बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०८ नारदीयपुराणम् देवतानां पितॄणां च जलं दद्याज्जलाञ्जलीन् । असंस्कृतप्रमीतानां स्थले दद्याद्विचक्षणः ॥६३॥ श्राद्धे हवनकाले च दद्यादेकेन पाणिना । उभाभ्यां तर्पणे दद्यादेष धर्मो व्यवस्थितः ॥६४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे धर्मशान्तिनिर्देशो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥ पञ्चदशोऽध्यायः धर्मराज उवाच पापभेदान्प्रवक्ष्यामि यथा स्थूलाश्च यातनाः । शृणुष्व धैर्यमास्थाय रौद्रा ये नरका यतः ॥१॥ पापिनो ये दुरात्मानो नरकाग्निषु सन्ततम् । पच्यन्ते येषु तान्वक्ष्ये भयंकरफलप्रदान् ॥२॥ तपनो बालुकाकुम्भो महारौरवरौरवौ । कुम्भीपाको निरुच्छ्वासः कालसूत्रः प्रमर्दनः ॥३॥ असिपत्रवनं घोरं लालाभक्षो हिमोत्कटः । मूषावस्था वसाकूपस्तथा वैतरणी नदी ॥४॥ भक्ष्यन्ते मूत्रपानं च पुरीषह्रद एव च । तप्तशूलं तप्तशिला शाल्मलीद्रुम एव च ॥५॥ तथा शोणितकूपश्च घोरः शोणितभोजनः । श्वमांसभोजनं चैव वह्निज्वालानिवेशनम् ॥६॥ शिलावृष्टिः शस्त्रवृष्टिर्वह्निवृष्टिस्तथैव च । क्षारोदकं चोष्णतोयं तप्तायः पिण्डभक्षणम् ॥७॥ सर्वदा पवित्र होता है। पात्र में रखा हुआ और पृथ्वीतल का, सरोवर, तड़ाग आदि का जल सर्वदा पवित्र रहता है। देवता और पितरों को जलांजलि देनी चाहिए। संस्कार तथा प्रमाण से हीन व्यक्तियों के लिए भूमि पर जल छोड़ना चाहिए। श्राद्ध और हवनकाल में एक हाथ से जल देना चाहिए और तर्पण में दोनों हाथ से जल देना चाहिए ॥६०-६४॥ श्रीनारदीयपुराण के धर्मशान्तिनिर्देश नामक चौदहवां अध्याय समाप्त ॥१४॥ अध्याय १५ नरकयातना तथा गंगानयनवर्णन धर्मराज बोले—हे राजन् ! अब पापों के भेद और तदनुकूल घोर नरकों की यातनाओं को बता रहा हूँ, धैर्यपूर्वक सुनो ! क्योंकि नरक अत्यन्त भयङ्कर होते हैं। जो दुरात्मा पापी जन हैं वे सदा जिन नरकों की ज्वाला में जलते रहते हैं, उन भयङ्कर फल देने वाले नरकों का वर्णन कर रहा हूँ ॥१-२॥ तपन, बालुकाकुम्भ, महारौरव, रौरव, कुम्भीपाक, निरुच्छ्वास (?) कालसूत्र, प्रमर्दन, घोर असिपत्रवन, लालाभक्ष, हिमोत्कट, मूषावस्था, वसा- कूप और वैतरणी नदी ये कुछ नरकों के नाम हैं। पुरीषह्रद (विष्ठा के तालाब) में मूत्रपान और विष्ठा का भक्षण करना पड़ता है। तप्तशूल, तप्तशिला (जलती हुई चट्टानों का नरक) शाल्मलीद्रुम ॥३-५॥ शोणितकूप (रक्त का कुँआ), घोर शोणितभोजन, श्वमांसभोजन (कुत्ते का मांस खाना), वह्निज्वालानिवेशन, शिलावृष्टि, शस्त्र- वृष्टि, वह्निवृष्टि, क्षारोदक (खारा जल), उष्णतोय (गरम जल), तप्तायःपिण्डभक्षण¹, शिरःशोषण, मरुत्प्रपतन, १. जलते लोहे का गोला खाना ।