भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 1008 में से

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द्वितीयोऽध्यायः ११ दंष्ट्राङ्कुरेण योऽनन्तः समुद्धृत्यार्णवाद्वराम् । तस्थाविदं जगत्कृत्स्नं वाराहं तं नतोऽस्म्यहम् ॥३८॥ प्रह्लादं गोपयन्दैत्यं शिलातिकठिनोरसम् । विदार्य हतवांस्त्यो हि तं नृसिंहं नतोऽस्म्यहम् ॥३९॥ लब्ध्वा वैरोचनेर्भूमिं द्वभ्यां पद्भ्यामतीत्य यः । आब्रह्मभुवनं प्रादात्सुरेभ्यस्तं नतोऽजितम् ॥४०॥ हैहयस्यापराधेन ह्येकविंशतिसंख्यया । क्षत्रियान्वयभेत्ता यो जामदग्न्यं नतोऽस्मि तम् ॥४१॥ आविर्भूतश्चतुर्द्धा यः कपिभिः परिवारितः । हतवान्राक्षसानीकं रामचन्द्रं नतोऽस्म्यहम् ॥४२॥ मूर्तिद्वयं समाश्रित्य भूभारमपहृत्य च । संजहार कुलं स्वं यस्तं श्रीकृष्णमहं भजे ॥४३॥ भूर्यादिलोकत्रितयं संतृप्तात्मानमात्मनि । पश्यन्ति निर्मलं शुद्धं तमीशानं भजाम्यहम् ॥४४॥ युगान्ते पापिनो शुद्धान्भित्त्वा तीक्ष्णसुधारया । स्थापयामास यो धर्मं कृतादौ तन्नमाम्यहम् ॥४५॥ एवमादीन्यनेकानि यस्य रूपाणि पाण्डवाः । न शक्यं तेन संख्यातुं कोट्यब्दैरपि तं भजे ॥४६॥ महिमानं तु यन्नाम्नः परं गंतुं मुनीश्वराः । देवासुराश्च मनवः कथं तं क्षुल्लको भजे ॥४७॥ यन्नामश्रवणेनापि महापातकिनो नराः । पवित्रतां प्रपद्यन्ते तं कथं स्तौमि चाल्पधीः ॥४८॥ यथाकथंचिद्यन्नाम्नि कीर्तिते वा श्रुतेऽपि वा । पापिनस्तु विशुद्धाः स्युः शुद्धा मोक्षमवाप्नुयुः ॥४९॥ आत्मन्यात्मानमाधाय योगिनो गतकल्मषाः । पश्यन्ति यं ज्ञानरूपं तमस्मि शरणं गतः ॥५०॥ साङ्ख्याः सर्वेषु पश्यन्ति परिपूर्णात्मकं हरिम् । तमादिदेवमजरं ज्ञानरूपं भजाम्यहम् ॥५१॥ सर्वसत्त्वमयं शान्तं सर्वं द्रष्टारमीश्वरम् । सहस्रशीर्षकं देवं वन्दे भावात्मकं हरिम् ॥५२॥


समुद्र-मग्न पृथ्वी को खींचकर उस सम्पूर्ण संसार की स्थापना की, उस भगवान् वाराह को नमस्कार करता हूँ। जिसने प्रह्लाद की रक्षा करते हुए चट्टान से भी कठिन छाती को फाड़कर दैत्य हिरण्यकशिपु को मार डाला उस नृसिंह को नमस्कार है। जिसने विरोचन के पुत्र बलि से भूमि का दान प्राप्त कर उसको दो ही डगों से नाप डाला और ब्रह्मलोक पर्यन्त भुवन देवों को दे दिया उस अजित वामन को नमस्कार है। हैहय के अपराध के कारण इक्कीस बार क्षत्रिय वंश का नाश करने वाले जो देव परशुराम हैं उनको नमस्कार करता हूँ। जिसने चार १रूपों में प्रकट होकर बन्दरों की सहायता से राक्षसों की सेना का वध किया उस रामचन्द्र को नमस्कार करता हूँ। जिसने दो रूपों में (बलराम-कृष्ण) अपने को व्यक्त कर भू-भार को दूर किया और स्वयं अपने कुल का भी संहार कर डाला उस भगवान् श्रीकृष्ण को नमस्कार है। योगी लोग अपने आत्मा में भू आदि तीनों लोकस्वरूप जिस पूर्णात्मा को देखते हैं, उस निर्मल एवं शुद्ध प्रभु का मैं भजन करता हूँ। जिस भगवान् ने युग के अन्त में (खड्ग की) तीक्ष्ण धार से अपवित्र पापियों को नष्ट कर कृतयुग के आदि में धर्म की स्थापना की उस कल्कि भगवान् को नमस्कार है ॥३८-४५॥ पाण्डवो ! ऐसे जिसके अनेकों रूप हैं जिसकी गणना करोड़ों वर्षों में भी नहीं की जा सकती है, उस भगवान् को मैं नमस्कार करता हूँ। जिसके नामों की महिमा का मुनीश्वर, देव, असुर और मनुष्य भी पार नहीं पा सकते हैं, उसको मुझ जैसा क्षुद्र व्यक्ति कैसे भजेगा ? जिसके नाम श्रवण मात्र से महापापी मनुष्य भी पवित्र हो जाते हैं, उसकी स्तुति मेरे समान क्षुद्र बुद्धि कैसे कर सकता है ? जिस किसी प्रकार से जिसके नाम श्रवण या कीर्तन से पापी पापमुक्त हो जाते और शुद्ध भक्त मोक्ष पा जाते हैं और अपने में ही (अन्तःकरण- रूप परम तत्त्व में) अपना ध्यान लगाकर निष्पाप योगी जिस ज्ञानरूप ब्रह्म को देखते हैं, उस ब्रह्म की शरण में मैं प्राप्त हूँ। ज्ञानी व्यक्ति जिस परिपूर्ण ब्रह्म को चराचर में देखते हैं उस आदि देव, अजर ज्ञान रूप ब्रह्म की आराधना करता हूँ ॥४६-५१॥ सकल प्राणिमय, शान्त, सर्वज्ञ, सर्वद्रष्टा, ईश्वर और सहस्र शिर वाले देव एवं भावरूप हरि

१. यहाँ चारों भाइयों से तात्पर्य है।

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