भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

षष्ठ षष्ठोऽध्यायः १०३ अथ शिरःशोषणं च मरुत्प्रपतनं तथा। तथा पाषाणवर्षं च कृमिभोजनमेव च ॥८॥ क्षारोदपानं भ्रमणं तथा क्रकचदारणम्। पुरीषलेपनं चैव पुरीषस्य च भोजनम् ॥६॥ रेतः पानं महाघोरं सर्वसन्धिषु दाहनम् । धूमपानं पाशबन्धं ज्ञाना शूलानुलेपनम् ॥१०॥ अङ्गारशयनं चैव तथा मुसलमर्दनम् । बहूनि काष्ठयन्त्राणि कषणं छेदनं तथा ॥११॥ पतनोत्पतनं चैव गदादण्डादिपीडनम् । गजदन्तप्रहरणं नानासपैश्च दंशनम् ॥१२॥ शीताम्बुसेचनं चैव नासायां च मुखे तथा । घोरक्षाराम्बुपानं च तथा लवणभक्षणम् ॥१३॥ स्नायुच्छेदं स्नायुबन्धमस्थिच्छेदं तथैव च। क्षाराम्बुपूर्णरन्ध्राणां प्रवेशं मांसभोजनम् ॥१४॥ पित्तपानं महाघोरं तथैव श्लेष्मभोजनम् । वृक्षात्प्रापातनं चैव जलान्तर्मज्जनं तथा ॥१५॥ पाषाणधारणं चैव शयनं कण्टकोपरि । पिपीलिकादंशनं च वृश्चिकैश्चापि पीडनम् ॥१६॥ व्याघ्रपीडा शिवापीडा तथा महिषपीडनम् । कदर्द्मे शयनं चैव दुर्गन्धपरिपूरणम् ॥१७॥ बहुशश्चार्द्धशयनं महातिक्तनिषेवणम् । अत्युष्णतैलपानं च महाकटुनिषेवणम् ॥१८॥ कषायोदकपानं च तप्तपाषाणतक्षणम् । अत्युष्णशीतस्नानं च तथा दशनशीर्णनम् ॥१९॥ तप्तायः शयनं चैव ह्ययोभारस्य बन्धनम् । एवमाद्या महाभाग यातना कोटिकोटिशः ॥२०॥ अपि वर्षसहस्रेण नाहं निगदितुं क्षमः । एतेषु यस्य यत्प्राप्तं पापिनः क्षितिरक्षक ॥२१॥ तत्सर्वं संप्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु । ब्रह्महा च सुरापी च स्तेयो च गुरुतल्पगः ॥२२॥ महापातकिनस्त्वेते तत्संगी च पञ्चमः । पंक्तिभेदी वृथापाकी नित्यं ब्राह्मणदूषकः ॥२३॥ आदेशी वेदविक्रेता पञ्चैते ब्रह्मघातकाः । ब्राह्मणं यः समाहूय दास्यामीति धनादिकम् ॥ पश्चान्नास्तीति यो ब्रूयात्तमाहुर्ब्रह्मघातिनम् ॥२४॥

पत्थरवर्ष, कृमिभोजन, क्षारोदपान, भ्रमण, क्रकचदारण, पुरीषलेपन, पुरीषभोजन, रेतः (वीर्य) पान, महाघोर सब सन्धियों (जोड़ों) में दाहन, धूमपान, पाशबन्ध, नाना शूलानुलेपन, ॥६-१०॥ अंगारशयन, मुसलमर्दन, बहुत से काठ के बने यन्त्रों में दबाना और काटना, पतनोत्पतन, गदा, दण्ड आदि से पीड़ित करना, गजदन्तप्रहरण, नानासपर्दंशन (अनेक सापों से कटवाना) नाक में और मुंह में शीतल जल छोड़ना, अतिकड़वा जल पिलाना, नमक खिलाना स्नायुओं को काटना, स्नायुबन्ध, अस्थिच्छेदन, खारे जल से भरी नालियों में घुसाना, मांस खिलाना, पित्त पिलाना, महाघोर श्लेष्मभोजन, ऊंचे वृक्ष से गिराना, जल में डुबाना, शिला से दबाना, कांटे पर सुलाना, चींटियों से कटाना, बिच्छू से डंसवाना, बाघ और सियारों से नुचवाना, भैंसे से दबवाना, कीचड़ में सुलाना, दुर्गन्ध से भरे स्थान में बन्द करना ॥११-१७॥ अति तिक्त पदार्थों को खिलाना, देर तक मुर्गा बनाना, खौलता तैल पिलाना, अति कटु पदार्थों को खिलाना, कसैला जल पिलाना, जलते पत्थरों को कटवाना, अत्यन्त खौलते और अत्यन्त शीतल जल से नहलाना, दांतों को तोड़ देना, जलते लोहे पर सुलाना और जलते लोहे के भार में बांधना ॥१८-१६॥ महाभाग ! ऐसी अनेक करोड़ों यातनायें हैं, जिनको हजारों वर्षों में भी मैं नहीं कह सकता । भूमिरक्षक ! जो पापी जिन नरकों में जाते हैं, उनको कह रहा हूँ, सुनो । ब्रह्महत्या करने वाला, शराबी, सुवर्ण चुराने वाला और गुरुपत्नीगामी ये महापापी हैं। पाँचवां महापापी इन चारों प्रकार के महापापियों के निकट रहने वाला भी है । पंक्ति भेद करने वाला (एक पंक्ति में बैठाकर भिन्न-भिन्न प्रकार का भोजन देने वाला), अमेध्य पदार्थ पकाने वाला, सर्वदा ब्राह्मणों की निन्दा करने वाला, ब्राह्मणों को आज्ञा देने वाला, वेद विक्रेता ये पाँच ब्रह्मघातक हैं । जो पहले ब्राह्मणों को धन देने के लिए बुलावे और पीछे 'मेरे पास नहीं है' ऐसा कहकर लौटा दे, उसको भी ब्रह्मघाती कहा जाता है ॥२०-२४॥ जो स्नान या पूजा के लिए जावे