बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 125, कुल 1008 में से
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१०६ नारदीयपुराणम् वृष्टे रश्मिभिस्तेषामुदकस्नानमाचरेत् । याश्चान्तर्जल्वल्मीकमूषिकोखरवर्त्मसु ॥६३॥ श्मशाने शौचशेषे च न ग्राह्याः सप्त मृत्तिकाः । इष्टापूर्तं तु कर्तव्यं ब्राह्मणेन प्रयत्नतः ॥६४॥ इष्टेन लभते स्वर्गं मोक्षं पूर्तेन चाप्नुयात् । वित्तक्षेपो भवेदिष्टं तडागं पूर्तमुच्यते ॥६५॥ आरामश्च विशेषेण देवद्रोण्यस्तथैव च । वापीकूपतडागानि देवतायतनानि च ॥६६॥ पतितान्युद्धरेद्यस्तु स पूर्वफलमश्नुते । शुक्लाया आहरेन्मूत्रं कृष्णाया गोः शकृत्तथा ॥६७॥ ताम्रायाश्च पयो ग्राह्यं श्वेतायाश्च दधि स्मृतम् । कपिलाया घृतं ग्राह्यं महापातकनाशनम् ॥६८॥ कुशैस्तीर्थनदीतोयैः सर्वद्रव्यं पृथक् पृथक् । आहत्य प्रणवेनैव उत्थाप्यं प्रणवेन च ॥६६॥ प्रणवेन समालोड्य प्रणवेनैव संपिबेत् । पालाशे मध्यमे पर्णभाण्डे ताम्रमये शुभे ॥७०॥ पिबेत्पुष्करपर्णे वा मृन्मये वा कुशोदकम् । सूतके तु समुत्पन्ने द्वितीये समुपस्थिते ॥७१॥ द्वितीये नास्ति दोषस्तु प्रथमेनैव शुध्यति । जातेन शुध्यते जातं मृतेन मृतकं तथा ॥७२॥ गर्भसंलवणे मासे त्रीण्यहानि विनिर्देशेत् ॥७३॥ रात्रिभिर्मासतुल्याभिर्गर्भस्रावे विशुद्ध्यति । रजस्युपरते साध्वी स्नानेन स्त्री रजस्वला ॥७४॥ स्वगोत्राद्भ्रश्यते नारी विवाहात्सप्तमे पदे । स्वामिगोत्रेण कर्त्तव्यास्तस्याः पिण्डोदकक्रियाः ॥७५॥ उद्देशयं पिण्डदाने स्यात्पिण्डे पिण्डे द्विनामतः । षण्णां देयास्त्रयः पिण्डा एवं दाता न मुह्यति ॥७६॥ स्वेन भर्त्रा सहस्राब्दं माता भुक्ता सुदैवतम् । पितामह्यपि स्वेनैव स्वेनैव प्रपितामही ॥७७॥ हैं उनकी किरणों से अशुद्ध अवस्था में स्पर्श हो जाने पर जल से स्नान करना चाहिए। जल के भीतर की मिट्टी, वल्मीक (दीमकों का घर), चूहे के बिल की मिट्टी, ऊसर भूमि, मार्ग, श्मशान और शौच के लिए ली हुई मिट्टी इन सात प्रकार की मिट्टियों को उपयोग में नहीं लाना चाहिए। ब्राह्मण को यत्नपूर्वक इष्ट और पूर्त कार्य करना चाहिए। इष्ट से स्वर्ग प्राप्त होता है और पूर्त कर्म से मोक्ष मिलता है। धन से सम्पन्न किये जाने वाले यज्ञ, आतिथ्य आदि इष्ट कर्म और तड़ाग आदि बनवाना पूर्तक हा जाता है ॥६०-६५॥ आराम (वाटिका), देवद्रोणी, वावली, कुएं, तड़ाग और देव-मन्दिरों का पुनरुद्धार करने से पूर्व-वर्णित फल प्राप्त होते हैं। पञ्चगव्य को विधि बता रहे हैं—शुक्ल गौ का मूत्र, कृष्णा गो का गोबर, लाल गौ का दूध-धवल गौ का दधि और कपिला गौ का घृत लेना चाहिए। ये महापापों के नाशक हैं। कुश, तीर्थ और नदी के जल से इन सब द्रव्यों को पृथक्-पृथक् 'ओंकार' उच्चारण कर के ले आना चाहिए ॥६६-६६॥ उनको प्रणवोच्चारण से हो एक में मिलाना चाहिए और प्रणव उच्चारण पूर्वक ही उसको पी जाना चाहिए। पलाश के मध्य के पत्ते में, स्वच्छ तांबे के वर्तन, कमल-पत्र अथवा मिट्टी के पात्र में कुशोदक पीना चाहिए। एक सूतक के आ जाने पर यदि बीच में दूसरा भी सूतक आ जाय तो दूसरे के लिए पृथक् शुद्धि नहीं प्रत्युत पहले से ही दोष-शान्ति हो जाती है। प्रथम जनन शौच से द्वितीय जनन शौच और प्रथम मृत शौच से द्वितीय की भी शुद्धि हो जाती है ॥७०-७२॥ जिस मास में गर्भस्राव हो तो गर्भस्राव के पश्चात् तीन दिन तक दोष रहता है, मास के अनु- कूल अर्थात् जितने मास के गर्भ होने के अनन्तर गर्भस्राव हो उतनी रात्रि तक दोष रहता है। तदनन्तर वह शुद्ध हो जाती है। रजस्वला स्त्री रजस्राव के अनन्तर स्नान करने से शुद्ध हो जाती है। विवाह के समय सप्तपदी हो जाने से स्त्री अपने गोत्र से च्युत हो जाती है, अतः पति के गोत्र से ही स्त्री का श्राद्ध करना चाहिए, प्रत्येक पिण्ड में दो नामों का निर्देश करना चाहिए। छह को तीन पिण्ड देना चाहिए, ऐसा करने से भी दाता को कोई दोष नहीं लगता ॥७३-७६॥ माता अपने पति के साथ सहस्र वर्षों तक स्वर्ग सुख भोगती है। इसी प्रकार दादी (पितामही) और प्रपितामही (परदादी) भी अपने अपने पति के साथ स्वर्ग में निवास करती हैं। अतः वर्ष-वर्ष में माता-पिता का श्राद्ध करना चाहिए। श्राद्ध में ज्योतिषी को नहीं