भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 1008 में से

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( ४ ) तात्पर्य है। गृहाश्रमियों के लिए स्मृति ही वेद है अर्थात् गृहस्थ के आचार-व्यवहार आदि के ज्ञान का प्रका- शक धर्मस्मृति ही है। ये दोनों प्रकार के ग्रन्थ पुराण में केन्द्रित रहते हैं। जिस प्रकार यह आश्चर्यमय जगत् उस पुराणपुरुष (नारायण भगवान्) से उत्पन्न हुआ है, उसी प्रकार समस्त वाङ्मय विस्तृत अर्थ में पुराण साहित्य से ही उत्पन्न हुआ है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं— शृणु मोहिनि मद्वाक्यं वेदोऽयं बहुधा स्थितः । यज्ञकर्म क्रिया वेदः स्मृतिर्वेदो गृहाश्रमे ।। स्मृतिर्वेदः क्रिया वेदः पुराणेषु प्रतिष्ठितः । पुराणपुरुषाज्जातं यथेदं जगदद्भुतम् । तथेदं वाङ्मयं सर्वं पुराणेभ्यो न संशयः ।। (ना० पु० २।२४।१५-१६) पुराण की सहायता वेद भी अपने रहस्य के उपबृंहण के निमित्त सर्वदा चाहता है। वह अल्प शास्त्रों के ज्ञाता से सदा डरा करता है कि वह मुझे मार न डाले— इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपवृंहयेत् । विभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरेदिति ।। (महाभारत) देवीभागवत तो पुराण को पुरुष का हृदय बताता है। इससे बढ़कर पुराण की महिमा क्या हो सकती है ?— श्रुतिस्मृती उभे नेत्रे पुराणं हृदयं स्मृतम् । एतत्त्रयोक्त एव स्याद् धर्मो नान्यत्र कुत्रचित् ।। (दे० भा० ११।१।२१) ऐसे महामहिमाशाली पुराण के कतिपय तथ्यों का रहस्य बिना समझे कुछ लोग अनर्गल दोषारोपण करते हैं। उनका उत्तर देना अनुपयुक्त न होगा। रहस्यानभिज्ञ लोगों का कहना है कि पुराणों में ब्रह्मा का दुहितृगमन, चन्द्रमा का गुरुपत्नीगमन, इन्द्र का अहल्यागमन आदि कतिपय प्रसंग अश्लील एवं अनर्थकारी होने से पुराण-साहित्य अपठनीय है। ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि पुराण-साहित्य समुद्र के समान दुस्तर है, किन्तु कल्याणकारी विषय-रत्न से भरपूर है। ऐसे लोगों को अपनी शंका का समाधान ढूंढ़ना चाहिए, न कि पुराणों पर आक्षेप करना चाहिए। उक्त शंकाओं का समाधान प्राचीनकाल में कुमारिल भट्ट ने अपने 'तन्त्रवार्तिक' में किया है और आधुनिककाल में माधवाचार्य ने 'पुराण-दिग्दर्शन' में और महामहोपाध्याय गिरिधर शर्मा ने 'पुराण-अनुशीलन, में किया है। शर्मा जी ने पहले 'ब्रह्मा का दुहितृगमन' प्रसंग का उत्तर इस प्रकार दिया है— 'श्रीमद्भागवत (३।१२।२८) में इस प्रकार आया है— वाचं दुहितरं तन्वीं स्वयम्भूर्हरतीं मनः । अकामा चकमे सक्तः सकाम इति नः श्रुतम् ।।

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