भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 15

( ६ )

वीर्य-दान माना गया है एवं सर्वत्र उषा आगे-आगे चलती है और सूर्य उसके पीछे लगा रहता है, यहां स्त्री का अनुगमन माना गया है। इसी प्रकार 'चन्द्रमा का गुरुपत्नीगमन' प्रसंग का उत्तर देखिए— चन्द्रमा का अपने गुरु बृहस्पति की पत्नी के साथ सहवास का उल्लेख भी पुराणों में मिलता है। उस पर भी स्वभावतः यह आशंका होती है कि देवता होते हुए भी चन्द्रमा ने ऐसा क्यों किया ? परन्तु इस आख्या- यिका का भी नक्षत्र-परक अर्थ आकाशविज्ञान के विश्लेषण से स्पष्ट हो जाता है। गुरु का अर्थ है—बृहस्पति । पहले के ज्योतिर्विद् विद्वान् बृहस्पति के ही सम्बन्ध से गणना आरम्भ करते थे। बाद के ज्योतिर्विदों ने चन्द्रमा के अनुसार गणना प्रारम्भ कर दी। बृहस्पति के अनुसार जो तारा- गणना होती है, वही चन्द्रमा के अनुसार भी उत्पन्न हो जाती है, जिसे पौराणिक आख्यान की शैली में कहा गया कि बृहस्पति की तारा चन्द्रमा ने छीन ली। इस प्रकार से सभी आख्यान केवल तारा-मण्डल के वर्णन-स्वरूप हैं, इसमें अश्लीलता की कोई बात नहीं। इसी तरह 'इन्द्र का अहल्या' प्रसंग भी प्रतीकात्मक आख्यान है। इन्द्र-अहल्या का समागम भी इसी प्रकार एक प्रतीकात्मक आख्यान है। इस प्रतीकात्मक आख्यान को समझने के पहले 'अहल्या' और 'गौतम'— इन शब्दों का रहस्यार्थ जान लेना आवश्यक है। व्याकरण की रीति से 'अहल्या' शब्द का अर्थ होता है— अह्ना यम्यते, अहो यमयति वा सा अहल्या । अर्थात् जो रात्रि के द्वारा समाप्त किया जाय अथवा जिसको दिन समाप्त करे, वह अहल्या है। अतः, 'अहल्या' नाम रात्रि का हुआ। इसी प्रकार 'गौतम' शब्द का अर्थ होता है— गौ = पृथ्वी से प्रादुर्भूत होने वाली काली किरणें। पृथ्वी से काली ही किरणें निकला करती हैं और वे प्रकाश से दब जाती हैं, इसलिए वे किरणें लोक में प्रतीत नहीं होतीं। इस आख्यान में कहा गया है कि इन्द्र अहल्या के पास जब गया, तब उसने चन्द्रमा को कुक्कुट पक्षी बनाया। इतना तो सभी जानते हैं कि चन्द्रमा के दो पक्ष होते हैं, इसीलिए वह पक्षी कहा गया है। इन्द्र प्रकाश का देवता है, जिसके सम्बन्ध में श्रुति कहती है— यथाग्निगर्भा पृथिवी यथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिणी । अर्थात्, जिस प्रकार पृथिवी अग्निगर्भा है, उसी प्रकार अन्तरिक्ष इन्द्र के द्वारा गर्भवान् बना हुआ है। अतः इन्द्र प्रकाश का देवता है। दिन में तो प्रकाश का साम्राज्य रहता ही है, किन्तु अहर्या, अर्थात् रात्रि में जब इन्द्र अर्थात् प्रकाश का देवता जाने लगा, तब उसने चन्द्रमा का आधार लिया। इसी आधार के लिए उसने चन्द्रमा को पक्षी बनाया। यह तो बिलकुल स्पष्ट है कि चन्द्रमा अपने दो पक्षों के द्वारा ही प्रकाश ग्रहण करता है और देता है। चन्द्रमा के बिना अहल्या (रात्रि) इन्द्र (प्रकाश) को प्राप्त नहीं कर सकती, अर्थात् प्रकाश (इन्द्र) ही रात्रि के पास जा सकता है। अतः इस तरह प्रकाश का देवता इन्द्र चन्द्रमा के साहाय्य से अहल्या-रात्रि के साथ समागम करता है और यह समागम पूर्णिमा के दिन पूर्ण रूप से होता है। कथा में वर्णित है कि जब 'गौतम' रात समझकर लौट आये, तब अपनी स्त्री के पास इन्द्र को देखकर उन्होंने शाप दिया कि जा दुष्ट, तू ने भग के लिए ऐसा दुराचार किया है अतः तू सहस्र-भग हो जा। 'सहस्रभग' का अर्थ होता है—सहस्रेषु भेषु नक्षत्रेषु गच्छति, अर्थात् हजार ताराओं में गमन करके टिमटिमाने वाला। यही कारण है कि इन्द्र सहस्र नेत्र वाला कहा जाता है। वहाँ 'भग' नेत्र-रूप में परिणत मान लिये गये हैं। इस प्रकार यह भी ताराओं का या देवताओं का पौराणिक भाषा में चरित्र-चित्रण किया गया है। इसमें आक्षेप-योग्य कोई बात नहीं है। ऋषि ने अपनी स्त्री को शिला हो जाने का शाप दिया, उसका आशय है कि