बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशोऽध्यायः १०५ दीयमाने विपत्तिः स्यात्प्रायश्चित्तं तदा नहि। तैलभेषजपाने च भेषजानां च भक्षणे ॥४७॥ निश्शल्यकरणे चैव प्रायश्चित्तं न विद्यते। वत्सानां कण्ठबन्धेन क्रियया भेषजेन तु ॥४८॥ सायं संगोपनार्थं च त्वदोषो रोधबन्धयोः। पादे चैवास्य रोमाणि द्विपादे श्मश्रु केवलम् ॥४९॥ त्रिपादे तु शिखावज्रं मूले सर्वं समाचरेत्। सर्वान्केशान्समुद्धृत्य छेदयेदङ्गुलद्वयम् ॥५०॥ एवमेव तु नारीणां मुण्डनं शिरसः स्मृतम्। न स्त्रिया वपनं कार्यं न च वीरासनं स्मृतम् ॥५१॥ न च गोष्ठे निवासोऽस्ति न गच्छन्तीमनुव्रजेत्। राजा वा राजपुत्रो वा ब्राह्मणो वा बहुश्रुतः ॥५२॥ अकृत्वा वपनं तेषां प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत्। केशानां रक्षणार्थं च द्विगुणं व्रतमादिशेत् ॥५३॥ द्विगुणे तु व्रते चीर्णे द्विगुणा व्रतदक्षिणा ॥५४॥ पापं न क्षीयते हन्तुर्दाता च नरकं व्रजेत्। अश्रौतस्मार्तविहितं प्रायश्चित्तं वदन्ति ये ॥५५॥ तान्धर्मविघ्नकर्तृंश्च राजा दण्डेन पीडयेत्। न चैतान्पीडयेद्राजा कथंचित्काममोहितः ॥५६॥ तत्पापं शतधा भूत्वा तमेव परिसर्पति। प्रायश्चित्ते ततश्चीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ॥५७॥ विंशतिर्गा वृषं चैकं दद्यात्तेषां च दक्षिणम्। क्रिमिभिस्तृणसंभूतैर्मक्षिकादिनिपातितैः ॥५८॥ कृच्छ्राद्धं स प्रकुर्वीत शक्त्या दद्याच्च दक्षिणाम्। प्रायश्चित्तं च कृत्वा वै भोजयित्वा द्विजोत्तमान् ॥५९॥ सुवर्णमानिकं दद्यात्ततः शुद्धिर्विधीयते। चाण्डालश्वपचैः स्पृष्टे निशि स्नानं विधीयते ॥६०॥ न वसेत्तत्र रात्रौ तु सद्यः स्नानेन शुद्ध्यति। वसेदथ यदां रात्रावज्ञानादविचक्षणः ॥६१॥ तदा तस्य तु तत्पापं शतधा परिवर्त्तते। उदग्गच्छन्ति च नक्षत्राण्युपरिष्टाच्च ये ग्रहाः ॥६२॥ लिए प्रायश्चित्त नहीं कहा गया है। गाय के शरीर से काँटे आदि निकालने में भी प्रायश्चित्त नहीं है ॥४५-४७३॥ बछड़ों के गले में रस्सी बाँधने, ओषधि पिलाने तथा सायंकाल सुरक्षा के लिए उन्हें बाँधने या उन पर क्रोध करने में भी कोई दोष नहीं है। एकपाद प्रायश्चित्त में कुछ रोम कटावे, द्विपाद प्रायश्चित्त में केवल दाढ़ी-मूंछ कटावे, त्रिपाद प्रायश्चित्त में शिखा छोड़कर मुंडन करावे और पूर्ण प्रायश्चित्त में यथोक्त सब विधियों का पालन करे। सभी केशों को पकड़कर दो अंगुल परिमाण में कटा दे। इसी प्रकार नारियों के सिर का मुंडन भी करावे अर्थात् उनके दो अंगुल बालों को कटावे। क्योंकि स्त्रियों के लिए केश- वपन और वीरासन वर्जित हैं। स्त्री गोष्ठ में निवास न करे तथा चलती हुई गाय के पीछे भी न चले। राजा, राजपुत्र या बहुज्ञ ब्राह्मण के लिए बिना केशवपन के ही प्रायश्चित्त का विधान है। केश की रक्षा की दृष्टि से इनके लिए दूने व्रत का विधान है। व्रत पालन हो जाने के अनन्तर दूनी दक्षिणा देने की भी विधि है ॥४८-५३॥ जो व्यक्ति श्रुति-स्मृति के विरुद्ध प्रायश्चित्त बतलाते हैं, वे तो स्वयं नरक में गिरते ही हैं उस गोहत्या करने वाले के पाप भी नष्ट नहीं होते। ऐसे धर्म में विघ्न डालने वाले को राजा दण्ड देकर पीड़ित करे। यदि कदाचित् राजा इच्छा वश या किसी पक्षपात वश ऐसा नहीं करता तो वह पाप सौगुना होकर उसी के मत्थे पड़ जाता है। प्रायश्चित्त हो जाने पर ब्राह्मण-भोजन परमावश्यक है और ऐसे कार्य में बीस गायें और एक बैल दक्षिणा में देना आवश्यक है ॥५४-५७३॥ घास के कीड़ों से यदि गाय की मृत्यु हो बाय तो आधा कृच्छ्र व्रत करे और यथाशक्ति दक्षिणा दे। प्रायश्चित्त के उपरान्त उत्तम ब्राह्मणों को भोजन कराकर उनको सुवर्ण की गुरिया देनी चाहिए तभी शुद्धि होती है ॥५८-५६३॥ चाण्डाल और श्वपच के स्पर्श हो जाने से रात्रि में स्नान का विधान है। उस रात्रि को वह यों न रहे प्रत्युत तत्काल स्नान कर ले। ऐसा करने से वह शीघ्र शुद्ध हो जाता है। यदि कोई अज्ञानी व्यक्ति यों ही रह जाय तो वह पाप सौगुना होकर बढ़ता जाता है। जो ग्रह और नक्षत्र आकाश में उगे रहते १४-नार०