानसाक्षिणे ॥८७॥ नमस्ते ध्यानसंस्थाय ध्यानगम्याय ते नमः । येनेदं विश्वमखिलं चराचरविराजितम् ॥८८॥ वर्षेवाभ्रेण जनितं प्रधानपुरुषात्मना ॥८९॥ स्वप्रकाशं महात्मानं परं ज्योतिः सनातनम् । यमामनन्ति तत्त्वज्ञाः सवितारं नृचक्षुषाम् ॥९०॥ उमाकांतंनन्दिकेशं नीलकण्ठं सदाशिवम् । मृत्युंजयं महादेवं परात्परतरं विभुम् ॥९१॥ परं शब्दब्रह्मरूपं तं वन्देऽखिलकारणम् । कपर्दिने नमस्तुभ्यं सद्योजाताय वै नमः ॥९२॥ भवोद्भवाय शुद्धाय ज्येष्ठाय च कनीयसे । मन्यवे त इषे वध्याः पतये यज्ञतन्तवे ॥९३॥ ऊर्जे दिशां च पतये कालायाघोररूपिणे । कृशानुरेतसे तुभ्यं नमोऽस्तु सुमहात्मने ॥९४॥ यतः समुद्राः सरितोऽद्रयश्च गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घाः । स्थाणुर्चरिष्णुर्महदल्पकं च असच्च सञ्जीवमजीवमास ॥९५॥ नतोऽस्मि तं योगिनतांघ्रिपद्मं सर्वान्तरात्मानमरूपमीशम् । स्वतंत्रमेकं गुणिनां गुणं च नमामि भूयः प्रणमामि भूयः ॥९६॥ इत्थं स्तुतो महादेवः शंकरो लोकशंकरः । आविर्बभूव भूपस्य संतप्ततपसोग्रतः ॥९७॥ पञ्चवक्त्रं दशभुजं चन्द्रार्द्धकृतशेखरम् । त्रिलोचनमुदाराङ्गं नागयज्ञोपवीतिनम् ॥९८॥ नमस्कार है। पाँच मुख वाले को नमस्कार है। क्षेत्रों के पति को नमस्कार है ॥८२-८४॥ भू को धारण करने वाले और समस्त भूतों के आदि भूत को नमस्कार है। अनेक अनेक रूपों को धारण करने वाले, निर्गुण, परात्मन्, गणाधि- देव को नमस्कार है। गणों के स्वामी को नमस्कार है। हिरण्यगर्भ को नमस्कार है। हिरण्यपति को नमस्कार है। हिरण्यरेतस् तुमको नमस्कार है। हिरण्यबाहु के लिए नमस्कार है। ध्यानस्वरूप को नमस्कार है। ध्यान- साक्षी को नमस्कार है। ध्यानस्थ को नमस्कार है। ध्यानगम्य को नमस्कार है। जिससे यह अखिल चराचरा- त्मक जगत् व्याप्त है ॥८५-८८॥ जिस जगत् को प्रधान पुरुष (शिव) ने मेघों से उत्पन्न वर्षा की भाँति उत्पन्न किया, उसको नमस्कार है। स्वप्रकाश, परं ज्योति, सनातन, महात्मा और जो मनुष्यों के नेत्र हैं उस सविता सूर्य को नमस्कार है। उमाकान्त, नन्दिकेश, नीलकण्ठ, सदाशिव, मृत्युंजय, महादेव, परात्पर, विभु, वाणी से अगोचर और अखिल सृष्टि के कारण ब्रह्म की वन्दना करता हूँ। कपर्दी ! तुमको नमस्कार है। सद्यःजात को नमस्कार है ॥८९-९२॥ भव के आदि कारण, शुद्ध, ज्येष्ठ, सबसे छोटे, क्रोधस्वरूप, सर्वव्यापक, वेदपति, यज्ञ के प्रवर्द्धक, ऊर्ज (बल), दिक्पति, काल, अघोर रूप, अग्निरेतस् और महात्मा तुमको नमस्कार है। समुद्र, नदियाँ, पहाड़, गन्धर्व, यक्ष, असुर, सिद्धसंघ, चर, स्थावर, महान्, लघु, असत् और सत् भी जिससे उत्पन्न हुए हैं, उस सर्वान्तरात्मा, अरूप, ईश, स्वतन्त्र, एक, गुणशील और गुणरूप शंकर को प्रणाम करता हूँ। जिसके चरणकमलों में योगी जन नतमस्तक रहते हैं, ऐसे देव को पुनः-पुनः प्रणाम करता हूँ ॥९३-९६॥ लोककल्याणकारी शंकर की इस प्रकार स्तुति करने पर शंकर जी उस तपोजर्जर भूप के सामने प्रकट हुए। नारद ! इस प्रकार पंचमुख, दशभुज, द्वितीया के चन्द्रमा को शिर पर धारण किये, त्रिनेत्र, उदाररूप, सर्प का यज्ञोपवीत पहने हुए, विशाल वक्षःस्थल वाले, कैलाश के समान गौर वर्ण, गज-
षोडशोऽध्यायः। १२७ विशालवक्षसं देवं तुहिनाद्रिसमप्रभम् । गजचर्माम्बरधरं सुरार्चितपदाम्बुजम् ॥९६॥ दृष्ट्वा पपात पादाग्रे दण्डवद्भुवि नारद । तत उत्थाय सहसा शिवाग्रे विहिताञ्जलिः ॥१००॥ प्रणनाम महादेवं कीर्तयन्शंकराद्वयम् । विज्ञाय भक्तिं भूपस्य शंकरः शशिशेखरः ॥१०१॥ उवाच राज्ञे तुष्टोऽस्मि वरं वरय वाञ्छितम् । तोषितोऽस्मि त्वया सम्यक् स्तोत्रेण तपसा तथा ॥१०२॥ एवमुक्तः स देवेन राजा संतुष्टमानसः । उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा जगतामीश्वरेश्वरम् ॥१०३॥ भगीरथ उवाच अनुग्राह्योऽस्मि यदि ते वरदानान्महेश्वर । तदा गङ्गां प्रयच्छास्मत्पितॄणां मुक्तिहेतवे ॥१०४॥ श्रीशिव उवाच दत्ता गङ्गा मया तुभ्यं पितॄणां ते गतिः परा । तुभ्यं मोक्षः परश्चेति तमुक्त्वान्तर्दधे शिवः ॥१०५॥ कपर्दिनो जटास्रस्ता गङ्गा लोकैकपाविनी । पावयन्ती जगत्सर्वमन्वगच्छद्भगीरथम् ॥१०६॥ ततः प्रभृति सा देवी निर्मला मलहारिणी । भागीरथीति विख्याता त्रिषु लोकेष्वभून्मुने ॥१०७॥ सगरस्यात्मजाः पूर्वं यत्र दग्धाः स्वपाप्मना । तं देशं प्लावयामास गङ्गा सर्वसरिद्वरा ॥१०८॥ यदा संप्लावितं भस्म सागराणां तु गङ्गया । तदैव नरके मग्ना उद्धृताश्च गतैमसः ॥१०६॥ पुरा संक्रुध्यमानेन ये यमेनातिपीडिताः । त एव पूजितास्तेन गङ्गाजलपरिप्लुताः ॥११०॥ गतपापान्स विज्ञाय यमः सगरसंभवान् । प्रणम्याभ्यर्च्य विधिवत्प्राह तान्प्रीतमानसः ॥१११॥ भो भो राजसुता यूयं नरकाद् भृशदारुणात् । मुक्ता विमानमारुह्य गच्छध्वं विष्णुमन्दिरम् ॥११२॥ इत्युक्तास्ते महात्मानो यमेन गतकल्मषाः । दिव्यदेहधरा भूत्वा विष्णुलोकं प्रपेदिरे ॥११३॥ चर्म का वस्त्र धारण करने वाले और सुरों से पूजित चरण वाले भगवान् शंकर को सामने उपस्थित देखकर भगीरथ ने दण्डवत् प्रणाम किया । तत्पश्चात् शीघ्र उठकर शंकर के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए ॥६७-१००॥ महादेव शंकर का गुणगान करते हुए बार-बार प्रणाम करने लगे । चन्द्रशेखर शंकर राजा की भक्ति देखकर बोले, राजन् ! प्रसन्न हूँ, अभीष्ट वर माँगो, तुम्हारी स्तुति और तपस्या के वशीभूत हूँ। भगवान् शंकर की ऐसी बातें सुनकर राजा संतुष्ट हो गया । उसने हाथ जोड़कर जगदीश्वर से बोला—महेश्वर ! यदि आप वरदान के द्वारा मुझे अनुगृहीत करना चाहते हैं तो कृपा कर मुझे गंगाजी को दे दें जिनसे मेरे मृत पितरों को मुक्ति प्राप्त हो ॥१०१-१०४॥ शिव बोले—मैने तुमको गंगा दे दी, जिससे तुम्हारे पितरों को परमगति की प्राप्ति होगी, तुम्हें भी परम मोक्ष प्राप्त होगा, ऐसा वर देकर शिव अन्तर्हित हो गए । तदनन्तर कपर्दी शंकर की जटा से निकलकर लोक को पवित्र करने वाली गंगा सारे संसार को पवित्र करती हुई भगीरथ के पीछे-पीछे चलो । मुने ! उसी समय से वह मलहारिणी निर्मल गंगा इस त्रिभुवन में भागीरथी नाम से विख्यात हो गयीं ।१०५-१०७॥ परम पवित्र (श्रेष्ठ) नदी गंगा ने उस स्थान को जहाँ अपने पापों के कारण सगरपुत्र भस्म हो गए थे—जलमग्न कर दिया । ज्योंही गंगाजल से सगर पुत्रों के शरीर-भस्म का स्पर्श हुआ त्योंही नरक में डूबे हुए वे पापमुक्त हो कर स्वर्ग को चले गए । जिन सगर पुत्रों को यम ने क्रुद्ध होकर पीड़ा पहुँचाई थी, गंगाजल के स्पर्श से वे ही उनके द्वारा पूजे गए । यम ने सगर पुत्रों को पाप मुक्त जानकर उनकी विधिवत् पूजा की और प्रसन्न होकर कहा ॥१०८-१११॥ हे राजपुत्रो ! तुम लोग अब इस घोर दारुण नरक से मुक्त हो गए। इस विमान पर चढ़कर विष्णु- लोक को चले जाओ । महात्मा यम की बातों को सुनकर वे निष्पाप सगर-पुत्र दिव्यरूप धारणकर विष्णुलोक को
१२८ नारदीयपुराणम् एवं प्रभावा सा गङ्गा विष्णुपादाग्रसंभवा । सर्वलोकेषु विख्याता महापातकनाशिनी ॥११४॥ य इदं पुण्यमाख्यानं महापातकनाशनम् । पठेच्च शृणुयाद्वापि गङ्गास्नानफलं लभेत् ॥११५॥ यस्त्वेतत्पुण्यमाख्यानं कथयेद्ब्राह्मणाग्रतः । स याति विष्णुभवनं पुनरावृत्तिवर्जितम् ॥११६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गामाहात्म्ये भगीरथगङ्गानयनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥१६॥ सप्तदशोऽध्यायः ऋषय ऊचुः साधु सूत महाभाग त्वयातिकरुणात्मना । श्रावितं सर्वपापघ्नं गङ्गामाहात्म्यमुत्तमम् ॥१॥ श्रुत्वा तु गङ्गामाहात्म्यं नारदो देवदर्शनः । किं पप्रच्छ पुनः सूत सनकं मुनिसत्तमम् ॥२॥ सूत उवाच शृणुध्वमृषयः सर्वे नारदेन सुरर्षिणा । पृष्टं पुनर्यथा प्राह प्रवक्ष्यामि तथैव तत् ॥३॥ नानाख्यानेतिहासाढ्यं गङ्गामाहात्म्यमुत्तमम् । श्रुत्वा ब्रह्मसुतो भूयः पृष्टवानिदमादरात् ॥४॥ नारद उवाच अहोऽतिधन्यं सुकृतैकसारं श्रुतं मया पुण्यमसंवृतार्थम् गाङ्गेयमाहात्म्यमघप्रणाशि त्वत्तो मुने कारुणिकादभीष्टम् ॥५॥ चले गए। इस प्रकार के प्रभाव वाली और विष्णु चरणों से उत्पन्न होने वाली गंगा सब लोकों में महापातक- नाशिनी नाम से विख्यात हो गई। जो मनुष्य इस महापातकनाशक परमपुण्यप्रद आख्यान को सुनता है अथवा पाठ करता है वह गंगास्नान का फल प्राप्त करता है। जो इस पुण्य आख्यान को ब्राह्मणों को सुनाता है वह मुक्ति धाम विष्णु लोक को चला जाता है। ॥११२-११६॥ श्री बृहन्नारदीयपुराण के पूर्वभाग के प्रथम पाद में गंगामाहात्म्यवर्णन नामक सोलहवां अध्याय समाप्त ॥१६॥ अध्याय १७ उद्यापन सहित शुक्लपक्षीय द्वादशीव्रत-निरूपण ऋषिगण बोले—महाभाग ! धन्य हो, तुमने बड़ी कृपा की जो आज परम उत्तम तथा सब पापों को नष्ट करने वाला यह गंगा माहात्म्य सुना दिया। सूत ! देवदर्शन नारद जी ने गंगा-माहात्म्य सुनने के बाद पुनः मुनि- श्रेष्ठ सनक जी से क्या पूछा इसको अब बतलाओ। ॥१॥ सूतजी बोले—ऋषिगण ! सुनो। देवर्षिनारद ने पुनः जो कुछ पूछा और सनक जी ने जो कुछ उत्तर दिया, उसको पूर्णरूप से कह रहा हूँ। अनेकों इतिहास और आख्यानों से भरे उत्तम गंगा माहात्म्य को सुनकर ब्रह्मपुत्र नारद ने आदर पूर्वक सनक जी से पूछा—॥२-४॥ नारद जी बोले—अहा ! मुने ! आज मैंने परम कृपालु आप से धन्य, सम्पूर्ण सुकृतों का सारभूत, पवित्र,
१२६ सप्तदशोऽध्यायः ये साधवः साधु भजन्ति विष्णुं स्वार्थं परार्थं च यतन्त एव । नानोपदेशैः सुविमुग्धचित्तं प्रबोधयन्ति प्रसभं प्रसन्नम् ॥६॥ ततः समाख्याहि हरेर्व्रतानि कृतैश्च यैः प्रीतिमुपैति विष्णुः । ददाति भक्तिं भजतां दयालुर्मुक्तिस्तु तस्या विदिता हि दासी ॥७॥ ददाति मुक्तिं भजतां मुकुन्दो व्रतार्चनध्यानपरायणानाम् । भक्तानुसेवासु महाप्रयासं विमृश्य कस्यापि न भक्तियोगम् ॥८॥ प्रवृत्तं च निवृत्तं च यत्कर्म हरितोषणम् । तदाख्याहि मुनिश्रेष्ठ विष्णुभक्तोऽसि मानद ॥६॥ सनक उवाच साधु साधु मुनिश्रेष्ठ भक्तस्त्वं पुरुषोत्तमे । भूयो भूयो यतः पृच्छेश्र्चरित्रं शार्ङ्गधन्वनः ॥१०॥ व्रतानि ते प्रवक्ष्यामि लोकोपकृतिमन्ति च । प्रसीदति हरिर्यैस्तु प्रयच्छत्यभयं तथा ॥११॥ यस्य प्रसन्नो भगवान्यज्ञलिङ्गो जनार्दनः । इहामुत्र सुखं तस्य तपोवृद्धिश्च जायते ॥१२॥ येन केनाप्युपायेन हरिपूजापरायणाः । प्रयान्ति परमं स्थानमिति प्राहुर्महर्षयः ॥१३॥ मार्गशीर्षे सिते पक्षे द्वादश्यां जलशायिनम् । उपोषितोऽर्चयेत्सम्यङ् नरः श्रद्धासमन्वितः ॥१४॥ स्नात्वा शुक्लाम्बरधरो दन्तधावनपूर्वकम् । गन्धपुष्पाक्षतैर्धूपैर्दीपेर्नैवेद्यपूर्वकैः ॥१५॥ वाग्यतो भक्तिभावेन मुनिश्रेष्ठार्चयेद्धरिम् । केशवाय नमस्तुभ्यमिति विष्णुं च पूजयेत् ॥१६॥ अष्टोत्तरशतं हुत्वा वह्नौ घृततिलाहुतीः । रात्रौ जागरणं कुर्याच्छाालग्रामसमीपतः ॥१७॥ विशद फल देने वाला, अभीष्ट और पापनाशक गंगा का माहात्म्य सुना इससे कृतार्थ हो गया। जो साधु होते हैं वे विष्णु का अनन्य भाव से भजन करते हैं और अपने स्वार्थ (भक्ति) और परोपकार दोनों की सिद्ध करते हैं, वे अपने मनोहर उपदेशामृत से पामरजनों को भी प्रसन्न कर ज्ञान का ज्योति प्रदान करते हैं। अब इसके बाद भगवान् के उन व्रतों और अनुष्ठानों को कहिए जिससे भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। कृपालु भगवान् भजन करने वालों को अपनी भक्ति प्रदान करते हैं। मुक्ति भक्ति की दासी कही गयी है। मुकुन्द भगवान् व्रत, पूजा और ध्यानोपासना में लीन रहने वाले भक्त जनों को मुक्ति देते हैं। भक्तों की सेवा में महान् प्रयास करना पड़ता है ऐसा सोचकर वे भक्तियोग किसी को नहीं देते। मुनिशिरोमणि ! प्रवृत्त, निवृत्त और जिन कर्मों से भगवान् प्रसन्न होते हैं उन कर्मों को आप बतलाइए, मानद ! आप विष्णु भक्त हैं, आप ही इन बातों को जानते हैं ॥५-९॥ सनकजी बोले-मुनिश्रेष्ठ ! तुम धन्य हो, धन्य हो, तुम पुरुषोत्तम के अनन्य भक्त हो; क्योंकि बार- बार विष्णु के चरित्र को ही तुम पूछ रहे हो। तुमसे लोक के उपकार करनेवाले उन व्रतों को कह रहा हूँ जिनके अनुष्ठान से विष्णु प्रसन्न होते हैं और अभय वर प्रदान करते हैं। जिसके ऊपर यज्ञपुरुष जनार्दन प्रसन्न होते हैं, उसको लोक एवं परलोक में सुख तो मिलेगा ही है, साथ ही उसकी तपस्या भी अक्षय हो जाती है। जिस किसी प्रकार से भगवान् की पूजा में लीन रहने वाले व्यक्ति परम उत्तम लोक को पाते हैं, ऐसा ऋषियों ने कहा है ॥१०-१३॥ अगहन मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी को मनुष्य श्रद्धापूर्वक क्षीरशायी भगवान् की विधिपूर्वक अर्चा करें। पहले दन्तधावन आदि नित्यकर्मों को समाप्त कर स्नान करें और श्वेतवस्त्र धारणकर गंध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य से मौन होकर भक्तिपूर्वक हरि की पूजा करे । केशवाय नमस्तुभ्यम्, (केशव को नमस्कार है) इस मन्त्र से विष्णु की पूजा करनी चाहिए। तदनन्तर घृत और तिल की एक सौ आठ आहुतियाँ अग्नि में देनी चाहिए, रात में शालिग्राम के समीप ही जागरण करना चाहिए और फिर एक पसेरी दूध से निर्विकार १७-नारदीयपुराणम्
१३० नारदीयपुराणम् स्नापयेत्प्रस्थपयसा नारायणमनामयम् । गीतैर्वाद्यैश्च नैवेद्यैर्भक्ष्यभोज्यैश्च केशवम् ॥१७॥ त्रिकालं पूजयेद्भक्त्या महालक्ष्म्या समन्वितम् । पुनः कल्ये समुत्थाय कृत्वा कर्म यथोचितम् ॥१८॥ पूर्ववत्पूजयेद्देवं वाग्यतो नियतः शुचिः । पायसं घृतसंमिश्रं नारिकेरफलान्वितम् ॥२०॥ मन्त्रेणानेन विप्राय दद्याद्भक्त्या सदक्षिणम् । केशवः केशिहा देवः सर्वसंपत्प्रदायकः ॥२१॥ परमान्नप्रदानेन मम स्यादिष्टदायकः । ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाच्छक्तितो बन्धुभिः सह ॥२२॥ नारायणपरो भूत्वा स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः । इति यः कुरुते भक्त्या केशवार्चनमुत्तमम् ॥२३॥ स पौण्डरीकयज्ञस्य फलमष्टगुणं लभेत् । पौषमासे सिते पक्षे द्वादश्यां समुपोषितः ॥२४॥ नमो नारायणायेति पूजयेत्प्रयतो हरिम् । पयसा स्नाप्य नैवेद्यं पायसं च समर्पयेत् ॥२५॥ रात्रौ जागरणं कुर्यात्त्रिकालार्चनतत्परः । धूपैर्दीपैश्च नैवेद्यैर्गन्धैः पुष्पैर्मनोरमैः ॥२६॥ तृणैश्च गीतवाद्याद्यैः स्तोत्रैश्चाप्यर्चयेद्धरिम् । कृशरान्नं च विप्राय दद्यात्सघृतदक्षिणम् ॥२७॥ सर्वात्मा सर्वलोकेशः सर्वव्यापी सनातनः । नारायणः प्रसन्नः स्यात्कृशरान्नप्रदानतः ॥२८॥ मंत्रणानेन विप्राय दत्त्वा वै दानमुत्तमम् । द्विजांश्च भोजयेद्भक्त्या स्वयमद्यात्स बान्धवः ॥२९॥ एवं संपूजयेद्भक्त्या देवं नारायणं प्रभुम् । अग्निष्टो्राष्टकफलं स संपूर्णमवाप्नुयात् ॥३०॥ माघस्य शुक्लद्वादश्यां पूर्ववत्समुपोषितः । नमस्ते माधवायेति हुत्वाष्टौ च घृताहुतीः ॥३१॥ पूर्वमानेन पयसा स्नापयेन्माधवं तदा । पुष्पगन्धाक्षतैरर्चेतसावधानेन चेतसा ॥३२॥ रात्रौ जागरणं कुर्यात्पूर्ववद्भक्तिसंयुतः । कल्पकर्म च निर्वर्त्य माधवं पुनरर्चयेत् ॥३३॥ प्रस्थं तिलानां विप्राय दद्याद्वै मन्त्रपूर्वकम् । सदक्षिणं सवस्त्रं च सर्वपापविमुक्तये ॥३४॥ नारायण का अभिषेक करना चाहिए ॥१४-१७॥ इस प्रकार लक्ष्मी के सहित भगवान् की नैवेद्य और अन्यान्य भोज्यपदार्थों, एवं गीत वाद्य आदि से तीनों काल भक्ति पूर्वक पूजा करनी चाहिए। फिर प्रातःकाल उठकर विधिपूर्वक नित्यकर्मों को समाप्त कर पहले की ही भाँति समय पूर्वक पवित्र भाव से पूजा करे। 'केशव केशिहन्ता और सब प्रकार की सम्पत्ति को देने वाले भगवान् इस मधुर भोजन के दान से प्रसन्न होकर मेरे मनोरथों को पूर्ण करें' इस मन्त्र से दूध, घी और नारिकेल से बने पदार्थों को दक्षिणा सहित ब्राह्मणों को दे । पश्चात् यथा शक्ति ब्राह्मणों को भोजन करावे और स्वयं भाई बन्धुओं के साथ भगवान् का ध्यान करते हुए भोजन करे । इस प्रकार विधिपूर्वक जो केशव की पूजा करता है वह पौण्डरीक यज्ञ का आठगुना फल पाता है ॥१८-२३॥ पूस मास में शुक्ल पक्ष की द्वादशी को निराहार रहकर 'नमो नारायणाय' इस मन्त्र से भक्ति पूर्वक भगवान् को दुग्ध से स्नान कराकर पायस और नैवेद्य अर्पित करे । तीनों काल भगवान् की पूजा में निरत रहकर रात में तो जागरण करे और धूप, दीप, नैवेद्य, गन्ध और मनोहर फूल और पत्तियों से हरि की पूजा करे । पुनः स्तोत्र पाठ और गीत वादन से भगवान् का मनोरंजन करे, ब्राह्मणों को 'सर्वात्मा, सब लोकों के प्रभु, सर्वव्यापक सनातन नारायण इस कृशरान्न (खिचड़ी) के दान से प्रसन्न होवें' इस मन्त्र से घी और दक्षिणा सहित खिचड़ी दे ॥२४-२८॥ शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर पश्चात् स्वयं भाई बन्धुओं के साथ भोजन करे । इस प्रकार भक्ति पूर्वक विधिवत् प्रभुनारायण की पूजा करने से आठ अग्निष्टोम यज्ञ करने का फल मिलता है । माघ शुक्ल द्वादशी को पहले की भाँति निराहार व्रत रहकर 'नमस्ते माधवाय' इस मन्त्र से घी की छह आहुतियां देकर एक पसेरी दूध से माधव को स्नान करावे । पुनः सावधान होकर पुष्प, गंध, अक्षत से भगवान् की पूजा करे और पूर्व की भाँति भक्तिपूर्वक रात में जागरण करे । कल्प-सूत्रानुसार कर्मों को समाप्त कर पुनः माधव की पूजा करे ॥२६-३३॥ साथ ही वस्त्र और दक्षिणा के साथ मन्त्र पढ़ता हुआ हुआ एक पसेरी तिल
१३१] सप्तदशोऽध्यायः माधवः सर्वभूतात्मा सर्वकर्मफलप्रदः । तिलदानेन महता सर्वान्कामान्प्रयच्छतु ॥३५॥ मन्त्रेणानेन विप्राय दत्त्वा भक्तिसमन्वितः । ब्राह्मणान्भोजयेच्छक्त्या संस्मरेन्माधवं प्रभुम् ॥३६॥ एवं यः कुरुते भक्त्या तिलदाने व्रतं मुने । वाजपेयशतस्यासौ संपूर्णं फलमाप्नुयात् ॥३७॥ फाल्गुनस्य सिते पक्षे द्वादश्यां समुपोषितः । गोविन्दाय नमस्तुभ्यमिति संपूजयेद्व्रती ॥३८॥ अष्टोत्तरशतं हुत्वा घृतमिश्रतिलाहुतीः । पूर्वमानेन पयसा गोविन्दं स्नापयेच्छुचिः ॥३६॥ रात्रौ जागरणं कुर्यात्त्रिकालं पूजयेत्तथा । प्रातःकृत्यं समाप्याथ गोविन्दं पूजयेत्पुनः ॥४०॥ व्रीह्याढकं च विप्राय दद्याद्वस्त्रं सदक्षिणम् । नमो गोविन्द सर्वेश गोपिकाजनवल्लभ ॥४१॥ अनेन धान्यदानेन प्रीतो भव जगद्गुरो । एवं कृत्वा व्रतं सम्यक् सर्वपापविवर्जितः ॥४२॥ गोमेदमखजं पुण्यं सम्पूर्णं लभते नरः । चैत्रमासे सिते पक्षे द्वादश्यां समुपोषितः ॥४३॥ नमोऽस्तु विष्णवे तुभ्यमिति पूर्ववदर्चयेत् । क्षीरेण स्नापयेद्विष्णुं पूर्वमानेन भक्तितः ॥४४॥ तथैव स्नापयेद्विप्र घृतप्रस्थेन सादरम् । कृत्वा जागरणं रात्रौ पूजयेत्पूर्ववद्व्रती ॥४५॥ ततः कल्ये समुत्थाय प्रातःकृत्यं समाप्य च । अष्टोत्तरशतं हुत्वा मध्वाज्यतिलमिश्रितम् ॥४६॥ सदक्षिणं च विप्राय दद्याद्वै तण्डुलाढकम् । प्राणरूपी महाविष्णुः प्राणदः सर्ववल्लभः ॥४७॥ तण्डुलाढकदानेन प्रीयतां मे जनार्दनः । एवं कृत्वा नरो भक्त्या सर्वपापविवर्जितः ॥४८॥ अत्यग्निष्टोमयज्ञस्य फलमष्टगुणं लभेत् । वैशाखशुक्लद्वादश्यामुपोष्य मधुसूदनम् ॥४६॥ द्रोणक्षीरेण देवेशं स्नापयेद्भक्तिसंयुतः । जागरं तत्र कर्त्तव्यं त्रिकालाचंनसयुतम् ॥५०॥ अपने सब पापों से मुक्त होने के लिए ब्राह्मण को दे। माधव सब पदार्थों में व्यापक और सब कर्मों के फल को देने वाले हैं। वे इस मन्त्रवाक्य से भक्ति पूर्वक ब्राह्मण को तिलदान देकर प्रभु माधव का स्मरण करता हुआ यथा शक्ति ब्राह्मणों को खिलावे ॥३४-३६॥ मुनिनारद ! इस प्रकार भक्ति पूर्वक जो व्यक्ति तिलदान से भगवान् को संतुष्ट करता है, वह सौ वाजपेय यज्ञों का फल पाता है। फागुन मास की शुक्ल-पक्ष-द्वादशी को निराहार रहकर व्रती 'गोविन्दाय नमस्तुभ्यम्' इस मन्त्र से घी मिले तिल को एक सौ आठ आहुतियाँ देकर एक पसेरी दूध से गोविन्द को स्नान करावे। तीनों काल विधिवत् पूजा कर रात में जागरण करे। प्रातःकालीन पूजा समाप्त हो जाने पर उसी प्रकार शेष दोनों समय गोविन्द की पूजा करे और वस्त्र दक्षिणा सहित 'गोविन्द ! सर्वेश ! गोपिकाजनबल्लभ ! आपको नमस्कार है। जगद्गुरु ! धान्य दान से प्रसन्न होइए' इस वाक्य से एक आढक धान विप्र को दे। इस प्रकार विधि पूर्वक व्रत को करने से मनुष्य अपने सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर गोमेधयज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥३७-४३॥ चैत महीने में शुक्लपक्ष-द्वादशी के दिन निराहार व्रत रहकर यथाशक्ति पूर्वोक्त विधि से 'नमोस्तु विष्णवे तुभ्यम्' इस मन्त्र से दूध से विष्णु को स्नान करावे। विप्र ! फिर आदर पूर्वक एक पसेरी घी से स्नान कराकर रात भर जागरण कर पूर्वोक्त विधि से ही पूजा करे। तदनन्तर प्रातःकाल उठकर प्रातःकालीन क्रिया समाप्त करने के बाद मधु, घी और तिल से एक सौ आठ बार आहुति दे। 'महाविष्णु प्राणरूप, प्राणदाता और सब के स्वामी भगवान् जनार्दन मेरे इस एक आढक चावल के दान से प्रसन्न हों, इस वाक्य से ब्राह्मण को दक्षिणा में एक आढक चावल भी दे ॥४४-४७॥ इस प्रकार व्रत करने से मनुष्य अपने सब पापों से युक्त होकर अग्निष्टोम यज्ञ का अठगुना फल पाता है। वैशाख-शुक्ल-द्वादशी के दिन निराहार रहकर देवेश मधुसूदन को एक द्रोण दूध से स्नान करावे, तीनों काल विधिपूर्वक भगवान् की पूजाकर रात्रि में जागरण भी करे और 'नमस्ते मधु हन्चे' (मधु हन्ता को नमस्कार है) इस मन्त्र से घी की एक सौ आठ आहुतियां दे। इस प्रकार
१३२ : नारदीयपुराणम् नमस्ते मधुहन्त्रे च जुहुयाच्छक्तितो घृतम् । अष्टोत्तरशतं प्राच्र्यं विधिवन्मधुसूदनम् ॥५१॥ विपापो ह्याश्वमेधानांमष्टानां फलमाप्नुयात् । ज्येष्ठमासे सिते पक्षे द्वादश्यामुपवासकृत् ॥५२॥ क्षीरेणाढकमानेन स्नापयेत्त्रिविक्रमम् । नमस्त्रिविक्रमायेति पूजयेद्भक्तिसंयतः ॥५३॥ जुहुयात्पायसेनेव ह्यष्टोत्तरशताहुतीः । कृत्वा जागरणं रात्रौ पुनः पूजां प्रकल्पयेत् ॥५४॥ अपूपविंशतिं दत्त्वा ब्राह्मणाय सदक्षिणाम् । देवदेव जगन्नाथ प्रसीद परमेश्वरः ॥५५॥ उपायेन च संगृह्य समाभीष्टप्रदो भव । ब्राह्मणांन्भोजयेच्छक्त्या स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः ॥५६॥ एवं यः कुरुते विप्र व्रतं त्रैविक्रमं परम् । सोऽष्टानां नरमेधानां विपापः फलमाप्नुयात् ॥५७॥ आषाढशुक्लद्वादश्यामुपवासो जितेन्द्रियः । वामनं पूर्वमानेन स्नापयेत्पयसा व्रती ॥५८॥ नमस्ते वामनायेति दूर्वाज्याष्टोत्तरं शतम् । हुत्वा च जागरं कुर्याद्वामनं चार्चयेत्पुनः ॥५९॥ सदक्षिणं च दध्यन्नं नालिकेरफलान्वितम् । भक्त्या प्रदद्याद्विप्राय वामनार्चनशीलिने ॥६०॥ वामनो बुद्धिदो होता द्रव्यस्थो वामनः सदा । वामनस्तारकोऽस्माच्च वामनाय नमो नमः ॥६१॥ अनेन दत्त्वा दध्यन्नं शक्तितो भोजयेद्विजान् । कृत्वैवमग्निष्टोमानां शतस्य फलमाप्नुयात् ॥६२॥ श्रावणस्य सिते पक्षे द्वादश्यामुपवासकृत् । क्षीरेण मधुमिश्रेण स्नापयेच्छ्रीधरं व्रती ॥६३॥ नमोऽस्तु श्रीधरायेति गन्धाद्यैः पूजयेत्क्रमात् । जुहुयात्पृषदाज्येन शतमष्टोत्तरं मुने ॥६४॥ कृत्वा च जागरं रात्रौ पुनः पूजां प्रकल्पयेत् । दातव्यं चैव विप्राय क्षीराढकमनुत्तमम् ॥६५॥ दक्षिणां च सवस्त्रां वै प्रदद्याद्धेमकुण्डले । मन्त्रेणानेन विप्रेन्द्र सर्वकामार्थसिद्धये ॥६६॥
भक्ति पूर्वक मधुसूदन को पूजा करने से मनुष्य पाप मुक्त होकर आठ अश्वमेध का फल प्राप्त करता है ॥४८-५१॥ जेठ मास की शुक्लपक्ष द्वादशी के दिन निराहार रहकर एक आढ़क दूध से भगवान् त्रिविक्रम को 'नमः त्रिविक्रमाय' इस मन्त्र से भक्ति पूर्वक पूजा करे और खीर की एक सौ आठ आहुतियां भी दे । रात्रि में जागरण कर पुनः सविधि पूजा कर 'देवदेव ! जगन्नाथ ! प्रसन्न होइए परमेश्वर ! इस उपहार से आप प्रसन्न होकर मेरे अभीष्ट फल को प्रदान कीजिए' इस वाक्य से बीस पूए ब्राह्मणों को दक्षिणा के साथ दे । स्वयं शक्ति के अनु- सार ब्राह्मण को भोजन कराकर मौन हो स्वयं भी भोजन करे । विप्र ! जो इस प्रकार त्रिविक्रम का परमोत्तम व्रत करता है वह निष्पाप होकर आठ नरमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥५२-५७॥ आषाढ़ शुक्ल द्वादशी के दिन जो जितेन्द्रिय व्रती निराहार रहकर एक द्रोण या एक आढ़क दूध से भगवान् वामन को स्नान कराता है और 'नमस्ते वामनाय' इस मन्त्र से दूब एवं घी की एक सौ आठ आहुतियां देकर रात भर जागरण करता है, फिर दक्षिणा, दही, अन्न और नारियल आदि से भगवान् की पूजाकर वामन के भक्त किसी ब्राह्मण को 'भगवान् वामन बुद्धि देने वाले, होता, सर्वदा सब द्रव्यों में रहने वाले और इस संसार-सागर से पार लगाने वाले हैं, ऐसे पूज्य वामन को नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है। इस वाक्य से यथाशक्ति दही मिला अन्नदान करता है वह इस प्रकार व्रत करने से हो अग्निष्टोम यज्ञ के समान फल पा जाता है ॥५८-६२॥ व्रती सावन की शुक्ल- पक्ष वाली द्वादशी को निराहार रहकर मधुमिश्रित दूध से भगवान् श्रीधर को स्नान करावे । 'नमस्ते श्रीधराय' इस मन्त्र से गन्ध आदि पूजन सामग्री से क्रमशः पूजन करे । मुने ! घी से एक सौ आठ बार हवन करने के अनन्तर रात भर जागरण करे और फिर पूजा करे । अपने सब मनोरथों को सिद्धि के लिए किसी ब्राह्मण को एक आढ़क शुद्ध दूध, वस्त्र, दक्षिणा और दो सुवर्ण के कुण्डल देने चाहिए । विप्रेन्द्र, दूध दान करते समय यह वाक्य पढ़ना चाहिए "क्षीरसागरशायी ! देवेश ! रमाकान्त ! जगत्पते ! इस क्षीर दान से आप प्रसन्न हों और सब
१३३ सप्तदशोऽध्यायः क्षीराब्धिशायिन्देवेश रमाकान्त जगत्पते । क्षीरदानेन सुप्रीतो भव सर्वसुखप्रदः ॥६७॥ सुखप्रदत्वाद्विप्रांश्च भोजयेच्छक्तितो व्रती । एवं कृत्वाश्वमेधानां सहस्रस्य फलं लभेत् ॥६८॥ मासि भाद्रपदे शुक्ले द्वादश्यां समुपोषितः । स्नापयेद्द्रोणपयसा हृषीकेशं जगद्गुरुम् ॥६९॥ हृषीकेशं नमस्तुभ्यमिति संपूजयेन्नरः । चरुणा मधुयुक्तेन शतमष्टोत्तरं हुनेत् ॥७०॥ जागरादीनि निर्वर्त्य दद्यादात्मविदे ततः । सार्धाढकं च गोधूमन्दक्षिणां हेमशक्तितः ॥७१॥ हृषीकेश नमस्तुभ्यं सर्वलोकैकहेतवे । मह्यं सर्वसुखं देहि गोधूमस्य प्रदानतः ॥७२॥ भोजयेद्ब्राह्मणाञ्शक्त्या स्वयं चाश्नीत वाग्यतः । सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्ममेधफलं लभेत् ॥७३॥ आश्विने मासि शुक्लायां द्वादश्यां समुपोषितः । पद्मनाभं च पयसा स्नापयेद्भक्तितः शुचिः ॥७४॥ नमस्ते पद्मनाभाय होमं कुर्यात्स्वशक्तितः । तिलव्रीहियवाज्यैश्च पूजयेच्च विधानतः ॥७५॥ जागरं निशि निर्वर्त्य पुनः पूजां समाचरेत् । दद्याद्विप्राय कुडवं मधुनस्तु सदक्षिणम् ॥७६॥ पद्मनाभ नमस्तुभ्यं सर्वलोकपितामह । मधुदानेन सुप्रीतो भव सर्वसुखप्रदः ॥७७॥ एवं यः कुरुते भक्त्या पद्मनाभव्रतं सुधीः । ब्रह्ममेधसहस्रस्य फलमाप्नोति निश्चितम् ॥७८॥ द्वादश्यां कार्तिके शुक्ले उपवासी जितेन्द्रियः । क्षीरेणाढकमानेन दध्ना वाज्येन तावता ॥७९॥ नमो दामोदरायेति स्नापयेद्भक्तिभावतः । अष्टोत्तरशतं हुत्वा मध्वाज्याक्ततिलाहुतीः ॥८०॥ जागरं नियतः कुर्यात्त्रिकालार्चनतत्परः । प्रातः संपूजयेद्देवं पद्मपुष्पैर्मनोरमैः ॥८१॥ पुनरष्टोत्तरशतं जुहुयात्सघृतैस्तिलैः । पञ्चभक्ष्ययुतं चान्नं दद्याद्विप्राय भक्तितः ॥८२॥ सुखों को प्रदान कीजिए । व्रती इस प्रकार पूजा समाप्त कर सुख प्राप्ति के लिए यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन करावे । इस प्रकार सविधि व्रत के अनुष्ठान से मनुष्य को एक हजार अश्वमेध का फल मिलता है ॥६३-६८॥ भादों मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी को निराहार रहकर एक द्रोण दूध से जगद्गुरु हृषीकेश को ‘हृषीकेश नमस्तुभ्यम्' इस मन्त्र से स्नान कराकर मधु युक्त चरु से एक सौ आठ बार हवन करे । रात्रि जागरण आदि विधि समाप्त कर किसी ज्ञानी ब्राह्मण को शक्ति के अनुसार सोना और दक्षिणा के सहित गेहूँ दे । दान देते समय 'हृषीकेश ! सारे संसार के एक मात्र कारण आपको नमस्कार है इस गेहूँ के दान से आप मुझे सम्पूर्ण सुख दें' इस वाक्य को कहे । इस प्रकार पूजा समाप्त कर यथा शक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं मौन होकर भोजन करे। इस विधि से व्रत का अनुष्ठान करने से व्रती सब पापों से मुक्त होकर 'ब्रह्ममेध' का फल प्राप्त करता है ॥६९-७३॥ कुआर के शुक्लपल की द्वादशी को व्रती उपवास करे, पवित्र होकर श्रद्धापूर्वक भगवान् पद्मनाभ को दूध से नहलावे । 'नमस्ते पद्मनाभाय' इस मन्त्र से तिल, चावल, घी और उसकी आहुति दे । शास्त्रविधि से पूजा करने के अनन्तर रातभर जागरण करे और पुनः विधिवत् पूजा कर किसी ब्राह्मण को दक्षिणा सहित एक पाव मधु का दान दे । दान करते समय 'सब लोकों के पितामह ! पद्मनाभ ! आपको नमस्कार है' इस मधुदान से आप प्रसन्न होकर सब सुखों को प्रदान करें। इस वाक्य का उच्चारण करे । नारद ! इस प्रकार जो बुद्धिमान् व्यक्ति भक्ति पूर्वक पद्मनाभ व्रत का अनुष्ठान करता है वह एक हजार ब्रह्ममेध यज्ञ का फल पाता है ॥७४-७८॥ कार्तिक-शुक्ल-द्वादशी को व्रती संयम पूर्वक निराहार व्रत रहे । 'नमो दामोदराय' इस मन्त्र से श्रद्धा-भाव से एक आढक दूध, दही अथवा उतने ही घी से भगवान् दामोदर को नहलावे । स्नान कराने के पश्चात् मधु, घी से मिश्रित तिल की एक सौ आठ बार आहुति दे ! नियम पूर्वक तोनों समय पूजा कर रात्रि में जागरण करे । दूसरे दिन प्रातःकाल भगवान् को मनोहर कमलपुष्प से अनन्य भाव से पूजा करे और पुनः घी मिश्रित तिल से एक सौ आठ बार आहुति दे । व्रत की निर्विघ्न समाप्ति के लिए पाँचों प्रकार के भक्ष्य पदार्थ सहित अन्न किसी वेदपाठी कुटुम्बी ब्राह्मण को दे । दान का मन्त्र यह है 'दामोदर ! जगन्नाथ !
१३४ नारदीयपुराणम् दामोदर जगन्नाथ सर्वकारणकारण । त्राहि मां कृपया देव शरणागतपालक ॥८३॥ अनेन दत्त्वा दानं च श्रोत्रियाय कुटुम्बिने । दक्षिणां च यथाशक्त्या ब्राह्मणांश्चापि भोजयेत् ॥८४॥ एवं गत्वा व्रतं सम्यगश्नीयाद्बन्धुभिः सह । अश्वमेधसहस्राणां द्विगुणं फलमश्नुते ॥८५॥ एवं कुर्याद्व्रती यस्तु द्वादशीव्रतमुत्तमम् । संवत्सरं मुनिश्रेष्ठ स याति परमं पदम् ॥८६॥ एकमासे द्विमासे वा यः कुर्याद्भक्तितत्परः । तत्तत्फलमवाप्नोति प्राप्नोति च हरेः पदम् ॥८७॥ पूर्णं संवत्सरं कृत्वा कुर्यादुद्यापनं व्रती । मार्गशीर्षसिते पक्षे द्वादश्यां च मुनीश्वर ॥८८॥ स्नात्वा प्रातर्यथाचारं दन्तधावनपूर्वकम् । शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लगन्धानुलेपनः ॥८९॥ मण्डपं कारयेद्दिव्यं चतुरस्रं सुशोभनम् । घण्टाचामरसंयुक्तं किङ्किणीरवशोभितम् ॥९०॥ अलंकृतं पुष्पमाल्यैर्वितानध्वजराजितम् । छादितं शुक्लवस्त्रेण दीपमालाविभूषितम् ॥९१॥ तन्मध्ये सर्वतोभद्रं कुर्यात्सम्यगलंकृतम् । तस्योपरि न्यसेत्कुम्भां द्वादशाम्बुप्रपूरितान् ॥९२॥ एकेन शुक्लवस्त्रेण सम्यक्संशोधितेन च । सर्वान्नाच्छादयेत्कुम्भान्पञ्चरत्नसमन्वितान् ॥९३॥ लक्ष्मीनारायणं देवं कारयेद्भक्तिमान्व्रती । हेम्ना वा रजतेनापि तथा ताम्रेण वा द्विज ॥९४॥ स्थापयेत्प्रतिमां तां च कुम्भोपरि सुसंयमी । तन्मूल्यं वा द्विजश्रेष्ठ काञ्चनं च स्वशक्तितः ॥९५॥ सर्वव्रतेषु मतिमान्वित्तशाठ्यं विवर्जयेत् । यदि कुर्यात्क्षयं यान्ति तस्यायुर्धनसंपदः ॥९६॥ अनन्तशायिनं देवं नारायणमनामयम् । पञ्चामृतेन प्रथमं स्नापयेद्भक्तिसंयुतः ॥९७॥ सकल कारणों के कारण ! शरणागतपालक ! देव ! कृपा कर मेरी रक्षा कीजिए । दक्षिणा सहित अन्नदान के बाद व्रती श्रद्धापूर्वक यथा शक्ति ब्राह्मणों को खिलावे और दक्षिणा भी दे । इस प्रकार व्रत सम्पन्न करके व्रती स्वयं परिवार सहित भोजन करे । नारद ! इस प्रकार जा व्रती द्वादशी व्रत का अनुष्ठान करता है वह सहस्रों अश्व- मेध यज्ञों का द्विगुण फल पाता है ॥७६-८५॥ मुनिश्रेष्ठ ! जो व्रतो उपर्युक्त विधि से एक वर्ष तक इस उत्तम द्वादशी व्रत का अनुष्ठान करता है वह परम पद को प्राप्त कर लेता है । जो केवल एक मास या दो मास तक भक्तिपूर्वक इस व्रत को करता है वह पूर्वोक्त फल के साथ भगवान् के लोक भी प्राप्त कर लेता है । व्रती एक-एक वर्ष तक व्रत को पूरा कर इसका उद्यापन१ करे ॥८६-८७॥ मुनीश्वर ! अगहन मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी को प्रातःकाल आचार के अनुसार दन्तधावन कर स्नान करे, श्वेत वस्त्र पहन कर श्वेत सुगन्धित चन्दन लगावे । इस प्रकार स्वयं पवित्र होकर भूमि पर एक चौकोर दिव्य मण्डप बनावे । घंटा चँवर से सुशोभित कर बीच में किंकिणी लटकावे, जिसकी मधुर ध्वनि से सारा मण्डप गुंजित रहे । चारों ओर पताकाओं, फूलों की माला और चाँदवे से उसको सजाकर श्वेत वस्त्र से उसको आच्छादित कर दे और चारों ओर दीप जलाकर रख दे । उस मण्डप के मध्य में अति मनोहर सर्वतोभद्र चक्र बनाकर उस पर जल से परिपूर्ण बारह कलश रख दे ॥८८-९२॥ उन कलशों में पंच रत्न छोड़कर एक ही भलीभाँति शुद्ध किए हुए श्वेत वस्त्र से सबको ढक दे । द्विज ! भक्त व्रती अपनी शक्ति के अनु- सार सोना, चाँदी या तांबे की लक्ष्मो-नारायण की मूर्ति बनवावे ॥९३-९४॥ उसके प्रतिमा को वह संयमो भक्त कलश के ऊपर रखे । यदि मूर्ति न बनी हो तो मूर्ति का मूल्य अथवा सोना ही यथा शक्ति उस पर रख दे । द्विजवर्य ! बुद्धिमान् व्यक्ति सभी प्रकार के व्रतों में कृपणता न करे, यदि ऐसा करेगा तो उसकी आयु, धन-सम्पत्ति आदि सब कुछ नष्ट हो जायगा । सबसे पहले भक्ति पूर्वक शेषशायी, निर्विकार, भगवान् नारायण को पंचामृत १. यह विधि इस उद्देश्य से की जाती है कि पुनः व्रत न करना पड़े । इसे 'व्रत का बैठाना' कहा जाता है ।
१३५ सप्तदशोऽध्यायः नामभिः केशवाद्यैश्च ह्युपचारान्प्रकल्पयेत् । रात्रौ जागरण कुर्यात्पुराणश्रवणादिभिः ॥६८॥ जितनिद्रो भवेत्सम्यक्सोपवासो जितेन्द्रियः । त्रिकालमर्चयेद्देवं यथाविभवविस्तरम् ॥६६॥ ततः प्रातः समुत्थाय प्रातः कृत्यं समाप्य च । तिलहोमान्व्याहृतिभिः सहस्त्रं कारयेद्विजैः ॥१००॥ ततः संपूजयेद्देवं गन्धपुष्पादिभिः क्रमात् । देवस्य पुरतः कुर्यात्पुराणश्रवणं ततः ॥१०१॥ दद्याद्द्वादशविप्रेभ्यो दध्यन्नं पायसं तथा । अपूपैर्दशभिर्युक्तं सघृतं च सदक्षिणम् ॥१०२॥ देवदेवजगन्नाथ भक्तानुग्रहविग्रह । गृहाणोपायनं कृष्ण सर्वाभीष्टप्रदो भव ॥१०३॥ अनेनोपायनं दत्त्वा प्रार्थयेत्प्राञ्जलिः स्थितः । आधाय जानुनी भूमौ विनयावनतो व्रती ॥१०४॥ नमो नमस्ते सुरराजराज, नमोऽस्तु ते देव जगन्निवास । कुरुष्व सम्पूर्णफलं ममाद्य, नमोऽस्तु तुभ्यं पुरुषोत्तमाय ॥१०५॥ इति संप्रार्थयेद्विप्रान्देवं च पुरुषोत्तमम् । दद्यादर्घ्यं च देवाय महालक्ष्मीयुताय वै ॥१०६॥ लक्ष्मीपते नमस्तुभ्यं क्षीरार्णवनिवासिने । अर्घ्यं गृहाण देवेश लक्ष्म्या च सहितः प्रभो ॥१०७॥ यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु । न्यूनं संपुर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥१०८॥ इति विज्ञाप्य देवेशं तत्सर्वं संयमी व्रते । प्रतिमां दक्षिणायुक्तामाचार्याय निवेदयेत् ॥१०६॥ ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाच्छक्त्या दद्याच्च दक्षिणाम् । भुञ्जीत वंग्यतः पश्चात्स्वयं बंधुजनैर्वृतः ॥११०॥ आसायं शृणुयाद्विष्णोः कथां विद्वज्जनैः सह । इत्येवं कुरुते यस्तु मनुजो द्वादशीव्रतम् ॥१११॥ सर्वान्कामान्स आप्नोति परत्रेह च नारद । विसप्तकुलसंयुक्तः सर्वपापविवर्जितः ॥ प्रयाति विष्णुभवनं यत्र गत्वा न शोचति ॥११२॥
स्नान करावे। केशव आदि नामों का कीर्तन करता हुआ विभिन्न उपचारों से पूजन करो। रात को पुराण श्रवण के द्वारा जग कर ही बिता दे ॥६५-६८॥ वह संयमी व्रती निद्रा को वश में कर निराहार रहकर अपने वैभव के अनुसार तीनों काल भगवान् का पूजन करे। तदनन्तर दूसरे दिन प्रातःकाल उठकर नित्यक्रिया से निवृत्त हो ब्राह्मणों के द्वारा व्याहृति मंत्रों से तिल का हवन करावे। पुनः यथाक्रम गन्ध, पुष्प आदि से भगवान् की पूजा कर उनके सामने ही पुराण का श्रवण करे। बारह ब्राह्मणों को दही, खीर, घी और दक्षिणा सहित दस पूये का दान करे। (दानका मन्त्र यह है--) ॥६६-१०२॥ 'देवदेव ! जगन्नाथ ! भक्तों पर कृपा करने वाले ! कृष्ण ! मेरे सब मनोरथों को पूर्ण कीजिए'। इस प्रकार उपहार दान के पश्चात् व्रतो पृथ्वो पर घुटने टेक कर विनम्र भाव से हाथ जोड़ कर भगवान् की स्तुति करे 'सुरराज ! आपको नमस्कार है। देव ! जगन्निवास ! नमस्कार है। आज मेरी सम्पूर्ण कामनायें पूर्ण कीजिए। पुरुषोत्तम ! आप को नमस्कार है' ॥१०३-१०५॥ इस प्रकार विप्रों और भगवान् की प्रार्थना के बाद महालक्ष्मी सहित भगवान् को अर्घ्य दे। अर्घ्य का मन्त्र यह है 'लक्ष्मीपते ! क्षीरसागर में सोने वाले आप को नमस्कार है, देवेश ! प्रभो ! लक्ष्मी के सहित आप मेरे इस अर्घ्य को ग्रहण करे। जिसके स्मरण और नाम कीर्तन से तप, यज्ञ आदि अनुष्ठान को न्यूनतायें अतिशीघ्र दूर हो जाती हैं उस अच्युत देव को नमस्कार है' इस प्रकार भगवान् को स्तुति कर वह व्रती प्रतिमा सहित उन सब सामग्रियों का आचार्य के लिए अर्पित कर दे। यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा देकर व्रत को समाप्त कर दे ॥१०६-१११॥ इसके बाद स्वयं भाई-बन्धुओं के सहित मौन होकर भोजन करे और सायंकाल तक विद्वज्जनों के साथ बैठकर पुराण कथा सुने। नारद ! जो मनुष्य इस विधि से द्वादशी का व्रत करता है वह लौकिक पारलौकिक सभी कामनाओं का प्राप्त करता है। वह अपने इक्कीस कुलों के उस
१३६ नारदीयपुराणम् य इदं शृणुयाद्विप्र द्वादशीव्रतमुत्तमम् । वाचयेद्वाऽपि स नरो वाजपेयफलं लभेत् ॥११३॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे व्रताख्याने मार्गशीर्षशुक्लद्वादशीव्रतकथनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥१७॥
अष्टादशोऽध्यायः सनक उवाच अन्यद्व्रतवरं वक्ष्ये शृणुष्व मुनिसत्तम । सर्वपापहरं पुण्यं सर्वदुःखनिबर्हणम् ॥१॥ ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां योषितां तथा । समस्तकामफलदं सर्वव्रतफलप्रदम् ॥२॥ दुःस्वप्ननाशनं धर्म्यं दुष्टग्रहनिवारणम् । सर्वलोकेषु विख्यातं पूर्णिमाव्रतमुत्तमम् ॥३॥ येन चीर्णेन पापानां राशिकोटिः प्रशाम्यति मार्गशीर्षे सितेपक्षे पूर्ण्णायां नियतः शुचिः । स्नानं कुर्याद्यथाचारं दन्तधावनपूर्वकम् ॥४॥ शुक्लाम्बरधरः शुद्धो गृहमागत्य वाग्यतः । प्रक्षाल्य पादावाचम्य स्मरन्नारायणं प्रभुम् ॥५॥ नित्यं देवार्चनं कृत्वा पश्चात्सङ्कल्पपूर्वकम् । लक्ष्मीनारायणं देवमर्चयेद्भक्तिभावतः ॥६॥ आवाहनासनाद्यैश्च गन्धपुष्पादिभिर्व्रती । नमो नारायणायेति पूजयेद्भक्तितत्परः ॥७॥
विष्णुलोक को चला जाता है जहाँ जाकर किसी प्रकार का शोक नहीं होता । विप्र ! जो इस उत्तम द्वादशी व्रत की कथा को सुनता या सुनाता है वह मनुष्य वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥११२-११३॥ श्री नारदीयपुराण में द्वादशी-माहात्म्यवर्णन नामक सत्रहवां अध्याय समाप्त ॥१७॥
अध्याय १८ उद्यापन विधिसहित लक्ष्मीनारायणव्रत का वर्णन सनक बोले—मुनिवर्य ! अब सब पापों का नाश करने वाले, पुण्यदायक और सब दुःखों को दूर करने वाले श्रेष्ठव्रत को कह रहा हूँ, सुनो ॥१॥ पूर्णिमा का व्रत सब व्रतों में उत्तम, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा स्त्रियों की भी सब कामनाओं का पूर्ण करने वाला, सब व्रतों के फल को देने वाला, बुरे स्वप्नों के कुफल से बचाने वाला, धर्मप्रद, दुष्टग्रहों का निवारण करने वाला और लोक-विख्यात है, जिसके अनुष्ठान से पापों की असंख्य ढेरियां नष्ट हो जाती हैं ॥२-३॥ अगहन मास की पूर्णिमा को व्रती आचारानुकूल दातौन आदि नित्य क्रिया से निवृत्त हो संयम पूर्वक पवित्र भाव से स्नान करे । धुले श्वेत वस्त्र धारण कर मौन हो घर आकर पैरों को धोवे और प्रभु नारायण का स्मरण करता हुआ आचमन कर प्रति दिन की भाँति अपनी नित्य देव-पूजा समाप्त करे । फिर-संकल्पपूर्वक भक्तिभाव से भगवान् लक्ष्मीनारायण की पूजा करे ॥४-६॥ व्रती 'नमो नारायणाय' इस मन्त्र से श्रद्धापूर्वक आवाहन, आसनदान और गन्ध, पुष्प आदि सामग्री से भगवान् की पूजा करे । वह व्रती एकाग्रभाव से गीत,
१३७ अष्टादशोऽध्यायः गीतैर्वाद्यैश्च नृत्यैश्च पुराणपठनादिभिः । स्तोत्रैर्वारराधयेद्देवं व्रतकृत्सुसमाहितः ॥७॥ देवस्य पुरतः कृत्वा स्थण्डिलं चतुरस्रकम् । अरत्निमात्रं तत्राग्निं स्थापयेद्गृह्यमार्गतः । आज्यभागान्तपर्यन्तं कृत्वा पुरुषसूक्ततः । चरुणा च तिलैश्चापि घृतेन जुहुयात्तथा ॥८॥ एकवारं द्विवारं वा त्रिवारं वापि शक्तितः । होमं कुर्यात्प्रयत्नेन सर्वपापनिवृत्तये ॥१०॥ प्रायश्चित्तादिकं सर्वं स्वगृह्योक्तविधानतः । समाप्य होमं विधिवच्छान्तिसूक्तं जपेद्बुधः ॥११॥ पश्चाद्देवं समागत्य पुनः पूजां प्रकल्पयेत् । तथोपवासं देवाय ह्यर्पयेद्भक्तिसंयुक्तः ॥१२॥ पौर्णमास्यां निराहारः स्थित्वा देव तवाज्ञया । भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष परेऽह्नि शरणं भव ॥१३॥ इति विज्ञाप्य देवाय ह्यर्थ्यं दद्यात्तथैन्दवे । जानुभ्यामवनीं गत्वा शुक्लपुष्पाक्षतान्वितः ॥१४॥ क्षीरोदार्णवसंभूत अत्रिगोत्रसमुद्भव । गृहाणार्घ्यं मया दत्तं रोहिणीनायक प्रभो । एवमर्घ्यं प्रदायेन्दोः प्रार्थयेत्प्राञ्जलिस्ततः ॥१५॥ तिष्ठन्पूर्वमुखो भूत्वा पश्यन्निन्दुं च नारद ॥१६॥ नमः शुक्लांशवे तुभ्यं द्विजराजाय ते नमः । रोहिणीपतये तुभ्यं लक्ष्मीभ्रात्रे नमोऽस्तु ते ॥१७॥ ततश्च जागरं कुर्यात्पुराणश्रवणादिभिः । जितेन्द्रियश्च संशुद्धः पाषण्डालोकवर्जितः ॥१८॥ ततः प्रातः प्रकुर्वीत स्वाचारं च यथाविधि । पुनः संपूजयेद्देवं यथा विभवविस्तरम् ॥१९॥ ब्राह्मणान्भोजयेच्छक्त्या ततश्च प्रयतो नरः । बन्धुभृत्यादिभिः सार्धं स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः ॥२०॥ एवं पौषादिमासेषु पूर्णमास्यामुपोषितः । अर्चयेद्भक्तिसंयुक्तो नारायणमनामयम् ॥२१॥ एवं संवत्सरं कृत्वा कार्तिकां पूर्णिमादिने । उद्यापनं प्रकुर्वीत तद्विधानं वदामि ते ॥२२॥ वाद्य, नृत्य, पुराणपाठ और स्तोत्र आदि से भगवान् की आराधना करे ॥७-८॥ इसके बाद भगवान् के आगे एक अरत्नि (बँधी मुट्ठी वाला हाथ) लम्बी वर्गाकार वेदी बनाकर गृह्य सूत्रोक्त विधि से अग्नि स्थापन करे । आज्य भाग तक की विधि सम्पन्न कर सब पापों की निवृत्ति के लिए पुरुष सूक्तों के मन्त्रों से एक बार, दो बार तथा तीन बार तक शक्ति के अनुसार चरु, तिल और घी का यत्नपूर्वक हवन करे । ज्ञानी व्रती अपने गृह्यसूत्रों की विधि से हवन और प्रायश्चित्तादि कर्म समाप्त कर विधि पूर्वक शान्ति सूक्त का जप करे ॥९-११॥ इतनी विधि करने के पश्चात् पुनः भगवान् की पूजाकर अपने उपवास आदि व्रत को भक्तिपूर्वक भगवान् को ही 'देव ! निराहार रहकर पूर्णिमा व्रत का अनुष्ठान करने के बाद दूसरे दिन भोजन करूँगा, पुण्डरीकाक्ष ! आप मेरे शरणदायक होइए' यह कह कर अर्पित करे । तत्पश्चात् भगवान् को अर्घ्य दे और पृथ्वी पर घुटने टेक कर हाथ में श्वेत पुष्प, अक्षत लेकर 'क्षीर सागर से उत्पन्न ! अत्रिवंशज ! रोहिणीनायक ! प्रभो ! मेरे दिये अर्घ्य को ग्रहण कीजिए ।' इस मन्त्र से चन्द्रमा को अर्घ्य दे ॥१२-१५॥ नारद ! इस प्रकार चन्द्रमा को अर्घ्य देने के बाद हाथ जोड़कर पूर्वाभिमुख हो चन्द्रमा को देखता हुआ इस मन्त्र से प्रार्थना करे । मन्त्र- 'श्वेत किरणों वाले तुमको नमस्कार है, द्विजराज को नमस्कार है, रोहिणी के पति और लक्ष्मी के भ्राता तुमको नमस्कार है।' इतनी क्रिया समाप्त करने के अनन्तर वह संयमी, पवित्र, व्रती पाखण्ड और दुर्जन की संगति से अपने को अलग रख कर पुराण श्रवण, कीर्तन आदि से रात्रि को जागरण करे ॥१६-१८॥ प्रातःकाल यथाविधि अपनी नित्य क्रियाओं से निवृत्त होकर पुनः अपने विभव के अनुकूल भगवान् की पूजा कर यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन करावे । तदनन्तर स्वयं व्रती भाई और सेवकों के सहित भोजन करे। इसी प्रकार पौष आदि मासों में पूर्णिमा के दिन निराहार रहकर भक्तिपूर्वक निर्विकार नारायण की पूजा करे ॥१९-२१॥ इस प्रकार वर्ष भर पूर्णिमा का व्रत करने के बाद कार्तिक की पूर्णिमा को व्रत का उद्यापन करना १८-नारदीयपुराणम्
१३८ नारदीयपुराणम् मण्डपं कारयेद्दिव्यं चतुरस्रं सुमङ्गलम् । शोभितं पुष्पमालाभिर्वितानध्वजराजितम् ॥२३॥ बहुदीपसमाकीर्णं किङ्किणीजालशोभितम् । दर्पणैश्चामरैश्चैव कलशैश्च समावृतम् ॥२४॥ तन्मध्ये सर्वतोभद्रं पञ्चवर्णविराजितम् । जलपूर्णं ततः कुम्भं न्यसेत्तस्योपरि द्विज ॥२५॥ पिधाय कुम्भं वस्त्रेण सुसूक्ष्मेणातिशोभितम् । हेम्ना वा रजतेनापि तथा ताम्रेण वा द्विज । लक्ष्मीनारायणं देवं कृत्वा तस्योपरि न्यसेत् ॥२६॥ पञ्चामृतेन संस्नाप्याभ्यर्च्य गन्धादिभिः क्रमात् । भक्ष्यैर्भोज्यादिनैवेद्यैर्भक्तितः संयतेन्द्रियः ॥२७॥ जागरं च तथा कुर्यात्सम्यक्श्रद्धासमन्वितः । परेऽह्नि प्रातर्विधिवत्पूर्ववद्विष्णुमर्चयेत् ॥२८॥ आचार्याय प्रदातव्या प्रतिमा दक्षिणान्विता । ब्राह्मणान्भोजयेच्छक्त्या विभवे सत्यवारितम् ॥२९॥ तिलदानं प्रकुर्वीत यथाशक्त्या समाहितः । कुर्यादग्नौ च विधिवत्तिलहोमं विचक्षणः ॥३०॥ एवं कृत्वा नरः सम्यक् लक्ष्मीनारायणव्रतम् । इह भुक्त्वा महाभोगान्पुत्रपौत्रसमन्वितः ॥३१॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः कुलायुतसमन्वितः । प्रयाति विष्णुभवनं योगिनामपि दुर्लभम् ॥३२॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे व्रताख्याने मार्गशीर्षपौर्णिमायां लक्ष्मीनारायणव्रतं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥१८॥ चाहिए। व्रत उद्यापन की जो विधि है उसको कह रहा हूँ सुनो। पहले चौकोर, शुभ और दिव्य मण्डप बनावे। उसको, फूलों की माला, चंदवा और ध्वजाओं से सजावे। दीपक, किंकिणी, दर्पण, चामर और कलशों से भली भाँति सुशोभित करे। मध्य भाग में पाँच रंगों से रंगा हुआ सर्वतोभद्र चक्र बनावे ॥२२-२४॥ द्विज ! उस चक्र पर जल से भरा एक मंगल-कलश रख कर उसको अति सूक्ष्म वस्त्र से ढंक दे। द्विज ! सोना, चाँदी अथवा अथवा ताँबे की लक्ष्मीनारायण की मूर्ति बनाकर उसे कलश के ऊपर रखे। संयम रखने वाला वह व्रती भक्ति पूर्वक पंचामृत से भगवान् को नहलाकर गंध, पुष्प, नैवेद्य आदि नाना मधुर भोज्य पदार्थों से पूजन करे। रात्रि में श्रद्धा पूर्वक कीर्तन, पाठ आदि करता हुआ जागरण करे और दूसरे दिन प्रातःकाल पूर्व की भाँति विधिवत् पूजा करे फिर दक्षिणा के सहित उस प्रतिमा को आचार्य के हाथ दान कर दे ॥२५-२८॥ सम्पत्ति रहने पर यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन कराने के बाद वह विद्वान् व्रती शक्ति के अनुसार एकाग्रभाव से तिल दान करे और विधिवत् हवन भी करे। इस विधि से भली भाँति लक्ष्मीनारायण-व्रत का अनुष्ठान कर मनुष्य इस लोक में पुत्र, पौत्र आदि के सहित लौकिक भोगों को भोगता है और मृत्यु के बाद अपने दश सहस्र कुलों के साथ पाप-मुक्त होकर योगियों के लिए भी दुर्लभ विष्णुलोक को प्राप्त करता है ॥२६-३२॥ श्रीनारदीय पुराण के व्रताख्यान प्रकरण में मार्गशीर्ष पूर्णिमा को किये किये जाने वाले लक्ष्मीनारायणव्रत का वर्णन नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त ॥१८॥
एकोनविंशोऽध्यायः सनक उवाच अन्यद्व्रतं प्रवक्ष्यामि ध्वजारोपणसंज्ञितम्। सर्वपापहरं पुण्यं विष्णुप्रीणनकारणम् ॥१॥ यः कुर्याद्विष्णुभवने ध्वजारोपणमुत्तमम्। संपूज्यते विरिञ्चाद्यैः किमन्यैर्बहुभाषितैः ॥२॥ हेमभारसहस्रं तु यो ददाति कुटुम्बिने। तत्फलं तुल्यमात्रं स्याद्ध्वजारोपणकर्मणः ॥३॥ ध्वजारोपणतुल्यं स्याद्गङ्गास्नानमनुत्तमम्। अथवा तुलसीसेवा शिवलिङ्गप्रपूजनम् ॥४॥ अहोऽपूर्वमहोऽपूर्वमहोऽपूर्वमिदं द्विज। सर्वपापहरं कर्म ध्वजारोपणसंज्ञितम् ॥५॥ सन्ति वै यानि कार्याणि ध्वजारोपणकर्मणि। तानि सर्वाणि वक्ष्यामि शृणुष्व गदतो मम ॥६॥ कार्तिकस्य सिते पक्षे दशम्यां प्रयतो नरः। स्नानं कुर्यात्प्रयत्नेन दन्तधावनपूर्वकम् ॥७॥ एकाशी ब्रह्मचारी च स्वपेन्नारायणं स्मरन्। धौताम्बरधरः शुद्धो विप्रो नारायणप्रतः ॥८॥ ततः प्रातः समुत्थाय स्नात्वाचम्य यथाविधि। नित्यकर्माणि निर्वर्त्य पश्चाद्विष्णुं समर्चयेत् ॥९॥ चतुर्भिर्ब्राह्मणैः सार्द्धं कृत्वा च स्वस्तिवाचनम्। नान्दीश्राद्धं प्रकुर्वीत ध्वजारोपणकर्मणि ॥१०॥ ध्वजस्तम्भौ च गायत्र्या प्रोक्षयेद्वस्त्रसंयुतौ। सूर्यं च वैनतेयं च हिमांशुं तत्परोऽर्चयेत् ॥११॥ धातारं च विधातारं पूजयेद्ध्वजदण्डके। हरिद्राक्षतगन्धाद्यैः शुक्लपुष्पैर्विशेषतः ॥१२॥ अध्याय १६ विष्णु-मन्दिर में ध्वजारोपण सनक बोले--दूसरे ध्वजारोपण नामक व्रत के विषय में, जो सब पापों को नष्ट करने वाला, पुण्यदा- यक और भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने वाला है, कह रहा हूँ। जो मनुष्य विष्णु मन्दिर में भली भाँति ध्वजा- रोपण कर्म करता है वह ब्रह्मा आदि देवताओं से भी पूजित होता है, इसके विषय में और अधिक क्या कहा जाय। जो व्यक्ति किसी परिवार वाले ब्राह्मण को एक हजार भार सोना दान में देता है, उसके बराबर फल ध्वजारोपण कर्म से प्राप्त होता है। ध्वजारोपण कर्म परमोत्तम गंगास्नान, तुलसीसेवा अथवा शिवलिङ्ग की पूजा के समान फल को देने वाला है ॥१-४॥ द्विज ! क्या ही यह अपूर्व कर्म है, अपूर्वकर्म है, अपूर्वकर्म है, यह ध्वजा- रोपण नामक कर्म सब पापों को दूर करने वाला है, इस ध्वजारोपण कर्म की जितनी विधियाँ हैं, उनको कह रहा हूँ, सुनो ॥५-६॥ कार्तिक-शुक्ल-दशमी को मनुष्य संयम पूर्वक रहे, दातोन आदि से छुटकारा पाकर भली भाँति स्नान करे। विप्र ! ब्रह्मचर्य और एकाहार व्रत धारण कर वह व्रती शुद्धता के साथ स्वच्छ वस्त्र पहने और भगवान् नारायण के सामने ही नामस्मरण करता हुआ सोये। प्रातः काल उठकर यथा विधि आचमन, स्नान आदि नित्य कर्मों से निवृत्त होने के बाद विष्णु की पूजा करे। ध्वजारोपण कर्म में सबसे पहले चार ब्राह्मणों के साथ स्वस्ति पाठ कर नान्दी-श्राद्ध करे ॥७-१०॥ गायत्री मन्त्र से दो ध्वज-स्तम्भों को, जिनमें वस्त्र लपेटे गये हों, नहलाये। तदनन्तर सूर्य, गरुड़ और चन्द्रमा की पूजा करे। ध्वज-दण्ड पर हल्दी, गंध, अक्षत और विशेष रूप से श्वेत पुष्प