भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 14, कुल 1008 में से

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( ५ ) किन्तु इस श्लोक के वास्तविक रहस्य को नहीं समझने के कारण ही अज्ञानी लोग गलत अर्थ के शिकार होते हैं । श्रीमद्भागवत का यह श्लोक ऋग्वेद की निम्नांकित ऋचा के आधार पर ही लिखा गया है— कामस्तदग्रे समवर्त्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् । अर्थात्, सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मा को सर्वप्रथम अपने को बहुत रूपों में प्रकट करने की इच्छा हुई । ऐसी इच्छा 'काम' कहलाती है और वह 'काम' मन का रेत (वीर्य) है । इससे स्पष्ट है कि सृष्टि की कामना से पहले मन की उत्पत्ति होती है । और वह मन ही प्राणपूर्वक 'वाक्' को उत्पन्न करता है । इस कारण, मन प्रजापति कहलाया और वाक् मन की पुत्री कहलाई । फिर, मन ही उस 'वाक्' में अपना रस देता है, जो वाक् के साथ उसका समागम कहा गया है । मन की अपेक्षा वाक् सूक्ष्म होती है, अतः वह 'तन्वी' कही गई है । काम तो मन का ही धर्म है, अतः वाक् को 'अकामा' और मन को 'सकाम' कहा गया है । सृष्टि में सर्वप्रथम मन ही उत्पन्न हुआ, अतः वह 'स्वयम्भू' भी कहा जाता है । श्रीमद्भागवत के उक्त श्लोक के आगे वर्णन मिलता है कि मरीचि आदि मुनियों ने प्रजापति के इस कार्य का विरोध किया और प्रजापति ने भी शरीर त्याग दिया, जिससे 'नीहार' की उत्पत्ति हुई । इसका तात्पर्य यह होता है कि इच्छा को दबाना चाहिए, उसे वाणी के द्वारा प्रकट नहीं करना चाहिए । वाणी के द्वारा इच्छा जब प्रकट हो जाती है, तब वह मन नष्ट हो जाता है । इस तरह की सारी सृष्टि तमोगुण के आधिक्य से प्रकट होती है । ऐसे ही तमोगुण से नीहार की उत्पत्ति होती है । प्रजापति तो त्रिगुणात्मक है ही । उसके तीनों गुणों के ही कार्य सृष्टि में होते हैं । इस प्रसंग का दूसरा पक्ष ब्राह्मणग्रन्थों में दिया गया है— प्रजापतिर्वे स्वां दुहितरमभ्यध्यायत् । दिवमित्यन्ये आहुः उषसमित्यन्ये ।। —ऐतरेयारण्यक । अर्थात्, "सूर्य का प्रकाश आने से पूर्व जो प्रभा फैलती है, वह उषा कहलाती है। वह उषा सूर्य से ही उत्पन्न होती है, इसलिए वह सूर्य की पुत्री कही जाती है ।" फिर, सूर्य ही उसमें प्रकाशरूप बीज देता है। यही रहस्य सूर्य का दुहितृगमन माना जाता है । सूर्य अपनी दुहिता उषा के पीछे-पीछे लगा रहता है और उषा सूर्य की कान्ति से ही पुष्ट होती है । इसका संकेत इस प्रकार मिलता है— सूर्यो देवीमुषसं रोचमानां मर्यो न योषामभ्येति पश्चात् । इसका भी तात्पर्य यही है कि जिस प्रकार कोई पति अपनी स्त्री के साथ-साथ घूमता है, उसी प्रकार सूर्य भी उषा के पीछे-पीछे चलता है । ऐतरेयारण्यक की तरह इस बात को ऐतरेय ब्राह्मण (१३।६) भी निम्नलिखित वाक्यों में स्पष्ट करता है— प्रजापतिः स्वां दुहितरमभ्यध्यायत् दिवमित्यन्ये उपसमित्येके इत्यादि । अर्थात्, “सूर्योदय से कुछ पूर्व जो प्रकाश आता है, उसे उषा कहते हैं । वह उषा सूर्य से ही पैदा होती है, इसलिए वह सूर्य की दुहिता मानी गई है ।” यहाँ भी उषा में सूर्य द्वारा प्रकाश दिये जाने के कारण उसे

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