बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
( २ ) करके अंग समेत चार वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र को ग्रहण कर लिया । पुनः कल्प के आदि में मत्स्यरूप धारण करके मैंने जलार्णव में जल के भीतर ही अशेष वेद, पुराणादि को कह डाला, जिसे सुनकर ब्रह्मा ने मुनियों को बता दिया । इस प्रकार मत्स्यपुराण में मत्स्यावतार भगवान् ने उक्त बातें कहकर आगे किस-किस ने किस-किस को कौन-कौन पुराण सुनाया, यह कहा । इसी प्रकार रेवामाहात्म्य में भी कहा गया है— पुराणमेकमेवासीदस्मिन्कल्पान्तरे नृप । त्रिवर्गसाधनं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम् ।। स्मृत्वा जगाद च मुनीन् प्रति देवश्चतुर्मुखः । प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणस्याभवत्ततः ।। कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य ततो नृप । व्यासरूपं विभुः कृत्वा संहरेत्स युगे युगे ।। चतुर्लक्षप्रमाणेने द्वापरे द्वापरे सदा । तदष्टादशधा कृत्वा भूलोकेऽस्मिन् प्रभाष्यते ।। अद्यापि देवलोके तच्छतकोटिप्रविस्तरम् । तदर्थोऽत्र चतुर्लक्षसंक्षेपेण निवेशितः ।। पुराणानि दशाष्टौ च साम्प्रतं तदिहोच्यते ।' अर्थात् पहले सौ करोड़ श्लोकों में ग्रथित एक ही पुराण था । उसका स्मरण कर ब्रह्मा ने मुनियों को उपदेश दिया । तब सभी शास्त्रों और पुराणों की प्रवृत्ति हुई । राजन् ! पुराण का समय से ग्रहण करना दुष्कर समझकर भगवान् ने व्यास का रूप धारण करके प्रत्येक पुराण का संक्षेप कर दिया । प्रत्येक द्वापर में चार लाख श्लोकों के प्रमाण से उसे १८ भागों में परिणत किया । आज भी देवलोक में सौ करोड़ श्लोकों वाला पुराण विद्यमान है । उसके अर्थ को चार लाख श्लोकों में संक्षेप से सन्निविष्ट किया गया है । वही अठारह पुराणों के रूप में सम्प्रति उपलब्ध है । प्रस्तुत नारदीय पुराण में भी ब्रह्मा ने मरीचि से उक्त प्रकार की बातें कहीं हैं— शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि पुराणानां समुच्चयम् । यस्मिन्ज्ञाते भवेज्ज्ञातं वाङ्मयं सचराचरम् ।। पुराणमेकमेवासीत् सर्वकल्पेषु मानद ।। चतुर्वर्गस्य बीजस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।। प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणादभवत्ततः । कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य महामतिः । हरिर्व्यासस्वरूपेण जायते च युगे युगे । चतुर्लक्षप्रमाणेन द्वापरे द्वापरे सदा ।। तदष्टादशधा कृत्वा भूर्लोके निर्दिशत्यपि । अद्यापि देवलोके तु शतकोटिप्रविस्तरम् ।। अस्यैव तस्य सारस्तु चतुर्लक्षेण वर्ण्यते ।
( ३ ) इतना कहकर आगे अठारह पुराणों के नाम, संख्या आदि का वर्णन किया । इस प्रकार वेद-प्रतिपादित पुराण सर्वथा प्रामाणिक हैं और इनमें प्रतिपादित भगवान् के सगुणावतारों की कथायें भी वेदमूलक होने से प्रमाणिक हैं । वेदमंत्रों में अवतारों का उल्लेख है— जो लोग वेद को परम प्रमाण मानते हैं, किन्तु तन्मूलक अवतारवाद को नहीं मानते, उन्हें वेद-मंत्रों में अवतारों का उल्लेख देखकर निर्णय करना चाहिए— तैत्तिरीयसंहिता में वाराहावतार—‘आपो वा इदमग्रे सलिलमासीत्तस्मिन् प्रजापतिर्वायुर्भूत्वाऽचरत्स इमामपश्यत्तं वराहो भूत्वाऽहरत्’ । तैत्तिरीय ब्राह्मण में—‘स वराहो रूपं कृत्वोपन्यमज्जत स पृथिवीमध आर्छत्’ । ऐतरेय ब्राह्मण में परशुरामावतार—‘प्रोवाच रामो भार्गवेयो विश्वान्तरायः’ । छान्दोग्य में कृष्णावतार—‘कृष्णाय देवकीपुत्राय’ । तैत्तिरीयारण्यक में—‘नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि । तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ।’ ऋग्वेद के विष्णु सूक्त में—‘विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि । यो अस्कभायदुत्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः ।’ प्र तद्विष्णुस्तव ते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः । यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेण्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा ।’ उसी सूक्त में—‘इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्य पांसुरे । त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् । शतपथब्राह्मण में—‘वामनो ह विष्णुरास तद्देवा न जिहीडिरे महद्वै नोऽदुर्यं नो यज्ञसंमितमदुरिति । रुद्र का वर्णन अथर्ववेद—११ काण्ड २ प्रपाठक ६६ मन्त्र में—‘नमस्ते रुद्र मन्यव उतो त इषवे नमः । बाहुभ्यामुत ते नमः ।।’ तैत्तिरीयारण्यक में—‘नमो हिरण्यबाहवे हिरण्यवर्णाय हिरण्यरूपाय हिरण्यपतयेऽम्बिकापतय उमापतये पशुपतये नमो नमः ।’ देवी का वर्णन ऋग्वेद और अथर्ववेद में—‘अहं रुद्रे- भिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः । अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा ।’ इत्यादि । गणपति का वर्णन ऋग्वेद में—‘गणानां त्वा गणपतिं हवाहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे निधीनां त्वा निधिपतिं हवामहे व्वसो मम । अहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ।’ इसी प्रकार सूर्यादि अन्य देवों का वर्णन भी मन्त्रों में मिलता है । अतएव वेदादि में ग्रथित देव- चरित्रों का उपवृंहण पुराणों में देखकर पुराणोक्त देवकथा को अमूल कहना हास्यास्पद है । मत्स्यपुराण ने स्पष्ट उद्घोष किया है कि ब्रह्मा ने सभी शास्त्रों से पहले पुराणशास्त्र का स्मरण किया, पश्चात् उनके मुख से वेद निकले— पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् । अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः ।। इससे पुराण की प्राचीनता वेद से भी अधिक सिद्ध होती है । इतना ही नहीं, प्रस्तुत नारदीय पुराण वेद के अर्थ से पुराण के अर्थ को कहीं अधिक मानता है और इसीलिए समग्र वेदों को पुराणों में ही प्रतिष्ठित स्वीकारता है— वेदार्थादधिकं मन्ये पुराणार्यं वरानने । वेदाः प्रतिष्ठिताः सर्वे पुराणेष्वेव सर्वदा ।। (ना० पु० २।२४।१७) फिर नारदीय पुराण वेद, स्मृति तथा पुराण के विषय तथा क्षेत्र के विभाग को दिखलाते हुए कहता है—वेद का क्षेत्र भिन्न-भिन्न है। वेद का प्रधान क्षेत्र है यज्ञकर्म का सम्पादन—इसी कार्य में वेद का महनीय
( ४ ) तात्पर्य है। गृहाश्रमियों के लिए स्मृति ही वेद है अर्थात् गृहस्थ के आचार-व्यवहार आदि के ज्ञान का प्रका- शक धर्मस्मृति ही है। ये दोनों प्रकार के ग्रन्थ पुराण में केन्द्रित रहते हैं। जिस प्रकार यह आश्चर्यमय जगत् उस पुराणपुरुष (नारायण भगवान्) से उत्पन्न हुआ है, उसी प्रकार समस्त वाङ्मय विस्तृत अर्थ में पुराण साहित्य से ही उत्पन्न हुआ है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं— शृणु मोहिनि मद्वाक्यं वेदोऽयं बहुधा स्थितः । यज्ञकर्म क्रिया वेदः स्मृतिर्वेदो गृहाश्रमे ।। स्मृतिर्वेदः क्रिया वेदः पुराणेषु प्रतिष्ठितः । पुराणपुरुषाज्जातं यथेदं जगदद्भुतम् । तथेदं वाङ्मयं सर्वं पुराणेभ्यो न संशयः ।। (ना० पु० २।२४।१५-१६) पुराण की सहायता वेद भी अपने रहस्य के उपबृंहण के निमित्त सर्वदा चाहता है। वह अल्प शास्त्रों के ज्ञाता से सदा डरा करता है कि वह मुझे मार न डाले— इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपवृंहयेत् । विभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरेदिति ।। (महाभारत) देवीभागवत तो पुराण को पुरुष का हृदय बताता है। इससे बढ़कर पुराण की महिमा क्या हो सकती है ?— श्रुतिस्मृती उभे नेत्रे पुराणं हृदयं स्मृतम् । एतत्त्रयोक्त एव स्याद् धर्मो नान्यत्र कुत्रचित् ।। (दे० भा० ११।१।२१) ऐसे महामहिमाशाली पुराण के कतिपय तथ्यों का रहस्य बिना समझे कुछ लोग अनर्गल दोषारोपण करते हैं। उनका उत्तर देना अनुपयुक्त न होगा। रहस्यानभिज्ञ लोगों का कहना है कि पुराणों में ब्रह्मा का दुहितृगमन, चन्द्रमा का गुरुपत्नीगमन, इन्द्र का अहल्यागमन आदि कतिपय प्रसंग अश्लील एवं अनर्थकारी होने से पुराण-साहित्य अपठनीय है। ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि पुराण-साहित्य समुद्र के समान दुस्तर है, किन्तु कल्याणकारी विषय-रत्न से भरपूर है। ऐसे लोगों को अपनी शंका का समाधान ढूंढ़ना चाहिए, न कि पुराणों पर आक्षेप करना चाहिए। उक्त शंकाओं का समाधान प्राचीनकाल में कुमारिल भट्ट ने अपने 'तन्त्रवार्तिक' में किया है और आधुनिककाल में माधवाचार्य ने 'पुराण-दिग्दर्शन' में और महामहोपाध्याय गिरिधर शर्मा ने 'पुराण-अनुशीलन, में किया है। शर्मा जी ने पहले 'ब्रह्मा का दुहितृगमन' प्रसंग का उत्तर इस प्रकार दिया है— 'श्रीमद्भागवत (३।१२।२८) में इस प्रकार आया है— वाचं दुहितरं तन्वीं स्वयम्भूर्हरतीं मनः । अकामा चकमे सक्तः सकाम इति नः श्रुतम् ।।
( ५ ) किन्तु इस श्लोक के वास्तविक रहस्य को नहीं समझने के कारण ही अज्ञानी लोग गलत अर्थ के शिकार होते हैं । श्रीमद्भागवत का यह श्लोक ऋग्वेद की निम्नांकित ऋचा के आधार पर ही लिखा गया है— कामस्तदग्रे समवर्त्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् । अर्थात्, सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मा को सर्वप्रथम अपने को बहुत रूपों में प्रकट करने की इच्छा हुई । ऐसी इच्छा 'काम' कहलाती है और वह 'काम' मन का रेत (वीर्य) है । इससे स्पष्ट है कि सृष्टि की कामना से पहले मन की उत्पत्ति होती है । और वह मन ही प्राणपूर्वक 'वाक्' को उत्पन्न करता है । इस कारण, मन प्रजापति कहलाया और वाक् मन की पुत्री कहलाई । फिर, मन ही उस 'वाक्' में अपना रस देता है, जो वाक् के साथ उसका समागम कहा गया है । मन की अपेक्षा वाक् सूक्ष्म होती है, अतः वह 'तन्वी' कही गई है । काम तो मन का ही धर्म है, अतः वाक् को 'अकामा' और मन को 'सकाम' कहा गया है । सृष्टि में सर्वप्रथम मन ही उत्पन्न हुआ, अतः वह 'स्वयम्भू' भी कहा जाता है । श्रीमद्भागवत के उक्त श्लोक के आगे वर्णन मिलता है कि मरीचि आदि मुनियों ने प्रजापति के इस कार्य का विरोध किया और प्रजापति ने भी शरीर त्याग दिया, जिससे 'नीहार' की उत्पत्ति हुई । इसका तात्पर्य यह होता है कि इच्छा को दबाना चाहिए, उसे वाणी के द्वारा प्रकट नहीं करना चाहिए । वाणी के द्वारा इच्छा जब प्रकट हो जाती है, तब वह मन नष्ट हो जाता है । इस तरह की सारी सृष्टि तमोगुण के आधिक्य से प्रकट होती है । ऐसे ही तमोगुण से नीहार की उत्पत्ति होती है । प्रजापति तो त्रिगुणात्मक है ही । उसके तीनों गुणों के ही कार्य सृष्टि में होते हैं । इस प्रसंग का दूसरा पक्ष ब्राह्मणग्रन्थों में दिया गया है— प्रजापतिर्वे स्वां दुहितरमभ्यध्यायत् । दिवमित्यन्ये आहुः उषसमित्यन्ये ।। —ऐतरेयारण्यक । अर्थात्, "सूर्य का प्रकाश आने से पूर्व जो प्रभा फैलती है, वह उषा कहलाती है। वह उषा सूर्य से ही उत्पन्न होती है, इसलिए वह सूर्य की पुत्री कही जाती है ।" फिर, सूर्य ही उसमें प्रकाशरूप बीज देता है। यही रहस्य सूर्य का दुहितृगमन माना जाता है । सूर्य अपनी दुहिता उषा के पीछे-पीछे लगा रहता है और उषा सूर्य की कान्ति से ही पुष्ट होती है । इसका संकेत इस प्रकार मिलता है— सूर्यो देवीमुषसं रोचमानां मर्यो न योषामभ्येति पश्चात् । इसका भी तात्पर्य यही है कि जिस प्रकार कोई पति अपनी स्त्री के साथ-साथ घूमता है, उसी प्रकार सूर्य भी उषा के पीछे-पीछे चलता है । ऐतरेयारण्यक की तरह इस बात को ऐतरेय ब्राह्मण (१३।६) भी निम्नलिखित वाक्यों में स्पष्ट करता है— प्रजापतिः स्वां दुहितरमभ्यध्यायत् दिवमित्यन्ये उपसमित्येके इत्यादि । अर्थात्, “सूर्योदय से कुछ पूर्व जो प्रकाश आता है, उसे उषा कहते हैं । वह उषा सूर्य से ही पैदा होती है, इसलिए वह सूर्य की दुहिता मानी गई है ।” यहाँ भी उषा में सूर्य द्वारा प्रकाश दिये जाने के कारण उसे
( ६ )
वीर्य-दान माना गया है एवं सर्वत्र उषा आगे-आगे चलती है और सूर्य उसके पीछे लगा रहता है, यहां स्त्री का अनुगमन माना गया है। इसी प्रकार 'चन्द्रमा का गुरुपत्नीगमन' प्रसंग का उत्तर देखिए— चन्द्रमा का अपने गुरु बृहस्पति की पत्नी के साथ सहवास का उल्लेख भी पुराणों में मिलता है। उस पर भी स्वभावतः यह आशंका होती है कि देवता होते हुए भी चन्द्रमा ने ऐसा क्यों किया ? परन्तु इस आख्या- यिका का भी नक्षत्र-परक अर्थ आकाशविज्ञान के विश्लेषण से स्पष्ट हो जाता है। गुरु का अर्थ है—बृहस्पति । पहले के ज्योतिर्विद् विद्वान् बृहस्पति के ही सम्बन्ध से गणना आरम्भ करते थे। बाद के ज्योतिर्विदों ने चन्द्रमा के अनुसार गणना प्रारम्भ कर दी। बृहस्पति के अनुसार जो तारा- गणना होती है, वही चन्द्रमा के अनुसार भी उत्पन्न हो जाती है, जिसे पौराणिक आख्यान की शैली में कहा गया कि बृहस्पति की तारा चन्द्रमा ने छीन ली। इस प्रकार से सभी आख्यान केवल तारा-मण्डल के वर्णन-स्वरूप हैं, इसमें अश्लीलता की कोई बात नहीं। इसी तरह 'इन्द्र का अहल्या' प्रसंग भी प्रतीकात्मक आख्यान है। इन्द्र-अहल्या का समागम भी इसी प्रकार एक प्रतीकात्मक आख्यान है। इस प्रतीकात्मक आख्यान को समझने के पहले 'अहल्या' और 'गौतम'— इन शब्दों का रहस्यार्थ जान लेना आवश्यक है। व्याकरण की रीति से 'अहल्या' शब्द का अर्थ होता है— अह्ना यम्यते, अहो यमयति वा सा अहल्या । अर्थात् जो रात्रि के द्वारा समाप्त किया जाय अथवा जिसको दिन समाप्त करे, वह अहल्या है। अतः, 'अहल्या' नाम रात्रि का हुआ। इसी प्रकार 'गौतम' शब्द का अर्थ होता है— गौ = पृथ्वी से प्रादुर्भूत होने वाली काली किरणें। पृथ्वी से काली ही किरणें निकला करती हैं और वे प्रकाश से दब जाती हैं, इसलिए वे किरणें लोक में प्रतीत नहीं होतीं। इस आख्यान में कहा गया है कि इन्द्र अहल्या के पास जब गया, तब उसने चन्द्रमा को कुक्कुट पक्षी बनाया। इतना तो सभी जानते हैं कि चन्द्रमा के दो पक्ष होते हैं, इसीलिए वह पक्षी कहा गया है। इन्द्र प्रकाश का देवता है, जिसके सम्बन्ध में श्रुति कहती है— यथाग्निगर्भा पृथिवी यथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिणी । अर्थात्, जिस प्रकार पृथिवी अग्निगर्भा है, उसी प्रकार अन्तरिक्ष इन्द्र के द्वारा गर्भवान् बना हुआ है। अतः इन्द्र प्रकाश का देवता है। दिन में तो प्रकाश का साम्राज्य रहता ही है, किन्तु अहर्या, अर्थात् रात्रि में जब इन्द्र अर्थात् प्रकाश का देवता जाने लगा, तब उसने चन्द्रमा का आधार लिया। इसी आधार के लिए उसने चन्द्रमा को पक्षी बनाया। यह तो बिलकुल स्पष्ट है कि चन्द्रमा अपने दो पक्षों के द्वारा ही प्रकाश ग्रहण करता है और देता है। चन्द्रमा के बिना अहल्या (रात्रि) इन्द्र (प्रकाश) को प्राप्त नहीं कर सकती, अर्थात् प्रकाश (इन्द्र) ही रात्रि के पास जा सकता है। अतः इस तरह प्रकाश का देवता इन्द्र चन्द्रमा के साहाय्य से अहल्या-रात्रि के साथ समागम करता है और यह समागम पूर्णिमा के दिन पूर्ण रूप से होता है। कथा में वर्णित है कि जब 'गौतम' रात समझकर लौट आये, तब अपनी स्त्री के पास इन्द्र को देखकर उन्होंने शाप दिया कि जा दुष्ट, तू ने भग के लिए ऐसा दुराचार किया है अतः तू सहस्र-भग हो जा। 'सहस्रभग' का अर्थ होता है—सहस्रेषु भेषु नक्षत्रेषु गच्छति, अर्थात् हजार ताराओं में गमन करके टिमटिमाने वाला। यही कारण है कि इन्द्र सहस्र नेत्र वाला कहा जाता है। वहाँ 'भग' नेत्र-रूप में परिणत मान लिये गये हैं। इस प्रकार यह भी ताराओं का या देवताओं का पौराणिक भाषा में चरित्र-चित्रण किया गया है। इसमें आक्षेप-योग्य कोई बात नहीं है। ऋषि ने अपनी स्त्री को शिला हो जाने का शाप दिया, उसका आशय है कि
( ७ ) सूर्यास्त के समय जगत् की स्थिति पाषाण-जैसी ही रहती है। अर्थात्, उस समय न प्रकाश ही रहता है, न गौतम अर्थात् अन्धकार ही। इसी प्रकार राजपत्नी का अश्व के साथ शयन, विष्णु-वृन्दा-वृत्तान्त, अगस्त्य का समुद्र-पान आदि का रहस्य न जानने से लोग आशंका करते हैं। इन सबका उत्तर 'पुराण-परिशीलन' में द्रष्टव्य है। अतएव पूर्ण जानकारी के बिना अल्प ज्ञान के आधार पर पुराणों पर छींटाकशी करना अनुचित है। पुराण-साहित्य महनीय है। पुराणों से ही भारतीय जीवन का आदर्श, भारत की सभ्यता, संस्कृति तथा भारत के विद्या-वैभव के उत्कर्ष का वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो सकता है। पुराण न केवल साहित्य हैं अपितु इनमें विश्वकल्याणकारी त्रिविध (आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक) उन्नति का मार्ग भी प्रदर्शित किया गया है। अतएव दुराग्रह एवं पक्षपात से रहित होकर पुराण-साहित्य का अध्ययन करना सबके लिए कल्याणकारी है। आगे अब प्रस्तुत पुराण का परिचय दिया जा रहा है। पुराण-रचयिता अष्टादशपुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः (महाभारत, आदिपर्व), अष्टादश पुराणानां वक्ता सत्यवती- सुतः (शिवपुराण, रेवाखण्ड)—इत्यादि प्रमाणों से अठारहों पुराणों के रचयिता श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास माने जाते हैं। स्वयं ब्रह्मा प्रत्येक द्वापर युग के अन्त में और कलियुग के आरम्भ में व्यास के रूप में अवतीर्ण होकर अष्टादशपुराणों को सम्पादित, निर्मित एवं ग्रन्थित करते हैं। इस वाराहकल्प में द्वापर युगों की संख्या के अनुसार अब तक २८ व्यास हो चुके हैं। अन्तिम व्यास का नाम श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास था जिनकी अवशिष्ट शास्त्र-कृतियाँ आज सौभाग्यवश हमें प्राप्य हैं। २६ वें द्वापर में अर्थात् आगामी समय मे जो व्यास होंगे, उनका नाम होगा श्री अश्वत्थामा व्यास। श्रीव्यास जी का परिचय हमारे पुरातन साहित्य में विस्तार के साथ आया है। संक्षेप में व्यास का स्वरूप समझ लेना ही यहाँ पर्याप्त है। पुराणवर्म में पं० कालूराम शास्त्री ने लिखा है— व्यास कोई एक व्यक्ति नहीं होता, प्रत्येक द्वापर में नवीन व्यास हुआ करते हैं। व्यास किसी का नाम नहीं, किन्तु पदवी है। गोलवृत्त में जो एक सीधी रेखा निकल जाती है, उसका नाम व्यास है। इसी प्रकार वेदवृत्त में जो सीधा निकल जाय उसका नाम वेदव्यास है। जितने व्यास हुए हैं, वे वेद और पुरातत्त्व के पूर्ण ज्ञाता हुए हैं। नारदीयपुराण नारदोक्त पुराण ही 'नारदीय' नाम से प्रख्यात है—'नारदोक्तं पुराणं तु नारदीयं प्रचक्षते' (शिवउप- पुराण) नारद ने बृहत्कल्पप्रसंग में जिन अनेक धर्म-आख्यायिकाओं को कहा है, वही २५००० श्लोकों में ग्रथित होकर नारदीयमहापुराण बना है— यत्राह नारदो धर्मान् बृहत्कल्पाश्रयाणि च । पञ्चविंशत्सहस्राणि नारदीयं तदुच्यते ॥ (मत्स्यपुराण ५३।२३) किन्तु वर्तमान नारदीयपुराण में ३००० श्लोकों की कमी है, २२००० श्लोक ही मिलते हैं। इस पुराण के पूर्वभाग में सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार—इन चार ब्रह्मपुत्रों का ब्रह्मपुत्र नारद के प्रति कथन है। किन्तु ऐसा भी माना जाता है कि नारद का ही अपने उक्त चारों भाइयों के प्रति कथन है, ऊपर आये हुए शिवउपपुराण और मत्स्यपुराण के वचनों से यही सिद्ध होता है। नारदीयपुराण में क्या विषय है ? इसका संक्षेप में इसी पुराण ने उत्तर दे दिया है—
पञ्चविंशतिसाहस्रं बृहच्चित्रकथाश्रयम् ।
( ८ ) शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि पुराणं नारदीयकम् । पञ्चविंशतिसाहस्रं बृहच्चित्रकथाश्रयम् । पूर्वभाग—प्रथमपाद में— सूतशौनकसंवादः सृष्टिसंक्षेपवर्णनम् । नानाधर्मकथाः पुण्याः प्रवृत्तेः समुदाहृताः । प्राग्भागे प्रथमे पादे सनकेन महात्मना ।। पूर्वभाग-द्वितीयपाद में— द्वितीये मोक्षधर्माख्ये मोक्षोपायनिरूपणम् । वेदाङ्गानाञ्च कथनं शुकोत्पत्तिश्च विस्तरात् । सनन्दनेन गदिता नारदाय महात्मने ।। पूर्वभाग-तृतीयपाद में— महातन्त्रे समुद्दिष्टं पशुपाशविमोक्षणम् । मन्त्राणां शोधनं दीक्षा मन्त्रोद्धारश्च पूजनम् ।। प्रयोगाः कवचं चैव सहस्रं स्तोत्रमेव च । गणेशसूर्यविष्णूनां शिवशक्त्योरनुक्रमात् । सनत्कुमारमुनिना नारदाय तृतीयेके ।। पूर्वभाग-चतुर्थपाद में— पुराणलक्षणञ्चैव प्रमाणं दानमेव च । पृथक् पृथक् समुद्दिष्टं दानकालपुरः सरम् ।। चैत्रादिसर्वमासेषु तिथीनां च पृथक् पृथक् । प्रोक्तम्प्रतिपदादीनां व्रतं सर्वाघनाशनम् ।। पूर्वभागोऽयमुदितो बृहदाख्यानसंज्ञितः ।। उत्तरभाग में— अस्योत्तरे विभागे तु प्रश्न एकादशीव्रते । वशिष्ठेनाथ संवादो मान्धातुः परिकीर्तितः ।। रुक्माङ्गदकथा पुण्या मोहिन्युत्पत्तिकर्म च । वसुशापश्च मोहिन्यै पश्चादुद्धरणक्रिया ।। गंगाकथा पुण्यतमा गयायात्रानुकीर्तनम् । काश्या माहात्म्यमतुलम्पुरुषोत्तमवर्णनम् ।। यात्राविधानं क्षेत्रस्य बहु वाख्यानसमन्वितम् । प्रयागस्याथ माहात्म्यं कुरुक्षेत्रस्य तत्परम् ।। हरिद्वारस्य चाख्यानं कामोदाख्यानकन्तथा । बदरीतीर्थमाहात्म्यं कामाख्यायास्तथैव च ।।
प्रभासस्य च माहात्म्यं पुराणाख्यानकन्तथा ।
प्रभासस्य च माहात्म्यं पुराणाख्यानकन्तथा । गौतमाख्यानकं पश्चाद् वेदपादस्तवस्ततः ॥ गोकर्णक्षेत्रमाहात्म्यं नर्मदातीर्थवर्णनम् । अवन्त्याश्चैव माहात्म्यं मथुरायास्ततः परम् । वृन्दावनस्य महिमा वसोर्द्धान्तिके गतिः । फलश्रुति-- यः शृणोति नरो भक्त्या श्रावयेद्वा समाहितः । स याति ब्रह्मणो धाम नात्र कार्या विचारणा ॥ यस्त्वेतादिषुपूर्णायां धेनूनां सप्तकाचितम् । प्रदद्याद् द्विजवर्याय स लभेन्मोक्षमेव च ॥ यश्चानुक्रमणीमेतां नारदीयस्य वर्णयेत् । शृणुयाद्वैकचित्तेन सोऽपि स्वर्गगतिं लभेत् ॥ (ना० पु० पूर्वभाग, अ० ६७) इस प्रकार नारदीयपुराण ने जहाँ अपने विषयों की अनुक्रमणी दी है वहीं अठारहों पुराणों की भी विस्तृत विषयानुक्रमणिका प्रस्तुत की है। यह अनुक्रमणी सभी पुराणों के विषयों को जानने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इसकी सहायता से हम वर्तमान पुराणों के मूलरूप तथा प्रक्षिप्त अंश की छानबीन बड़ी सुग- मता से कर सकते हैं। इस पुराण में विविध ज्ञान-विज्ञान की बातें, अनेक इतिहास-गाथायें, गोपनीय अनुष्ठान आदि का वर्णन, धर्मनिरूपण तथा भक्तिमहत्त्वपरक विलक्षण कथायें, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, मन्त्र-विज्ञान आदि का अलौकिक और महत्त्वपूर्ण व्याख्यान संगृहीत है। यद्यपि सभी पुराण श्रीहरि के स्वरूप ही हैं। फिर भी छह पुराण सात्त्विक माने जाते हैं। वे ये हैं— वैष्णवं नारदीयं च तथा भागवतं शुभम् । गारुडं च तथा पाद्मं वाराहं शुभदर्शने ॥ सात्त्विकानि पुराणानि विज्ञेयानि शुभानि वै । (पद्मपुराण उत्तरखण्ड, २६३।८२-८३) अतएव नारदीय पुराण सात्त्विक पुराण है। इसमें परात्पर ब्रह्म विशुद्ध सत्त्वमूर्ति श्रीहरि की लीलाओं का गायन हुआ है। यह पुराण 'भक्त्या तुष्यति माधवो न च गुणैर्भक्तिप्रियो माधवः' इस सिद्धान्त का परि- पोषक है। यह कहता है— यथा भूमि समाश्रित्य सर्वे जीवन्ति जन्तवः । तथा भक्ति समाश्रित्य सर्वकार्याणि साधयेत् ॥ (पूर्वभाग ४।५) किन्तु इस पुराण की दृष्टि में भक्ति के साथ वर्णाश्रमधर्म एवं शास्त्रोक्त कर्त्तव्यों का पालन भी अत्या- वश्यक है। सदाचारपरायण, भवाचारत्यागी भक्त पर भगवान् कभी प्रसन्न नहीं होते—
( १० ) हरिभक्तिपरो वापि हरिध्यानरतोऽपि वा । भ्रष्टो यः स्वाश्रमाचारात् पतितः सोऽभिधीयते ।। वेदो वा हरिभक्तिर्वा भक्तिर्वापि महेश्वरे । आचारात्पतितं मूढं न पुनाति द्विजोत्तमम् ।। (पूर्व० ४, २४-२५) यः स्वधर्मं परित्यज्य भक्तिमात्रेण जीवति । न तस्य तुष्यते विष्णुश्चारेणैव तुष्यति ।। तस्मात् कार्या हरेर्भक्तिः स्वधर्मस्याविरोधिनी । स्वधर्महीना भक्तिश्चाप्यकृतैव प्रकीर्तिता ।। (पूर्व० १५, १२३, १२४) यह पुराण एकादशी व्रत के अनुष्ठान का माहात्म्य बड़े विस्तार से प्रभावक शब्दों में वर्णन करता है। यहाँ परम वैष्णव रुक्मांगद राजा का उल्लेख है, जिन्होंने अपने राज्य में आठ वर्ष से लेकर अस्सी वर्ष वय वाले व्यक्तियों के लिए आदेश जारी कर रखा था कि इनमें जो एकादशी का व्रत नहीं करेगा वह वध्य माना जाएगा। यह पुराण अग्निपुराण तथा गरुड़पुराण के समान समस्त विद्याओं का प्रतिपादन करने वाला विश्व- कोश के समान है। इन विद्याओं के प्रतिपादक किसी मान्य ग्रन्थ का संक्षेप यहाँ प्रस्तुत किया गया है कृतज्ञता-ज्ञापन लगभग ४० वर्ष पहले नारदीयपुराण (आनन्दाश्रम पूना संस्करण) का अपूर्ण हिन्दी अनुवाद हमने किया था। उसके बाद सम्मेलन में शासनतन्त्र बदल जाने से बहुत वर्षों तक पुराण-कार्य स्थगित रहा। पुनः श्री प्रभात शास्त्री के प्रशासनकाल में यह कार्य पुनरुज्जीवित हुआ। शास्त्री जी का दृढ़संकल्प है कि वे जब तक सम्मेलन में रहेंगे तब तक पुराणों का प्रकाशन निर्बाध गति से चलता रहेगा। उनके इस सत्य संकल्प के लिए जितना साधुवाद और धन्यवाद दिया जाय, वह कम ही होगा। शास्त्रीजी ने मुझे इस पुण्य कार्य का भार सौंपा, अतः मैं उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। ऊपर संकेत के अनुसार मुझे अपूर्ण हिन्दी अनुवाद को पूर्ण करने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा; कारण जिस संस्करण से इसका अनुवाद किया था, वह संस्करण प्रेस में देने से पूर्व मुझे नहीं मिला। नारदीय- पुराण की खोजबीन करने पर प्रयागस्थ पं० श्री महादेवप्रसाद पाठक'वैद्य जी से नारदीय पुराण (बम्बई संस्करण) की एक प्रति प्राप्त हुई। उसकी 'फोटो स्टेट' कापी कराकर हमने प्रेस में दी। पाठकजी की इस उदारता के लिए हम उनके प्रति अपना आभार प्रकट करते हैं। अनुवाद-कार्य को पूर्ण करने में मुझे कल्याण के 'नारद विष्णु पुराण अंक' से बहुत सहायता मिली। अतः मैं 'कल्याण' के कर्णधारों के प्रति अपनी हार्दिक कार्तज्ञ्य ज्ञापित करता हूँ। जैसा कि मैंने ऊपर संकेत किया है कि इसका अनुवाद पूना संस्करण से और संशोधन बम्बई संस्करण से किया गया है, इससे कुछ स्थलों पर पाठभिन्नता के कारण भावानुवाद ही करना पड़ा। कुछ कारणवश मंत्र-संशो- धन और मन्त्रोद्धार भी सब जगह नहीं कर सका। इसके लिए मैं पाठकों से क्षमा चाहता हूँ। यदि इसके दूसरे संस्करण तक मैं क्रियाशील रहा तो इस कमी को पूर्ण करने का भरसक प्रयास करूँगा। 'करकृतमपराधं क्षन्तुम- र्हन्ति सन्तः' इस अभ्यर्थना के साथ अपना निवेदन समाप्त करता हूँ। मौनी अमावास्या सन् १९८६ निवेदक तारिणीश झा
ॐ श्रीगुरुभ्यो नमः ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीनारदीयपुराणम् पूर्वार्द्धम् अथ प्रथमोऽध्यायः ओं नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥१॥ ओं वेदव्यासाय नमः ॥ वन्दे वृन्दावनासीनमिन्दिरानन्दमन्दिरम् । उपेन्द्रं सांद्रकारुण्यं परानन्दं परात्परम् ॥१॥ ब्रह्मविष्णुमहेशाख्यं यस्यांशा लोकसाधकाः । तमादिदेवं चिद्रूपं विशुद्धं परमं भजे ॥२॥ शौनकाद्या महात्मान ऋषयो ब्रह्मवादिनः । नैमिषाख्ये महारण्ये तपस्तेपुर्मुमुक्षवः ॥३॥ जितेन्द्रिया जिताहाराः सन्तः सत्यपराक्रमाः । यजन्तः परया भक्त्या विष्णुमाद्यं सनातनम् ॥४॥ अनीर्ष्याः सर्वधर्मज्ञा लोकानुग्रहतत्पराः । निर्ममा निरहंकाराः परस्मिन् रतमानसाः ॥५॥ न्यस्तकामा विवृजिनाः शमादिगुणसंयुताः । कृष्णाजिनोत्तरीयास्ते जटिला ब्रह्मचारिणः ॥६॥ अध्याय १ पुरुषोत्तम नर और नारायण तथा भगवती सरस्वती देवी को नमस्कार करके जय शब्द का उच्चारण करना चाहिए ॥१॥ वृन्दावन में बैठे हुए, लक्ष्मी के आनन्द के धाम, इन्द्र के छोटे भाई, करुणापूर्ण, परानन्दस्वरूप, श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ तथा ब्रह्मा, विष्णु और महेश नामक भगवान् की मैं वन्दना करता हूँ । जिस परब्रह्म के लोक-साधक देव अंश रूप हैं, उस चित्स्वरूप, विशुद्ध, परम तत्त्व, आदि देव का मैं भजन करता हूँ ॥२॥ प्राचीन काल में मुक्ति की कामना से शौनक आदि ब्रह्मवादी ऋषि नैमिषारण्य क्षेत्र में तपस्या करते थे । वे ऋषि जितेन्द्रिय, परमव्रती, सत्यसन्ध और अपनी उत्कृष्ट भक्ति से आद्य सनातन भगवान् विष्णु की उपासना में रत थे ॥३॥ वे ईर्ष्या से रहित, अखिल धर्मों के मर्मज्ञ, लोक-कल्याण में निरत, निर्मम, निरभिमान और परब्रह्म के ध्यान में मग्न रहते थे । अपनी सम्पूर्ण भौतिक कामनाओं को छोड़कर, शम आदि गुणों से युक्त होकर वे जटाधारी ब्रह्मचारी कृष्णमृगचर्म को ही धारण करते थे ॥६॥ फा०—१
२ प्रथमोऽध्यायः गृणन्तः परमं ब्रह्म जगच्चक्षुः समौजसः । धर्मशास्त्रार्थतत्त्वज्ञास्तेपुनैमिषकानने ॥७॥ यज्ञैर्यज्ञपतिं केचिज्ज्ञानैर्ज्ञानात्मकं परे । केचिच्च परया भक्त्या नारायणमपूजयन् ॥८॥ एकदा ते महात्मानः समाजं चक्रुरुत्तमाः । धर्मार्थकाममोक्षाणामुपायाञ्ज्ञातुमिच्छवः ॥६॥ षड्िंवशतिसहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् । तेषां शिष्यप्रशिष्याणां संख्या वक्तुं न शक्यते ॥१०॥ मुनयो भावितात्मानो मिलितास्ते महौजसः । लोकानुग्रहकर्त्तारो वीतरागा विमत्सराः ॥११॥ कानि क्षेत्राणि पुण्यानि कानि तीर्थानि भूतले । कथं वा प्राप्यते मुक्तिर्नृणां तापार्तचेतसाम् ॥१२॥ कथं हरौ मनुष्याणां भक्तिरव्यभिचारिणी । केन सिध्येत च फलं कर्मणस्त्रिविधात्मनः ॥१३॥ इत्येवं प्रष्टुमात्मानमुद्यतान्प्रेक्ष्य शौनकः । प्राञ्जलिर्वाक्यमाहेदं विनयावनतः सुधीः ॥१४॥ शौनक उवाच आस्ते सिद्धाश्रमे पुण्ये सूतः पौराणिकोत्तमः । यजन्मुखैर्बहुविधैर्विश्वरूपं जनार्दनम् ॥१५॥ स एतदखिलं वेत्ति व्यासशिष्यो महामुनिः । पुराणसंहितावक्ता शान्तो वै रोमहर्षणिः ॥१६॥ युगे युगेऽल्पकान्धर्मान्निरोक्ष्य मधुसूदनः । वेदव्यासस्वरूपेण वेदभानं करोति वै ॥१७॥ वेदव्यासमुनिः साक्षान्नारायण इति द्विजाः । शुश्रुमः सर्वशास्त्रेषु सूतस्तु व्यासशासितः ॥१८॥ तेन संशासितः सूतो वेदव्यासेन धीमता । पुराणानि स वेत्त्येव नान्यो लोके ततः परः ॥१६॥ स पुराणार्थविल्लोके स सर्वज्ञः स बुद्धिमान् । स शान्तो मोक्षधर्मज्ञः कर्मभक्तिकलापवित् ॥२०॥ इस प्रकार धर्मशास्त्रों के अर्थ एवं रहस्य को जानने वाले, सर्वदा परब्रह्म की स्तुति में ही लीन रहने वाले, सर्वद्रष्टा और समान ओज रखने वाले ऋषि उस नैमिषकानन में तपोरत थे ॥७॥ उनमें से कुछ तो यज्ञों के द्वारा यज्ञपति की, कुछ ज्ञान के द्वारा ज्ञानस्वरूप ब्रह्म की और कुछ ऋषि अपनी पराभक्ति के द्वारा नारायण की उपासना करते थे ॥८॥ एक दिन उन महात्मा मुनियों ने धर्म-अर्थ काम और मोक्ष की प्राप्ति के साधनों को जानने की इच्छा से एक गोष्ठी का आयोजन किया। उस गोष्ठी में छब्बीस हजार ऊर्ध्वरेता, जिनके शिष्योपशिष्यों की संख्या नहीं कही जा सकती, एवं अन्यान्य महातेजस्वी और ज्ञानी मुनि सम्मिलित हुए। वे लोककल्याणकर्त्ता, वीत-राग और ईर्ष्यारहित मुनि-इस भूतल पर कौन-कौन से पवित्र तीर्थ ओर पुण्यदायक क्षेत्र हैं, अथवा त्रिविधताप से संतप्त मनुष्यों को कैसे मुक्ति मिल सकती है, किस प्रकार श्री विष्णु में मनुष्यों की अचल भक्ति हो सकती है और किस उपाय से त्रिविध कर्म (दैविक, दैहिक और आध्यात्मिक, अथवा कायिक, वाचिक और मानसिक) सफल हो सकते हैं, आदि प्रश्नों को महर्षि शौनक से पूछने के लिए उद्यत हुए। उन्हें देखकर विनयावनत सुधी शौनक ने हाथ जोड़कर कहा ॥ ६—१४॥ शौनक बोले- 'सभ्यगण ! पुनीत सिद्ध आश्रम में महान् पुराण विद्या के ज्ञाता सूत जी रहते हैं। वे बहुविध यज्ञों में विश्वरूप जनार्दन की अराधना किया करते हैं। वे ही व्यास के प्रिय शिष्य, पुराण संहिता के वक्ता, शान्त, महामुनि रोमहर्षण जी इन सम्पूर्ण तत्त्वों को जानते हैं। युग-युग में धर्म का ह्रास देखकर स्वयं मधुसूदन वेदव्यास के रूप में अवतार लेकर वेदों का विभाग करते हैं। द्विजगण ! मुनि वेदव्यास साक्षात् नारायण हैं। सुना जाता है कि कृपालु व्यास जी ने सूत को सब शास्त्रों का उपदेश किया है। जब उन्ही धीमान् वेदव्यास जी ने सूत को शास्त्रों का उपदेश किया है तो मैं यह कह सकता हूँ कि इस लोक में वे ही पुराणों को जानते हैं। उनसे बढ़कर दूसरा कोई पुराणविद् नहीं है। वे ही इसलोक में पुराण के तत्त्वज्ञाता हैं। वे ही सर्वज्ञ ओर वे ही बुद्धिमान्
नारदीयपुराणम् ३ वेदवेदाङ्गशास्त्राणां सारभूतं मुनीश्वराः । जगद्धितार्थं तत्सर्वं पुराणेषूक्तवान्मुनिः ॥२१॥ ज्ञानार्णवो वै सूतस्तत्सर्वतत्त्वार्थकोविदः । तस्मात्तमेव पृच्छाम इत्यूचे शौनको मुनीन् ॥२२॥ ततस्ते मुनयः सर्वे शौनकं वाग्विदां वरम् । समाश्लिष्य सुसंप्रीताः साधु साध्विति चाब्रुवन् ॥२३॥ अथ ते मुनयो जग्मुः पुण्यं सिद्धाश्रमं वने । मृगव्रजसमाकीर्णं मुनिभिः परिशोभितम् ॥२४॥ मनोज्ञभूरुहलताफलपुष्पविभूषितम् । युक्तं सरोभिरच्छोदैरतिथ्यातिथ्यसंकुलम् ॥२५॥ ते तु नारायणं देवमनन्तमपराजितम् । यजन्तमग्निष्टोमेन ददृशु रोमहर्षणम् ॥२६॥ यथार्हमर्चितास्तेन सूतेन प्रथितौजसः । तस्यावभृथमैक्षन्तस्तत्र तस्थुर्मखालये ॥२७॥ अधरावभृथस्नातं सूतं पौराणिकोत्तमम् । पप्रच्छुस्ते सुखासीनं नैमिषारण्यवासिनः ॥२८॥ ऋषय ऊचुः वयं त्वतिथयः प्राप्ता आतिथेयास्तु सुव्रत । ज्ञानदानोपचारेण पूजयास्मान्यथाविधि ॥२६॥ दिवौकसो हि जीवन्ति पीत्वा चन्द्रकलामृतम् । ज्ञानामृतं भूसुरास्तु मुने त्वन्मुखनिःसृतम् ॥३०॥ येनेदमखिलं जातं यदाधारं यदात्मकम् । यस्मिन्प्रतिष्ठितं तात यस्मिन्वा लयमेष्यति ॥३१॥ केन विष्णुः प्रसन्नः स्यात्स कथं पूज्यते नरैः । कथं वर्णाश्रमाचारश्चातिथेः पूजनं कथम् ॥३२॥ सफलं स्याद्यथा कर्म मोक्षोपायः कथं नृणाम् । भक्त्या किं प्राप्यते पुंभिस्तथा भक्तिश्च कीदृशी ॥३३॥ हैं। परमशान्त, उदारचेता सूत जी ही मोक्ष धर्म के ज्ञाता तथा कर्म और भक्तितत्त्व के मर्मज्ञ हैं। मुनिवर व्यास जी ने जगत्-कल्याण के लिए वेद-वेदाङ्ग और शास्त्रों के सारभूत तत्त्व को पुराणों में कह दिया है। ज्ञान के सागर सूत जी उन सम्पूर्ण तत्त्वों के ज्ञाता हैं, अतः उन्हीं सर्वज्ञ सूत जी से इन प्रश्नों को पूछना चाहिए। शौनक जी इतना कह कर चुप हो गये ॥१५-२२॥ उपर्युक्त बातों को सुनकर वे सभी मुनि प्रेम-गद्गद हो गये। उन्होंने परमवाग्मी शौनक को छाती से लगाया और साधुवाद द्वारा सम्मानित किया। तत्पश्चात् वे मुनि वनमें उस पवित्र सिद्धाश्रम में पहुँचे, जो मृग-समूह से व्याप्त, मुनिगण से शोभायमान और मनोहर वृक्षों, लताओं, फूलों और फलों से विभूषित था। विमल जल वाले सरोवर उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वहां आये हुए अतिथियों के आतिथ्य से विचित्र चहल पहल थी। उन मुनियों ने अग्निष्टोम यज्ञ द्वारा अनन्त, सर्वातिशायी नारायण की उपासना में तल्लीन रोमहर्षण को देखा। विख्यात तेजस्वी उन ऋषियों का सूत जी ने यथायोग्य सत्कार किया। वे मुनि भी उस यज्ञशाला में सूत जी के यज्ञ को देखने के लिए बैठ गए। जब पौराणिकप्रवर सूत जी अवभृथ स्थान (यज्ञ के बाद का स्थान) कर चुके और सुखपूर्वक अपने आसन पर बैठ गए तब नैमिषारण्यनिवासी उन मुनियों ने विनयपूर्वक पूछा ॥२३-२८॥ ऋषियों ने कहा—सुव्रत ! हम अतिथि आज आप के समीप आए हुए हैं और आप अतिथिसवापरायण हैं। अतः आप अपने ज्ञान दान द्वारा हम लोगों की यथाविधि पूजा कीजिए। स्वर्ग में निवास करने वाले देवता चन्द्रमा की किरणों से अमृत पीकर जीते हैं और मुने ! इस धरातल के निवासी देवता (ब्राह्मण) आपके मुख चन्द्र से निकली ज्ञानसुधा को पीकर जीते हैं। किससे इस लोक की सृष्टि हुई है ? कौन इसका आधार है ? क्या इसका स्वरूप है ? तात ! किसमें यह ब्रह्माण्ड प्रतिष्ठित है ? अथवा किसमें यह अखिल लोक पुनः लीन होगा ? किस उपाय से भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं ? किस प्रकार मनुष्यों को उनकी पूजा करनी चाहिए ? वर्णाश्रमव्यवस्थानुकूल आचार किस प्रकार करनी चाहिए ? मनुष्यों को कर्म में सफलता कैसे मिलेगी ? और
४ प्रथमोऽध्यायः वद सूत मुनिश्रेष्ठ सर्वमेतदसंशयम् । कस्य नो जायते श्रद्धा श्रोतुं त्वद्वचनामृतम् ॥३४॥ सूत उवाच शृणुध्वमृषयः सर्वे यदिष्टं वो वदामि तत् । गीतं सनकमुख्यैस्तु नारदाय महात्मने ॥३५॥ पुराणं नारदोपाख्यमेतद्वेदार्थसंमितम् । सर्वपापप्रशमनं दुष्टग्रहनिवारणम् ॥३६॥ दुःस्वप्ननाशनं धर्म्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् । नारायणकथोपेतं सर्वकल्याणकारणम् ॥३७॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां हेतुभूतं महाफलम् । अपूर्वं पुण्यफलदं शृणुध्वं सुसमाहिताः ॥३८॥ महापातकयुक्तो वा युक्तो वाप्युपपातकैः । श्रुत्वैतदार्षं दिव्यं च पुराणं शुद्धिमाप्नुयात् ॥३९॥ यस्यैकाध्यायपठनाद्वाजिमेधफलं लभेत् । अध्यायद्वयपाठेन राजसूयफलं तथा ॥४०॥ ज्येष्ठमासे पूर्णिमायां मूलर्क्षे प्रयतो नरः । स्नात्वा च यमुनातोये मथुरायामुपोषितः ॥४१॥ अभ्यर्च्य विधिवत्कृष्णं यत्फलं लभते द्विजाः । तत्फलं समवाप्नोति अध्यायत्रयपाठतः ॥४२॥ तत्प्रवक्ष्यामि वः सम्यक् शृणुध्वं गदतो मम । जन्मायुताजितैः पापैर्मुक्तः कोटिकुलान्वितः ॥४३॥ ब्रह्मणः पदमासाद्य तत्रैव प्रतितिष्ठति । श्रुत्वास्य तु दशाध्यायान्भक्तिभावेन मानवः ॥४४॥ निर्वाणमुक्तिं लभते नात्र कार्या विचारणा । श्रेयसां परमं श्रेयः पवित्राणामनुत्तमम् ॥४५॥ दुःस्वप्ननाशनं पुण्यं श्रोतव्यं यत्नतो द्विजाः । श्रद्धया सहितो मर्त्यः श्लोकं श्लोकार्द्धमेव वा ॥४६॥ पठित्वा मुच्यते सद्यो महापातकराशिभिः । सतामेव प्रवक्तव्यं गुह्याद्गुह्यतरं यतः ॥४७॥ वाचयेत्पुरतो विष्णोः पुण्यक्षेत्रे द्विजान्तिकै । ब्रह्मद्रोहपराणां च दम्भाचारयुतात्मनाम् ॥४८॥
मोक्ष की प्राप्ति कैसे होगी ? भक्ति से मनुष्य क्या प्राप्त करता है ? भक्ति का स्वरूप क्या है ? हे मुनिश्रेष्ठ सूत ! इन प्रश्नों का अवश्य समाधान कीजिये जिससे हम लोगों का संशय दूर हो । आपका वचनामृत पान करने के लिए भला किसकी श्रद्धा नहीं होगी ॥२६-३४॥ सूत बोले—ऋषिवर्यवृन्द ! एवमस्तु, कृपाकर सुनिए ? इस विषय में सनकादि प्रमुख ऋषियों ने महात्मा नारद से जिस पुराण को कहा है उसी को यहाँ कह रहा हूँ। वह वेदार्थसम्मत पुराण नारद पुराण नाम से प्रसिद्ध है। वह पापनाशक, दुष्टग्रह-शान्ति-कारक, भुक्ति-मुक्ति-प्रदाता, पुण्यवर्धक, दुःस्व- प्ननाशक, भगवान् श्रीनारायण की पुण्यकथाओं से सम्पन्न एवं कल्याणप्रद है। ऐसे धर्म-अर्थ, काम और मोक्ष के हेतुभूत, महाफलदायक अपूर्व और पुण्यफलदायक पुराण आप लोग सावधान होकर सुनें ! छोटे बड़े पापों को करने वाले व्यक्ति भी इस आर्ष एवं दिव्य पुराण को सुनकर शुद्ध हो जाते हैं। इसके एक अध्याय के पाठ करने से भी मनुष्य अश्वमेध के बराबर फल पाते हैं । दो अध्याय के पाठ से तो वह राजसूय का फल पा जाता है। जेठ मास की पूर्णिमा को मूल नक्षत्र में एकाग्र भाव से यमुना में स्नान करने और मथुरा पुरी में उपवास-व्रत करके कृष्ण की विधिवत् पूजा करने से मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, वह फल इस पुराण के तीन अध्याय के पाठ से मिल जाता है । अतएव इस पुराण की कथा आज मैं भलीभाँति कह रहा हूँ, आप लोग सुनें । मनुष्य इस पुराण को सुनकर दस हजार जन्मों के किये हुए पापों से मुक्त होकर अपने करोड़ों कुलों के साथ ब्रह्म-पद को प्राप्त करता है । भक्ति पूर्वक इसके दश अध्यायों के सुनने से निर्वाण प्राप्त होता है । इसमें किसी प्रकार की शंका करने की आवश्यकता नहीं है । द्विजगण ! इस परम पवित्र, कल्याणमय, दुःस्वप्न नाशक पुण्य पुराण को यत्न पूर्वक सुनना चाहिए । श्रद्धा के सहित मनुष्य यदि एक श्लोक अथवा आधा श्लोक भी पढ़े तो भी असंख्य महापापों से छूट जाता है ३५-४६३॥ यह पुराण श्रद्धालु व्यक्ति को ही सुनाना चाहिए, क्योंकि इसका रहस्य गोपनीय है । इस पुराण को
नारदीयपुराणम् ५ जनानां बकवृत्तीनां न ब्रूयादिदमुत्तमम् । त्यक्तकामादिदोषाणां विष्णुभक्तिरतात्मनाम् ॥४९॥ सदाचारपराणां च वक्तव्यं मोक्षसाधनम् । सर्वदेवमयो विष्णुःस्मरतामार्त्तिनाशनः ॥५०॥ सद्भक्तिवत्सलो विप्रा भक्त्या तुष्यति नान्यथा । अश्रद्धयापि यन्नाम्नि कीर्त्तितेऽथस्मृतेऽपि वा ॥५१॥ विमुक्तः पातकैर्मर्त्यो लभते पदमव्ययम् । संसारघोरकान्तारदावाग्निर्मधुसूदनः ॥५२॥ स्मरतां सर्वपापानि नाशयत्याशु सत्तमाः । तदर्थद्योतकमिदं पुराणं श्राव्यमुत्तमम् ॥५३॥ श्रवणात्पठनाद्वापि सर्वपापविनाशकृत् । यस्यास्य श्रवणे बुद्धिर्जायते भक्तिसंयुता ॥५४॥ स एव कृतकृत्यस्तु सर्वशास्त्रार्थकोविदः । यदजितं तपः पुण्यं तन्मन्ये सफलं द्विजाः ॥५५॥ यदस्य श्रवणे भक्तिरन्यथा नहि जायते । सत्कथासु प्रवर्त्तन्ते सज्जना ये जगद्धिताः ॥५६॥ निन्दायां कलहे वापि ह्यसन्ततः पापतत्पराः । पुराणेष्वर्थवादत्वं ये वदन्ति नराधमाः ॥५७॥ तैरर्जितानि पुण्यानि क्षयं यान्ति द्विजोत्तमाः । समस्तकर्मनिर्मूलसाधनानि नराधमः ॥५८॥ पुराणान्यर्थवादेन ब्रुवन्नरकमाश्नुते । अन्यानि साधयन्त्येव कार्याणि विधिना नराः ॥५९॥ पुराणानि द्विजश्रेष्ठाः साधयन्ति न मोहिताः । अनायासेन यः पुण्यानीच्छतीह द्विजोत्तमाः ॥६०॥ श्रोतव्यानि पुराणानि तेन वै भक्तिभावतः । पुराणश्रवणे बुद्धिर्यस्य पुंसः प्रवर्त्तते ॥६१॥ पुरार्जितानि पापानि तस्य नश्यन्त्यसंशयम् । पुराणे वर्त्तमानेऽपि पापपाशेन यन्त्रितः ॥ आदरेणान्यगाथासु सक्तबुद्धिः पतत्यधः ॥६२॥ पवित्र क्षेत्र में द्विजातियों के समीप भगवान् विष्णु के सान्निध्य में सुनाना चाहिए । ब्रह्मद्रोह करने वालों, पाखण्ड में रत रहने वालों और बगुला भक्तों को तो कभी भी यह उत्तम पुराण नहीं सुनाना चाहिए । यह मोक्षदायी पुराण सदाचारपरायण, कामादिदोषरहित और विष्णु-भक्ति में तल्लीन रहने वाले महापुरुषों को सुनाना चाहिए । विप्रगण ! स्मरण करने वालों की पीड़ा दूर करने वाले, सच्ची भक्ति के स्नेही और अखिल देव स्वरूप विष्णु भक्ति से सन्तुष्ट होते हैं, अन्य प्रकार से नहीं । मनुष्य यदि बिना श्रद्धा के भी विष्णु का नाम कीर्तन अथवा स्मरण करे तो भी अपने पापों से मुक्त होकर शाश्वत पद को प्राप्त करता है । सज्जनो ! संसार रूपी घोर महा- वन के लिए वनाग्नि के समान मधुसूदन भगवान् अपने स्मरण करने वालों का सब पाप शीघ्र नष्ट कर देते हैं । उनकी महिमा को प्रकट करने वाले इस उत्तम पुराण का तो सर्वदा श्रवण करना चाहिए । इसके सुनने और स्वयं पाठ करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं । द्विजो ! जिस मनुष्य की इस पुराण के श्रवण में श्रद्धायुक्त बुद्धि हो जाती है, वही कृतकृत्य है वही सब शास्त्रों का ज्ञाता है । द्विजगण ! अर्जित किये हुए तप और पुण्य के फलोदय होने से इस पुराण के सुनने में भक्ति होती है, अन्यथा नहीं । सत्कथाओं को सुनने की इच्छा उन्हीं व्यक्तियों को होती है जो सज्जन और जगत् का कल्याण करने वाले हैं ।४७-५६॥ जो दुष्ट और पापी हैं वे तो सर्वदा परनिन्दा और कलह में लगे रहते हैं । जो नराधम पुराणों पर अर्थ- वाद का दोष लगाते हैं अर्थात् पुराणों को असत्य और अत्युक्ति कहते हैं, उनके पूर्वार्जित सभी सुकृत नष्ट हो जाते हैं । समस्त कर्मों को निर्मूल करने के साधन पुराणों को अर्थवाद से युक्त कहने वाला नराधम नरक भोग करता है । मोहग्रस्त द्विजवर पुराणों को नहीं साधते हैं । द्विजश्रेष्ठो ! जो व्यक्ति अनायास पुण्य प्राप्त करना चाहते हैं, उनको अवश्य भक्तिपूर्वक पुराणों का श्रवण करना चाहिए । पुराणों के श्रवण में जिस मनुष्य की रुचि हो जाती है निःसन्देह उसके पूर्वार्जित पाप शीघ्र नष्ट हो जाते हैं । पुराणों के रहते हुए भी पाप की रस्सी में बँधा प्राणी अन्य कथाओं की ओर मन लगाकर पाप के गड्ढे में गिरता है ॥५७-६२॥
सत्सङ्गदेवार्चनसत्कथासु हितोपदेशे निरतो मनुष्यः ।
६ नारदीयपुराणम् सत्सङ्गदेवार्चनसत्कथासु हितोपदेशे निरतो मनुष्यः । प्रयाति विष्णोः परमं पदं यद्देहावसानेऽच्युततुल्यतेजाः ॥६३॥ तस्मादिदं नारदनामधेयं पुण्यं पुराणं शृणुत द्विजेन्द्राः । यस्मिञ्छुते जन्मजरादिहीनो नरो भवेदच्युतनिष्ठचेताः ॥६४॥ वरं वरेण्यं वरदं पुराणं निजप्रभावितसर्वलोकम् । संकल्पितार्थप्रदमादिदेवं स्मृत्वा व्रजेन्मुक्तिपदं मनुष्यः ॥६५॥ ब्रह्मेशविष्ण्वादिशरीरभेदैर्विश्वं सृजत्यत्ति च पाति विप्राः । तमादिदेवं परमं परेशमाधाय चेतस्युपयाति मुक्तिम् ॥६६॥ यो नाम जात्यादिविकल्पहीनः परः पराणां परमः परस्मात् । वेदान्तवेद्यः स्वजनप्रकाशः समीड्यते सर्वपुराणवेदैः ॥६७॥ तस्मात्तमीशं जगतां विमुक्तिमुपासनायालमजं मुरारिम् । परं रहस्यं पुरुषार्थहेतुं स्मृत्वा नरो याति भवाब्धिपारम् ॥६८॥ वक्तव्यं धार्मिकेभ्यस्तु श्रद्दधानेभ्य एव च । मुमुक्षुभ्यो यतिभ्यश्च वीतरागेभ्य एव च ॥६९॥ वक्तव्यं पुण्यदेशे च सभायां देवतागृहे । पुण्यक्षेत्रे पुण्यतीर्थे देवब्राह्मणसन्निधौ ॥७०॥ उच्छिष्टदेशे वक्तार आख्यानमिदमुत्तमम् । पच्यन्ते नरके घोरे यावदाभूतसंप्लवम् ॥७१॥ मृषा शृणोति यो मूढो दम्भी भक्तिविवर्जितः । सोऽपि तद्वन्महाघोरे नरके पच्यतेऽक्षये ॥७२॥ नरो यः सत्कथामध्ये संभावां कुरुतेऽन्यतः । स याति नरकं घोरं तदेकाग्रमना भवेत् ॥७३॥ श्रोता वक्ता च विप्रेन्द्रा एष धर्मः सनातनः । असमाहितचित्तस्तु न जानाति हि किंचन ॥७४॥ इसके विपरीत जो मनुष्य सत्संग, देवार्चन, सत्कथा श्रवण और माङ्गलिक उपदेश श्रवण में निरत रहता है वह मृत्यु के बाद अच्युत के समान तेजस्वी बनकर विष्णु के परमपद को प्राप्त करता है ॥६३॥ द्विजोत्तमवृन्द ! इसलिए नारद नामक इस पुण्यदायक पुराण को तुम लोग सुनो, जिसके सुनने से मनुष्य जन्म-मरण के क्लेश से मुक्त होकर अच्युत में अचल भक्ति प्राप्त करता है । श्रेष्ठ, महनीय, वरदाता, पुराण, अपनी कान्ति से सम्पूर्ण लोक को वशीभूत करने वाले और मनोरथों को पूर्ण करने वाले आदिदेव का स्मरण कर मनुष्य मोक्ष पदवी को प्राप्त करता है । द्विजो ! जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव रूपों में अपने को विभक्त कर विश्व की सृष्टि, पालन और नाश करता है उस आदिदेव, परम पुरुष महाप्रभु का हृदय में ध्यान कर मनुष्य मुक्ति प्राप्त करता है । जो नाम, जाति आदि विकल्पों से रहित, पर, परात्पर, परम से भी परम, वेदान्त (ज्ञान) द्वारा जानने योग्य और भक्तों के लिए प्रकाश स्वरूप है उसी की पूजा सब पुराणों के ज्ञाता व्यक्ति करते हैं । इसलिए उस जगत् को मुक्ति देने वाले, उपासना से प्राप्त करने योग्य, अज, पर, रहस्यमय और मोक्षदाता मुरारि का स्मरण कर मनुष्य इस संसार-सागर को पार कर जाता है । यह पुराण मुमुक्षु, यति, वीतराग, धार्मिक और श्रद्धालु जनों को ही सुनाना चाहिए । इस पुण्य पुराण का पाठ पुण्य क्षेत्र में, सभा में, देवमन्दिरों में, पवित्रतीर्थों में और देवता तथा ब्राह्मणों के समीप ही होना चाहिए । जो मूढ़ अपवित्र स्थानों में इस उत्तम कथा का उपदेश करता है वह प्रलय काल तक घोर नरक में कष्ट पाता है । इसी प्रकार जो पाखण्डी श्रोता श्रद्धाहीन होकर केवल दिखाने के लिए इस उत्तम आख्यान को सुनता है, वह भी दम्भी वक्ता के समान ही घोर नरक में यातना पाता है ॥६४-७२॥ जो नर पुराण-पाठ के समय व्यर्थ की बातें करता है, वह घोर नरक में जाता है। अतएव विप्रेन्द्रो ! श्रोता और वक्ता सबको एकाग्रमन से कथा का श्रवण या पाठ करना चाहिए। यही कथा की सनातन विधि है
द्वितीयाऽध्यायः ७ तत एकमना भूत्वा पिबेद्धरिकथामृतम् । कथं संभ्रान्तचित्तस्य कथास्वादः प्रजायते ॥७५॥ किं सुखं प्राप्यते लोके पुंसा संभ्रान्तचेतसा । तस्मात्सर्वं परित्यज्य कामं दुःखस्य साधनम् ॥७६॥ समाहितमना भूत्वा कुर्यादच्युतचिन्तनम् । येन केनाप्युपायेन स्मृतो नारायणोऽव्ययः ॥७७॥ अपि पातकयुक्तस्य प्रसन्नः स्यान्न संशयः । यस्य नारायणे भक्तिर्विभो विश्वेश्वरेऽव्यये ॥ तस्य स्यात्सफलं जन्म मुक्तिश्चैव करे स्थिता ॥७८॥ धर्मार्थकाममोक्षाख्यपुरुषाथा द्विजोत्तमाः । हरिभक्तिपराणां वै संपद्यन्ते न संशयः ॥७६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे सूतर्षिसंवादो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥ द्वितीयोऽध्यायः ऋषय ऊचुः कथं सनत्कुमारस्तु नारदाय महात्मने । प्रोक्तवान्सकलान्धर्मान्कथं तौ मिलितावुभौ ॥१॥ कस्मिन्स्थाने स्थितौ सूत तावुभौ ब्रह्मवादिनौ । हरिगीतसमुद्गाने चक्रतुस्तद्वदस्व नः ॥२॥ और यही सनातन धर्म है। जो एकाग्रमन से कथा नहीं सुनता है, वह कथा का कुछ भी रस या रहस्य नहीं जान पाता है। इसलिए एकाग्रचित्त होकर हरिकथा रूपी अमृत का पान करना चाहिए, इधर-उधर मन दौड़ाने वाले को कैसे कथा का रस (आनन्द) प्राप्त हो सकता है ॥७३-७५॥ भ्रान्त चित्त वाले व्यक्ति को इस लोक में क्या सुख मिल सकता है ? इसलिए दुःखमूलक भौतिक काम- नाओं को छोड़कर एकाग्र भाव से भगवान् अच्युत का चिन्तन करना चाहिए । चाहे अत्यन्त घोर पापी ही क्यों न हो परन्तु यदि वह जिस किसी प्रकार से अव्यय नारायण का स्मरण करता है तो भगवान् पतितपावन अवश्य उस पर प्रसन्न होते हैं, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । जिस व्यक्ति को अविनाशी, विश्व के स्वामी और व्यापक नारायण में अनन्य भक्ति होती है, उसी का जन्म सफल है और मुक्ति उसके हाथ में रहती है । द्विजो- त्तमवृन्द ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष नाम के पुरुषार्थ हरिभक्तों को अवश्य प्राप्त हो जाते हैं, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं ॥७६-७८॥ श्री बृहन्नारदीयपुराण के पूर्वार्ध के प्रथम भाग में सूत और ऋषियों के संवाद नामक पहला अध्याय समाप्त ॥१॥ अध्याय २ नारद द्वारा विष्णु की स्तुति ऋषि बोले—महात्मा नारद को सनत्कुमार ने किस प्रकार सब धर्मों का रहस्य बतलाया ? और कैसे उन दोनों महापुरुषों का मिलन हुआ ? किस स्थान पर स्थित होकर उन दोनों ब्रह्मवादी महात्माओं ने भगवान् के इस पुण्य आख्यान की चर्चा की ? हे सूत, इन्हें विस्तार पूर्वक हमें समझाइये ॥१-२॥
यहाँ पृष्ठ का पूर्ण देवनागरी लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
८ नारदीयपुराणम् सूत उवाच सनकाद्या महात्मानो ब्रह्मणो मानसाः सुताः । निर्ममा निरहंकाराः सर्वे ते ह्यूर्ध्वरेतसः ॥३॥ तेषां नामानि वक्ष्यामि सनकश्च सनन्दनः । सनत्कुमारश्च विभुः सनातन इति स्मृतः ॥४॥ विष्णुभक्ता महात्मानो ब्रह्मध्यानपरायणाः । सहस्रसूर्यसंकाशाः सत्यसन्धा मुमुक्षवः ॥५॥ एकदा मेरुशृङ्गं ते प्रस्थिता ब्रह्मणः सभाम् । इष्टं मार्गेऽथ ददृशुः गङ्गां विष्णुपदीं द्विजाः ॥६॥ तां निरीक्ष्य समुद्युक्ताः स्नातुं सीताजलेऽभवन् । एतस्मिन्नन्तरे तत्र देवर्षिर्नारदो मुनिः ॥७॥ आजगाम द्विजश्रेष्ठा दृष्ट्वा भ्रान्तॄन्स्वकाग्रजान् । तान्दृष्ट्वा स्नातुमुद्युक्तान्नमस्कृत्य कृतांजलिः ॥८॥ गृणन्नामानि सप्रेमभक्तियुक्तो मधुद्विषः । नारायणाच्युतानन्त वासुदेव जनार्दन ॥९॥ यज्ञेश यज्ञपुरुष कृष्ण विष्णो नमोऽस्तु ते । पद्माक्ष कमलाकान्त गङ्गाजनक केशव ॥ क्षीरोदशायिन्देवेश दामोदर नमोऽस्तु ते ॥१०॥ श्रीराम विष्णो नरसिंह वामन प्रद्युम्न संकर्षण वासुदेव । अजानिरुद्धामलरुङ् मुरारे त्वं पाहि नः सर्वभयादजस्रम् ॥११॥ इत्युच्चरन्हरेर्नाम नत्वा तांस्वाग्रजान्मुनीन् । उपासीनश्च तैः सार्द्धं सस्नौ प्रीतिसमन्वितः ॥१२॥ तेषां चापि तु सीताया जले लोकमलापहे । स्नात्वा संतर्प्य देवर्षिपिटून्विगतकल्मषाः ॥१३॥ उत्तौर्य संध्योपास्त्यादि कृत्वाचारं स्वकं द्विजाः । कथां प्रचक्रुर्विविधा नारायणगुणाश्रिताः ॥१४॥ कृतक्रियेषु मुनिषु गङ्गातीरे मनोरमे । चकार नारदः प्रश्नं नानाख्यानकथान्तरे ॥१५॥ सूत बोले—महात्मा सनक आदि ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं वे सभी अतिविनीत, मायारहित और ऊर्ध्व- रेता हैं । उन लोगों का नाम कहता हूँ । वे सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और विभु सनातन नाम से प्रसिद्ध हैं । वे विष्णुभक्त, महात्मा ब्रह्मोपासना में निरत रहने वाले, सहस्र सूर्यों के समान कान्तिमान्, सत्यवक्ता और मुक्ति- परायण हैं । एक समय वे ब्रह्मा की सभा में सम्मिलित होने के लिए मेरुशृङ्ग की ओर चले । द्विजो ! उन के मार्ग में ही विष्णु-चरण से निकलने वाली विष्णुपदी गंगा दिखाई दी । उसको देखकर वे महामुनि उस सीता (गंगा) के जल में स्नान करने के लिए प्रस्तुत हुए । उसी समय वहाँ देवर्षिनारद भी आ गये । द्विजश्रेष्ठो ! स्नान करने के लिए प्रस्तुत अपने उन अग्रज भाइयों को देखकर नमस्कार करके हाथ जोड़कर प्रेम पूर्वक भक्ति से मधुसूदन का नाम कीर्तन करने लगे—नारायण ! अच्युत ! अनन्त ! वासुदेव ! जनार्दन ! यज्ञेश ! यज्ञपुरुष ! कृष्ण ! विष्णु ! आपको नमस्कार है । कमलोचन ! कमलापति ! गंगा के जनक ! केशव ! क्षीरशायी ! देवेश ! दामोदर ! आपको नमस्कार करता हूँ । श्रीराम ! विष्णु ! नरसिंह ! वामन ! प्रद्युम्न ! संकर्षण ! वासुदेव ! अज ! अनिरुद्ध ! विमल कान्तिमान् ! मुरारे ! आप सब प्रकार के भयों से हमारी रक्षा कीजिए । इस प्रकार उच्च स्वर से हरिनाम का स्मरण कर अपने उन अग्रज मुनियों को नमस्कार करके उनके साथ प्रेम पूर्वक स्नान करने के उपरान्त बैठ गए । द्विजो ! वे भी पापों को दूर करने वाले सीता के जल में विधिवत् स्नान कर देव, ऋषि और पितर के तर्पण से निवृत्त हो शुद्ध हो गये । द्विजो ! इस प्रकार वे अपने नित्यकर्म और उपासना से निवृत्त हो भगवान् नारायण और उनके भक्तों की चर्चा करने लगे । उस मनोहर गंगा के तट पर जब वे मुनि अपने सान्ध्य- कर्म से निवृत्त हो गये तब अवसर पाकर नारद जी ने नाना कथाओं और आख्यानों के विषय में पूछा ॥३-१५॥
द्वितीयोऽध्यायः ६ नारद उवाच सर्वज्ञाः स्थ मुनिश्रेष्ठाः भगवद्भक्तितत्पराः । यूयं सर्वे जगन्नाथा भगवन्तः सनातनाः ॥१६॥ लोकोद्धारपरान्युष्मन्दीनेषु कृतसौहृदान् । पृच्छे ततो वदत मे भगवल्लक्षणं बुधाः ॥१७॥ येनेदमखिलं जातं जगत्स्थावरजङ्गमम् । गङ्गापादोदकं यस्य स कथं ज्ञायते हरिः ॥१८॥ कथं च विविधं कर्म सफलं जायते नृणाम् । ज्ञानस्य लक्षणं ब्रूत तपसश्चापि मानदाः ॥१९॥ अतिथेः पूजनं वापि येन विष्णुः प्रसीदति । एवमादीनि गुह्यानि हरितुष्टिकराणि च । अनुगृह्य च मां नाथास्तत्त्वतो वक्तुमर्हथ ॥२०॥ शौनक उवाच नमः पराय देवाय परस्मात्परमाय च । परावरनिवासाय सगुणायागुणाय च ॥२१॥ अमायायात्मसंज्ञाय मायिने विश्वरूपिणे । योगीश्वराय योगाय योगगम्याय विष्णवे ॥२२॥ ज्ञानाय ज्ञानगम्याय सर्वज्ञानैकहेतवे । ज्ञानेश्वराय ज्ञेयाय ज्ञात्रे विज्ञानसंपदे ॥२३॥ ध्यानाय ध्यानगम्याय ध्यातृपापहराय च । ध्यानेश्वराय सुधिये ध्येयध्यातृस्वरूपिणे ॥२४॥ आदित्यचन्द्राग्निविधातृदेवाः सिद्धाश्च यक्षासुरनागसङ्घाः । यच्छक्तियुक्तास्तमजं पुराणं सत्यं स्तुतीशं सततं नतोऽस्मि ॥२५॥ यो ब्रह्मरूपी जगतां विधाता स एव पाता द्विजविष्णुरूपी । कल्पान्तरुद्राख्यतनुः स देवः शेतेऽङ्घ्रिपानस्तमजं भजामि ॥२६॥ नारद बोले—मुनिश्रेष्ठ ! आप लोग सर्वज्ञ और सर्वदा भगवद् भक्तों में ही लीन रहने वाले महात्मा हैं। आप सभी संसार के स्वामी, सनातन और भगवद्रूप हैं। आप लोकोद्धार में सर्वदा निरत रहने वाले और दीन जनों पर कृपा करने वाले हैं। अतः हे बुधवृन्द ! आप से मैं भगवद्-विभूति के विषय में पूछ रहा हूँ कृपाकर बतलाइये। जिन भगवान् से इस स्थावर जंगमात्मक अखिल विश्व की सृष्टि हुई है और गंगा जिनके चरणोदक (चरणों से निकली हुई) हैं, वे किस प्रकार जाने जा सकते हैं ? ज्ञान और तपस्या के लक्षण क्या हैं ? वह बताइये । अतिथि-पूजन, जिससे विष्णु प्रसन्न होते हैं वह तथा इसी प्रकार के अन्य रहस्य एवं विष्णु को प्रसन्नता के उपाय कहिए। नाथ ! आप मेरे ऊपर अनुग्रह करके इन प्रश्नों को यथार्थ रूप से समझाइये ॥१६-२०॥ शौनक बोले—श्रेष्ठ देव तथा श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठतम देव को नमस्कार है। क्षुद्र से क्षुद्र और महान् से महान् पदार्थों में रहने वाले, सगुण, अगुण, मायारहित, आत्मज्ञ, माया स्वरूप और विश्वरूप को नमस्कार है। योगीश्वर, योगिरूप, योग द्वारा प्राप्त करने योग्य विष्णु को नमस्कार है। ज्ञानरूप, ज्ञान द्वारा जानने योग्य, सब ज्ञानों के एकमात्र कारण, ज्ञानेश्वर, ज्ञेय, ज्ञाता और विज्ञान सागर को नमस्कार है। ध्यानरूप, ध्यान से प्राप्त करने योग्य, ध्यान करने वालों के पाप को हरने वाले, ध्यानेश्वर, सुधी, ध्येय और ध्याता स्वरूप को नमस्कार है। जिसकी शक्ति से आदित्य, चन्द्रमा, अग्नि, विधाता, सब देवता, सिद्ध, यक्ष, असुर और नाग समूह शक्तिमान् हैं उस अज, पुराण, सत्य और सब स्तुतियों के एकमात्र ईश को सतत नमस्कार हैं। जो ब्रह्मारूप से विश्व का निर्माण करता, द्विज विष्णु के रूप में रक्षा करता और कल्पान्त में रुद्र रूप धारणकर विश्व का संहार करता २—ना० पु०
१० नारदीयपुराणम् यन्नामसंकीर्त्तनतो गजेन्द्रो ग्राहोग्रबन्धन्मुमुचे स देवः । विराजमानः स्वपदे पराख्ये तं विष्णुमाद्यं शरणं प्रपद्ये ॥२७॥ शिवस्वरूपो शिवमक्तिभाजां यो विष्णुरूपी हरिभावितानाम् । संकल्पपूर्वात्मकदेहहेतुस्तमेव नित्यं शरणं प्रपद्ये ॥२८॥ यः केशहन्ता नरकान्तकश्च बालो भुजाग्रेण दधार गोत्रम् । देवं च भूभारविनोदशीलं तं वासुदेवं सततं नतोऽस्मि ॥२६॥ लेभेऽवतीर्याग्रनृसिंहरूपी यो दैत्यवक्षः कठिनं शिलावत् । विदार्य संरक्षितवान्स्वभक्तं प्रह्लादमीशं तमजं नमामि ॥३०॥ व्योमादिभिर्भूतमात्मसंज्ञं निरञ्जनं नित्यममेयतत्त्वम् । जगद्विधातारमकर्मकं च परं पुराणं पुरुषं नतोऽस्मि ॥३१॥ ब्रह्मेन्द्ररुद्रानिलवायुमर्त्यगन्धर्वयक्षासुरदेवसंधैः । स्वमूर्तिभेदैः स्थित एक ईशस्तमादिमात्मानमहं भजामि ॥३२॥ यतो भिन्नमिदं सर्वं समुद्भूतं स्थितं च वै । यस्मिन्नेष्यति पश्चाच्च तमस्मि शरणं गतः ॥३३॥ यः स्थितो विश्वरूपेण सङ्गीवात प्रतीयते । असङ्गो परिपूर्णश्च तमस्मि शरणं गतः ॥३४॥ हृदि स्थितोऽपि यो देवो मायया मोहितात्मनाम् । न ज्ञायेत परः शुद्धस्तमस्मि शरणं गतः ॥३५॥ सर्वसंगनिवृत्तानां ध्यानयोगरतात्मनाम् । सर्वत्र भाति ज्ञानात्मा तमस्मि शरणं गतः ॥३६॥ दधार मंदरं पृष्ठे निरोदेऽमृतमन्थने । देवतानां हितार्थाय तं कूर्मं शरणं गतः ॥३७॥ और अन्त में स्वयं क्षीर सागर में शयन करता है ऐसे अज का मैं भजन करता हूँ । जिसके नाम के स्मरण मात्र से गजेन्द्र ग्राह के कठोर बन्धन से मुक्त हो गया, जो देव सर्वदा अपने परम पद पर विराजमान रहते हैं, उस आदि विष्णु की शरण में मैं आया हूँ । जो शिव भक्तों के लिये शिव स्वरूप और वैष्णवों के लिए विष्णु स्वरूप हैं जो पूर्व संकल्प के अनुरूप शरीर धारण करते हैं उसी देव की शरण में मैं नित्य रहता हूँ । जिसने केशो का नाश किया, नरकासुर को यमलोक पहुँचाया, बालक होते हुए भी जिसने अंगुली पर पर्वत को उठा लिया, जिसने पृथ्वी के भार को दूर करने का स्वभाव-सा बना लिया है उस वासुदेव को सतत नमस्कार है ॥२१-२६॥ जिसने सिंह रूप में अवतार लेकर शिला के समान कठिन हिरण्यकशिपु के वक्षःस्थल को नखों से फाड़ डाला और अपने प्रिय भक्त प्रह्लाद की रक्षा की उस अज ईश को नमस्कार करता हूँ। जो आकाश आदि पंच तत्त्वों से विभूषित, आत्मा नाम से प्रसिद्ध, निर्गुण, नित्य, रहस्यमय, जगत् के स्रष्टा और कर्मशून्य है उस परमपुराण पुरुष को नमस्कार करता हूँ ॥३०-३१॥ जो एक होते हुए भी ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, वायु, मनुष्य, गन्धर्व, यक्ष, असुर और देव समूह आदि अनेक रूपों में स्थित है उस आदि आत्मा को मैं भजता हूँ । जिससे ये सारे भिन्न लोक उत्पन्न हुए, जिसमें स्थित हैं और अन्त में जिसमें लीन भी होंगे उस देव की शरण में मैं प्राप्त हूँ । जो विश्व रूप में स्थित होकर इसमें लिप्त-सा जान पड़ता है, उस निर्लिप्त और परिपूर्ण देव की शरण में प्राप्त हूँ । जो पर और शुद्ध ब्रह्म सब प्राणियों के हृदय में रहता हुआ भी माया- बद्ध जीवों से नहीं जाना जाता है उस ईश की शरण में प्राप्त हूँ । जो ज्ञानरूप परमात्मा सब प्रकार की आस- क्तियों से विरत और ध्यान योग में रत रहने वाले महापुरुषों को सर्वत्र प्रकाशरूप में दिखायी पड़ता है उस ज्ञान रूप भगवान् की शरण में प्राप्त हूँ । जिसने अमृत के लिये किये गये समुद्र मन्थन के समय देवों के हित के लिए मेरु को अपनी पीठ पर धारण किया उस कूर्म की शरण में प्राप्त हूँ ॥३२-३७॥ जिस अनन्त ने अपने दाँतों के अग्र भाग से
द्वितीयोऽध्यायः ११ दंष्ट्राङ्कुरेण योऽनन्तः समुद्धृत्यार्णवाद्वराम् । तस्थाविदं जगत्कृत्स्नं वाराहं तं नतोऽस्म्यहम् ॥३८॥ प्रह्लादं गोपयन्दैत्यं शिलातिकठिनोरसम् । विदार्य हतवांस्त्यो हि तं नृसिंहं नतोऽस्म्यहम् ॥३९॥ लब्ध्वा वैरोचनेर्भूमिं द्वभ्यां पद्भ्यामतीत्य यः । आब्रह्मभुवनं प्रादात्सुरेभ्यस्तं नतोऽजितम् ॥४०॥ हैहयस्यापराधेन ह्येकविंशतिसंख्यया । क्षत्रियान्वयभेत्ता यो जामदग्न्यं नतोऽस्मि तम् ॥४१॥ आविर्भूतश्चतुर्द्धा यः कपिभिः परिवारितः । हतवान्राक्षसानीकं रामचन्द्रं नतोऽस्म्यहम् ॥४२॥ मूर्तिद्वयं समाश्रित्य भूभारमपहृत्य च । संजहार कुलं स्वं यस्तं श्रीकृष्णमहं भजे ॥४३॥ भूर्यादिलोकत्रितयं संतृप्तात्मानमात्मनि । पश्यन्ति निर्मलं शुद्धं तमीशानं भजाम्यहम् ॥४४॥ युगान्ते पापिनो शुद्धान्भित्त्वा तीक्ष्णसुधारया । स्थापयामास यो धर्मं कृतादौ तन्नमाम्यहम् ॥४५॥ एवमादीन्यनेकानि यस्य रूपाणि पाण्डवाः । न शक्यं तेन संख्यातुं कोट्यब्दैरपि तं भजे ॥४६॥ महिमानं तु यन्नाम्नः परं गंतुं मुनीश्वराः । देवासुराश्च मनवः कथं तं क्षुल्लको भजे ॥४७॥ यन्नामश्रवणेनापि महापातकिनो नराः । पवित्रतां प्रपद्यन्ते तं कथं स्तौमि चाल्पधीः ॥४८॥ यथाकथंचिद्यन्नाम्नि कीर्तिते वा श्रुतेऽपि वा । पापिनस्तु विशुद्धाः स्युः शुद्धा मोक्षमवाप्नुयुः ॥४९॥ आत्मन्यात्मानमाधाय योगिनो गतकल्मषाः । पश्यन्ति यं ज्ञानरूपं तमस्मि शरणं गतः ॥५०॥ साङ्ख्याः सर्वेषु पश्यन्ति परिपूर्णात्मकं हरिम् । तमादिदेवमजरं ज्ञानरूपं भजाम्यहम् ॥५१॥ सर्वसत्त्वमयं शान्तं सर्वं द्रष्टारमीश्वरम् । सहस्रशीर्षकं देवं वन्दे भावात्मकं हरिम् ॥५२॥
समुद्र-मग्न पृथ्वी को खींचकर उस सम्पूर्ण संसार की स्थापना की, उस भगवान् वाराह को नमस्कार करता हूँ। जिसने प्रह्लाद की रक्षा करते हुए चट्टान से भी कठिन छाती को फाड़कर दैत्य हिरण्यकशिपु को मार डाला उस नृसिंह को नमस्कार है। जिसने विरोचन के पुत्र बलि से भूमि का दान प्राप्त कर उसको दो ही डगों से नाप डाला और ब्रह्मलोक पर्यन्त भुवन देवों को दे दिया उस अजित वामन को नमस्कार है। हैहय के अपराध के कारण इक्कीस बार क्षत्रिय वंश का नाश करने वाले जो देव परशुराम हैं उनको नमस्कार करता हूँ। जिसने चार १रूपों में प्रकट होकर बन्दरों की सहायता से राक्षसों की सेना का वध किया उस रामचन्द्र को नमस्कार करता हूँ। जिसने दो रूपों में (बलराम-कृष्ण) अपने को व्यक्त कर भू-भार को दूर किया और स्वयं अपने कुल का भी संहार कर डाला उस भगवान् श्रीकृष्ण को नमस्कार है। योगी लोग अपने आत्मा में भू आदि तीनों लोकस्वरूप जिस पूर्णात्मा को देखते हैं, उस निर्मल एवं शुद्ध प्रभु का मैं भजन करता हूँ। जिस भगवान् ने युग के अन्त में (खड्ग की) तीक्ष्ण धार से अपवित्र पापियों को नष्ट कर कृतयुग के आदि में धर्म की स्थापना की उस कल्कि भगवान् को नमस्कार है ॥३८-४५॥ पाण्डवो ! ऐसे जिसके अनेकों रूप हैं जिसकी गणना करोड़ों वर्षों में भी नहीं की जा सकती है, उस भगवान् को मैं नमस्कार करता हूँ। जिसके नामों की महिमा का मुनीश्वर, देव, असुर और मनुष्य भी पार नहीं पा सकते हैं, उसको मुझ जैसा क्षुद्र व्यक्ति कैसे भजेगा ? जिसके नाम श्रवण मात्र से महापापी मनुष्य भी पवित्र हो जाते हैं, उसकी स्तुति मेरे समान क्षुद्र बुद्धि कैसे कर सकता है ? जिस किसी प्रकार से जिसके नाम श्रवण या कीर्तन से पापी पापमुक्त हो जाते और शुद्ध भक्त मोक्ष पा जाते हैं और अपने में ही (अन्तःकरण- रूप परम तत्त्व में) अपना ध्यान लगाकर निष्पाप योगी जिस ज्ञानरूप ब्रह्म को देखते हैं, उस ब्रह्म की शरण में मैं प्राप्त हूँ। ज्ञानी व्यक्ति जिस परिपूर्ण ब्रह्म को चराचर में देखते हैं उस आदि देव, अजर ज्ञान रूप ब्रह्म की आराधना करता हूँ ॥४६-५१॥ सकल प्राणिमय, शान्त, सर्वज्ञ, सर्वद्रष्टा, ईश्वर और सहस्र शिर वाले देव एवं भावरूप हरि
१. यहाँ चारों भाइयों से तात्पर्य है।