बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 126, कुल 1008 में से
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चतुर्दशोऽध्यायः १०७ वर्षे वर्षे तु कुर्वीत मातापित्रोस्तु सत्कृतिम् । अदेवं भोजयेच्छ्राद्धं पिण्डमेकं तु निर्वपेत् ॥७८॥ नित्यं नैमित्तिकं काम्यं वृद्धिश्राद्धमथापरम् । पार्वणं चेति विज्ञेयं श्राद्धं पञ्चविधं बुधैः ॥७६॥ ग्रहोपरागे संक्रान्तौ पर्वोत्सवेमहालये । निर्वपेत्त्रीन्नरः पिण्डानेकमेव मृतेऽहनि ॥८०॥ अनूढा न पृथक्कन्या पिण्डे गोत्रे च सूतके । पाणिग्रहणमन्त्राभ्यां स्वगोत्राद्भ्रश्यते ततः ॥८१॥ येन येन तु वर्णेन या कन्या परिणीयते । तत्समं सूतकं याति तथा पिण्डोदकेऽपि च ॥८२॥ विवाहे चैव संवृत्ते चतुर्थेऽहनि रात्रिषु । एकत्वं सा व्रजेद्भर्तुः पिण्डे गोत्रे च सूतके ॥८३॥ प्रथमेऽह्नि द्वितीये वा तृतीये वा चतुर्थके । अस्थिसंचयनं कार्यं बन्धुभिर्हितबुद्धिभिः ॥८४॥ चतुर्थे पञ्चमे चैव सप्तमे नवमे तथा । अस्थिसंचयनं प्रोक्तं वर्णानामनुपूर्वशः ॥८५॥ एकादशाहे प्रेतस्य यस्य चोत्सृज्यते वृषः । मुच्यते प्रेतलोकात्स स्वर्गलोके महीयते ॥८६॥ नाभिमात्रे जले स्थित्वा हृदयेन तु चिन्तयेत् । आगच्छन्तु मे पितरो गृह्णन्त्वेताञ्जलाञ्जलीन् ॥८७॥ हस्तौ कृत्वा तु संयुक्तौ पूरयित्वा जलेन च । गोशृङ्गमात्रमुद्धृत्य जलमध्ये विनिःक्षिपेत् ॥८८॥ आकाशे च क्षिपेद्वारि वारिस्थो दक्षिणामुखः । पितॄणां स्थानमाकाशं दक्षिणादिक् तथैव च ॥८६॥ आपो देवगणाः प्रोक्ता आपः पितृगणास्तथा । तस्मादस्य जलं देयं पितॄणां हितमिच्छता ॥६०॥ दिवा सूर्याशुसंतप्तं रात्रौ नक्षत्रमाहतैः । मध्ययोरप्युभाभ्यां च पवित्रं सर्वदा जलम् ॥६१॥ स्वभावयुक्तमव्यक्तममेध्येन सदा शुचिः । भाण्डस्थं धरणीस्थं वा पवित्रं सर्वदा जलम् ॥६२॥
खिलाना चाहिए और श्राद्ध में उन लोगों के निमित्त एक पिण्ड देना चाहिए । नित्य-नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि और पार्वण ये पाँच श्राद्ध पंडितों ने बतलाये हैं ॥७७-७६॥ ग्रहण, संक्रान्ति, पर्वोत्सव, और महालय (पितृ- पक्ष) में मनुष्य मृत्युदिन को तीन पिण्ड तीनों के निमित्त दे । अविवाहित कन्या पिण्डकर्म, गोत्र और सूतक नादि में पृथक् नहीं समझी जाती, जब पाणिग्रहण के मन्त्र पढ़े जाते तभी वह गोत्र से पृथक् होकर पति-गोत्र की हो जाती है । जो कन्या जिस वर्ण के पति से ब्याही जाती है उसी पति के गोत्रानुकूल सूतक और श्राद्ध- क्रिया होती है । विवाह हो जाने पर चौथे दिन के रात्रि से वह पति के गोत्रानुसार सूतक, पिण्ड और गोत्र में एक हो जाती है । मरने के पश्चात् पहले, दूसरे, तीसरे ओर चौथे दिन में मृतक को हितदृष्टि से बन्धुओं को मृतक के लिए अस्थिसंचयन कर्म करना चाहिए ॥८०-८४॥ वर्णों के क्रमानुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय क्रम से चौथे, पाँचवें, सातवें और नवें दिन अस्थि-संचयन करना करना चाहिए । एकादशाह के दिन जिस के निमित्त 'वृषोत्सर्ग'१ किया जाता वह शीघ्र यमलोक से छूट कर स्वर्गलोक में आदरपूर्वक चला जाता है। नाभि पर्यन्त गहरे जल में जाकर हृदय से प्रेत के स्मरण करने के पश्चात् 'आगच्छन्तु मे पितरो गृह्णन्त्वेताञ्जलाञ्जलीन्, 'मेरे पितर आओ इस जलांजलि को ग्रहण करो' इस मन्त्र से अञ्जलि बांधकर उसको जल से पूर्णकर गौ के सींग की ऊँचाई से जल में छोड़ दे । जल में रहकर ही दक्षिण को ओर मुंह कर आकाश में जल छोड़ना चाहिए क्योंकि पितरों का स्थान आकाश है और दक्षिण दिशा पितरों की दिशा है ॥८५-८६॥ जल देवगण है और जल को ही पितृगण कहा गया है, अतएव पितरों का हितेच्छु, मनुष्य पितृहित के लिए जल दे। दिन में सूर्य को किरणों से तपने के कारण और रात्रि में नक्षत्र और और वायु के स्पर्श से, संध्याकाल में सूर्य-चन्द्रमा दोनों के स्पर्श से जल सर्वदा पवित्र रहता है। प्राकृतिक अव्यक्त जल
१. श्राद्ध में त्रिशूल और चक्र से चिह्नित करके वृषभ छोड़ा जाता है इसी से वृषोत्सर्ग कहते हैं ।