बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २ ) करके अंग समेत चार वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र को ग्रहण कर लिया । पुनः कल्प के आदि में मत्स्यरूप धारण करके मैंने जलार्णव में जल के भीतर ही अशेष वेद, पुराणादि को कह डाला, जिसे सुनकर ब्रह्मा ने मुनियों को बता दिया । इस प्रकार मत्स्यपुराण में मत्स्यावतार भगवान् ने उक्त बातें कहकर आगे किस-किस ने किस-किस को कौन-कौन पुराण सुनाया, यह कहा । इसी प्रकार रेवामाहात्म्य में भी कहा गया है— पुराणमेकमेवासीदस्मिन्कल्पान्तरे नृप । त्रिवर्गसाधनं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम् ।। स्मृत्वा जगाद च मुनीन् प्रति देवश्चतुर्मुखः । प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणस्याभवत्ततः ।। कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य ततो नृप । व्यासरूपं विभुः कृत्वा संहरेत्स युगे युगे ।। चतुर्लक्षप्रमाणेने द्वापरे द्वापरे सदा । तदष्टादशधा कृत्वा भूलोकेऽस्मिन् प्रभाष्यते ।। अद्यापि देवलोके तच्छतकोटिप्रविस्तरम् । तदर्थोऽत्र चतुर्लक्षसंक्षेपेण निवेशितः ।। पुराणानि दशाष्टौ च साम्प्रतं तदिहोच्यते ।' अर्थात् पहले सौ करोड़ श्लोकों में ग्रथित एक ही पुराण था । उसका स्मरण कर ब्रह्मा ने मुनियों को उपदेश दिया । तब सभी शास्त्रों और पुराणों की प्रवृत्ति हुई । राजन् ! पुराण का समय से ग्रहण करना दुष्कर समझकर भगवान् ने व्यास का रूप धारण करके प्रत्येक पुराण का संक्षेप कर दिया । प्रत्येक द्वापर में चार लाख श्लोकों के प्रमाण से उसे १८ भागों में परिणत किया । आज भी देवलोक में सौ करोड़ श्लोकों वाला पुराण विद्यमान है । उसके अर्थ को चार लाख श्लोकों में संक्षेप से सन्निविष्ट किया गया है । वही अठारह पुराणों के रूप में सम्प्रति उपलब्ध है । प्रस्तुत नारदीय पुराण में भी ब्रह्मा ने मरीचि से उक्त प्रकार की बातें कहीं हैं— शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि पुराणानां समुच्चयम् । यस्मिन्ज्ञाते भवेज्ज्ञातं वाङ्मयं सचराचरम् ।। पुराणमेकमेवासीत् सर्वकल्पेषु मानद ।। चतुर्वर्गस्य बीजस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।। प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणादभवत्ततः । कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य महामतिः । हरिर्व्यासस्वरूपेण जायते च युगे युगे । चतुर्लक्षप्रमाणेन द्वापरे द्वापरे सदा ।। तदष्टादशधा कृत्वा भूर्लोके निर्दिशत्यपि । अद्यापि देवलोके तु शतकोटिप्रविस्तरम् ।। अस्यैव तस्य सारस्तु चतुर्लक्षेण वर्ण्यते ।