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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पञ्चदशोऽध्यायः ११३ ततः क्षारोदकस्नानं क्षारोदकनिषेवणम् । तदन्ते नरकान् सर्वान् भुञ्जतेऽब्दशतं शतम् ॥७५॥ यो हन्ति ब्राह्मणं गां च क्षत्रियं च नृपोत्तमम् । स चापि यातनाः सर्वा भुङ्क्ते कल्पेषु पञ्चसु ॥७६॥ यः शृणोति महन्निन्दां सादरं तत्फलं शृणु । तेषां कर्णेषु दाप्यन्ते तप्तायःकीलसंचयाः ॥७७॥ ततश्च तेषु छिद्रेषु तैलमत्युष्णमुल्बणम् । पूर्यते च ततश्चापि कुम्भीपाकं प्रपद्यते ॥७८॥ नास्तिकानां प्रवक्ष्यामि विमुखानां हरे हरौ । अब्दानां कोटिपर्यन्तं लवणं भुञ्जते हि ते ॥७९॥ ततश्च कल्पपर्यन्तं रौरवे तप्तसैकते । भज्यंते पापकर्मणोऽन्येष्वप्येवं नराधिप ॥८०॥ ब्राह्मणान्ये निरीक्षन्ते कोपदृष्टचा नराधमाः । तप्तसूचीसहस्रेण चक्षुस्तेषां प्रसूर्यते ॥८१॥ ततः क्षाराम्बुधाराभिः सेच्यन्ते नृपसत्तम । ततश्च क्रकचैर्घोरैर्भिद्यन्ते पापकर्मणः ॥८२॥ विश्वासघातिनां चैव मर्यादाभेदिनां तथा । परान्नलोलुपानां च नरकं शृणु दारुणम् ॥८३॥ स्वमांसभोजिनो नित्यं भक्ष्यमाणाः श्वभिस्तु ते । नरकेषु समस्तेषु प्रत्येकं ह्यब्दवासिनः ॥८४॥ प्रतिग्रहरता ये च ये वै नक्षत्रपाठकाः । ये च देवलकान्नानां भोजिनस्ताञ्छृणुष्व मे ॥८५॥ राजन्नाकल्पपर्यन्तं यातनास्वासु दुःखिताः । पच्यन्ते सततं पापाविष्टा भोगरताः सदा ॥८६॥ ततस्तैलेन पुर्यन्ते कालसूत्रप्रपीडिताः । ततः क्षारोदकस्नानं मूत्रविष्ठानिषेवणम् ॥८७॥ तदन्ते भुवमासाद्य भवन्ति म्लेच्छजातयः । अन्योद्वेगरता ये तु यान्ति वैतरणीं नदीम् ॥८८॥ त्यक्तपञ्चमहायज्ञा लालाभक्षं व्रजन्ति हि । उपासनापरित्यागो रौरवं नरकं व्रजेत् ॥८९॥ वर्ष तक रहती हैं। इस घोरयातना को भोगने के पश्चात् उनके खारे जल से स्नान करना पड़ता और वही पीना पड़ता है ॥७०-७५॥ जो किसी ब्राह्मण, गौ और उत्तम क्षत्रिय राजा को मारता है वह भी पाँच कल्प तक सब प्रकार की यातनाओं को भोगता है । जो दूसरे की निन्दा बड़े चाव से सुनता है उसका फल सुनो—उनके कानों में जलते लोहे की कीलें डाल दी जाती हैं और उनके छिद्रों को खौलते हुए तेल से भर दिया जाता है और पुनः उनको कुंभीपाक में छोड़ा जाता है । जो नास्तिक विष्णु अथवा शंकर से विमुख रहते उनके पापों का वर्णन कह रहा हूँ सुनो—वे करोड़ वर्षों तक नमक खाते रहते हैं और पुनः कल्पान्त तक तप्त बालुका से भरे रौरवनरक में रहते हैं ॥७६-७६॥ नराधिप ! उसी प्रकार अन्य पापों के करने वाले भी विभिन्न नरकों का भोग करते हैं। जो नराधम ब्राह्मणों को काप दृष्टि से देखते हैं उनकी आंखों में जलती हजारों सुइयाँ चुभोई जाती हैं। नृप- सत्तम ! पुनः उनकी आंखों में खारे जल की धार गिराई जाती है और पापों के अनुसार वे आरे से फाड़े जाते हैं । अब विश्वासघाती, लोकमर्यादा भङ्ग करने वाले और परान्नलोलुप पापियों के दारुण नरकों का वर्णन सुनो ॥८०-८३॥ वे सर्वदा अपना ही मांस नोच-नोच कर खाते रहते हैं और कुत्ते भी उनको नोच कर खाते हैं । पुनः प्रत्येक नरक में करोड़ों वर्षों तक उन्हें रहना पड़ता है। जो सर्वदा दूसरों से दान ही लिया करते हैं और जो ज्योतिषी तथा पुजारियों का अन्न खाया करते हैं उनके पापों को मुझसे सुनो। राजन् ! कल्पान्त तक वह उपर्युक्त यातनाभय नरकों में दुःख भोग करते और सर्वदा अपने पापों के फल-भोग में निरत रहते हैं। तदनन्तर काल सूत्र से पीड़ित होकर जलते तेल से भरे कुण्ड में छोड़े जाते और पुनः खारे जल से स्नान करने के बाद मूत्र और विष्ठा को खाते हैं । भोग के अनन्तर इस पृथ्वो पर आकर म्लेच्छ जाति में जन्म लेता है। जो दूसरों को उद्विग्न करने में लगे रहते हैं वे वैतरणी नदी में गिराये जाते हैं ॥८४-८८॥ जो पञ्चमहायज्ञ¹ नहीं करते वे १. स्वाध्याय, अग्नि होत्र, अतिथि पूजन, पितृ तर्पण और बलिकर्म । १५

११४ नारदीयपुराणम् विप्रग्रामकरादानं कुर्वतां शृणु भूपते । यातनास्वासु पच्यन्ते यावदाचन्द्रतारकम् ॥८०॥ ग्रामेषु भूपालवरो यः कुर्यादधिकं करम् । स सहस्रकुलो भुङ्क्ते नरकं कल्पपञ्चसु ॥८१॥ विप्रग्रामकरादाने योऽनुमन्ता तु पापकृत् । स एव कृतवान् राजन्ब्रह्महत्यासहस्रकम् ॥८२॥ कालसूत्रे महाघोरे स वसेद्द्विचतुर्युगम् । अयोनौ च वियोनौ च पशुयोनौ च यो नरः ॥८३॥ त्यजेद्रेतो महापापी स रेतोभोजनं लभेत् । वसाकूपं ततः प्राप्य स्थित्वा दिव्याब्दसप्तकम् ॥८४॥ रेतोभोजी भवेन्मर्त्यः सर्वलोकेषु निन्दितः । उपवासदिने राजन्दन्तधावनकृन्नरः ॥८५॥ स घोरं नरकं याति व्याघ्रपक्षं चतुर्युगम् । यः स्वकर्मपरित्यागी पाषण्डीत्युच्यते बुधैः ॥८६॥ तत्संगकृतमोहः स्यात्तावुभावतिपापिनौ । कल्पकोटिसहस्रेषु प्राप्नुतो नरकान्क्रमात् ॥८७॥ देवद्रव्यापहतारो गुरुद्रव्यापहारकाः । ब्रह्महत्याव्रतसमं दुष्कृतं भुञ्जते नृप ॥८८॥ अनाथधनहर्तारो ह्यनाथं ये द्विषन्ति च । कल्पकोटिसहस्राणि नरके ते वसन्ति च ॥८९॥ स्त्रीशूद्राणां समीपे तु ये वेदाध्ययने रताः । तेषां पापफलं वक्ष्ये शृणुष्व सुसमाहितः ॥१००॥ अधःशीर्षोर्ध्वपादाश्च कीलिताः स्तम्भकद्वये । धूम्रपानरता नित्यं तिष्ठन्त्याब्रह्मवत्सरम् ॥१०१॥ जले देवालये वापि यस्त्यजेद्देहजं मलम् । भ्रूणहत्यासमं पापं संप्राप्नोत्यतिदारुणम् ॥१०२॥ दन्तास्थ्यकेशनखराण्य् त्यजन्त्यमरालये । जले वा भुक्तशेषं च तेषां पापफलं शृणु ॥१०३॥ प्रासप्रोता हलीभिन्ना आर्त्तरावविराविणः । अत्युष्णतैलपाकेऽतितप्यन्ते भृशदारुणं ॥१०४॥ कुर्वन्ति दुःखसंतप्तास्ततोऽन्येषु व्रजन्ति च । ब्रह्म संहरते यस्तु गन्धकाष्ठं तथैव च ॥१०५॥ लालाभक्ष में जाते हैं। देव उपासना न करने वाला रौरव नरक में जाता है भूपते ! जो ब्राह्मणों के गाँव से कर लेता है उनके पाप-फल को सुनो वे इन नरकों में कल्पान्त तक रहते हैं। भूपाल ! जो ब्राह्मण-ग्रामों पर अधिक कर बढ़ा देते हैं वे अपने सहस्र कुलों के सहित पांच कल्प तक नरक भोग करते हैं । राजन् ! जो ब्राह्मणों की बस्ती से कर लेने में अपनी अनुमति देता है उसने मानो हजारों ब्रह्महत्यायें कर दीं और वह महाघोर काल सूत्र में दो चतुर्युगों तक रहता है। जो मनुष्य अयोनित, वियोनि और पशुयोनि में वीर्य त्याग करता है। वह महापापो उसी वीर्य को पोता है। तदन्तर वसाकूप नरक में जाकर देवताओं के वर्ष के प्रमाण से सात वर्ष तक रहता है। फिर वीर्यभोजी मनुष्य होकर सब लोकों में निन्दित होता है। जो व्रत के दिन दातून करता है वह चारयुग तक व्याघ्र पक्ष नामक घोर नरक में पड़ता है। जो अपने शास्त्रविहित कर्मों को नहीं करता, उसको पंडित जन पाखण्डी कहते हैं ॥८६-१६॥ जो उस पापी को संगति करता है, वह भी अति पापी कहा जाता है। वे दोनों हजार करोड़ कल्प तक क्रम-क्रम से नरकों में गिराये जाते हैं। नृप ! देव-द्रव्य और गुरुद्रव्य के चुराने वाले ब्रह्महत्या के समान पापों का भोग करते हैं। जो अनाथों का द्रव्य हरते और अनाथों से द्वेष करते हैं, वे हजार कोटि कल्प तक नरक में रहते हैं ॥६७-६६॥ जो स्त्री और शूद्रों के समीप वेद अध्ययन करते हैं उनके पापों को बतला रहा हूँ ध्यानपूर्वक सुनो ॥१००॥ उनका शिर नीचे और पैर ऊपर कर दो खम्भों में कील से जड़ दिये जाते हैं और इसी स्थिति में उनको ब्रह्मा के एक वर्ष तक धुआं पोकर रहना पड़ता है। जो जल या देवालय में अपने शरीर के मल को फेंकता है वह भ्रूण हत्या के समान अति दारुण पापों का भोग करता है। जो देवालय में दाँत, हड्डी, केश, नख, अथवा अन्य अपवित्र पदार्थों को छोड़ते अथवा जल में अपना जूठा फेंकते हैं, उनके पाप-फल को सुनो ॥१०१-१०३॥ वे भाले से मारे जाते, हल से फाड़े जाते और आर्त्तनाद करने वाले उन लोगों को पुनः अति घोर तप्त तैलपाक में भोंक दिया जाता है। इस प्रकार दुःखों से कष्ट पाकर पुनः अन्य घृणित योनियों में भेजे जाते हैं। जो वेदों को चुराता या नष्ट करना और

पञ्चविशोऽध्यायः ११५ स याति नरकं घोरं यावदाचन्द्रतारकम् । ब्रह्मस्वहरणं राजन्निहामुत्र च दुःखदम् ॥१०६॥ इह संपद्विनाशाय परत्र नरकाय च । कूटसाक्ष्यं वदेद्यस्तु तस्य पापफलं शृणु ॥१०७॥ स याति यातनाः सर्वा यावदिन्द्राश्चतुर्दश । इह पुत्राश्च पौत्राश्च विनश्यन्ति परत्र च ॥१०८॥ रौरवं नरकं भुङ्क्ते ततोऽन्यानपि च क्रमात् । येऽप्यतिकामिनो मर्त्या ये च मिथ्याप्रवादिनः ॥१०६॥ तेषां मुखे जलौकास्तु पूर्यन्ते पन्नगोपमाः । एवं षष्टिसहस्राब्दे ततः क्षाराम्बुसेचनम् ॥११०॥ ये वृथामांसनिरतास्ते यान्ति क्षारकद्दमम् । ततो गजैर्निपात्यन्ते मरुत्पतनं यथा ॥१११॥ तदन्ते भवमासाद्य हीनाङ्गाः प्रभवन्ति च । यस्त्वृतौ नाभिगच्छेत स्वस्त्रियं मनुजेश्वर ॥११२॥ स याति रौरवं घोरं ब्रह्महत्यां च विन्दति । अनाचाररतं दृष्ट्वा यः शक्तो न निवारयेत् ॥११३॥ तत्पापं समवाप्नोति नरकं तावुभावपि । पापिनां पापगणनां कृत्वान्येभ्यो दिशन्ति च ॥११४॥ अस्तित्वे तुल्यपापास्ते मिथ्यात्वे द्विगुणा नृप । अपापे पातकं यस्तु समारोप्य विनिन्दति ॥११५॥ स याति नरकं घोरं यावच्चंद्रार्कतारकम् । पापिनां निन्द्यमानानां पापाद्धं क्षयमेति च ॥११६॥ यस्तु व्रतानि संगृह्य असमाप्य परित्यज्येत् । सोऽसिपत्रेऽनुभूयार्ति हीनाङ्गो जायते भुवि ॥११७॥ अन्यैः संगृह्यमाणानां व्रतानां विघ्नकृन्नरः । अतीव दुःखदं रौद्रं स याति श्लेष्मभोजनम् ॥११८॥ न्याये च धर्मशिक्षायां पक्षपातं करोति यः । न तस्य निष्कृतिर्भूयः प्रायश्चित्तायुतैरपि ॥११९॥ चन्दन आदि को चुराता है वह कल्पान्त तक घोर नरक में रखा जाता है । ब्राह्मणों की सम्पत्ति छीनना लोक परलोक दोनों में दुःखदायी होता है । उससे अपनी सम्पत्ति का नाश तो होता ही है अन्त में नरक का भी भोग करना पड़ता है । जो झूठी गवाही देता है उसके पापफल को सुनो ॥१०४-१०७॥ वह जब तक चौदहों इन्द्रों का भोग काल रहता है तब तक सब नरकों का भोग करता है । उसके सब पुत्र और पौत्र तो नष्ट हो ही जाते हैं; इसके अतिरिक्त उसको परलोक में रौरव नरक और अन्यान्य नरकों का क्रमशः भोग करना पड़ता है । जो अत्यन्त कामी, मिथ्या बोलने वाले होते हैं उनके मुख सांप के समान जोंकों से भर दिये जाते हैं । इसके पश्चात् साठ हजार वर्ष तक खारे जल से नहलाया जाता है ॥१०८-११०॥ जो सदा व्यर्थ में (यज्ञ के अतिरिक्त) मांस खाते रहते वे क्षारकर्दम नरक में गिराये जाते हैं । तदनन्तर हाथियों पर से गिराये जाते और पुनः आंधियों में उनको लुढ़काया जाता है । इतने भोग के अनन्तर वे संसार में आकर लंगड़े-लूले और काने होते हैं । मुनेश्वर ! जो ऋतुकाल में अपनो स्त्री के समीप नहीं जाते वे रौरव नरक को जाते हैं और ब्रह्महत्या के समान पाप भोग करते हैं । जो समर्थ होते हुये भी किसी को दुराचार से नहीं रोकता वह भी उसी के समान पापभागी होता और वे दोनों नरक भोग करते हैं ॥१११-११४॥ नृप ! जो पापियों के पापों की गणना करके दूसरों से कहता है, यदि वे पाप सत्य हैं तब तो तुल्यपाप का भागी होता है यदि असत्य हैं तब तो दूने पापों का भोग करना पड़ता है । जो सच्चरित्र व्यक्ति पर पापों का आरोप कर उसकी निन्दा करता है, वह कल्पपर्यन्त घोर नरक में निवास करता है और पापियों की निन्दा करने से पापियों के आधे पाप धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं ॥११५-११६॥ जो व्रत को प्रारम्भ कर बिना समाप्त किये छोड़ देते हैं वे असिपत्र वन नामक नरक को भोगने के पश्चात् मृत्युलोक में हीनाङ्ग होकर जन्म लेते हैं। जो दूसरों के व्रत पालन में विघ्न उपस्थित करता है वह अतीव दुःखदायी घोर श्लेष्मभोजन नामक नरक में गिराया जाता है । जो न्याय अथवा धर्म शिक्षा में पक्षपात करता है उसके पापों का नाश दस सहस्र प्रायश्चित्त करने पर भी नहीं होता है । अभोज्य भोजन करने वाला और गोमांस खाने वाला विशेषरूप से हजार वर्ष तक

११६ नारदीयपुराणम् अभोज्यभोजी संप्राप्य विड्भोज्यं तु समायुतम् । ततश्चाण्डालयोनौ तु गोमांसाशी सदा भवेत् ॥१२०॥ अवमान्य द्विजान्वाग्भिर्ब्रह्महत्यां च विन्दति । सर्वश्वियातना भुक्त्वा चाण्डालो दशजन्मसु ॥१२१॥ विप्राय दीयमाने तु यस्तु विघ्नं समाचरेत् । ब्रह्महत्यासमं तेन कर्त्तव्यं व्रतमेव च ॥१२२॥ अपहृत्य परस्यार्थं यः परेभ्यः प्रयच्छति । अपहर्ता तु निरयी यस्यार्थस्तस्य तत्फलम् ॥१२३॥ प्रतिश्रुत्याप्रदानेन लालाभक्षं व्रजेन्नरः । यतिनिन्दापरो राजन् शिलामात्रे प्रयाति हि ॥१२४॥ आरामच्छेदिनो यान्ति युगानामेकविंशतिम् । श्वभोजनं ततः सर्वा भुञ्जते यातनाः क्रमात् ॥१२५॥ देवतागृहभेत्तारस्तडागानां च भूपते । पुष्पारामभिदश्चैव यां गतिं यान्ति तच्छृणु ॥१२६॥ यातनास्वासु सर्वासु पच्यन्ते वै पृथक् पृथक् । ततश्च विष्ठाकृमयः कल्पानामेकविंशतिम् ॥१२७॥ यतश्चाण्डालयोनौ तु शतजन्मानि भूपते । ग्रामविध्वंसकानां तु दाहकानां च लुम्पताम् ॥१२८॥ महत्पापं तदादेष्टुं न क्षमोऽहं निजायुषा । उच्छिष्टभोजिनो ये च मित्रद्रोहपराश्च ये ॥१२६॥ एतेषां यातनास्तीव्रा भवन्त्याचन्द्रतारकम् । उच्छिन्नपितृदेवेज्या वेदमार्गबहिःस्थिताः ॥१३०॥ पाषण्डा इति विख्यातास्तांस्तेषां वै सर्वयातनाः । एवं बहुविधा भूप यातनाः पापकारिणाम् ॥१३१॥ तेषां तासां च संख्यानं कर्त्तुं नालमहं प्रभो । पापानां यातनानां च धर्माणां चापि भूपते ॥१३२॥ संख्यां निगदितुं लोके कः क्षमो विष्णुना विना । एतेषां सर्वपापानां धर्मशास्त्रविधानतः ॥१३३॥ प्रायश्चित्तेषु चीर्णेषु पापराशिः प्रणश्यति । प्रायश्चित्तानि कार्याणि समीपे कमलापतेः ॥१३४॥ विड्भोज्य नरक में रहने के बाद चांडाल योनि में जन्म लेता है ।। ११९-१२०।। ब्राह्मणों को वाणी द्वारा अपमानित कर ब्रह्म हत्या के बराबर दोषभागी होना पड़ता है वह सब नरकों को भोगकर दश जन्म तक चाण्डाल बनता है । जो ब्राह्मणों को दान देने के समय बाधा पहुँचाता है उसको ब्रह्महत्या के समान प्रायश्चित्त करना पड़ता है । जो दूसरे का धन छीन कर दूसरे को दे देता है, तो वह अपहरण करने वाला नरक भोगता है परन्तु जिसको धन मिलता है वह अवश्य पापफल भोगता है । दान की प्रतिज्ञा कर जो दान नहीं देता वह मनुष्य लालाभक्ष नरक में जाता है । राजन् ! संन्यासियों की निन्दा करने वाला शिलामात्र नामक नरक में जाता है । उपवन या वाटिका के विनाशक इक्कीस युगों तक श्वभोजन नरक में जाते हैं और क्रमशः सब नरकों का भोग करते हैं ।। १२१-१२५।। भूपते ! देव मन्दिरों और तालाबों को हानि पहुँचाने वाले साथ ही, पुष्प वाटिका को क्षति पहुँचाने वाले जिस गति को प्राप्त करते, उसको सुनो ! वे उपर्युक्त नरकों में पृथक्-पृथक् कष्ट पाते हैं । पुनः इक्कीस कल्पों तक विष्ठा के कृमि होकर रहते हैं । भूपते ! इतने पर भी अन्त में सौ जन्मों तक उनको चाण्डाल योनि में रहना पड़ता है ॥१२६-१२७॥ ग्राम-विध्वंसक, ग्राम जलाने वाले और गांवों को लूटने वाले मनुष्यों के पापों की गणना मैं अपने जीवन काल तक नहीं कर सकता हूँ। जो जूठा खाने वाले, मित्रद्रोही हैं उनको तीव्र यातनायें कल्पपर्यन्त भोगनी पड़ती हैं । पितृकर्म और देवयज्ञों को न करने वाले और वेदमार्ग पर न चलने वाले पाखण्डी कहे गये हैं। उनको सब प्रकार की यातनायें दी जातो हैं । प्रभो ! उन पापियों, पापों और उन नरकों की गणना करने में मैं समर्थ नहीं हूँ ॥१२८-१३१॥ भूपते ! पाप, नरक और धर्म की गणना इस विश्व में विष्णु को छोड़कर और कोई करने में समर्थ नहीं है । ऐसे सभी पापों का धर्मशास्त्रों के अनुसार प्रायश्चित्त करने से पापराशि अवश्य क्षीण हो जाती है । प्रायश्चित्तों को कमलापति विष्णु के समीप करना चाहिए, क्योंकि इससे न्यूनाधिक दोषों की पूर्ति हो जाती है । गंगा, तुलसी, सत्संग और हरिकीर्तन, इसी

पञ्चदशोऽध्यायः ११७. न्यूनातिरिक्तकृत्यानां संपूर्तिकरणाय च । गङ्गा च तुलसी चैव सत्सङ्गो हरिकीर्त्तनम् ॥१३५॥ अनसूया ह्यहिंसा च सर्वेष्येते हि पापहा । विष्ण्वर्पितानि कर्माणि सफ़लानि भवन्ति हि ॥१३६॥ अनर्पितानि कर्माणि भस्मविन्यस्तहव्यवत् । नित्यं नैमित्तिकं काम्यं यच्चान्यन्मोक्षसाधनम् ॥१३७॥ विष्णौ समर्पितं सर्वं सात्त्विकं सफलं भवेत् । हरिभक्तिः परा नृणां सर्वपापप्रणाशिनी ॥१३८॥ सा भक्तिर्दशधा ज्ञेया पापारण्यदवोपमा । तामसो राजसैश्चैव सात्त्विकैश्च नृपोत्तम ॥१३६॥ यच्चान्यस्य विनाशार्थं भजनं श्रीपतेर्नृप । सा तामस्यधमा भक्तिः खलभावधरा यतः ॥१४०॥ योऽर्चयेत्कैतवधिया स्वैरिणी स्वपतिं यथा । नारायणं जगन्नाथं तामसी मध्यमा तु सा ॥१४१॥ देवपूजापरन्दृष्ट्वा मात्सर्याद्योऽर्चयेद्धरिम् । सा भक्तिः पृथिवीपाल तामसी चोत्तमा स्मृता ॥१४२॥ धनधान्यादिकं यस्तु प्रार्थयन्नर्चयेद्धरिम् । श्रद्धया परया युक्तः सा राजस्यधमा स्मृता ॥१४३॥ यः सर्वलोकविख्यातकीर्तिमुद्दिश्य माधवम् । अर्चयेत्परया भक्त्या सा मध्या राजसी मता ॥१४४॥ सालोक्यादि पदं यस्तु समुद्दिश्यार्चयेद्धरिम् । सा राजस्युत्तमा भक्तिः कीर्तिता पृथिवीपते ॥१४५॥ यस्तु स्वकृतपापानां क्षयार्थं प्रार्चयेद्धरिम् । श्रद्धया परयोपेतः सा सात्त्विक्यधमा स्मृता ॥१४६॥ हरेरिदं प्रियमिति शुश्रूषां कुरुते तु यः । श्रद्धया संयुतो भूयः सात्त्विकी मध्यमा तु सा ॥१४७॥ विधिबुद्ध्याचार्चयेद्यस्तु दासबच्च्छ्रीपतिं नृप । भक्तीनां प्रवरा सा तु उत्तमा सात्त्विकी स्मृता ॥१४८॥ महिमानं हरेर्यस्तु किञ्चित्कृत्वा प्रियो नरः । तन्मयत्वेन संतुष्टः सा भक्तिरुत्तमोत्तमा ॥१४६॥ अहमेव परो विष्णुर्मयि सर्वमिदं जगत् । इति यः सततं पश्येत्तं विद्यादुत्तमोत्तमम् ॥१५०॥ प्रकार अनसूया (उदारता) और अहिंसा ये भी पाप-विनाशक हैं । विष्णु को अर्पित किये हुए सभी शुभ कर्म सफल होते हैं । विष्णु को न अर्पित किये हुए कर्म उसी प्रकार निष्फल होते जैसे भस्म में दी हुई आहुति । नित्य, नैमित्तिक, काम्य अथवा और जितने मोक्षदायक कर्म हैं वे विष्णु को अर्पित करने से सात्त्विक फल प्रदान करते हैं। परा हरिभक्ति मनुष्यों के सभी पापों को नष्ट कर देती है ॥१३२-१३८॥ नृपोत्तम ! यह पाप रूपो वन को दावानल के समान भस्म करने वाली भक्ति तामस, राजस और सात्त्विक भेदों से इस प्रकार की होती है। नृप ! दूसरे के विनाश के लिए जो विष्णु का भजन किया जाता है वह तामसो अधमा भक्ति है, क्योंकि यह दुष्टजनों की भक्ति के समान है । जिस प्रकार कुलटा स्त्री अपने पति के प्रति कपट प्रेम दिखलाती है, उसो प्रकार जो व्यक्ति कपट भाव से नारायण जगन्नाथ की पूजा करता है, उसकी भक्ति मध्यमा तामसी है ॥१३९- १४१॥ जो दूसरे को देवपूजा में देखकर ईर्ष्यावश स्वयं ईश्वर की पूजा करता है वह उत्तमा तामसो भक्ति कही जाती है । जो धन सम्पत्ति आदि की इच्छा से परम श्रद्धापूर्वक भगवान् को पूजा करता है, वह अधमा- राजसी भक्ति है । जो सारे संसार में विख्यात-यश प्राप्त करने के लिए परमश्रद्धा से माधव को पूजा करता है वह भक्ति मध्यम राजसी कही जाती है । पृथ्बीपते ! जो सालोक्य आदि पद को पाने के लिए हरि की उपासना करता है, वह उत्तम राजसी भक्ति मानी गई है। जो अति श्रद्धा से अपने पापों के क्षय के लिए हरि की अर्चा करता है, वह अधम सात्त्विक भक्ति कही गई है । ।१४२-१४६॥ जो हरि को यह मेरा कार्य प्रिय है इस बुद्धि से श्रद्धायुत होकर हरि की शुश्रूषा करता है वह मध्यम सात्विक भक्ति बताई गई है । नृप ! जो विधि (शास्त्राज्ञा या कर्त्तव्य) बुद्धि से दास की भांति श्रीपति विष्णु की पूजा करता है वह भक्तियों में श्रेष्ठ उत्तम सात्त्विक भक्ति है । जो मनुष्य हरि की महिमा का स्मरणकर तन्मय होकर प्रसन्नतापूर्वक भगवान् की पूजा करता है उस भक्ति को उत्तमोत्तम भक्ति कहते हैं । मैं ही परम विष्णु हूँ मुझमें यह सारा जगत् व्याप्त है, इस प्रकार की भावना जिसके हृदय में रहती है उसको उत्तमोत्तम भक्त कहा जाता है। इस प्रकार की दशविध भक्ति संसार की माया

११८ नारदीयपुराणम् एवं दशविधा भक्तिः संसारच्छेदकारिणी । तत्रापि सात्त्विकी भक्तिः सर्वकामफलप्रदा ॥१५१॥ तस्माच्छृणुष्व भूपाल संसारविजिगीषुणा । स्वकर्मणो विरोधेन भक्तिः कार्या जनार्दने ॥१५२॥ यः स्वधर्मं परित्यज्य भक्तिमात्रेण जीवति । न तस्य तुष्यते विष्णुराचारेणैव तुष्यते ॥१५३॥ सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते । आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥१५४॥ तस्मात्कार्या हरेर्भक्तिः स्वधर्मस्याविरोधिनी । सदाचारविहीनानां धर्मो अप्यसुखप्रदाः ॥१५५॥ स्वधर्महीना भक्तिश्चाप्यकृतेव प्रकीर्तिता । यत्तु पृष्टं त्वया भूयस्तत्सर्वं गदितं मया ॥१५६॥ तस्माद्धर्मपरो भूत्वा पूजयस्व जनार्दनम् । नारायणमणीयांसं सुखमेष्यसि शाश्वतम् ॥१५७॥ शिव एव हरिः साक्षाद्धरिरेव शिवः स्वयंम् । द्वयोरन्तरदृग्याति नरकान्कोटिशः खलः ॥१५८॥ तस्माद्विष्णुं शिवं वापि समं बुद्ध्वा समर्चय । भेदकृद्दुःखमाप्नोति इह लोके परत्र च ॥१५९॥ यदर्थमहमायातःत्वत्समीपं जनाधिप । तत्ते वक्ष्यामि सुमति सावधानं निशामय ॥१६०॥ आत्मघातकपाप्मानो दग्धा कपिलकोषतः । वसन्ति नरके ते तु राजंस्तव पितामहाः ॥१६१॥ तानुद्धर महाभाग गङ्गानयनकर्मणा । गङ्गा सर्वाणि पापानि नाशयत्येव भूपते ॥१६२॥ केशास्थिनखदन्तांश्च भस्मापि नृपसत्तम । नयति विष्णुसदनं स्पृष्टा गङ्गेण वारिणा ॥१६३॥ यस्यास्थि भस्म वा राजन् गङ्गायां क्षिप्यते नरैः । स सर्वपापनिर्मुक्तः प्रयाति भवनं हरेः ॥१६४॥ यानि कानि च पापानि प्रोक्तानि तब भूपते । तानि सर्वाणि नश्यन्ति गङ्गाबिन्दुभिषेचनात् ॥१६५॥

का नाश करने वाली है, इनमें सात्त्विक भक्ति सब प्रकार की कामनाओं को देने वाली है ॥१४७-१५१॥ भूपाल ! इसलिए सुनो—संसारिक अभाव या बन्धनों पर विजय पाने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति अपने आश्रम धर्म का निर्वाह करता हुआ भगवान् जनार्दन में अपनी निष्ठा रखे । जो अपने धर्म का त्याग कर केवल भक्ति मात्र से जीवित रहता या जीविका चलाता है उसके ऊपर भगवान् प्रसन्न नहीं होते वे तो केवल आचार पालन से ही प्रसन्न रहते हैं। आचार ही सब प्रकार के धर्मों की प्राप्ति का प्रथम कारण है। आचार द्वारा ही धर्म की रक्षा होती है और धर्म के प्रभु भगवान् हैं। अतएव हरि की भक्ति अपने अपने आचार धर्म के पालन के साथ ही (अविरोधभाव से) करनी चाहिए। सदाचारहीन व्यक्ति के लिए धर्म भी कष्टप्रद ही होता है ॥१५२-१५५॥ अपने धर्म से हीन भक्ति केवल प्राकृत भक्ति कही गई है । तुमने मुझसे जो कुछ पूछा, उसको मैंने सम्पूर्ण रूपसे कह दिया । इसलिए तुम धर्म पूर्वक भगवत्स्वरूप भगवान् जनार्दन की पूजा करो तभी तुम शाश्वत सुख प्राप्त करोगे । चाहे हरि की पूजा करो या शिव की दोनों में कोई भेद नहीं, क्योंकि शिव ही साक्षात् हरि और हरि ही साक्षात् शंकर हैं, इन दोनों में भेद बुद्धि रखने वाला दुष्टमानव करोड़ों नरकों में जाता है ॥१५६-१५८॥ इसलिए समभाव से विष्णु या शिव की पूजा करो । भेद भाव रखने वाला दुष्टभक्त न तो इस लोक में ही सुख पाता है न पर लोक में । जनाधिप ! जिसलिए मैं यहाँ तुम्हारे निकट आया हूँ, उसको कह रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो । राजन् ! तुम्हारे आत्मघाती पापी पितामह कपिल के क्रोधानल से भस्म होकर अब तक नरक में पड़े हुए हैं। महाभाग ! गंगा को यहां लाकर उनका उद्धार करो । भूपते ! गंगा मनुष्य के पापों को नष्ट कर ही देती हैं ॥१५९-१६२॥ नृपश्रेष्ठ ! मृत व्यक्तियों के केश, हड्डियां, नख, दांत यहाँ तक कि केवल श्मशान भस्म भी यदि गंगा जल से छू जाय तो मृत व्यक्ति अवश्य विष्णुपलोक को चला जाता है। राजन् ! मानव यदि किसी मृत व्यक्ति की हड्डी अथवा शव भस्म को ही गंगा में फेंक दे तो वह मृत व्यक्ति सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को चला जाता है। भूपते ! जो कुछ पाप तुम्हारे सामने कहे गये हैं वे सभी पाप गंगाजल के अभिषेक मात्र से नष्ट हो जाते हैं ॥१६३-१६५॥

पञ्चदशोऽध्यायः ११६ सनक उवाच इत्युक्त्वा मुनिशार्दूल महाराजं भगीरथम् । धर्मात्मानं धर्मराजः सद्यश्चान्तर्दधे तदा ॥१६६॥ स तु राजा महाप्राज्ञः सर्वशास्त्रार्थपारगः । निक्षिप्य पृथिवीं सर्वां सचिवेबु ययौ वनम् ॥१६७॥ तुहिनाद्रौ ततो गत्वा नरनारायणाश्रमात् । पश्चिमे तुहिनाक्रान्ते शृङ्गेषोडशयोजने ॥१६८॥ तपस्तप्त्वाऽनयामास गङ्गां त्रैलोक्यपावनीम् ॥१६६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे धर्माख्याने धर्मराजोपदेशेन भगीरथस्य गङ्गानयनोद्यमवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥

षोडशोऽध्यायः नारद उवाच हिमवद्गिरिमासाद्य किं चकार महीपतिः । कथमानीतवान्गङ्गामेतन्मे वक्तुमर्हसि ॥१॥ सनक उवाच भगीरथो महाराजो जटाचीरधरो मुने । गच्छन्हिमाद्रिं तपसे प्राप्तो गोदावरीतटम् ॥२॥ तत्रापश्यन्महारण्ये भृगोराश्रममुत्तमम् । कृष्णसारसमाकीर्णं मातङ्गगणसेवितम् ॥३॥

सनक बोले—मुनिशार्दूल ! इस प्रकार धर्मात्मा महाराज भगीरथ से कहकर धर्मराज तत्काल अन्तर्हित हो गए । वह परम बुद्धिमान्, सब शास्त्रों का पारगामी विद्वान् राजा मन्त्रियों को पृथ्वी का शासनभार सौंपकर वन को चला गया । इसके पश्चात् हिमालय पर्वत पर नर-नारायणाश्रम के पश्चिम दिशा के सोलह योजन विस्तीर्ण हिमाच्छाद्य शिखर पर घोर तपस्या कर इस पृथ्वीपर त्रिभुवन पावनी गंगा को ले आया ॥१६६-१६९॥ श्रीनारदीयपुराण में धर्मराजोपदेश और भगीरथ द्वारा गङ्गाआनयन नामक पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त ॥१५॥

अध्याय १६ गङ्गा का आनयन और अपने कुल का उद्धार नारदजी बोले—महीपति ने हिमालय पर्वत पर जाकर क्या किया और किस प्रकार गंगा को पृथ्वी पर लाया, इस आख्यान को मुझसे कहिए ॥१॥ सनक बोले—मुने ! जटा, वल्कल धारणकर महाराज भगीरथ तपस्या करने के लिए हिमालय में गोदावरी के तट पर गए । वहाँ उन्होंने उस महावन में भृगु के उत्तम आश्रम को देखा, जहाँ कृष्णसार मृग इधर-उधर क्रीड़ा कर रहे थे, मतवाले हाथी निःशङ्क होकर घूम रहे थे, चञ्चल भौंरों की गुंजार और कलकूजन

१२० नारदीयपुराणम् भ्रमद्भ्रमरसंघुष्टं कूजद्विहगसंकुलम् । व्रजद्वराहनिकरं चमरीपुच्छवीजितम् ॥४॥ नृत्यन्मयूरनिकरं सारङ्गादिनिषेवितम् । प्रवर्द्धितमहावृक्षं मुनिकन्याभिरादरात् ॥५॥ शालतालतमालाढ्यं नूनहिंतालमण्डितम् । मालतीयूथिकाकुन्दचम्पकाश्वत्थभूषितम् ॥६॥ उत्फुल्लकुसुमोपेतमृषिसङ्घनिषेवितम् । वेदशास्त्रमहाघोषमाश्रमं प्राविशद्भृगोः ॥७॥ गृणन्तं परमं ब्रह्मावृतं शिष्यगणैर्मुनिम् । तेजसा सूर्यसदृशं भृगुं तत्र ददर्श सः ॥८॥ प्रणनामार्थ विप्रेन्द्रं पादसंग्रहणादिना । आतिथ्यं भृगुरप्यस्य चक्रे सम्मानपूर्वकम् ॥९॥ कृतातिथ्यक्रियो राजा भृगुणा परमर्षिणा । उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा विनयान्मुनिपुङ्गवम् ॥१०॥ भगीरथ उवाच भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । पृच्छामि भवभीतोऽहं नृणामुद्धारकारणम् ॥११॥ भगवांस्तुष्यते येन कर्मणा मुनिसत्तम । तन्ममाख्याहि सर्वज्ञ अनुग्राह्योऽस्मि ते यदि ॥१२॥ भृगुरुवाच राजंस्तवेप्सितं ज्ञातं त्वं हि पुण्यवतां वरः । अन्यथा स्वकुलं सर्वं कथमुद्धर्त्तुमर्हसि ॥१३॥ यो वा को वापि भूपाल स्वकुलं शुभकर्मणा । उद्धर्त्तुकामस्तं विद्यान्नररूपधरं हरिम् ॥१४॥ कर्मणा येन देवेशो नृणामिष्टफलप्रदः । तत्प्रवक्ष्यामि राजेन्द्र शृणुष्व सुसमाहितः ॥१५॥ भव सत्यपरो राजन्न हिंसानिरतस्तथा । सर्वभूतहितो नित्यं मानृतं वद वै क्वचित् ॥१६॥

करने वाले पक्षियों की मधुर ध्वनि से वह आश्रम मुखरित था । कहीं एक ओर वराहयूथ इधर-उधर घूम रहे हैं तो कहीं चँवरी गायें अपनी मनोहर पूंछों को हिला रही हैं ॥२-४॥ नाचते हुए मयूरों और सारंगपक्षियों से वह वन सुशोभित है । जहाँ मुनि-कन्याओं ने बड़े आदर से सींच-सींचकर वट आदि वृक्षों को बड़ा बनाया है । शाल, ताल और तमाल वृक्षों से वह आश्रम व्याप्त है । हिंताल से युक्त वह मालती, जूही, कुंद, चंपा और पीपल के वृक्षों से सुशोभित है ॥५-६॥ ऐसे पुष्पित कुसुमों, तेजस्वी ऋषियों से व्याप्त उस भृगु के आश्रम में भगीरथ ने प्रवेश किया जहाँ चारों ओर वेद और शास्त्रों की ही ध्वनि सुनाई पड़ रही थी । उस आश्रम में राजा अपने तेज से सूर्य के समान भृगु मुनि को देखा जिनके चारों ओर परम ब्रह्म की चर्चा में लीन शिष्य-गण उपस्थित थे । मुनि को देखकर राजा ने चरणों पर गिर कर उस विप्रेन्द्र को प्रणाम किया, भृगु ने भी सम्मानपूर्वक राजा का आतिथ्य सत्कार किया । परम ऋषि भृगु का आतिथ्य स्वीकार करने के अनन्तर राजा हाथ जोड़कर विनत-भाव से मुनिपुंगव भृगु से बोला ॥७-१०॥ भगीरथ बोले - भगवन् ! सर्वधर्मज्ञ ! सर्वशास्त्रविशारद ! सांसारिक दुःखों से भयभीत मैं मनुष्यों के उद्धार का मार्ग पूछ रहा हूँ । यदि आप का मेरे ऊपर अनुग्रह है तो हे मुनिश्रेष्ठ ! सर्वज्ञ ! आप जिन कर्मों से भगवान् सन्तुष्ट होते हैं उनकी कृपा कर मुझको बतलाइये मैं आपका कृपापात्र हूँ ॥११-१२॥ भृगु बोले-राजन् ! मैंने तुम्हारा अभिप्राय समझ लिया । तुम पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ हो, अन्यथा अपने कुल का उद्धार करने के लिये कैसे प्रस्तुत होते ? भूपाल ! जो कोई मनुष्य अपने शुभ कर्मों से अपने कुल का उद्धार करना चाहता है उसको नररूपधारी हरि समझना चाहिए । राजेन्द्र ! जिन कर्मों से प्रसन्न होकर देवेश मनुष्यों को इष्ट फल प्रदान करते हैं, उनको बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनो । राजन् ! सत्यवादी बनो, सर्वदा अहिंसा का पालन करो, सारे प्राणियों के उपकार में ही लीन रहो और कभी भी कहीं पर असत्य वचन मत

षोडशोऽध्यायः १२१ त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम् । कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर विष्णुं सनातनम् ॥१७॥ कुरु पूजां महाविष्णोर्याहि शान्तिमनुत्तमाम् । द्वादशाष्टाक्षरं मन्त्रं जप श्रेयो भविष्यति ॥१८॥ भगीरथ उवाच सत्यं तु कीदृशं प्रोक्तं सर्वभूतहितं मुने । अनृतं कीदृशं प्रोक्तं दुर्जनाश्चापि कीदृशाः ॥१९॥ साधवः कीदृशाः प्रोक्तास्तथा पुण्यं च कीदृशम् । स्मर्तव्यश्च कथं विष्णुस्तस्य पूजा च कीदृशी ॥२०॥ शान्तिश्च कीदृशी प्रोक्ता को मन्त्रोऽष्टाक्षरो मुने । को वा द्वादशवर्णश्च मुने तत्त्वार्थकोविद ॥२१॥ कृपां कृत्वा मयि परां सर्वं व्याख्यातुमर्हसि । भृगुरुवाच साधु साधु महाप्राज्ञ तव बुद्धिरनुत्तमा । ॥२२॥ यत्पृष्टोऽहं त्वया भूप तत्सर्वं प्रवदामि ते । यथार्थकथनं यत्तत्सत्त्वमाहुर्विपश्चितः ॥२३॥ धर्माविरोधतो वाच्यं तद्धि धर्मपरायणैः । देशकालादि विज्ञाय स्वधमस्याविरोधतः ॥२४॥ यद्वचः प्रोच्यते सद्भिस्तत्सत्यमभिधीयते । सर्वेषामेव जंतूनामक्लेशजननं हि तत् ॥२५॥ अहिंसा सा नृप प्रोक्ता सर्वकामप्रदायिनी । कर्मकार्यसहायत्वमकार्यपरिपन्थिना ॥२६॥ सर्वलोकहितत्वं वै प्रोच्यते धर्मकोविदैः । इच्छानुवृत्तकथनं धर्माधर्मविवेकिनः ॥२७॥ अनृतं तद्धि विज्ञेयं सर्वश्रेयोविरोधि तत् । ये लोके द्वेषिणो मूर्खाः कुमार्गरतबुद्धयः ॥२८॥ ते राजन्दुर्जंना ज्ञेयाः सर्वधर्मबहिष्कृताः । धर्माधर्मविवेकेन वेदमार्गानुसारिणः ॥२६॥

बोलो । दुर्जन का संग छोड़ दो, साधुओं की संगति करो, रात दिन पुण्य कार्य करो सनातन विष्णु का स्मरण निरन्तर करो । महाविष्णु को पूजा करो शान्ति प्राप्त करोगे । द्वादशाक्षर (ओं नमो भगवते वासुदेवाय) और अष्टाक्षर मंत्र (ओं नमो वासुदेवाय) का जप करो तुम्हें श्रेय प्राप्त होगा ॥१३-१८॥ भगीरथ बोले--मुने ! सत्य का स्वरूप कैसा कहा गया है ? सर्व-प्राणि-हित क्या है ? अनृत किसे कहते हैं ? दुर्जनों की परिभाषा क्या है ? साधु किसे कहते हैं ? पुण्य कैसा होता है ? विष्णु का स्मरण किस प्रकार करना चाहिए ? उनकी पूजा को विधि क्या है ? शान्ति किसे कहते हैं ? अष्टाक्षर मन्त्र कौन सा है ? द्वादशवर्ण मन्त्र कौन है ? मुने ! तत्त्वार्थ के ज्ञाता ! मुझ पर अत्यधिक कृपा कर इन विषयों की व्याख्या कीजिए ॥१९-२१॥ भृगुजी बोले--महाप्राज्ञ ! धन्य हो, धन्य हो, तुम्हारी बुद्धि असाधारण है । तुमने जो कुछ मुझसे पूछा है उसको कह रहा हूँ। जो यथार्थ कथन है उसो को विद्वानों ने सत्य कहा है अर्थात् यथार्थ कथन को ही सत्य कहा जाता है । उस सत्य को धर्मपरायण व्यक्ति धर्म के अविरोध रूप से कहें । सज्जन व्यक्ति देश काल का ध्यान रखकर समन्वयात्मक दृष्टि से जो कुछ कहते हैं वही सत्य कहा जाता है। नृप ! सब प्राणियों को जिस कार्य से कष्ट न हो उसी को सब अभीष्ट वस्तुओं को देने वाली अहिंसा कहा गया है ॥२२-२५॥ धर्मतत्त्व के मर्मज्ञ जन लोक-व्यवहार में जिससे सहायता मिले और लोक-विरोध जिससे शान्त हो उसी को सर्वलोकहित कहते हैं । धर्म अधर्म का पूर्ण ज्ञान रखने वाले मनीषी जिसको अपने विवेक से अनुचित ठहराते हैं, उसको सब श्रेयसें को नष्ट करने वाला अनृत समझना चाहिए । राजन् ! इस संसार में जो द्वेष करने वाले, मूर्ख, कुमार्ग में ही सर्वदा लीन रहने वाले हैं, उन सब धर्मों से पराङ्मुख रहनेवालों को ही दुर्जन समझना चाहिए ॥२६-२८॥ धर्माधर्म के विवेक से वेदमार्ग का अनुसरण करने वाले और लोक-हितों में लगे रहने वाले व्यक्ति ही साधु माने जाते हैं। हरिभक्ति १६-नारदीयपुराण

१२२ नारदीयपुराणम् सर्वलोकहितासक्ताः साधवः परिकीर्तिताः । यत्तत्सद्भिborderश्च परिरञ्जितम् ॥३०॥ आत्मनः प्रीतिजनकं तत्पुण्यं परिकीर्तितम् । सर्वं जगदिदं विष्णुर्विष्णुः सर्वस्य कारणम् ॥३१॥ अहं च विष्णुर्यज्ज्ञानं तद्विष्णुस्मरणं विदुः । सर्वदेवमयो विष्णुर्विधिना पूजयामि तम् ॥३२॥ इति या भवति श्रद्धा सा तद्भक्तिः प्रकीर्तिता । सर्वभूतमयो विष्णुः परिपूर्णः सनातनः ॥३३॥ इत्यभेदेन या बुद्धिः समता सा प्रकीर्तिता । समता शत्रुमित्रेषु वशित्वं च तथा नृप ॥३४॥ यदृच्छालाभसंतुष्टिः सा शान्तिः परिकीर्तिता । एते सर्वे समाख्यातास्तपःसिद्धिप्रदा नृणाम् ॥३५॥ समस्तपापराशीनां तरसा नाशहेतवः । अष्टाक्षरं महामन्त्रं सर्वपापप्रणाशनम् ॥३६॥ वक्ष्यामि तव राजेन्द्र पुरुषार्थैकसाधनम् । विष्णोः प्रियकरं चैव सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥३७॥ नमो नारायणायेति जपेत्प्रणवपूर्वकम् । नमो भगवते प्रोच्य वासुदेवाय तत्परम् ॥३८॥ प्रणवाद्यं महाराज द्वादशार्णमुदाहृतम् । द्वयोः समं फलं राजन्नष्टदशावर्णयोः ॥३९॥ प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च साम्यमुद्दिष्टमेतयोः । शङ्खचक्रधरं शान्तं नारायणमनामयम् ॥४०॥ लक्ष्मीसंश्रितवामाङ्कं तथाभयकरं प्रभुम् । किरीटकुण्डलधरं नानामण्डनशोभितम् ॥४१॥ भ्राजत्कौस्तुभमालाढ्यं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम् । पीताम्बरधरं देवं सुरासुरनमस्कृतम् ॥४२॥ ध्यायेदनादिनिधनं सर्वकामफलप्रदम् । अन्तर्यामी ज्ञानरूपी परिपूर्णः सनातनः ॥४३॥ एतत्सर्वं समाख्यातं यत्तु पृष्टं त्वया नृप । स्वस्ति तेऽस्तु तपःसिद्धिं गच्छ लब्धुं यथासुखम् ॥४४॥ एवमुक्तो महीपालो भृगुणा परमर्षिणा । परमां प्रीतिमापन्नः प्रपेदे तपसे वनम् ॥४५॥


की ओर मन को प्रेरित करने वाले, सज्जनों को आनन्दित करने वाले और अपने को आनन्द देने वाले जो शुभ कर्म हैं, वे पुण्य कहे गए हैं । सारा विश्व विष्णु है विष्णु ही सब के कारण हैं। मैं स्वयं विष्णु हूँ, ऐसे ज्ञान को ही विष्णु स्मरण कहा जाता है । 'विष्णु सर्वदेवमय हैं । उनकी विधिपूर्वक पूजा करूँगा' इस प्रकार की जो श्रद्धा होती है उसी को भक्ति कहा जाता है ॥२९-३२॥ 'विष्णु सब पदार्थों में व्याप्त हैं, परिपूर्ण और सनातन हैं, ऐसी जो विश्व और विष्णु में अभेद बुद्धि है, उसी को समता कहते हैं । नृप ! शत्रु और मित्र में समान भाव रखना, आत्मसंयम और जो कुछ मिल जाय उसी पर प्रसन्न रहना ही शान्ति कही जाती है । ये सभी धर्म मनुष्यों के लिए तपस्या के समान सिद्धिप्रद बतलाये गए हैं ॥३३-३५॥ हठात् सम्पूर्ण पापराशि को नष्ट करने वाला अष्टाक्षर नामक महामन्त्र है । राजेन्द्र ! पुरुषार्थ के एक मात्र साधन, सब सिद्धियां देने वाले और भगवान् के परम प्रिय मन्त्र को कह रहा हूँ । प्रणव पूर्वक 'नमो नारायणाय' मन्त्र को जपना चाहिए । प्रणव (ओं) आदि में लगाकर 'नमो भगवते' कहने के पश्चात् वासुदेवाय का उच्चारणकरे । महाराज ! इसी को द्वादशाक्षर मन्त्र कहा जाता है । राजन् ! इन द्वादशाक्षर और अष्टाक्षर मन्त्रों का समान फल कहा गया है ॥३६-३९॥ ये प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों मार्गों के लिये समान रूप से साधक हैं । शंख-चक्र-धारी, शान्त, निर्विकार, नारायण, लक्ष्मी से सुशोभित वाम भाग वाले, अभय प्रद, प्रभु, किरीट-कुण्डल-धारी, अनेक प्रकार से सुसज्जित, कौस्तुभधारी और अनेक मालाओं से विभूषित, श्रीवत्स से सुशोभित वक्षःस्थल वाले, पीताम्बरधारी, सुर और असुरों से पूजित, अनादि, अनन्त और सब मनोरथों को देने वाले भगवान् विष्णु का ध्यान करे । भगवान् अन्तर्यामी, ज्ञानस्वरूप, परिपूर्ण और सनातन हैं । ॥४०-४३॥ नृप ! तुमने जो कुछ पूछा उसके विषय में ये सारी बातें बता दी गयीं । तुम्हारा कल्याण हो । अब सुख पूर्वक तपः सिद्धि प्राप्त करने के लिये जाओ । परम ऋषि भृगु की ऐसी आज्ञा और आशीर्वाद सुनकर राजा अति प्रसन्न हो गया और तपस्या के लिये वन में गया । हिमालयपर्वत के एक

षोडशोऽध्यायः १२३ हिमवद्गिरिमासाद्य पुण्यदेशे मनोहरे । नादेश्वरे महाक्षेत्रे तपस्तेपेऽतिदुश्चरम् ॥४६॥ राजा त्रिषवणस्नायी कन्दमूलफलाशनः । कृतातिथ्यर्हणश्चापि नित्यं होमपरायणः ॥४७॥ सर्वभूतहितः शान्तो नारायणपरायणः । पत्रैः पुष्पैः फलैस्तोयैस्त्रिकालं हरिपूजकः ॥४८॥ एवं बहुतित्थं कालं नीत्वा चात्यन्तधैर्यवान् । ध्यायन्नारायणं देवं शीर्णपर्णाशनोऽभवत् ॥४६॥ प्राणायामपरो भूत्वा राजा परमधार्मिकः । निरुच्छ्वासं तपस्तप्तुं ततः समुपचक्रमे ॥५०॥ ध्यायन्नारायणं देवमनन्तमपराजितम् । षष्टिवर्षसहस्राणि निरुच्छ्वासपरोऽभवत् ॥५१॥ तस्य नासापुटाद्राज्ञो वह्निर्जज्ञे भयंकरः । तं दृष्ट्वा देवताः सर्वे वित्रस्ता वह्नितापिताः ॥५२॥ अभिजग्मुर्महाविष्णुं यत्रास्ते जगतां पतिः । क्षीरोदस्योत्तरं तीरं संप्राप्य त्रिदशेश्वराः । अस्तुवन्देवदेवेशं शरणागतपालकम् ॥५३॥ देवा ऊचुः नता. स्म विष्णुं जगदेकनाथं स्मरत्समस्तार्तिहरं परेशम् । स्वभावशुद्धं परिपूर्णभावं वदन्ति यज्ज्ञानतनुं च तज्ज्ञाः ॥५४॥ ध्येयः सदा योगिवरैर्महात्मा स्वेच्छाशरीरैः कृतदेवकार्यः । जगत्स्वरूपो जगदादिनाथस्तस्मै नताः स्मः पुरुषोत्तमाय ॥५५॥ यन्नामसंकीर्त्तनतो खलानां समस्तपापानि लयं प्रयान्ति । तमीशमीड्यं पुरुषं पुराणं नताः स्म विष्णुं पुरुषार्थसिद्धयै ॥५६॥

मनोहर पुण्य भूमि नादेश्वर नामक क्षेत्र में अति दुष्कर तप करने लगा ।।४४-४६।। राजा त्रिकाल स्नान करता और कन्द मूल फल खाकर समय बिताता था । नित्य प्रति अतिथिसंवा और हवन करता था । प्राणियों का हितैषी, शान्त और नारायण का सेवक वह पत्र, पुष्प और फल से तीनों काल हरि की पूजा किया करता था । इस प्रकार परम धीर उस राजा ने बहुत समय व्यतीत किया । तदनन्तर नारायण देव का ध्यान करता हुआ पेड़ से गिरी हुई पत्तियों को चुन चुन कर खाने लगा । पुनः इससे भी सन्तोष न पाकर वह परम धार्मिक राजा प्राणायाम साधना करता हुआ श्वास रोक कर तपस्या करने लगा । ।।४७-५०।। इस प्रकार साठ हजार वर्षों तक अनन्त, अपराजित नारायण देव का श्वास निरोध पूर्वक ध्यान करता रहा । अन्त में उस राजा के नथने से भयंकर ज्वाला उत्पन्न हुई । उसको देखकर सभी देवता भयत्रस्त हो गये, वे अग्निज्वाला से सन्तप्त होकर वहाँ गये जहाँ जगन्नाथ महाविष्णु थे । देवता क्षीरसागर के उत्तर तीर पर जाकर शरणागतरक्षक देवदेवेश की स्तुति करने लगे ।।५१-५३।। देवगण बोले-- संसार के एकमात्र प्रभु, स्मरण मात्र से समस्त पीड़ाओं को दूर करने वाले, स्वभावशुद्ध और परम पूर्ण स्वरूप विष्णु को नमस्कार करते हैं । जिसको ब्रह्मज्ञानी ज्ञान रूप कहते हैं। अपनी इच्छा से शरीर धारण कर (अवतार लेकर) जो देवों का कार्य किया करते, जिस महात्मा का सर्वदा ध्यान करते, जो जगत्स्वरूप और संसार के आदि नाथ हैं उस पुरुषोत्तम को नमस्कार है । जिसके नाम-कीर्तन से समस्त पाप विनष्ट हो जाते हैं उस पूज्य परमेश पुराण पुरुष को अपनी कामना सिद्धि के लिए प्रणाम करते हैं । ।।५४-५६।। जिसके प्रकाश से सूर्य, चन्द्र आदि सर्वदा प्रकाश पूर्ण रहते और जिसके आदेश का कभी भी उल्लंघन नहीं करते उस पुरुषार्थस्वरूप, देवेश कलात्मक विष्णु को हम नमस्कार करते हैं । जिसके अनुग्रह से कमलयोनि ब्रह्मा लोक-

यतोजसा भान्ति दिवाकराद्या नातिक्रमन्त्यस्य कदापि शिक्षाः । कालात्मकं तं त्रिदशाधिनाथं नमामहे वै पुरुषार्थरूपम् ॥५७॥ जगत्करोऽत्यब्जभवोऽत्ति रुद्रः पुनाति लोकांञ्श्रुतिभिश्च विप्राः । तमादिदेवं गुणसन्निधानं सर्वोपदेष्टारमिताः शरण्यम् ॥५८॥ वरं वरेण्यं मधुकैटभारिं सुरासुरार्चितपादपीठम् । सद्‍भक्तसंकल्पितसिद्धिहेतुं ज्ञानेकवेद्यं प्रणताः स्म देवम् ॥५९॥ अनादिमध्यान्तमजं परेशमनाद्यविद्याख्यतमोविनाशम् । सच्चित्परानन्दघनस्वरूपं रूपादिहीनं प्रणताः स्म देवम् ॥६०॥ नारायणं विष्णमनन्तमेशं पीताम्बरं पद्मभवादिसेव्यम् । यज्ञप्रियं यज्ञकरं विशुद्धं नताः स्म सर्वोत्तमाव्ययं तम् ॥६१॥ इति स्तुतो महाविष्णुर्देवैरिन्द्रादिभिस्तदा । चरितं तस्य राजर्षेर्देवानां संन्यवेदयत् ॥६२॥ ततो देवान्समाश्वास्य दत्त्वाभयमनञ्जनः । जगाम यत्र राजर्षिस्तपस्तपति नारद ॥६३॥ शङ्खचक्रधरो देवः सच्चिदानन्दविग्रहः । प्रत्यक्षतामगात्तस्य राज्ञः सर्वजगद्गुरुः ॥६४॥ तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं भाभासितदिगन्तरम् । अतसीपुष्पसंकाशं स्फुरत्कुण्डलमण्डितम् ॥६५॥ स्निग्धकुन्तलवक्त्राब्जं विभ्राजन्मुकुटोज्ज्वलम् । श्रीवत्सकौस्तुभधरं वनमालाविभूषितम् ॥६६॥ दीर्घबाहुमुदाराङ्गं लोकेशार्चितपत्कजम् । ननाम दण्डवद्‍भूमौ भूपतिर्नम्रकंधरः ॥६७॥ अत्यन्तहर्षसंपूर्णः सरोमाञ्चः सगद्‍गदः । कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति श्रीकृष्णति समुच्चरन् ॥६८॥ तस्य विष्णुः प्रसन्नात्मा हृन्तर्यामी जगद्गुरुः । उवाच कृपयाविष्टो भगवान्भूतभावनः ॥६९॥

सृष्टि करते, अतिरुद्र समस्त संसार को पवित्र करते, विप्रगण वेदमन्त्रों द्वारा जिसका स्तवन करते उस गुणनिधान सबको उपदेश देने वाले, आदि देव और शरणागतपालक की शरण में हम सभी देवता आये हुए हैं । ।।५७-५८।। वर, वरेण्य, मधुकैटभ के शत्रु, सद्‍भक्तों के मनोरथों को सिद्ध करने वाले ज्ञान से हो एक मात्र गम्य देव को नमस्कार है, जिसके चरणों को देव और असुर सभी पूजा करते हैं । अनादि, अमध्य, अनन्त, अज, परेश और अनादि अविद्या रूपी अन्धकार को नष्ट करने वाले, रूप रहित (निर्गुण) और सच्चिदानन्द घन स्वरूप देव को नमस्कार है । ।।५९-६०।। अनन्त, ईश, पीताम्बरधारी, ब्रह्मा, शिव आदि देव के पूज्य, यज्ञप्रिय, यज्ञकर, सर्वोत्तम, विशुद्ध और अव्यय देव को नमस्कार है । इस प्रकार इन्द्र सहित सब देवताओं ने महाविष्णु की स्तुति की और उस राजर्षि भगीरथ का चरित्र कह दिया । यह सुनकर निरंजन भगवान् ने देवों को आश्वासन दिया और अभयवर प्रदानकर वे स्वयं वहाँ गये जहाँ राजर्षि भगीरथ तपस्या कर रहे थे । ।।६१-६३।। नारद ! शंख चक्र धारी, सच्चिदानन्द स्वरूप और सब लोकों के गुरु जब उस राजा के समीप गये तब उस भूपति ने कमलनयन, अलसी के पुष्प समान मनोहर वर्णी अपनी प्रभा से समस्त दिङ्मण्डल को आलोकित करने वाले, वनमाला से विभूषित, महाबाहु, श्रीवत्स और कौस्तुभ से सुशोभित, लोकपालों से पूजित चरणकमल वाले उज्ज्वल मणि जटिल मुकुट से सुशोभित शिर वाले, प्रभा पूर्ण कुण्डलों से सुशोभित और उदार अंग वाले भगवान् को विनम्र भाव से दण्डवत् प्रणाम किया और अत्यन्त आनन्द से पुलकित होकर गद् गद् वाणी से कृष्ण !, कृष्ण ! कृष्ण ! श्रीकृष्ण !!! का उच्चारण किया । अन्तर्यामी, जगद्गुरु, भूतभावन भगवान् भगीरथ को भक्ति भावना को देखकर प्रसन्न होकर कृपा पूर्वक बोले ।।६४-६९।।

षोडशोऽध्यायः १२५ श्रीभगवानुवाच भगीरथ महाभाग तवाभीष्टं भविष्यति । आगमिष्यन्ति मल्लोकं तव पूर्वपितामहाः ॥७०॥ मम मूर्त्यन्तरं शम्भुं राजन्स्तोत्रैः स्वशक्तितः । स्तुहि ते सकलं कामं स वै सद्यः करिष्यति ॥७१॥ यस्तु जग्राह शशिनं शरणं समुपागतम् । तस्मादाराधयेशानं स्तोत्रैः स्तुत्यं सुखप्रदम् ॥७२॥ अनादिनिधनो देवः सर्वकामफलप्रदः । त्वया संपूजितो राजन्सद्यः श्रेयो विधास्यति ॥७३॥ इत्युक्त्वा देवदेवेशो जगतां पतिरच्युतिः । अन्तर्दधे मुनिश्रेष्ठ उत्तस्थौ सोऽपि भूपतिः ॥७४॥ किमिदं स्वप्न आहोस्वित्सत्यं साक्षाद्द्विजोत्तम । भूपतिर्विस्मयं प्राप्तः किं करोमीति विस्मितः ॥७५॥ अथान्तरिक्षे वागुच्चैः प्राह तं भ्रान्तचेतसम् । सत्यमेतदिति व्यक्तं न चिन्तां कर्तुमर्हसि ॥७६॥ तन्निशाम्यावनीपाल ईशानं सर्वकारणम् । समस्तदेवताराजमस्तोषीद् भक्तितत्परः ॥७७॥ भगीरथ उवाच प्रणमामि जगन्नाथं प्रणतार्तिप्रणाशनम् । प्रमाणागोचरं देवमीशानं प्रणवात्मकम् ॥७८॥ जगद्रूपमजं नित्यं सर्गस्थित्यंतकारणम् । विश्वरूपं विरूपाक्ष प्रणतोऽस्म्युग्ररेतसम् ॥७९॥ आदिमध्यान्तरहितमनन्तमजमव्ययम् । समामनन्ति योगीन्द्रास्तं वन्दे पुष्टिवर्धनम् ॥८०॥ नमो लोकाधिनाथाय वञ्चते परिवञ्चते । नमोऽस्तु नीलग्रीवाय पशूनां पतये नमः ॥८१॥ नमश्चैतन्यरूपाय पुष्टानां पतये नमः । नमोऽकल्पप्रकल्पाय भूतानां पतये नमः ॥८२॥ नमः पिनाकहस्ताय शूलहस्ताय ते नमः । नमः कपालहस्ताय पाशमुद्गरधारिणे ॥८३॥ भगवान् बोले-भगीरथ ! महाभाग ! तुम्हारी मनःकामना सिद्ध होगी और तुम्हारे पूर्वज पितामह मेरे लोक को अवश्य प्राप्त करेंगे । परन्तु राजन् ! तुम अपनी शक्ति के अनुसार मेरी अपर मूर्ति शंकर की स्तोत्रों से स्तुति करो । वे तुम्हारे सब मनोरथों को तत्काल पूर्ण करेंगे । जिसने शरणागत चन्द्रमा को शरण दी, उस सुखप्रद, पूज्य ईशानदेव की आराधना करो ॥७०-७२॥ वे अनादि और अनन्त देव सब मनोरथों को पूर्ण करने वाले हैं । राजन् ! तुम्हारी पूजा से प्रसन्न होकर वे शीघ्र तुम्हें कल्याण प्रदान करेंगे । यह कह कर जगत्पति, अच्युत, देवदेवेश अन्तर्हित हो गये और मुनिश्रेष्ठ ! वह भूपति भी उठा और आश्चर्य चकित होकर सोचने लगा कि यह सत्य है या स्वप्न ! अब क्या करूं ? इस प्रकार वह अत्यन्त विस्मित हो गया । भ्रान्त राजा को इस प्रकार आकाशवाणी सुनाई पड़ी कि यह सत्य है, इस विषय में चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं । आकाशवाणी सुनकर भूमिपाल भगीरथ सबके एक मात्र कारण सब देवताओं के स्वामी ईशान की भक्ति पूर्वक स्तुति करने लगे ॥७३-७७॥ भगीरथ बोले- जगन्नाथ ! भक्तों की पीड़ा दूर करने वाले, (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द) प्रमाणों से परे और ओंकार रूप ईशान देव को प्रणाम करता हूँ । जगत्स्वरूप, अज, नित्य, सृष्टि, स्थिति और प्रलय करने वाले, विश्वरूप, विरूपाक्ष और उग्रवीर्य को प्रणाम है । आदि, मध्य और अन्त से हीन, अनन्त, अज, अव्यय और योगीन्द्र लोग जिसकी वन्दना करते हैं, उस पुष्टिवर्धन को नमस्कार है । लोकाधिनाथ और लोक को मायावश करने वाले परम वंचक को नमस्कार है । नीलग्रीव को नमस्कार है । पशुपति को नमस्कार है ॥७८- ८१॥ चैतन्यरूप शिव को नमस्कार है। पुष्टों (भूतों) के पति को नमस्कार है । कल्प के रचयिता को नमस्कार है । भूतों के पति को नमस्कार है । पिनाकपाणि को नमस्कार है । शूलहस्त को नमस्कार है । कपालपाणि को नमस्कार है । पाश और मुद्गर धारण करने वाले को प्रणाम है । सर्वभूत को नमस्कार है । घंटाहस्त को

१२६ नारदीयपुराणम् नमस्ते सर्वभूताय घण्टाहस्ताय ते नमः । नमः पञ्चास्यदेवाय क्षेत्राणां पतये नमः ॥८४॥ नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते । अनेकरूपरूपाय निर्गुणाय परात्मने ॥८५॥ नमोगणाधिदेवाय गणानां पतये नमः । नमो हिरण्यगर्भाय हिरण्यपतये नमः ॥८६॥ हिरण्यरेतसे तुभ्यं नमो हिरण्यबाहवे । नमो ध्यानस्वरूपाय नमस्ते ध्यानसाक्षिणे ॥८७॥ नमस्ते ध्यानसंस्थाय ध्यानगम्याय ते नमः । येनेदं विश्वमखिलं चराचरविराजितम् ॥८८॥ वर्षेवाभ्रेण जनितं प्रधानपुरुषात्मना ॥८९॥ स्वप्रकाशं महात्मानं परं ज्योतिः सनातनम् । यमामनन्ति तत्त्वज्ञाः सवितारं नृचक्षुषाम् ॥९०॥ उमाकांतंनन्दिकेशं नीलकण्ठं सदाशिवम् । मृत्युंजयं महादेवं परात्परतरं विभुम् ॥९१॥ परं शब्दब्रह्मरूपं तं वन्देऽखिलकारणम् । कपर्दिने नमस्तुभ्यं सद्योजाताय वै नमः ॥९२॥ भवोद्भवाय शुद्धाय ज्येष्ठाय च कनीयसे । मन्यवे त इषे वध्याः पतये यज्ञतन्तवे ॥९३॥ ऊर्जे दिशां च पतये कालायाघोररूपिणे । कृशानुरेतसे तुभ्यं नमोऽस्तु सुमहात्मने ॥९४॥ यतः समुद्राः सरितोऽद्रयश्च गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घाः । स्थाणुर्चरिष्णुर्महदल्पकं च असच्च सञ्जीवमजीवमास ॥९५॥ नतोऽस्मि तं योगिनतांघ्रिपद्मं सर्वान्तरात्मानमरूपमीशम् । स्वतंत्रमेकं गुणिनां गुणं च नमामि भूयः प्रणमामि भूयः ॥९६॥ इत्थं स्तुतो महादेवः शंकरो लोकशंकरः । आविर्बभूव भूपस्य संतप्ततपसोग्रतः ॥९७॥ पञ्चवक्त्रं दशभुजं चन्द्रार्द्धकृतशेखरम् । त्रिलोचनमुदाराङ्गं नागयज्ञोपवीतिनम् ॥९८॥ नमस्कार है। पाँच मुख वाले को नमस्कार है। क्षेत्रों के पति को नमस्कार है ॥८२-८४॥ भू को धारण करने वाले और समस्त भूतों के आदि भूत को नमस्कार है। अनेक अनेक रूपों को धारण करने वाले, निर्गुण, परात्मन्, गणाधि- देव को नमस्कार है। गणों के स्वामी को नमस्कार है। हिरण्यगर्भ को नमस्कार है। हिरण्यपति को नमस्कार है। हिरण्यरेतस् तुमको नमस्कार है। हिरण्यबाहु के लिए नमस्कार है। ध्यानस्वरूप को नमस्कार है। ध्यान- साक्षी को नमस्कार है। ध्यानस्थ को नमस्कार है। ध्यानगम्य को नमस्कार है। जिससे यह अखिल चराचरा- त्मक जगत् व्याप्त है ॥८५-८८॥ जिस जगत् को प्रधान पुरुष (शिव) ने मेघों से उत्पन्न वर्षा की भाँति उत्पन्न किया, उसको नमस्कार है। स्वप्रकाश, परं ज्योति, सनातन, महात्मा और जो मनुष्यों के नेत्र हैं उस सविता सूर्य को नमस्कार है। उमाकान्त, नन्दिकेश, नीलकण्ठ, सदाशिव, मृत्युंजय, महादेव, परात्पर, विभु, वाणी से अगोचर और अखिल सृष्टि के कारण ब्रह्म की वन्दना करता हूँ। कपर्दी ! तुमको नमस्कार है। सद्यःजात को नमस्कार है ॥८९-९२॥ भव के आदि कारण, शुद्ध, ज्येष्ठ, सबसे छोटे, क्रोधस्वरूप, सर्वव्यापक, वेदपति, यज्ञ के प्रवर्द्धक, ऊर्ज (बल), दिक्पति, काल, अघोर रूप, अग्निरेतस् और महात्मा तुमको नमस्कार है। समुद्र, नदियाँ, पहाड़, गन्धर्व, यक्ष, असुर, सिद्धसंघ, चर, स्थावर, महान्, लघु, असत् और सत् भी जिससे उत्पन्न हुए हैं, उस सर्वान्तरात्मा, अरूप, ईश, स्वतन्त्र, एक, गुणशील और गुणरूप शंकर को प्रणाम करता हूँ। जिसके चरणकमलों में योगी जन नतमस्तक रहते हैं, ऐसे देव को पुनः-पुनः प्रणाम करता हूँ ॥९३-९६॥ लोककल्याणकारी शंकर की इस प्रकार स्तुति करने पर शंकर जी उस तपोजर्जर भूप के सामने प्रकट हुए। नारद ! इस प्रकार पंचमुख, दशभुज, द्वितीया के चन्द्रमा को शिर पर धारण किये, त्रिनेत्र, उदाररूप, सर्प का यज्ञोपवीत पहने हुए, विशाल वक्षःस्थल वाले, कैलाश के समान गौर वर्ण, गज-

षोडशोऽध्यायः। १२७ विशालवक्षसं देवं तुहिनाद्रिसमप्रभम् । गजचर्माम्बरधरं सुरार्चितपदाम्बुजम् ॥९६॥ दृष्ट्वा पपात पादाग्रे दण्डवद्भुवि नारद । तत उत्थाय सहसा शिवाग्रे विहिताञ्जलिः ॥१००॥ प्रणनाम महादेवं कीर्तयन्शंकराद्वयम् । विज्ञाय भक्तिं भूपस्य शंकरः शशिशेखरः ॥१०१॥ उवाच राज्ञे तुष्टोऽस्मि वरं वरय वाञ्छितम् । तोषितोऽस्मि त्वया सम्यक् स्तोत्रेण तपसा तथा ॥१०२॥ एवमुक्तः स देवेन राजा संतुष्टमानसः । उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा जगतामीश्वरेश्वरम् ॥१०३॥ भगीरथ उवाच अनुग्राह्योऽस्मि यदि ते वरदानान्महेश्वर । तदा गङ्गां प्रयच्छास्मत्पितॄणां मुक्तिहेतवे ॥१०४॥ श्रीशिव उवाच दत्ता गङ्गा मया तुभ्यं पितॄणां ते गतिः परा । तुभ्यं मोक्षः परश्चेति तमुक्त्वान्तर्दधे शिवः ॥१०५॥ कपर्दिनो जटास्रस्ता गङ्गा लोकैकपाविनी । पावयन्ती जगत्सर्वमन्वगच्छद्भगीरथम् ॥१०६॥ ततः प्रभृति सा देवी निर्मला मलहारिणी । भागीरथीति विख्याता त्रिषु लोकेष्वभून्मुने ॥१०७॥ सगरस्यात्मजाः पूर्वं यत्र दग्धाः स्वपाप्मना । तं देशं प्लावयामास गङ्गा सर्वसरिद्वरा ॥१०८॥ यदा संप्लावितं भस्म सागराणां तु गङ्गया । तदैव नरके मग्ना उद्धृताश्च गतैमसः ॥१०६॥ पुरा संक्रुध्यमानेन ये यमेनातिपीडिताः । त एव पूजितास्तेन गङ्गाजलपरिप्लुताः ॥११०॥ गतपापान्स विज्ञाय यमः सगरसंभवान् । प्रणम्याभ्यर्च्य विधिवत्प्राह तान्प्रीतमानसः ॥१११॥ भो भो राजसुता यूयं नरकाद् भृशदारुणात् । मुक्ता विमानमारुह्य गच्छध्वं विष्णुमन्दिरम् ॥११२॥ इत्युक्तास्ते महात्मानो यमेन गतकल्मषाः । दिव्यदेहधरा भूत्वा विष्णुलोकं प्रपेदिरे ॥११३॥ चर्म का वस्त्र धारण करने वाले और सुरों से पूजित चरण वाले भगवान् शंकर को सामने उपस्थित देखकर भगीरथ ने दण्डवत् प्रणाम किया । तत्पश्चात् शीघ्र उठकर शंकर के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए ॥६७-१००॥ महादेव शंकर का गुणगान करते हुए बार-बार प्रणाम करने लगे । चन्द्रशेखर शंकर राजा की भक्ति देखकर बोले, राजन् ! प्रसन्न हूँ, अभीष्ट वर माँगो, तुम्हारी स्तुति और तपस्या के वशीभूत हूँ। भगवान् शंकर की ऐसी बातें सुनकर राजा संतुष्ट हो गया । उसने हाथ जोड़कर जगदीश्वर से बोला—महेश्वर ! यदि आप वरदान के द्वारा मुझे अनुगृहीत करना चाहते हैं तो कृपा कर मुझे गंगाजी को दे दें जिनसे मेरे मृत पितरों को मुक्ति प्राप्त हो ॥१०१-१०४॥ शिव बोले—मैने तुमको गंगा दे दी, जिससे तुम्हारे पितरों को परमगति की प्राप्ति होगी, तुम्हें भी परम मोक्ष प्राप्त होगा, ऐसा वर देकर शिव अन्तर्हित हो गए । तदनन्तर कपर्दी शंकर की जटा से निकलकर लोक को पवित्र करने वाली गंगा सारे संसार को पवित्र करती हुई भगीरथ के पीछे-पीछे चलो । मुने ! उसी समय से वह मलहारिणी निर्मल गंगा इस त्रिभुवन में भागीरथी नाम से विख्यात हो गयीं ।१०५-१०७॥ परम पवित्र (श्रेष्ठ) नदी गंगा ने उस स्थान को जहाँ अपने पापों के कारण सगरपुत्र भस्म हो गए थे—जलमग्न कर दिया । ज्योंही गंगाजल से सगर पुत्रों के शरीर-भस्म का स्पर्श हुआ त्योंही नरक में डूबे हुए वे पापमुक्त हो कर स्वर्ग को चले गए । जिन सगर पुत्रों को यम ने क्रुद्ध होकर पीड़ा पहुँचाई थी, गंगाजल के स्पर्श से वे ही उनके द्वारा पूजे गए । यम ने सगर पुत्रों को पाप मुक्त जानकर उनकी विधिवत् पूजा की और प्रसन्न होकर कहा ॥१०८-१११॥ हे राजपुत्रो ! तुम लोग अब इस घोर दारुण नरक से मुक्त हो गए। इस विमान पर चढ़कर विष्णु- लोक को चले जाओ । महात्मा यम की बातों को सुनकर वे निष्पाप सगर-पुत्र दिव्यरूप धारणकर विष्णुलोक को

१२८ नारदीयपुराणम् एवं प्रभावा सा गङ्गा विष्णुपादाग्रसंभवा । सर्वलोकेषु विख्याता महापातकनाशिनी ॥११४॥ य इदं पुण्यमाख्यानं महापातकनाशनम् । पठेच्च शृणुयाद्वापि गङ्गास्नानफलं लभेत् ॥११५॥ यस्त्वेतत्पुण्यमाख्यानं कथयेद्ब्राह्मणाग्रतः । स याति विष्णुभवनं पुनरावृत्तिवर्जितम् ॥११६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गामाहात्म्ये भगीरथगङ्गानयनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥१६॥ सप्तदशोऽध्यायः ऋषय ऊचुः साधु सूत महाभाग त्वयातिकरुणात्मना । श्रावितं सर्वपापघ्नं गङ्गामाहात्म्यमुत्तमम् ॥१॥ श्रुत्वा तु गङ्गामाहात्म्यं नारदो देवदर्शनः । किं पप्रच्छ पुनः सूत सनकं मुनिसत्तमम् ॥२॥ सूत उवाच शृणुध्वमृषयः सर्वे नारदेन सुरर्षिणा । पृष्टं पुनर्यथा प्राह प्रवक्ष्यामि तथैव तत् ॥३॥ नानाख्यानेतिहासाढ्यं गङ्गामाहात्म्यमुत्तमम् । श्रुत्वा ब्रह्मसुतो भूयः पृष्टवानिदमादरात् ॥४॥ नारद उवाच अहोऽतिधन्यं सुकृतैकसारं श्रुतं मया पुण्यमसंवृतार्थम् गाङ्गेयमाहात्म्यमघप्रणाशि त्वत्तो मुने कारुणिकादभीष्टम् ॥५॥ चले गए। इस प्रकार के प्रभाव वाली और विष्णु चरणों से उत्पन्न होने वाली गंगा सब लोकों में महापातक- नाशिनी नाम से विख्यात हो गई। जो मनुष्य इस महापातकनाशक परमपुण्यप्रद आख्यान को सुनता है अथवा पाठ करता है वह गंगास्नान का फल प्राप्त करता है। जो इस पुण्य आख्यान को ब्राह्मणों को सुनाता है वह मुक्ति धाम विष्णु लोक को चला जाता है। ॥११२-११६॥ श्री बृहन्नारदीयपुराण के पूर्वभाग के प्रथम पाद में गंगामाहात्म्यवर्णन नामक सोलहवां अध्याय समाप्त ॥१६॥ अध्याय १७ उद्यापन सहित शुक्लपक्षीय द्वादशीव्रत-निरूपण ऋषिगण बोले—महाभाग ! धन्य हो, तुमने बड़ी कृपा की जो आज परम उत्तम तथा सब पापों को नष्ट करने वाला यह गंगा माहात्म्य सुना दिया। सूत ! देवदर्शन नारद जी ने गंगा-माहात्म्य सुनने के बाद पुनः मुनि- श्रेष्ठ सनक जी से क्या पूछा इसको अब बतलाओ। ॥१॥ सूतजी बोले—ऋषिगण ! सुनो। देवर्षिनारद ने पुनः जो कुछ पूछा और सनक जी ने जो कुछ उत्तर दिया, उसको पूर्णरूप से कह रहा हूँ। अनेकों इतिहास और आख्यानों से भरे उत्तम गंगा माहात्म्य को सुनकर ब्रह्मपुत्र नारद ने आदर पूर्वक सनक जी से पूछा—॥२-४॥ नारद जी बोले—अहा ! मुने ! आज मैंने परम कृपालु आप से धन्य, सम्पूर्ण सुकृतों का सारभूत, पवित्र,

१२६ सप्तदशोऽध्यायः ये साधवः साधु भजन्ति विष्णुं स्वार्थं परार्थं च यतन्त एव । नानोपदेशैः सुविमुग्धचित्तं प्रबोधयन्ति प्रसभं प्रसन्नम् ॥६॥ ततः समाख्याहि हरेर्व्रतानि कृतैश्च यैः प्रीतिमुपैति विष्णुः । ददाति भक्तिं भजतां दयालुर्मुक्तिस्तु तस्या विदिता हि दासी ॥७॥ ददाति मुक्तिं भजतां मुकुन्दो व्रतार्चनध्यानपरायणानाम् । भक्तानुसेवासु महाप्रयासं विमृश्य कस्यापि न भक्तियोगम् ॥८॥ प्रवृत्तं च निवृत्तं च यत्कर्म हरितोषणम् । तदाख्याहि मुनिश्रेष्ठ विष्णुभक्तोऽसि मानद ॥६॥ सनक उवाच साधु साधु मुनिश्रेष्ठ भक्तस्त्वं पुरुषोत्तमे । भूयो भूयो यतः पृच्छेश्र्चरित्रं शार्ङ्गधन्वनः ॥१०॥ व्रतानि ते प्रवक्ष्यामि लोकोपकृतिमन्ति च । प्रसीदति हरिर्यैस्तु प्रयच्छत्यभयं तथा ॥११॥ यस्य प्रसन्नो भगवान्यज्ञलिङ्गो जनार्दनः । इहामुत्र सुखं तस्य तपोवृद्धिश्च जायते ॥१२॥ येन केनाप्युपायेन हरिपूजापरायणाः । प्रयान्ति परमं स्थानमिति प्राहुर्महर्षयः ॥१३॥ मार्गशीर्षे सिते पक्षे द्वादश्यां जलशायिनम् । उपोषितोऽर्चयेत्सम्यङ् नरः श्रद्धासमन्वितः ॥१४॥ स्नात्वा शुक्लाम्बरधरो दन्तधावनपूर्वकम् । गन्धपुष्पाक्षतैर्धूपैर्दीपेर्नैवेद्यपूर्वकैः ॥१५॥ वाग्यतो भक्तिभावेन मुनिश्रेष्ठार्चयेद्धरिम् । केशवाय नमस्तुभ्यमिति विष्णुं च पूजयेत् ॥१६॥ अष्टोत्तरशतं हुत्वा वह्नौ घृततिलाहुतीः । रात्रौ जागरणं कुर्याच्छाालग्रामसमीपतः ॥१७॥ विशद फल देने वाला, अभीष्ट और पापनाशक गंगा का माहात्म्य सुना इससे कृतार्थ हो गया। जो साधु होते हैं वे विष्णु का अनन्य भाव से भजन करते हैं और अपने स्वार्थ (भक्ति) और परोपकार दोनों की सिद्ध करते हैं, वे अपने मनोहर उपदेशामृत से पामरजनों को भी प्रसन्न कर ज्ञान का ज्योति प्रदान करते हैं। अब इसके बाद भगवान् के उन व्रतों और अनुष्ठानों को कहिए जिससे भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। कृपालु भगवान् भजन करने वालों को अपनी भक्ति प्रदान करते हैं। मुक्ति भक्ति की दासी कही गयी है। मुकुन्द भगवान् व्रत, पूजा और ध्यानोपासना में लीन रहने वाले भक्त जनों को मुक्ति देते हैं। भक्तों की सेवा में महान् प्रयास करना पड़ता है ऐसा सोचकर वे भक्तियोग किसी को नहीं देते। मुनिशिरोमणि ! प्रवृत्त, निवृत्त और जिन कर्मों से भगवान् प्रसन्न होते हैं उन कर्मों को आप बतलाइए, मानद ! आप विष्णु भक्त हैं, आप ही इन बातों को जानते हैं ॥५-९॥ सनकजी बोले-मुनिश्रेष्ठ ! तुम धन्य हो, धन्य हो, तुम पुरुषोत्तम के अनन्य भक्त हो; क्योंकि बार- बार विष्णु के चरित्र को ही तुम पूछ रहे हो। तुमसे लोक के उपकार करनेवाले उन व्रतों को कह रहा हूँ जिनके अनुष्ठान से विष्णु प्रसन्न होते हैं और अभय वर प्रदान करते हैं। जिसके ऊपर यज्ञपुरुष जनार्दन प्रसन्न होते हैं, उसको लोक एवं परलोक में सुख तो मिलेगा ही है, साथ ही उसकी तपस्या भी अक्षय हो जाती है। जिस किसी प्रकार से भगवान् की पूजा में लीन रहने वाले व्यक्ति परम उत्तम लोक को पाते हैं, ऐसा ऋषियों ने कहा है ॥१०-१३॥ अगहन मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी को मनुष्य श्रद्धापूर्वक क्षीरशायी भगवान् की विधिपूर्वक अर्चा करें। पहले दन्तधावन आदि नित्यकर्मों को समाप्त कर स्नान करें और श्वेतवस्त्र धारणकर गंध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य से मौन होकर भक्तिपूर्वक हरि की पूजा करे । केशवाय नमस्तुभ्यम्, (केशव को नमस्कार है) इस मन्त्र से विष्णु की पूजा करनी चाहिए। तदनन्तर घृत और तिल की एक सौ आठ आहुतियाँ अग्नि में देनी चाहिए, रात में शालिग्राम के समीप ही जागरण करना चाहिए और फिर एक पसेरी दूध से निर्विकार १७-नारदीयपुराणम्

१३० नारदीयपुराणम् स्नापयेत्प्रस्थपयसा नारायणमनामयम् । गीतैर्वाद्यैश्च नैवेद्यैर्भक्ष्यभोज्यैश्च केशवम् ॥१७॥ त्रिकालं पूजयेद्भक्त्या महालक्ष्म्या समन्वितम् । पुनः कल्ये समुत्थाय कृत्वा कर्म यथोचितम् ॥१८॥ पूर्ववत्पूजयेद्देवं वाग्यतो नियतः शुचिः । पायसं घृतसंमिश्रं नारिकेरफलान्वितम् ॥२०॥ मन्त्रेणानेन विप्राय दद्याद्भक्त्या सदक्षिणम् । केशवः केशिहा देवः सर्वसंपत्प्रदायकः ॥२१॥ परमान्नप्रदानेन मम स्यादिष्टदायकः । ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाच्छक्तितो बन्धुभिः सह ॥२२॥ नारायणपरो भूत्वा स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः । इति यः कुरुते भक्त्या केशवार्चनमुत्तमम् ॥२३॥ स पौण्डरीकयज्ञस्य फलमष्टगुणं लभेत् । पौषमासे सिते पक्षे द्वादश्यां समुपोषितः ॥२४॥ नमो नारायणायेति पूजयेत्प्रयतो हरिम् । पयसा स्नाप्य नैवेद्यं पायसं च समर्पयेत् ॥२५॥ रात्रौ जागरणं कुर्यात्त्रिकालार्चनतत्परः । धूपैर्दीपैश्च नैवेद्यैर्गन्धैः पुष्पैर्मनोरमैः ॥२६॥ तृणैश्च गीतवाद्याद्यैः स्तोत्रैश्चाप्यर्चयेद्धरिम् । कृशरान्नं च विप्राय दद्यात्सघृतदक्षिणम् ॥२७॥ सर्वात्मा सर्वलोकेशः सर्वव्यापी सनातनः । नारायणः प्रसन्नः स्यात्कृशरान्नप्रदानतः ॥२८॥ मंत्रणानेन विप्राय दत्त्वा वै दानमुत्तमम् । द्विजांश्च भोजयेद्भक्त्या स्वयमद्यात्स बान्धवः ॥२९॥ एवं संपूजयेद्भक्त्या देवं नारायणं प्रभुम् । अग्निष्टो्राष्टकफलं स संपूर्णमवाप्नुयात् ॥३०॥ माघस्य शुक्लद्वादश्यां पूर्ववत्समुपोषितः । नमस्ते माधवायेति हुत्वाष्टौ च घृताहुतीः ॥३१॥ पूर्वमानेन पयसा स्नापयेन्माधवं तदा । पुष्पगन्धाक्षतैरर्चेतसावधानेन चेतसा ॥३२॥ रात्रौ जागरणं कुर्यात्पूर्ववद्भक्तिसंयुतः । कल्पकर्म च निर्वर्त्य माधवं पुनरर्चयेत् ॥३३॥ प्रस्थं तिलानां विप्राय दद्याद्वै मन्त्रपूर्वकम् । सदक्षिणं सवस्त्रं च सर्वपापविमुक्तये ॥३४॥ नारायण का अभिषेक करना चाहिए ॥१४-१७॥ इस प्रकार लक्ष्मी के सहित भगवान् की नैवेद्य और अन्यान्य भोज्यपदार्थों, एवं गीत वाद्य आदि से तीनों काल भक्ति पूर्वक पूजा करनी चाहिए। फिर प्रातःकाल उठकर विधिपूर्वक नित्यकर्मों को समाप्त कर पहले की ही भाँति समय पूर्वक पवित्र भाव से पूजा करे। 'केशव केशिहन्ता और सब प्रकार की सम्पत्ति को देने वाले भगवान् इस मधुर भोजन के दान से प्रसन्न होकर मेरे मनोरथों को पूर्ण करें' इस मन्त्र से दूध, घी और नारिकेल से बने पदार्थों को दक्षिणा सहित ब्राह्मणों को दे । पश्चात् यथा शक्ति ब्राह्मणों को भोजन करावे और स्वयं भाई बन्धुओं के साथ भगवान् का ध्यान करते हुए भोजन करे । इस प्रकार विधिपूर्वक जो केशव की पूजा करता है वह पौण्डरीक यज्ञ का आठगुना फल पाता है ॥१८-२३॥ पूस मास में शुक्ल पक्ष की द्वादशी को निराहार रहकर 'नमो नारायणाय' इस मन्त्र से भक्ति पूर्वक भगवान् को दुग्ध से स्नान कराकर पायस और नैवेद्य अर्पित करे । तीनों काल भगवान् की पूजा में निरत रहकर रात में तो जागरण करे और धूप, दीप, नैवेद्य, गन्ध और मनोहर फूल और पत्तियों से हरि की पूजा करे । पुनः स्तोत्र पाठ और गीत वादन से भगवान् का मनोरंजन करे, ब्राह्मणों को 'सर्वात्मा, सब लोकों के प्रभु, सर्वव्यापक सनातन नारायण इस कृशरान्न (खिचड़ी) के दान से प्रसन्न होवें' इस मन्त्र से घी और दक्षिणा सहित खिचड़ी दे ॥२४-२८॥ शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर पश्चात् स्वयं भाई बन्धुओं के साथ भोजन करे । इस प्रकार भक्ति पूर्वक विधिवत् प्रभुनारायण की पूजा करने से आठ अग्निष्टोम यज्ञ करने का फल मिलता है । माघ शुक्ल द्वादशी को पहले की भाँति निराहार व्रत रहकर 'नमस्ते माधवाय' इस मन्त्र से घी की छह आहुतियां देकर एक पसेरी दूध से माधव को स्नान करावे । पुनः सावधान होकर पुष्प, गंध, अक्षत से भगवान् की पूजा करे और पूर्व की भाँति भक्तिपूर्वक रात में जागरण करे । कल्प-सूत्रानुसार कर्मों को समाप्त कर पुनः माधव की पूजा करे ॥२६-३३॥ साथ ही वस्त्र और दक्षिणा के साथ मन्त्र पढ़ता हुआ हुआ एक पसेरी तिल

१३१] सप्तदशोऽध्यायः माधवः सर्वभूतात्मा सर्वकर्मफलप्रदः । तिलदानेन महता सर्वान्कामान्प्रयच्छतु ॥३५॥ मन्त्रेणानेन विप्राय दत्त्वा भक्तिसमन्वितः । ब्राह्मणान्भोजयेच्छक्त्या संस्मरेन्माधवं प्रभुम् ॥३६॥ एवं यः कुरुते भक्त्या तिलदाने व्रतं मुने । वाजपेयशतस्यासौ संपूर्णं फलमाप्नुयात् ॥३७॥ फाल्गुनस्य सिते पक्षे द्वादश्यां समुपोषितः । गोविन्दाय नमस्तुभ्यमिति संपूजयेद्व्रती ॥३८॥ अष्टोत्तरशतं हुत्वा घृतमिश्रतिलाहुतीः । पूर्वमानेन पयसा गोविन्दं स्नापयेच्छुचिः ॥३६॥ रात्रौ जागरणं कुर्यात्त्रिकालं पूजयेत्तथा । प्रातःकृत्यं समाप्याथ गोविन्दं पूजयेत्पुनः ॥४०॥ व्रीह्याढकं च विप्राय दद्याद्वस्त्रं सदक्षिणम् । नमो गोविन्द सर्वेश गोपिकाजनवल्लभ ॥४१॥ अनेन धान्यदानेन प्रीतो भव जगद्गुरो । एवं कृत्वा व्रतं सम्यक् सर्वपापविवर्जितः ॥४२॥ गोमेदमखजं पुण्यं सम्पूर्णं लभते नरः । चैत्रमासे सिते पक्षे द्वादश्यां समुपोषितः ॥४३॥ नमोऽस्तु विष्णवे तुभ्यमिति पूर्ववदर्चयेत् । क्षीरेण स्नापयेद्विष्णुं पूर्वमानेन भक्तितः ॥४४॥ तथैव स्नापयेद्विप्र घृतप्रस्थेन सादरम् । कृत्वा जागरणं रात्रौ पूजयेत्पूर्ववद्व्रती ॥४५॥ ततः कल्ये समुत्थाय प्रातःकृत्यं समाप्य च । अष्टोत्तरशतं हुत्वा मध्वाज्यतिलमिश्रितम् ॥४६॥ सदक्षिणं च विप्राय दद्याद्वै तण्डुलाढकम् । प्राणरूपी महाविष्णुः प्राणदः सर्ववल्लभः ॥४७॥ तण्डुलाढकदानेन प्रीयतां मे जनार्दनः । एवं कृत्वा नरो भक्त्या सर्वपापविवर्जितः ॥४८॥ अत्यग्निष्टोमयज्ञस्य फलमष्टगुणं लभेत् । वैशाखशुक्लद्वादश्यामुपोष्य मधुसूदनम् ॥४६॥ द्रोणक्षीरेण देवेशं स्नापयेद्भक्तिसंयुतः । जागरं तत्र कर्त्तव्यं त्रिकालाचंनसयुतम् ॥५०॥ अपने सब पापों से मुक्त होने के लिए ब्राह्मण को दे। माधव सब पदार्थों में व्यापक और सब कर्मों के फल को देने वाले हैं। वे इस मन्त्रवाक्य से भक्ति पूर्वक ब्राह्मण को तिलदान देकर प्रभु माधव का स्मरण करता हुआ यथा शक्ति ब्राह्मणों को खिलावे ॥३४-३६॥ मुनिनारद ! इस प्रकार भक्ति पूर्वक जो व्यक्ति तिलदान से भगवान् को संतुष्ट करता है, वह सौ वाजपेय यज्ञों का फल पाता है। फागुन मास की शुक्ल-पक्ष-द्वादशी को निराहार रहकर व्रती 'गोविन्दाय नमस्तुभ्यम्' इस मन्त्र से घी मिले तिल को एक सौ आठ आहुतियाँ देकर एक पसेरी दूध से गोविन्द को स्नान करावे। तीनों काल विधिवत् पूजा कर रात में जागरण करे। प्रातःकालीन पूजा समाप्त हो जाने पर उसी प्रकार शेष दोनों समय गोविन्द की पूजा करे और वस्त्र दक्षिणा सहित 'गोविन्द ! सर्वेश ! गोपिकाजनबल्लभ ! आपको नमस्कार है। जगद्गुरु ! धान्य दान से प्रसन्न होइए' इस वाक्य से एक आढक धान विप्र को दे। इस प्रकार विधि पूर्वक व्रत को करने से मनुष्य अपने सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर गोमेधयज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥३७-४३॥ चैत महीने में शुक्लपक्ष-द्वादशी के दिन निराहार व्रत रहकर यथाशक्ति पूर्वोक्त विधि से 'नमोस्तु विष्णवे तुभ्यम्' इस मन्त्र से दूध से विष्णु को स्नान करावे। विप्र ! फिर आदर पूर्वक एक पसेरी घी से स्नान कराकर रात भर जागरण कर पूर्वोक्त विधि से ही पूजा करे। तदनन्तर प्रातःकाल उठकर प्रातःकालीन क्रिया समाप्त करने के बाद मधु, घी और तिल से एक सौ आठ बार आहुति दे। 'महाविष्णु प्राणरूप, प्राणदाता और सब के स्वामी भगवान् जनार्दन मेरे इस एक आढक चावल के दान से प्रसन्न हों, इस वाक्य से ब्राह्मण को दक्षिणा में एक आढक चावल भी दे ॥४४-४७॥ इस प्रकार व्रत करने से मनुष्य अपने सब पापों से युक्त होकर अग्निष्टोम यज्ञ का अठगुना फल पाता है। वैशाख-शुक्ल-द्वादशी के दिन निराहार रहकर देवेश मधुसूदन को एक द्रोण दूध से स्नान करावे, तीनों काल विधिपूर्वक भगवान् की पूजाकर रात्रि में जागरण भी करे और 'नमस्ते मधु हन्चे' (मधु हन्ता को नमस्कार है) इस मन्त्र से घी की एक सौ आठ आहुतियां दे। इस प्रकार

१३२ : नारदीयपुराणम् नमस्ते मधुहन्त्रे च जुहुयाच्छक्तितो घृतम् । अष्टोत्तरशतं प्राच्र्यं विधिवन्मधुसूदनम् ॥५१॥ विपापो ह्याश्वमेधानांमष्टानां फलमाप्नुयात् । ज्येष्ठमासे सिते पक्षे द्वादश्यामुपवासकृत् ॥५२॥ क्षीरेणाढकमानेन स्नापयेत्त्रिविक्रमम् । नमस्त्रिविक्रमायेति पूजयेद्भक्तिसंयतः ॥५३॥ जुहुयात्पायसेनेव ह्यष्टोत्तरशताहुतीः । कृत्वा जागरणं रात्रौ पुनः पूजां प्रकल्पयेत् ॥५४॥ अपूपविंशतिं दत्त्वा ब्राह्मणाय सदक्षिणाम् । देवदेव जगन्नाथ प्रसीद परमेश्वरः ॥५५॥ उपायेन च संगृह्य समाभीष्टप्रदो भव । ब्राह्मणांन्भोजयेच्छक्त्या स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः ॥५६॥ एवं यः कुरुते विप्र व्रतं त्रैविक्रमं परम् । सोऽष्टानां नरमेधानां विपापः फलमाप्नुयात् ॥५७॥ आषाढशुक्लद्वादश्यामुपवासो जितेन्द्रियः । वामनं पूर्वमानेन स्नापयेत्पयसा व्रती ॥५८॥ नमस्ते वामनायेति दूर्वाज्याष्टोत्तरं शतम् । हुत्वा च जागरं कुर्याद्वामनं चार्चयेत्पुनः ॥५९॥ सदक्षिणं च दध्यन्नं नालिकेरफलान्वितम् । भक्त्या प्रदद्याद्विप्राय वामनार्चनशीलिने ॥६०॥ वामनो बुद्धिदो होता द्रव्यस्थो वामनः सदा । वामनस्तारकोऽस्माच्च वामनाय नमो नमः ॥६१॥ अनेन दत्त्वा दध्यन्नं शक्तितो भोजयेद्विजान् । कृत्वैवमग्निष्टोमानां शतस्य फलमाप्नुयात् ॥६२॥ श्रावणस्य सिते पक्षे द्वादश्यामुपवासकृत् । क्षीरेण मधुमिश्रेण स्नापयेच्छ्रीधरं व्रती ॥६३॥ नमोऽस्तु श्रीधरायेति गन्धाद्यैः पूजयेत्क्रमात् । जुहुयात्पृषदाज्येन शतमष्टोत्तरं मुने ॥६४॥ कृत्वा च जागरं रात्रौ पुनः पूजां प्रकल्पयेत् । दातव्यं चैव विप्राय क्षीराढकमनुत्तमम् ॥६५॥ दक्षिणां च सवस्त्रां वै प्रदद्याद्धेमकुण्डले । मन्त्रेणानेन विप्रेन्द्र सर्वकामार्थसिद्धये ॥६६॥

भक्ति पूर्वक मधुसूदन को पूजा करने से मनुष्य पाप मुक्त होकर आठ अश्वमेध का फल प्राप्त करता है ॥४८-५१॥ जेठ मास की शुक्लपक्ष द्वादशी के दिन निराहार रहकर एक आढ़क दूध से भगवान् त्रिविक्रम को 'नमः त्रिविक्रमाय' इस मन्त्र से भक्ति पूर्वक पूजा करे और खीर की एक सौ आठ आहुतियां भी दे । रात्रि में जागरण कर पुनः सविधि पूजा कर 'देवदेव ! जगन्नाथ ! प्रसन्न होइए परमेश्वर ! इस उपहार से आप प्रसन्न होकर मेरे अभीष्ट फल को प्रदान कीजिए' इस वाक्य से बीस पूए ब्राह्मणों को दक्षिणा के साथ दे । स्वयं शक्ति के अनु- सार ब्राह्मण को भोजन कराकर मौन हो स्वयं भी भोजन करे । विप्र ! जो इस प्रकार त्रिविक्रम का परमोत्तम व्रत करता है वह निष्पाप होकर आठ नरमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥५२-५७॥ आषाढ़ शुक्ल द्वादशी के दिन जो जितेन्द्रिय व्रती निराहार रहकर एक द्रोण या एक आढ़क दूध से भगवान् वामन को स्नान कराता है और 'नमस्ते वामनाय' इस मन्त्र से दूब एवं घी की एक सौ आठ आहुतियां देकर रात भर जागरण करता है, फिर दक्षिणा, दही, अन्न और नारियल आदि से भगवान् की पूजाकर वामन के भक्त किसी ब्राह्मण को 'भगवान् वामन बुद्धि देने वाले, होता, सर्वदा सब द्रव्यों में रहने वाले और इस संसार-सागर से पार लगाने वाले हैं, ऐसे पूज्य वामन को नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है। इस वाक्य से यथाशक्ति दही मिला अन्नदान करता है वह इस प्रकार व्रत करने से हो अग्निष्टोम यज्ञ के समान फल पा जाता है ॥५८-६२॥ व्रती सावन की शुक्ल- पक्ष वाली द्वादशी को निराहार रहकर मधुमिश्रित दूध से भगवान् श्रीधर को स्नान करावे । 'नमस्ते श्रीधराय' इस मन्त्र से गन्ध आदि पूजन सामग्री से क्रमशः पूजन करे । मुने ! घी से एक सौ आठ बार हवन करने के अनन्तर रात भर जागरण करे और फिर पूजा करे । अपने सब मनोरथों को सिद्धि के लिए किसी ब्राह्मण को एक आढ़क शुद्ध दूध, वस्त्र, दक्षिणा और दो सुवर्ण के कुण्डल देने चाहिए । विप्रेन्द्र, दूध दान करते समय यह वाक्य पढ़ना चाहिए "क्षीरसागरशायी ! देवेश ! रमाकान्त ! जगत्पते ! इस क्षीर दान से आप प्रसन्न हों और सब